वन्यजीव न्यायालयिक विज्ञान

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वन्यजीव न्यायालयिक विज्ञान (wildlife forensic science) न्यायालयिक विज्ञान की वह शाखा है जिसमें वन्य जीवन से जुड़े कानूनी मामले आते हैं। उदाहरण के लिए संरक्षित वन्यजीवों के अंग बेचना या उनकी चोरी करना, अन्य देश से प्रतिबंधित वन्यजीव उत्पाद मँगाना, खरीदना या बेचना।

प्रयोगशाला एवं संगठन[संपादित करें]

कई देशों में वन्यजीव न्यायालयिक विज्ञान की प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं।

वन्यजीव संरक्षण कानून[संपादित करें]

जंगली जानवरो को जीवित पकड़ना या उनकी मृत देह या उसके किसी भाग का व्यापार करना कानूनी अपराध है। इन अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए भारत सरकार ने कई कानून और नियम बनाए हैं। जेसे की वन्यजीव संरक्षण अधिनियम १९७२। उन अपराधों के लिए जिसमें वन्य जीव (या उनके शरीर के अंश)— जो कि इस अधिनियम की सूची 1 या सूची 2 के भाग 2 के अंतर्गत आते हैं— उनके अवैध शिकार, या अभ्यारण या राष्ट्रीय उद्यान की सीमा को बदलने के लिए दण्ड तथा जुर्माने की राशि बढ़ा दी गई है। अब कम से कम कारावास 3 साल का है जो कि 7 साल की अवधि के लिए बढ़ाया भी जा सकता है और कम से कम जुर्माना रु 10,000- है। दूसरी बार इस प्रकार का अपराध करने पर यह दण्ड कम से कम 3 साल की कारावास का है जो कि 7 साल की अवधि के लिए बढ़ाया भी जा सकता है और कम से कम जुर्माना रु 25,000/- है।

उपयोग[संपादित करें]

वन्यजीव न्यायालयिक विज्ञान कई क्षेत्रों में उपयोगी है। यह वन्य जीव संबंधी कई तथ्यों का पता लगा सकता है। जैसे कि-

  • किसी अपराधिक स्थान पर जंगली जानवर के होने के सबूत
  • जंगली जानवर के शरीर की तस्करी करने वालो को पकड़ना।
  • जंगल में हुई मृत्यु के पशु या मनुष्य द्वारा किए जाने का पता लगाना
  • वन्यजीव की सुरक्षा करना।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • Wildlife Forensics Laboratory". Law enforcement division. California Department of Fish and Wildlife. Retrieved 17 May 2014
  • U.S. Department of State (8 November 2007). "The coalition against wildlife trafficking: working together to end the illegal trade in wildlife" (PDF). Retrieved 17 May 2014.