लुसियन

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लूसियन (लगभग ११७ - १८० ई.) यूनानी वक्ता तथा लेखक। वह अपनी आलंकारिक एवं वैधिक वक्तृताओं तथा हास्य व्यंग्य संवादों के लिए प्राचीन साहित्य के इतिहास में प्रसिद्ध है।

परिचय[संपादित करें]

लुसियन सीरिया में, फरात नदी के किनारे स्थित सैमोसाता नगर के मूर्तिकार परिवार में उत्पन्न हुआ था। प्रारंभ में अपने चाचा से मूर्तियाँ बनाना सीखा, किंतु बाद में उसकी रुचि बदल गई और उसने सोफिस्त विचारकों की आलंकारिक एवं वैधिक संभाषण कला का अध्ययन किया। कुछ समय तक, वह अंतिओक नामक स्थान पर, वकालत करता रहा, पर इस व्यवसाय में उसे कोई विशेष सफलता प्राप्त न हुई। अतएव न्यायालय के दायरे से निकलकर वह सोफिस्त वक्ता बन गया। इस नए व्यवसाय के सहारे उसने एशिया माइनर, मकदूनिया, यूनान, इटली और गाल का भ्रमण किया। रोम में प्लेटो के मतानुयायी निग्रीनस से उसकी मुलाकात हुई थी। १६५ ई. के आसपास वह स्थायी रूप से यूनान के एथेंस नगर में बस गया। वहीं उसने अपने जीवन का शेष भाग लगभग पूरा कर लिया था। इसी काल में उसने लेखनकार्य किया।

लूसियन का युग पुराने विश्वासों के ह्रास का युग था। पुरानी परंपराएँ, जो जीवित भी थीं, अपना अर्थ खो चुकी थीं। युग की प्रवृत्तियों के अनुरूप उसने व्यंग्य साहित्य का प्रणयन प्रारंभ किया। उसे अच्छी सफलता मिली। अंतिम दिनों में वह मिस्र देश में किसी उच्च पद पर नियुक्त हो गया था। वहीं उसकी मृत्यु हुई।

कृतियाँ[संपादित करें]

लूसियन के नाम पर लगभग ७९ गद्य ग्रंथ, २ उपहासात्मक त्रासदियाँ तथा ५३ सूक्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इन रचनाओं की प्रामाणिकता के संबंध में कोई निश्चित स्थापना नहीं की जा सकती। उचित रूप में क्रमनिर्धारण भी संभव नहीं। केवल यही कहा जा सकता है कि उसने अपरिपक्व अवस्था में आलंकारिक तथा प्रौढ़ होने पर व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग किया होगा। उसके विस्तृत साहित्य की मुख्य प्रवृत्तियाँ इस प्रकार हैं -

  • (१) आलंकारिक संभाषण - लूसियन के वे संवाद भी हास्यप्रधान ही हैं, जिनमें सोफिस्तो की आलंकारिक शैली के संभाषणों का समावेश किया गया है। उदाहरण के लिए, उसके 'टिरेनीसाइड' (आतताई वध) में, एक पुरुष किसी आतताई की हत्या करने जाता है। उसे वह आतताई नहीं, उसका पुत्र मिलता है, जिसे वह तलवार भोंककर मार डालता है। किंतु मृत्यु देखकर वह इतना सहम जाता है कि तलवार उसके शरीर में धँसी हुई छोड़कर भाग जाता है। आतताई आता है तो अपने पुत्र को मरा हुआ देखकर, भावावेश में वही तलवर जिससे उसके पुत्र का वध हुआ था, खींचकर आत्महत्या कर लेता है। यह समाचार पाकर पुत्र का वध करनेवाला प्रकट होता है और आतताई का वध करने की घोषणा करता है।
  • (२) जीवनियाँ - लूसियन की कुछ रचनाओं का आकार जीवन कथाओं का है। इनमें 'पेरेग्रिनस' बहुत महत्वपूर्ण है। पेरिअम निवासी पेरेग्रिनस ईसाई था, किंतु बाद में वह सिनिक मतानुयायी हो गया। अंत में उसने धर्मत्याग के पश्चाताप के कारण, ओलिंपिया के समीप हार्पीन नामक स्थान पर, खुले आम चिता में जलकर प्रायश्चित्त किया। यह घटना १६५ ई. के आस पास की है। लूसियन के पेरेग्रिनस को, अपनी आँखों, चिता में जलते देखा था। पेरेग्रिनस की कथा में उसने ईसाई धर्मावलंबियों पर बीच-बीच में कुछ फबतियाँ कसी हैं, जिनके कारण उसकी यह पुस्तक काफी प्रसिद्ध हो गई है।
  • (३) रूमानी कथाएँ - इस श्रेणी की पुस्तकों में 'लूकियस, अथवा गधा' उल्लेख के योग्य है। दूसरी शताब्दी के एक अन्य लेखक, एप्यूलियस ने इसी पुस्तक से प्रेरणा प्राप्त कर, 'रूपांतर, अथवा सोने का गधा' शीर्षक कथा लिखी थी, जो आजकल, ट्रास्फार्मेशंस ऑव लूकियस ऑर द गोल्डेन ऐस शीर्षक से 'पेलिकन सिरीज़' में उपलब्ध है। इसमें लूकियस अपने एक मित्र के घर मेहमानी करने जाता है और वहाँ रात में देखता है कि उसके मित्र की पत्नी, सबके सो जाने पर, अपने जादू के पिटारे से कोई मरहम निकालकर अपने शरीर में मलती है और चिड़िया बन जाती है। लूकियस को यह बहुत अच्छा लगा और एक रात, मौका पाकर, उसने भी एक मरहम निकाल कर लगा लिया। किंतु वह गधा बन गया। इस जीवन में वह जाने कहाँ कहाँ मारा फिरता रहा, जाने कितने दु:ख सहे और अपनी आँखों, संसार के कितने ही कुकृत्य देखे। उस समय की सामाजिक दशा पर यह एक तीखा व्यंग है।

इस श्रेणी की दूसरी पुस्तक 'सत्य कथा' है। इसमें जलयात्रियों के एक जत्थे के, जो 'हरक्यूलिस के स्तंभों' से रवाना हुआ था, साहसिक अनुभवों का वर्णन किया गया है। उनका जलपोत वायुमंडल में चला जाता है, जहाँ चंद्रमा और सूर्य के बीच उषा नक्षत्र पर अधिकार का निबटारा करने के लिए युद्ध छिड़ा हुआ था। यात्रियों ने चंद्रमा की ओर से युद्ध में भाग लेकर अपूर्व शौर्य प्रदर्शन किया। लूसियन की इस उपहासात्मक वीर गाथा को अंग्रेज लेखक जोनेथन स्विफ्ट के 'गलीवर्स् ट्रेवेल्स्' का आधार माना जाता है।

  • (४) व्यंग्य संवाद - यों तो लूसियन का संपूर्ण साहित्य हास्य और व्यंगमय है, पर कुछ कृतियों में लूसियन के व्यंग्य का आशय अधिक स्पष्ट है। 'निग्रीनस' में एक दार्शनिक ऊँचे बैठा बैठा एक रंगशाला में झाँकता और हँसता है। रंगशाला में बड़ी भीड़ है और पात्रों के क्रियाकलाप में कोई साम्य नहीं। स्पष्टतया लूसियन की रंगशाला संसार के अतिरिक्त कुछ नहीं, जिसके बेमेल व्यापारों को देखकर, दार्शनिक, जो बुद्धिमान् है, उपेक्षापूर्ण हँसी हँसता है। 'मेनिप्पस' नामक संवाद में तो लूसियन ने अपना मत स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया है -
वही पात्र अभी क्रिऑन के रूप में आता है, सभी प्रायम, अथवा ऐग्मेम्नन बन जाता है, ....नाटक समाप्त होते होते अपने को साधारण मनुष्य पाता है।

'आक्श्न ऑव फ़िलॉसॉफर्स्' (दार्शनिकों का नीलाम) में तो लूसियन ने सुकरात, अरस्तू आदि महान् दार्शनिकों को, बाजार में खड़ा कराकर, सबसे अधिक दाम लगानेवालों के हाथ बिकवाकर, साफ साफ कह दिया है कि प्राचीन काल के भव्य भवनों में सियार और भेड़ियों ने डेरे डाल रखे हैं।

  • (५) साहित्यसमीक्षा - हास्य व्यंग्य का प्रचुर साहित्य निर्मित करने के साथ ही लूसियन ने उचित साहित्य के निर्माण के संबंध में काफी सुझाव छोड़े थे। इतिहासलेखन के प्रसंग में तो उसने बहुत ही सुंदर शब्दों में कहा था -
मैं चाहूँगा कि इतिहासकार बहुत ही निडर और पक्षपातरहित हो। उसे स्वतंत्र, स्पष्टवादिता तथा सत्य का प्रेमी होना चाहिए। वह अंजीर को अंजीर और कुदाल को कुदाल कह सके। घृणा और प्रेम से उसे कोई मतलब नहीं। ....वह सोचता ही नहीं कि उसे कोई क्या कहेगा। वह तथ्यों को जैसे वे घटित हुए थे, बताता है।