राम रथ यात्रा
| तिथि | 25 सितंबर – 30 अक्टूबर 1990 |
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| अयोध्या विवाद |
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| मुख्य विषय |
| संगठन |
राम रथ यात्रा एक राजनीतिक और धार्मिक रैली थी, जो सितंबर से अक्टूबर 1990 तक चली थी। इसका आयोजन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके हिंदू राष्ट्रवादी सहयोगियों द्वारा किया गया था। इसका नेतृत्व भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। यात्रा का उद्देश्य विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और संघ परिवार में उसके सहयोगियों के नेतृत्व में आंदोलन का समर्थन करना था, ताकि बाबरी मस्जिद की जगह पर हिंदू देवता राम का मंदिर बनाया जा सके।[1]
मस्जिद, 1528 में इस क्षेत्र की मुगल विजय के बाद अयोध्या शहर में बनाई गई थी।1980 के दशक में, विहिप और संघ परिवार के अन्य सहयोगियों ने इस स्थल पर राम का मंदिर बनाने के लिए एक आंदोलन शुरू किया, जिसमें भाजपा ने आंदोलन को राजनीतिक समर्थन दिया। 1990 में, वीपी सिंह के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने मंडल आयोग की कुछ सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया, और घोषणा की कि सत्ताईस प्रतिशत सरकारी नौकरियों को निचली जाति की पृष्ठभूमि के लोगों के लिए आरक्षित किया जाएगा। इस घोषणा से भाजपा के चुनावी क्षेत्र को खतरा था, जिसने मुस्लिम विरोधी भावना को लामबंद करके हिंदू वोट को एकजुट करने के लिए अयोध्या विवाद का इस्तेमाल करने का फैसला किया।[1]
इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए, भाजपा ने पूरे देश में अयोध्या तक "रथ यात्रा" की घोषणा की। रथ यात्रा का नेतृत्व लालकृष्ण आडवाणी ने किया था, और इसमें संघ परिवार के हजारों स्वयंसेवक शामिल थे। सैकड़ों गांवों और शहरों से होकर गुजरी यात्रा 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ में शुरू हुई। इसने प्रतिदिन लगभग 300 किलोमीटर की यात्रा की, और आडवाणी अक्सर एक ही दिन में छह जनसभाओं को संबोधित करते थे। इस यात्रा ने हिंदुओं में धार्मिक और उग्रवादी दोनों भावनाओं को उभारा, और यह भारत के सबसे बड़े जन आंदोलनों में से एक बन गया।[2]
यात्रा ने उत्तर भारत के शहरों में दंगों के साथ, इसके मद्देनजर धार्मिक हिंसा भी शुरू कर दी। परिणामस्वरूप, आडवाणी को बिहार सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि यात्रा उस राज्य से गुजरती थी। उनके 150,000 समर्थकों को भी उत्तर प्रदेश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया था। फिर भी हजारों कार्यकर्ता अयोध्या पहुंचे और मस्जिद पर धावा बोलने का प्रयास किया। जिसके परिणामस्वरूप सुरक्षा बलों के साथ घमासान युद्ध हुआ जिसमें 20 लोग मारे गए। इन घटनाओं के कारण पूरे देश में हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए।[3] खासकर उत्तर प्रदेश राज्य के नागरिक इन दंगों के शिकार होते थे। इन दंगों के बाद, भाजपा ने केंद्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया, जिससे जल्दी संसदीय चुनाव हुए। यात्रा के कारण हुए धार्मिक ध्रुवीकरण के बल पर भाजपा को राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर इन चुनावों में महत्वपूर्ण लाभ हुआ।
बाहरी कड़ियाँ
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- Jaffrelot, Christophe (2009). "The Hindu nationalist reinterpretation of pilgrimage in India: the limits of Yatra politics". Nations and Nationalism. 15 (1): 1–19. डीओआई:10.1111/j.1469-8129.2009.00364.x.
- Panikkar, K.M. (July 1993). "Religious Symbols and Political Mobilization: The Agitation for a Mandir at Ayodhya". Social Scientist. 21 (7): 63–78. डीओआई:10.2307/3520346. जेस्टोर 3520346.
- Srinivas, M.N. (30 March 1991). "On Living in a Revolution". Economic and Political Weekly. 26 (13): 833–835. जेस्टोर 4397472.