मातरीकुंडीया बांध

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मातृकुंडिया - मेवाड़ का हरिद्वार[संपादित करें]

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Bachan Singh Jalthaniya


मातृकुंडिया - मेवाड़ का हरिद्वार

मातृकुंडिया मेवाड़ का अत्यंत प्राचीन तीर्थ स्थल है  यहाँ के बारे में आमजन में ऐसी मान्यता है की यहाँ के कुंड में नहाने वाले को  सभी पापो से मुक्ति प्राप्त हो जाती है और यहाँ जिसकी अस्थिया विसर्जित की जाती है उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है इसी कारण प्रतिवर्ष हजारो  श्रद्धालु अपने दिवंगत परिजनो की अस्थिया विसर्जित करने यहाँआते  है और इसी कारण मातृकुंडिया को मेवाड़ का हरिद्वार भी कहा जाता है|

जनश्रुति तथा पौराणिक कथा के अनुसार मातृकुंडिया से थोडा आगे झाडेश्वर महादेव का प्राचीन स्थान है जहा किसी  समय परशुराम जी के पिता ऋषि जमदग्नी का आश्रम था जहा ऋषि जमदग्नि अपनी पत्नी रेणुका के साथ रहा करते थे | माता रेणुका प्रतिदिन ऋषि जमदग्नि के लिए पूजा हेतु  बनास नदी के तट पर प्रतिदिन मिटटी की मटकी बना कर उसमे जल भर कर लाया करती थी | एक बार जब रेणुका जल लाने वन में गई तो वहा से उनकी बहन के पति राजा सहस्त्रबाहू अपनी सेना के साथ निकले  जिनके वैभव को देख कर माता रेणुका के मन में ग्लानी पैदा हुई की वन में रहने वाले निर्धन ऋषि की पत्नी होने के कारण  वो अपनी बहन के पति को भोजन के लिए भी आमंत्रित नहीं कर सकती है और इसी उधेड़बुन के कारण माता रेणुका से मटकी नहीं बन पायी और वो पूजा हेतु जल नहीं ला पाई तो ऋषि जमदग्नि ने उनकी व्याकुलता का कारण पूछा तो उन्होंने अपने मन की व्यथा बताई | माता रेणुका के मन की बात जान कर ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु गौ माता का आह्वान किया जिस पर कामधेनु माता प्रगट हो गई और ऋषि जमदग्नि को राजा  सहस्त्रबाहु को सम्पूर्ण सेना के साथ इच्छानुसार भोजन हेतु आमंत्रित करने के लिए कहा | माता कामधेनु की आज्ञा से ऋषि जमदग्नि ने राजा सहस्त्र बाहू को सम्पूर्ण सेना के साथ भोजन हेतु आमंत्रित किया जिस पर राजा सहस्त्र बाहू ने व्यंग से ऋषि जमदग्नि से पूछा की सम्पूर्ण सेना के इच्छानुसार भोजन में क्या मेरी सैना के पशु भी आमंत्रित है? इस पर ऋषि जमदग्नि ने हा कहा मगर साथ ही ये कहा की आप हमारे अतिथि है और आपकी सेना में सभी को इच्छानुसार भोजन की प्राप्ति होगी राजन किन्तु ध्यान रहे कोई भी हमारी कुटिया में प्रवेश नहीं करेगा तब राजा सहस्त्र बाहू ने सहमती प्रदान करते हुवे ऋषि जमदग्नि का आतिथ्य ग्रहण किया |

राजा सहस्त्र बाहू की सम्पूर्ण सैना घने वन में इतना स्वादिष्ट भोजन कर चकित थी | राजा सहस्त्रबाहू  भी  वन में रहने वाले अपने निर्धन साढू के इस आतिथ्य से चकित थे और ऋषि जमदग्नि के सभी के कुटिया से दूर रहने के निवेदन से उनके मन में शंका पैदा हुई की जरुर इस भोजन का जादुई राज उस कुटिया में छिपा हुवा है और उसे जानने के लिए और उसे पाने के लिए वो ऋषि जमदग्नि के मना करने पर भी कुटिया की तरफ बढ़ने लगे जिस पर ऋषि ने माता कामधेनु को चेताने के लिए शंखनाद किया ताकि माता कामधेनु खतरे से  सावचेत हो जाए| माता कामधेनु ने ऋषि जमदग्नि के शंख की आवाज सुनते ही कुटिया से निकल कर हवा में उड़ने लगी जिस पर कामधेनु को पकड़ने के लोभ में राजा सहस्त्र बाहू ने तीर चलाये जिससे  एक तीर से माता कामधेनु का कान काट गया  और दूसरा तीर माता की नाभि में लगा जिससे रक्त गिरा | कहते है की माता कामधेनु के कटे कान के भूमि में गिरने से तंबाकू उत्पन्न हुवा तथा रक्त के भूमि में गिरने से वहां मेहंदी पैदा हुई| जब राजा सहस्त्र बाहू माता कामधेनु को नहीं पकड़ पाया तो उसने ऋषि जमदग्नि के गले पर तलवार रख कर कहा की वो उसे कामधेनु गाय दिलवाए अन्यथा वो उनके प्राण हर लेगा | तब ऋषि जमदग्नि ने तीन बार ताली बजा कर अपने पुत्र परशुरामजी को याद किया जो की वन में तपस्या में लीन थे | पिता की पुकार सुनकर परशुराम जी  मन के वेग से अपने पिता के पास पहुच गए और तत्काल ही राजा सहस्त्रबाहू की सम्पूर्ण सेना का नाश कर दिया और बाद में भगवान् शिव जी से प्राप्त फरसे से सहस्त्र बाहू की सारी भुजाओं को काट कर उसे परलोक भेज दिया और अपने माता  पिता के प्राणों की रक्षा की |

अपने माता पिता को पुन उनके आश्रम में  सकुशल छोड़ कर तपस्या हेतु पुन वन में जाने के लिए अपने पिता आज्ञा प्राप्त करने के लिए जब परशुराम जी अपने पिता ऋषि जमदग्नि के पास गए और उनसे पूछा अब मेरे लिए क्या आज्ञा है पिताजी? तो उनके पिता ने क्रोध में भर कर  कहा की  ये  सब घटनाक्रम  तुम्हारी माँ के कारण हुवा है इसलिए मेरी आज्ञा है तुम तत्काल अपनी माँ का सर धड से अलग कर दो | पिताजी की आज्ञा मानकर परशुराम जी ने तत्काल फरसे से अपनी माँ का सर काट दिया | अपने पिता की आज्ञा मानकर एक बार तो परशुराम जी ने अपनी माता का वध कर दिया तथा बाद में पिता के प्रसन्न होने पर उन्होंने अपने भाइयो तथा माता के पुन जीवित होने का तथा उन्हें किसी भी बात का स्मरण नहीं होने का वरदान भी प्राप्त कर लिया तथा उनकी माता पुन जीवित भी हो गई कितु बाद में भी वो  मातृहत्या के  पाप से दुखी रहने लगे और परशुराम जी को ऐसा प्रतीत हुवा मानो उनकी माता रेणुका का सर कट कर उनकी  पीठ से चिपक गया है | जब उन्होंने अपने पिता को ये बात बताई तो पिता ने कहा तुम्हे  मातृह्त्या के दोष से मुक्त होने के लिए तीर्थ स्थलों पर जाकर अपने पापो से मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिए | पिता की आज्ञा मानकर परशुराम जी ने सम्पूर्ण पृथ्वी के समस्त तीर्थ स्थलों पर जाकर मातृह्त्या के पाप से मुक्ति का प्रयास किया किन्तु उन्हें कही भी मुक्ति नहीं मिली उन्हें सदैव यही प्रतीत होता था की उनकी माता का सर उनकी पीठ से चिपका हुवा है|

जब परशुराम जी सम्पूर्ण पृथ्वी का चक्कर लगा कर पुन मंगलेश्वर महादेव के समीप गाँव में पहुचे तो एक रात को उन्होंने एक गाय और बछड़े को बात करते सूना जिसमे गाय अपने बछड़े से कह रही थी की उनके मालिक ने बछड़े को किसी और को बेच दिया है और वो सुबह उस बछड़े को ले जाएगा किन्तु बछड़ा अपनी माता से अलग नहीं होना चाहता था और अगले दिन सुबह परशुराम जी ने देखा की जो व्यक्ति बछड़े को लेकर जा रहा था बछड़े ने उसी को अपने सींगो से मार मार कर उसका वध कर दिया और वापस अपनी माँ के पास लौट आया | तब गौ माता ने उसे धिक्कारा और उसे कहा चल मेरे साथ मग्लेश्वर महादेव स्थित जल कुंड पर अब वाही स्नान करने पर तुझे अपने पापो से मुक्ति मिलेगी | परशुराम जी भी उस गाय और बछड़े के पीछे पीछे उस जल कुंड में चले गए और जैसे ही वो कुंड से बाहर निकले उन्हें ऐसा प्रतीत हुवा मानो उनकी माता का सर उनकी पीठ से अलग होकर आकाश में चला गया हो | तब परशु राम जी ने वहा स्थित मंगलेश्वर महादेव की पूजा की और उसके सम्मुख के जल कुंड को माँ तरी कुंड का नाम दिया क्योकि वही उनकी माता को मुक्ति और उन्हें मातृह्त्या के पाप से मुक्ति प्राप्त हुई थी कालान्तर में इस कुंड का नाम  मातृकुंडिया हो गया और श्रदालु लोह यहाँ अपने पापो से मुक्ति तथा अपने  दिवंगत परिजनों की अस्थियो को यहाँ इस मान्यता से की उन्हें यहाँ विसर्जित करने से मोक्ष प्राप्त हो जाएगा लाने लगे |

चित्तौड़ से मातृकुंडिया जाने का सबसे अच्छा मार्ग है  चित्तौड़ से कपासन रोड पर 20 किलोमीटर आगे जाने पर शनि मंदिर के आगे दाई और जाने वाले मोड़ में  मुड कर वाया भीमगढ़ और राशमी होते हुवे 26 किलोमीटर के बाद मातृकुंडिया आता है | इस सड़क मार्ग से चित्तौड़ से मातृकुंडिया की दुरी 46 किलोमीटर  है और  सड़क एकदम नयी बनी है| कपासन उदयपुर और चित्तौड़ रेल मार्ग से जुडा है तथा कपासन से मातृकुंडिया की दुरी 20 किलोमीटर है|

मैंने वहा आने वाले अन्य तीर्थ यात्रियों तथा वहा के स्थानीय निवासियों से मातृकुंडिया में आने वाले तीर्थ यात्रियों के समक्ष आने वाली परेशानियों के बारे में पूछा तो  प्राप्त जवाबो से लगा की इतना प्राचीन तीर्थ स्थल होने के बावजूद मातृकुंडिया में समुचित विकास कार्य नहीं हो पाये है | मंगलेश्वर मंदिर के पुजारीजी श्री कुंदनपूरी गोस्वामी जी ( मोबाईल-9587370615) तथा कचेडिया तेली समाज के पुजारी श्री मदन लाल सनाढ्य ( मोबाइल -9982998016) और वहा के स्थानीय निवासी और ठेकेदार श्री रमेश चन्द्र साल्वी ( मोबाइल - 9610199202)से जब मैंने पूछा के आप लोगो को  यहाँ क्या कमी लगती है तो वो सभी व्यंगात्मक  लहजे में बोले बस यहाँ कमियों की ही कमी नहीं है बाकी खूब कमीया है |  जब मैंने मैंने उनसे कमिया बताने के लिए आग्रह किया तो वे बोले

1- मातृकुंडिया में तीर्थ यात्रियों के ठहरने के लिए कोई सार्वजनिक धर्मशाला या गेस्टहाउस नहीं है| विभिन्न समाजो की पचास से ज्यादा निजी धर्मशालाए है  किन्तु महेश्वरी धर्मशाला को छोड़ कर एक भी धर्मशाला में किसी आम तीर्थ यात्री को ठहरने की अनुमति नहीं है | मंग्लेश्वर मंदिर के पास में ग्राम पंचायत द्वारा एक विश्राम गृह का निर्माण करवाया गया है किन्तु वो भी खराब हालत में है वहा पशु बैठे रहते है |

2- तीर्थ यात्रियों के लिए मंगलेश्वर मंदिर के पीछे और एक अन्य शौचालय को छोड़ कर स्त्रियों एवं पुरुषो के लिए सभी सुविधाओं युक्त एक भी सार्वजनिक शौचालय नहीं है जिसके कारण मातृकुंडिया आने वाले तीर्थयात्रियों को अत्यत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है| मंगलेश्वर मंदिर के पीछे स्थित शौचालय भी बदहाल स्थिति में है (फोटो सलग्न )

3-मंगलेश्वर मंदिर के बाहर पशुओ को रोकने के लिए एक रेलिंग अथवा कैटल गार्ड की जरुरत है जिसके अभाव में पशु घाटो पर और लक्ष्मण झूले में आ जाते है जिसके कारण तीर्थ यात्रियों को दिक्कत का सामना करना पड़ता है |

4- पीने के पानी की कोई सार्वजनिक व्यवस्था नहीं है सिवाय एक वाटर कूलर के जो की मंगलेश्वर मंदिर के बाहर हिन्दुस्तान जिंक द्वारा लगवाया गया है | धर्मशालाओं में समाजो द्वारा लगवाए गए है |

5- मातृकुंडिया के बस चोराहे पर रात में रौशनी की समुचित व्यवस्था नहीं है सिवाय एक सौर लेम्प के जिसके कारण रात्री में चोराहे की तरफ अन्धकार हो जाता है |

6- मातृकुंडिया में चिकित्सा तथा पुलिस चौकी  नहीं है जिसके कारण आने वाले तीर्थ यात्रियों को चिकित्सा एवं सुरक्षा व्यवस्था समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती है

7- मातृकुंडिया में किसी भी बैंक की शाखा अथवा  एक भी एटीएम् नहीं है जिसके कारण आज के जमाने के तीर्थ यात्री जो ATM के भरोसे रहते है को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है

8- मातृकुंडिया आने वाले सभी मार्गो पर मातृकुंडिया से सम्बन्धी दिशा निर्देशक पट्टिकाओ  साइन बोर्ड की कमी है तथा मातृकुंडिया में भी मंदिर के लिए अथवा मंदिर के इतिहास के सम्बन्ध में कही कोई सुचना पट्टिका नहीं है |

9-घाटों की नियमित साफ़ सफाई नहीं होती है और मंग्लेश्वर मंदिर के बाहर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री स्व० मोहनलाल सुखाडिया जी की मूर्ति के सामने एक कच्चा नाला बना हुवा है जिसके कारण गंदगी होती है उसे पक्का करवाया जाना चाहिए |

जब मैंने उन लोगो से पूछा की क्या सरकार ने अथवा जनप्रतिनिधियों ने यहाँ कोई काम नहीं करवाया ? तो सबने वर्तमान संसद महोदय श्री सी०पी0 जोशीजी द्वारा करवाए गए कार्यो की की खूब सराहना की और कहा सांसद महोदय ने स्वय यहाँ चार पांच दिन रह कर सारे तालाब के कीचड़ की सफाई करवाई तथा  घाटो की सफाई करवाई और घाटो के मध्य हाई मास्क लाइट लगवाई जिसके कारण यहाँ रात्री में समुचित रौशनी रहती है और सभी घाटो पर बनी छतरियो का रंग रोगन करवाया और जब भी सांसद महोदय यहाँ आते है कुछ न कुछ कार्य करवा कर ही जाते है| पूर्व सांसद महोदय ने भी खूब कार्य करवाए थे | तथा राजस्थान के पूर्व  मुख्यमंत्री स्व० मोहन लाल सुखाडिया जी ने यहाँ बाँध का निर्माण करवाया था | पर्यटन विभाग ने भी यहाँ राजस्थान पर्यटन विकास निगम के माध्यम से विकास कार्य करवाए थे जिसके अंतर्गत दुकानों का निर्माण, शौचालय का निर्माण, आदि करवाया गया था|

वर्तमान में माननीय मुख्यमंत्री महोदया ने मातृकुंडिया के विकास के लिए बहोत बड़ी योजना बनाई है जिसमे देवस्थान विभाग के माध्यम से मातृकुंडिया का विकास करवाया जाएगा तथा इस हेतु मास्टर प्लान भी तैयार करवाया जा चूका हैतथा मास्टर प्लान के अनुसार करवाए जाने वाले विकास कार्यो की डीपीआर आर.एस.आर.डी.सी. विभाग के माध्यम से बनवाई जा रही है |राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष श्री ओंकार सिंह लखावत जी इस हेतु यहाँ दो बार बैठक भी कर चुके है जिसमे यहाँ के स्थानीय जनप्रतिनिधि और विभागीय अधिकारी सम्मिलित थे| उम्मीद है जल्द ही इस प्राचीन धार्मिक तीर्थ स्थल का जीर्णोधार होगा|

Bachan Singh Jalthaniya