मागी

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प्राचीन ईरान में पारसी धर्म के पुजारियों को मागी कहते थे । इन्हें उच्च वर्ग का समझा जाता था । इस्लाम के आने के बाद ये ईरान के प्राचीन धर्म के प्रतीक बन गए और मुस्लिम धर्म की शराब-नृत्य-संगीत की मनाही के नियम के पालन करने के बाद इनकी छवि भौतिकतावादी पुजारियों की तरह हो गई । मध्यकाल के ईरानी कवियों तथा सूफ़ियों ने इनका ज़िक्र कई बार शराब पीने व विधर्मी लोगों के रूप में किया है । आधुनिक प़ारसी में इसे माग़ुन नाम से भी बुलाया जाता है । ग्यारहवीं सदी में लिखी ये फ़ारसी रचना -

गर मन ज़े मय-ए-मैग़ाने मस्तम्, हस्तम ।
वर आशिक़, व रिन्द व बुतपरस्तम, हस्तम ।
हर कस ख़याल-ए-ख़ुद गुमान दारन्द
मन मीदानम ख़ुद, हमचूँ हस्तम, हस्तम ।

(अगर मैं किसी माग़ी की दी शराब पीकर मस्त हूं, तो हूँ । अगर आशिक़, पाग़ल या मूर्ति पूजक हूँ तो हूँ । हर किसी को अपने बारे में शक है, मैं ख़ुद को जानता हूँ, जैसी हूँ, हूँ । इस्लामिक विचार में शराब पीना और मूर्तिपूजन दोनों मना हैं ।)