भारत में विधि व्यवसाय

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भारत में विधि व्यवसाय, अधिवक्ता अधिनियम १९६१ द्वारा शासित है। इस अधिनियम में भारतीय विधि व्यवसायियों से सम्बन्धित तथा भारतीय विधिज्ञ परिषद ( Bar Council of India) और राज्यों के विधिक परिषदों के गठन से सम्बन्धित नियम दिए गए हैं। यह भारतीय वकीलों के लिए एक सम्पूर्ण संहिताबद्ध विधि है जो समस्त भारत के वकीलों का निर्धारण करता है। यह अधिनियम वकीलों के पंजीकरण से लेकर अधिवक्ता प्रेक्टिस, सर्टिफिकेट निरस्तीकरण और अपील तक के सम्बन्ध में नियम प्रस्तुत करता है। अधिवक्ता अधिनियम द्वारा प्रदत्त अधिकारों के अधीन भारतीय विधिज्ञ परिषद ने "भारतीय विधिज्ञ परिषद नियम" के नाम से नियम बनाए हैं जिसमें वकालत, कानूनी शिक्षा और व्यावसायिक सुनीति (एथिक्स) के विषय में नियम हैं। अधिवक्ता अधिनियम में 60 धाराओं और कई उपधाराओं के अंर्तगत वकीलों के अधिकार तय किये गए हैं, एवं कुछ कर्तव्य भी वकीलों पर अधिरोपित किये गए हैं, तथा कुछ प्रावधान आम जनता को भी वकीलों के विरुद्ध कार्यवाही के अधिकार प्रदान करते हैं।

अधिवक्ता कौन है- अधिवक्ता अधिनियम की धारा 2 (1) के अंर्तगत किसी नामावली में दर्ज अधिवक्ता को अधिवक्ता माना जाता है। किसी राज्य की राज्य विधिज्ञ परिषद में दर्ज नाम होने पर व्यक्ति को अधिवक्ता माना जाएगा। राज्य विधिज्ञ परिषद में नाम दर्ज होने के लिए कुछ अर्हताएं भी रखी गयी हैं, जिनमे कुछ विशेष निम्न हैं-

  • अधिनियम की धारा 24 के अंर्तगत अर्हताओं में व्यक्ति भारत का नागरिक हो।
  • कोई विदेशी तब ही अधिवक्ता अधिनियम में नाम दर्ज करवाने के लिए योग्य होगा जब उस विदेशी के देश में भारत के नागरिक को विधि व्यवसाय करने का अधिकार होगा।
  • उसने २१ वर्ष की आयु पूरी कर ली हो।
  • उसने भारत के राज्यक्षेत्र के किसी विश्वविद्यालय से विधि की उपाधि अर्जित की हो।
  • वह व्यक्ति वह सभी शर्तें पूरी करता हो जो राज्य विधिज्ञ परिषद ने अधिवक्ता के लिए बनाये वियमों में विनिर्दिष्ट की है।
अधिवक्ता के लिए निरर्हता-
  • व्यक्ति नैतिक अधमता से संबंधित अपराध के लिए सिद्धदोष नहीं ठहराया गया हो।
  • व्यक्ति छुआछूत से संबंधित किसी आपराधिक कानून में सिद्धदोष नहीं ठहराया गया हो।
  • व्यक्ति किसी नैतिक अधमता के आरोप में किसी राज्य के सरकारी पद से पदच्युत नहीं किया गया हो।

कोई अन्य व्यक्ति विधि व्यवसाय नहीं कर सकता[संपादित करें]

अधिवक्ता अधिनियम की धारा 33 के अन्तर्गत केवल अधिवक्ता ही विधि व्यवसाय करने के अधिकारी होंगे, अधिवक्ता के अलावा कोई अन्य व्यक्ति विधि व्यवसाय नहीं कर सकता। अधिवक्ता भारत के किसी भी न्यायालय, प्राधिकरण, या व्यक्ति के समक्ष प्रेक्टिस कर सकता है जो साक्ष्य लेने का अधिकार रखता है। कोई व्यक्ति अधिवक्ता नहीं है तो वह न्यायालय के आदेश पर केवल अपने मामले की पैरवी कर सकता है, परन्तु विधि व्यवसाय नहीं कर सकता।

अधिवक्ता न्यायलय की महत्वपूर्ण कड़ी है और वह न्यायतंत्र में महत्वपूर्ण भागीदारी रखता है। यदि उसे भारत की न्यायपालिका का हिस्सा भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि एक व्यवस्थित और गहन विधान में हर कोई व्यक्ति न्यायालय की कार्यवाही संचालित नहीं कर सकता है, इस कार्य को कोई प्रोफेशनल व्यक्ति ही कर सकता है जो इस कार्य से संबंधित मामलों में पूरी तरह निपुण हो।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]