ब्रज शैलीगत क्षेत्र विस्तार की द्वितीय स्थिति

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भक्ति आंदोलन एक देशव्यापी आंदोलन था। शैली की दृष्टि से लोक भाषा- शैली का उन्नयन इस आंदोलन की सबसे बड़ी देन है। शास्रीय शैली का नियमन और अनुशासन शिथिल हो जाता है। वस्तुगत उदात्तता प्रमुख हो जाती है। आरंभ में निर्गुण विषय- वस्तु गृहीत होती है। परिणामतः विषय- वस्तु से संबद्ध भौगोलिक स्थानीयता का उत्कर्ष नहीं होता और न किसी क्षेत्रीय भाषा का ही विषय- वस्तु से संबंध होता है। केवल व्यावहारिक सौंदर्य और सुविधा की दृष्टि से एक मिश्रित सधुक्कड़ी शैली जन्म लेती है और एक व्यापक शैली क्षेत्र बनने लगता है। नितांत वैयक्तिक क्षणों में संतों की उन्मुक्त और तरल चेतना स्थानीय भाषा- रुपों या भावात्मक संदर्भों में रुढ़शैली को ग्रहण कर लेती है। इस प्रकार सधुक्कड़ी के साथ अन्य शैलियों का सहअस्तित्व हो जाता है।

सगुण वस्तुक्रम में भौगोलिक स्थानीयता आलंबन के भावपक्ष का अंग बन जाती है। अयोध्या, मथुरा, वृंदावन के भावात्मक और दिव्य संबंध प्रकट होने लगते हैं। स्थानीय भाषाओं के प्रति भी ऐसी ही एक भावुकता कसमसाने लगती है। स्थानीय भाषा- रुपों पर आधारित शैली वस्तु की यात्रा के साथ चलती है और अपने स्वतंत्र शैली- द्वीप या उपनिवेश बनाने लगती है। जब रामचरित्र की मर्यादाएँ, अमर्यादित दिव्य श्रृंगार- माधुर्य में निमज्जित हो जाती हैं, निर्गुण वाणी से निर्गत रहस्यमूलक श्रृंगारोक्तियाँ अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाने लगती है और राज्याश्रित श्रृंगार में राधाकृष्ण के प्रतीक रुढ़ हो जाते हैं, तब आरंभिक स्थितियों में माधुर्य- श्रृंगार के लिए रुढ़ ब्रजभाषा शैली, अन्य विषय- वस्तु द्वीपों में भी प्रविष्ट होने लगती है, अन्य भाषा- द्वीपों में भी विस्तार करने लगती है। ब्रजी की वस्तु- संरचना भी अन्य वस्तु- क्षेत्रों पर अध्यारोपित होने लगती है और ब्रजभाषा शैली अन्य स्थानीय भाषाओं से मैत्री शैली क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करती है।

सधुक्कड़ी[संपादित करें]

संत- साहित्य सधुक्कड़ी शैली में लिखा गया है। इस शैली का भाषागत आधार परंपरागत काव्य- भाषा या ब्रजी का नहीं है। खड़ी बोली और राजस्थानी की मिश्रित संरचना पर इस शैली की प्रतिष्ठा हुई। २ सिद्धों की भांति संत- साहित्य में भी दुहरी शैली मिलती है। संत कवियों के सगुण भक्ति के पदों की भाषा तो ब्रज या परंपरागत काव्यभाषा है, पर निर्गुनबानी की भाषा नाथपंथियों द्वारा गृहीत खड़ी बोली या सधुक्कड़ी भाषा है। ३

यह द्विविध शैलीयोजना नामदेव से लेकर परवर्ती संतों तक चलती रही। सधुक्कड़ी शैली में राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली और पूर्वी के रुपों का मिश्रण मिलता है। संत का व्यक्तित्व एक परंपरागत, परिनिष्ठित शैली को स्वीकार करके नहीं चला। खड़ी बोली का संबंध प्राचीन शैली भूगोल की दृष्टि से कुरु- जनपद से था। शौरसेनी पांचाली शैली क्षेत्र से इस क्षेत्र की भाषा संरचना कुछ भिन्न थी। प्राचीन रचनाओं में ब्रजी और खड़ी बोली के रुपों का सहअस्तित्व भी मिलता है। इन दोनों की प्रकृति में आकारांत- औकारांत, उकारांत- अकारांत का भेद प्रमुख है। इन दोनों की प्रकृति में आकारांत कौरवी का साम्य पंजाबी से है। आधुनिक राजस्थानी और ब्रजी में दोनों ही प्रवृतियाँ मिलती हैं। कन्नौजी का क्षेत्र अपेक्षाकृत शुद्ध औकारांत शैली का क्षेत्र है।

भौगोलिक दृष्टि से पंजाबी और राजस्थानी के कुछ रुपों को समेटे हुए, खड़ी बोली शैली दिल्ली के आसपास पनप रही थी। मुस्लिम काल में इस भौगोलिक क्षेत्र का ऐतिहासिक महत्व बढ़ा। यहाँ की भाषा- शैली को प्रचार और प्रोत्साहन मिला। इसी शैली को संतों ने अपनाया। इसमें ब्रजी के रुपों का नितांत अभाव नहीं था, पर मूल संरचना खड़ी बोली की ही मानी जानी चाहिए।

इस शैली को अपनाने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय मुस्लिम लेखकों को ही देना चाहिए। संक्रांतिकालीन संत भी मुस्लिम संस्कृति से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रभावित थे। आरंभिक नाथ- योगी परंपरा में अवश्य ही शुद्ध सधुक्कड़ी की परंपरा मिलती है। गोरखबानी की भाषा- शैली की मूल संरचना खड़ी बोली की है तथा उसमें पूर्वी का मिश्रण है। राजस्थानी के प्रभावों का भी अभाव नहीं है। साथ ही गोरखनाथजी ने ब्रजभाषा के पद भी लिखे। ऐसा प्रतीत होता है कि पद- काव्यरुप के लिए ब्रजी का प्रयोग रुढ़ होता जा रहा था। नाथ और संत भी गीतों में इसी शैली का प्रयोग करते थे। सैद्धांतिक चर्चा या निर्गन- वाणी सधुक्कड़ी में होती थी।

जिस प्रकार भक्ति- आंदोलन का सगुणवादी पक्ष ब्रजी की शैली को लेकर चल रहा था, उसी प्रकार निर्गुणवादी पक्ष सधुक्कड़ी को अपने प्रचार का माध्यम बना रहा था। संभवतः संत- व्यक्तित्व शिष्ट या परिनिष्ठित भाषा- शैली से परिचित भी कम था, पर कथ्य की प्रकृति इस नवीन शैली के ग्रहण का मुख्य कारण प्रतीत होती है। सामाजिक खंडन- मंडन, निर्गुण- चर्चा आदि कुछ ऐसे विषय थे, जिनको रुढ़ माध्यम वहन नहीं कर सकता था। इसलिए एक नवींन शैली- माध्यम की खोज हुई। यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि कुरुक्षेत्र में इस शैली की परंपरा पहले भी प्रचलित रही होगी। शौरसेनी- पांचाली क्षेत्र की परिनिष्ठित शैली के सामने इसका महत्त्व नहीं था। इस परंपरा का प्राचीन साहित्य भी नहीं मिलता। मध्यकाल के नाथ- संतों एवं मुस्लिम कवियों ने इस शैली का पुनरुत्थान किया।

गुजरात और ब्रजभाषा[संपादित करें]

ग्रियर्सन ने गुजराती को भारतीय आर्यभाषाओं की अंतवर्ती शाखा के अंतर्गत रखा है भौगोलिक दृष्टि से बहिर्वृत्त रहते हुए गुजराती का इस प्रकार का वर्गीकरण दोनों क्षेत्रों के सांस्कृतिक प्रभाव एवं संबंध की ही स्वीकृति है। पौराणिक साक्ष्य से भी मथुरा मंडल और गुजरात का संबंध सिद्ध होता है। कृष्ण समस्त यादवों के साथ द्वारावती में जाकर बस गए थे। आभीरों का गतिमार्ग भी मध्यदेश में गुजरात की ओर प्रतीत होता है। आभीर जैसी ही एक शक जाति थी। इस जाति का प्रसार भी गुजरात से मध्यप्रदेश तक था। ये वासुदेव के भक्त थे। संभवतः ये पंचवीरों -- कृष्ण, संकर्षण, बलराम, सोम और अनिरुद्ध के उपासक थे। पीछे जैन धर्म का भी मथुरा एक केन्द्र बन गया और गुजरात और ब्रज का संबंध बना रहा। जैन धर्म की भाषा- विधि भी शौरसेनी से प्रभावित थी। जैन आगमों और परवर्ती साहित्य कृष्ण वार्ता से अनुप्राणित है।

वैष्णव धर्म के उदय के समय भी ब्रज और गुजरात का संबंध घनिष्ठ बना रहा। वल्लभ संप्रदाय का यह सबसे प्रमुख प्रभाव- क्षेत्र रहा है और आज भी है। गुजरात की संस्कृति और ब्रज की संस्कृति में ही साम्य और घनिष्ठ संबंध नहीं रहा, उभय क्षेत्रीय भाषा और साहित्य भी एक- दूसरे के बहुत समीप आ गए। गुजरात की आरंभिक रचनाओं में शौरसेनी अपभ्रंश की स्पष्ट छाया है। नरसी, केशवदास आदि कवियों की भाषा पर ब्रजभाषा का प्रभाव भी है और उन्होंने ब्रजी में स्फुट काव्य रचना भी की है। हेमचंद्र के शौरसेनी के उदाहरणों की भाषा को ब्रजभाषा की पूर्वपीठिका माना जाना चाहिए। ४

गुजरात के अनेक कवियों ने ब्रजभाषा अथवा ब्रजी मिश्रित भाषा में कविता की। भालण, केशवदास तथा अरवा आदि कवियों का नाम इस संबंध में उल्लेखनीय है। ब्रह्मदेव की एक कृति में भी ब्रजभाषा का एक पद निकलता है। लक्ष्मीदास ने स्फुट पदों की रचना ब्रजभाषा में की। कृष्णदास (रुक्मिणी विवाहनों) का नाम भी इस सूची में महत्वपूर्ण है।

नरसी मेहता की भाषा पर परंपरागत पश्चिमी अपभ्रंश का प्रभाव है, जो उसे ब्रजभाषा के समीप ले आती है। इन्होंने ब्रजभाषा में भी पदों की रचना की। अष्टछापी कवि कृष्णदास भी गुजरात के ही थे। इनके पश्चात तो गुजरात में ब्रजभाषा कवियों की एक दीर्घ परंपरा ही बन जाती है। जो बीसवीं शती तक चली आती है। गुजरात के राजदरबारों में भी ब्रजभाषा के कवि समादृत रहे। इस प्रकार ब्रजभाषा गुजराती कवियों के लिए निज- शैली ही बन गई थी।

मालवा[संपादित करें]

मालवा और गुजरात को एक साथ उल्लेख करने की परंपरा ब्रज के लोकसाहित्य में भी मिलती है। अनेक गीतों में सगरौ तौ ढूंढ़यौ मालुवो और सबु ढूंढ़ी गुजरात जैसी पंक्तियाँ आती हैं। गुजरात, मालवा और ब्रज के पारस्परिक संबंध की चेतना ब्रज के सामान्यजन को भी थी। मुंज का संबंध मालवा से था। मुंज और मृणालवती के प्रेम से संबद्ध दोहे मध्यदेशी में ही रचित है। कुछ विद्वानों का मत है कि ये दोहे मध्यदेश या ब्रज में लोक- प्रचलित थे।

मुंज के भतीजे भोजराज थे। उनके सरस्वती कंठाभरण में जो अपभ्रंश रचनाएँ संकलित हैं, उन पर भी ब्रज की भाषा- प्रकृति का प्रभाव है। कुछ पंक्तियाँ तो ब्रजभाषा के अत्यंत निकट हैं।

बुंदेलखंड[संपादित करें]

ब्रजभाषा के लिए "ग्वालियरी' का प्रयोग भी हुआ है। जयकीर्ति ने "कृष्ण रुक्मिणी की बेल' की टीका में "ग्वालेरी' का प्रयोग भाषा के संबंध में एक प्राचीन प्रचलित दोहा उल्लिखित किया है ५। ब्रज- देश की एक सीमा का एक छोर ग्वालियर माना गया है। ग्वालियरी भाषा और ब्रजभाषा इस दृष्टि से एक दूसरी के पर्याय हैं। लल्लूलाल ने ग्वालियर को सरस कहा है। संभवतः: ब्रज बुंदेली सम्मिलित क्षेत्र में ग्वालियरी का विकास हुआ था। प्राचीनकाल में ही, इस क्षेत्र ने बहुत से कवियों को जन्म दिया। हरिहरनिवास द्विवेदी ने ब्रजभाषा शैली का जन्म ग्वालियर में माना है। उनका मत इस प्रकार है -- ११ वीं से १५ वीं तक जो हिन्दी बुंदेलखंड में विकसित हुई वही १६ वीं, १७वीं, १८ वीं शताब्दी में कवियों द्वारा अपनाई गई।

यदि इस झगड़े को छोड़ दें कि ब्रजभाषा शैली का जन्म ग्वालियर में हुआ या मथुरा के आस- पास, तो आसानी से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ब्रजभाषा शैली की सीमाएँ विस्तृत थीं। ग्वालियर और मथुरा दोनों की स्थिति इसी शैली क्षेत्र में थी। ग्वालियर सदा से ब्रजक्षेत्र में माना जाता रहा है। डॉ॰ ग्रियर्सन ने उत्तर- पश्चिमी ग्वालियर को ब्रजक्षेत्र में रखा है और यहाँ की भाषा परिनिष्ठित ब्रजी मानी है। यह शैली शौरसेनी परंपरा में आती है।

इसमें संदेह नहीं कि ब्रजी और बुंदेली की संरचना प्रायः समान है। साहित्यिक शैली तो दोनों क्षेत्रों की बिल्कुल समान रही। ब्रज और बुंदेलखंड का सांस्कृतिक संबंध भी सदा रहा है।

ब्रजभाषा का एक नाम ग्वालियरी भी हो गया था। ऐसा प्रतीत होता है कि ग्वालियर- क्षेत्र ब्रजभाषा के संगीत शास्रीय प्रयोग का क्षेत्र था। मानसिंह तोमर द्वारा प्रवर्तित ध्रुपद की रचना संभवतः इसी क्षेत्र में हुई। मानकुतूहल में "सुदेश' नाम आया है। इस पर टिप्पणी करते हुए हरिहरनिवास द्विवेदी ने लिखा है -- सुदेस से मतलब है ग्वालियर से, जो आगरा का राज्य केन्द्र है। ग्वालियर क्षेत्र का वैशिष्ट्य ब्रजभाषा की संगीत शैली को जन्म देने में है। वैसे केशव, बिहारी जैसे अनेक ब्रजभाषा कवियों को भी बुंदेलखंड ने जन्म दिया।

सिंध[संपादित करें]

सिंध का नाम आते ही तुलसीदास अथवा गोस्वामी लालजी का नाम स्मरण हो आता है। इन्होंने १६२६ वि. में गोस्वामी विट्ठलनाथजी का शिष्यत्व स्वीकार किया। अंततः गुसांईजी ने उसे अपना "लाल' ही माना और गोस्वामी पद से भी विभूषित किया। इनको कार्य दिया गया, सिंध और पंजाब में वैष्णव धर्म का प्रचार था। सिंध- तट पर डेरागाजीखां को इन्होंने अपना साधना- स्थल बनाया। इसी केन्द्र से वैष्णव धर्म का प्रचार ब्रजभाषा में आरंभ हुआ। लालजी ब्रजभाषा के मर्मज्ञ थे।

गोस्वामी लाल के पुत्रों ने भी ब्रजभाषा में काव्य रचना की इस गद्दी की शिष्य- परंपरा में ब्रज साहित्य के अन्य रचयिता भी मिलते हैं। गद्य की भी रचना हुई। टीकाएँ भी ब्रजभाषा में हुई। गुरु- प्रशस्ति की काव्य- रचना भी हुई। इस प्रकार लालजी के समकालीन लेखकों ने सिंध में ब्रजभाषा साहित्य की पर्याप्त उन्नति की। आगे भी यह परंपरा चलती रही।

पंजाब[संपादित करें]

पंजाब में ब्रजभाषा के प्रथम कवि ज्ञानरत्न के कर्ता सांईदास माने जाते हैं ६। गुरु नानक ने भी ब्रजभाषा में कविता की। आगे भी कई गुरुओं ने ब्रजभाषा में कविता रची। गुरुगोविंद सिंह का ब्रजभाषा- कृतित्व महत्त्वपूर्ण है ही। गुरु दरबारों में ब्रजभाषा को सम्मानपूर्ण आश्रय प्राप्त रहा७। राजदरबारों में भी ब्रजभाषा के कवि रहते थे ८। इन कवियों में सिक्खों का विशेष स्थान है। सिख संतों ने धार्मिक प्रचार के लिए भी कभी- कभी ब्रजभाषा को चुना ९। इस प्रकार पंजाब जो खड़ी बोली, पंजाबी, हरियाणवी की मिश्रित शैली का क्षेत्र माना जा सकता है, ब्रजभाषा की शैली के विकास में योग देता रहा।

बंगाल : ब्रजबुलि[संपादित करें]

पहले संकेत किया जा चुका है कि बंगाल में ब्रजभाषा के कुछ कवि हुए। सार्वदेशिक शौरसेनी के प्रभाव क्षेत्र में बंगाल था ही। बल्कि यों कहना चाहिए कि पूर्वी अपभ्रंश पश्चिम भारत से ही पूर्व में आई। इस पर मागधी का प्रभाव नहीं पड़ा।

अवह जब एक साहित्यिक शैली के रूप में पनपी, तो इसका प्रयोग मैथिल कोकिल विद्यापति ने कीर्तिलता में किया। इसमें मिथिला और ब्रज के रुपों का मिश्रण है। बंगाल के सहजिया- साहित्य की रचना भी मुख्यतः इसी में हुई है। बंगाली के आंचलिक रुपों की झलक से अवहट्ठ झिलमिला रही है।

बंगाल के वैष्णव कवियों को संत- सिद्धों की भाषा की परंपरा प्राप्त थी। "ब्रजबुली' वैष्णव परिवेश में उदित एक विशिष्ट शैली ही है। यह भी बोलियों के मिश्रण पर आधारित है। मुस्लिम युग में वैष्णव परिव्राजकों के लिए मथुरा- वृंदावन सबसे बड़े तीर्थ बन गए। दक्षिण के आचार्य भी इधर आए और चैतन्य महाप्रभु भी। वैष्णव साधु समाज की जो भाषा बनी उसका नाम ब्रजबुलि है। इसके विकास में मुख्य रूप से ब्रजी और मैथिली का योगदान था। गौण रूप से अन्य भाषाएँ भी योग दे रही थीं। विद्यापति के राधाकृष्ण प्रेम संबंधी गीतों ने बंगाल में वैष्णव- नवजागरण को रस- स्नात कर दिया।

बंगाल के कविवृंद मैथिली, बंगाली और ब्रजभाषा के मेल से घटित ब्रजबुली शैली को अपनाने लगे। इसी भाषा में गोविंददास, ज्ञानदास आदि कवियों का साहित्य मिलता है। मैथिली मिश्रित ब्रजी आसाम के शंकरदेव के कंठ से भी फूट पड़ी। बंगाल और उत्कल के संकीर्तनों की भी यही भाषा बनी। विशेष रूप से रास- कीर्तन की यह भाषा थी। संकीर्तन प्रायः पदों में मिलता है। ब्रजबुली वास्तव में पद- शैली ही है १०। बंगाल में ब्रजबुजी के अनेक पदकर्ता हुए। विषयवस्तु की दृष्टि से राधाकृष्ण, राधा तथा चैतन्य- प्रशस्ति से ब्रजबुली पद- साहित्य संबद्ध है। कुछ पदों में कृष्ण, गोप, गोपी संदर्भ भी है। इस प्रकार ब्रजसंदर्भ, ब्रज शैली, पद- पद्धति जैसे एक होकर ब्रजबुलि शैली में ढ़ल गए हों।

आसाम में शंकरदेव (१५०६- १६२५) ने भी ब्रजबुलि शैली को ही अपनाया। इनकी शिष्य- परंपरा में भी ब्रजबुलि साहित्य की रचना होती रही। इधर उड़ीसा में भी ब्रजबुलि साहित्य की रचना हुई। राय रामानंद का समय चैतन्य से भी पूर्व है।

महाराष्ट्र[संपादित करें]

ब्रजभाषा शैली का प्रसार महाराष्ट्र तक दिखलाई पड़ता है। सबसे प्राचीन रूप नामदेव की रचनाओं में मिलते हैं। नामदेव की भाषा को डॉ॰ शिवप्रसाद सिंह ने गुरुग्रन्थ साहब में संकलित पदों की भाषा को पूर्णतः ब्रज माना है। एक स्थान पर इनकी भाषा को मिश्रित भी कहा है। संत नामदेव की हिन्दी पदावली के संपादकों का अभिमत इस प्रकार है- गुरुग्रन्थ वाले पद ही नामदेव की हिन्दी रचना का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। सैकड़ों की संख्या में अन्य पद भी प्राप्त हुए हैं जिनकी भाषा संयत और सुरक्षित भी है। इन सभी रचनाओं को देखकर यह कहा जा सकता है कि नामदेव की भाषा मूलतः ब्रज है और उस पर पंजाबी, राजस्थानी, रेखता और मराठी का प्रभाव है। इस प्रकार नामदेव के द्वारा लिखित सैकड़ों हिन्दी पद प्राप्त होते हैं, जिनकी मूल संरचना ब्रजी की है और प्रभाव अन्य भाषाओं का भी है।

नामदेव ने ही नहीं, महाराष्ट्र क्षेत्र के अन्य संतों ने भी हिन्दी में पद रचे। ज्ञानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम, रामदास प्रभृति भक्त-संतों की भी हिन्दी रचनाएं मिलती हैं। इनकी हिन्दी रचनाओं की भाषा, ब्रज और दक्खिनी हिन्दी है ११।

उपर्युक्त संतों की वाणी की मूल संरचना तो ब्रजी की ही प्रतीत होती है, किंतु सधुक्कड़ी की परंपरा भी यहाँ लोकप्रिय थी, जो खड़ी बोली या पंजाबी प्रभावों के लिए उत्तरदायी है। दखनी क्षेत्र के समीप होने के कारण भी रेखता या दखनी का प्रभाव माना जा सकता है। मराठी रुपों का मिश्रण स्थानीय प्रभाव का परिचायक है। भाव विह्मवल लक्षणों में ब्रज भाषा की शैली अपना ली जाती है।

मुस्लिम काल में भी शाहजी एवं शिवाजी के दरबार में रहने वाले ब्रजभाषा के कवियों का स्थान बना रहा। शाहजी के दरबार में रहने वाले कवियों की सूचियों दी गई हैं। इन कवियों में महाराष्ट्र से बाहर के कवि भी थे। ब्रजी शैली के कवियों का भी यहाँ सम्मान था। शिवाजी के दरबार में भी यह परंपरा बनी रही। कवि भूषण तो ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि थे ही। जयराम पिंड्ये बारह भाषाओं के ज्ञाता थे। बारह भाषाओं में एक ब्रजभाषा भी होगी, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है। जयराम और भूषण का परस्पर परिचय-संबंध भी रहा हो सकता है। इन्होंने हिन्दी (ब्रजी) में भी शिवाजी की कथा लिखी, जो अब अप्राप्य है। जयराम रचित राधा माधव विलास चंपू में कुछ पद ब्रजभाषा के हैं। कुछ पद्य इस प्रकार हैं-

गायो उत्तर देस को द्वेै गुनि अति अभिराम। नाम एक को लालमनि, दुसरो है घनशाम।

बात अचंभो एक यह जंत्र सजे की ठाट। चित्रचना के दारि मह, चित्रचना के दारि।

इस पद्य में ब्रजभाषा शैली की ओकारंतता विद्यमान है। ब्रजभाषा शैली के दोहों का प्रचार तो बहुत व्यापक था। उसी शैली के ये दोहे हैं।

दक्षिण[संपादित करें]

दक्षिण में खड़ीबोली शैली का ही दखनी नाम से प्रसार हुआ। इसमें अनेक पुस्तकें लिखी गईं। बहमनी राज्य के उत्तराधिकारी साहित्यानुरागी थे। इन मुस्लिम राज्यों के आश्रित साहित्यकारों ने ग्वालेरी कविता का उल्लेख बड़ी श्रद्धा के साथ किया है। तुलसीदास के समकालीन मुल्ला वजही ने सबरस में ग्वालेरी के तीन दोहे उद्धृत किए हैं। वैसे सबरस की भाषा हिन्दी है। यह खड़ीबोली के समीप है। किंतु इतना अवश्य कहा जाना चाहिए कि ब्रज-शैली के या ब्रज के प्रचलित दोहों का प्रयोग वजही ने बीच-बीच में उसी प्रकार किया है, जिस प्रकार अब्दुर्रहमान ने अपनी प्रेमकथा में किया है।

ऐसी रचनाएं भी हैं, जिनमें खड़ीबोली शैली के साथ ब्रजी-शैली का मिश्रण हुआ है। उदाहरण के लिए अफजल की कृति "बिकट कहानी-बारहमासा' को लिया जा सकता है। उसकी भाषा के संबंध में डॉ॰ मसूद हुसैन खां ने लिखा है - "अफजल का संबंध पानीपत से था जो हरियाणी के प्रदेश में विद्यमान है।' चूंकि ब्रज-भाषा इस समय तक साहित्यिक रूप से एक उच्च स्थान ग्रहण कर चुकी थी और अफजल को मथुरा के ब्रजभाषा के वातावरण का पुर्ण अनुभव था, इसलिए उसकी भाषा में उस प्रभाव का आना अनिवार्य था।

अफजल ने बिकट कहानी बारहमासी में साहित्यिक भाषा का प्रयोग किया, इस कारण उसका ब्रजभाषा से प्रभावित होना अनिवार्य था। इसकी भाषा में ब्रजी की ल र प्रवृत्ति मिलती है। साथ ही दीर्घ स्वरों वाले ब्रजभाषा- प्रकृति के हाँसी (उहंसी), पाती (उपत्र) आदि शब्द मिलते हैं। तैं (उतू), तुमरी (उतुम्हारी), तुमन (उतुम) हौं (उमैं)। जैसे सर्वनाम रूप ब्रजभाषा के समान हैं। ब्रजभाषा के न बहुवचन प्रत्यय का भी प्रयोग मिलता है। पगन (उपगों), सूं (उसे), कूं (उको), कहा (उक्या), कौलौं (उकब तक), कहूं (उकहीं) अव्यय भी ब्रजभाषा प्रकृति के हैं।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि दक्खिन क्षेत्र खड़ी बोली शैली के विकास का क्षेत्र था। प्रायः गद्य रचनाओं में हरियानी बोली का प्रयोग मिलता है, एकाध पद्य रचना में ब्रज भाषा शैली का मिश्रण अवश्य है। गद्य में लिखित प्रेमगाथाओं के बीच में ब्रजभाषा शैली के दोहे प्रयुक्त मिलते हैं।

दक्षिण में अन्य क्षेत्रों में भी ब्रजभाषा के छुटपुट कवियों का अस्तित्व मिलता है। कल्याणी के चालुक्य नरेश भूलोक मल्ल सोमेश्वर के ग्रन्थ मानसोल्लास में ब्रजभाषा की शैली का एक उदाहरण मिलता है। यह उदाहरण राग-रागिनियों से संबद्ध है। इससे प्रतीत होता है कि ब्रजभाषा शैली का संगीत समस्त भारत में प्रसिद्ध था। संगीत की अनेक शाखाओं में से यह भी एक प्रसिद्ध और लोकप्रिय शाखा थी।

केरल के महाराजा राम वर्मा (जन्म १८७०) स्वाति-तिरुनाल के नाम से ब्रजभाषा में कविता करते थे। इनके पदों में सबसे अधिक संख्या कृष्ण संबंधी पदों की है। इससे प्रतीत होता है कि कृष्णवार्ता के साथ ब्रजभाषा शैली का घनिष्ठ संबंध हो गया था। साथ ही इन पदों का संदर्भ भी संगीत है।

ऊपर के विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि ब्रजभाषा शैली के खंड-उपखंड समस्त भारत में बिखरे हुए थे। कहीं इनकी स्थिति सघन थी और कहीं विरल। शैली खंडों का विस्तार आधारभूत भाषा के विविध संबंधों की ही भौगोलिक परिणति है। ये संबंध भाषागत, या सांस्कृतिक हो सकते हैं। भाषागत संबंधों के आधार पर निर्मित शैली खंड सघन कहे जाएंगे और अन्य सांस्कृतिक संबंधों के आधार पर बने उपखंड विरल। अन्य पारिभाषिक शब्दों के अभाव में हम प्रथम वर्ग में आने वाले शैली द्वीपों को खंड और द्वितीय वर्ग के द्वीपों को उपखंड कह सकते हैं।

साँचा:ब्रजभाषा