फिल्लौर की लड़ाई

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यह सन् 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सात से 11 सितंबर तक सियालकोट (पाकिस्तान) के फिल्लौरी नामक स्थान पर हुआ निर्णायक युद्ध था। इसे भारतीय सेना इतिहास में सबसे घातक युद्धों में शामिल किया जाता है।

युद्ध का आरंभ[संपादित करें]

पाकिस्तान के सियालकोट सेक्टर के नजदीक फिल्लौर के क्षेत्र पर अधिकार करने की जिम्मेदारी प्रथम आम्र्ड डिवीजन के तहत पूना हार्स रेजीमेंट के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टीनेंट कर्नल ए। बी। तारापोर को सौंपी गई। 7 सितंबर को फिल्लौरी में रेजीमेंट का सामना पाकिस्तान की पैटर्न टैंक डिवीजन से हुआ। अमेरिका की ओर से सबसे मजबूत और खतरनाक बताए जा रहे पैटर्न टैंक से सीधी लड़ाई में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को धूल चटा दी। लेफ्टिनेंट कर्नल एबी ताराबोर के नेतृत्व में गोलंदार (निशाना लगाने वाला) ने इतने सटीक लक्ष्य भेदे कि पाकिस्तानी सेना के 65 पैटर्न टैंक बर्बाद हो गए। युद्ध में पूना हार्स के केवल नौ टैंक बर्बाद हुए थे। बहादुरी के दम पर युद्ध के नतीजों को बदलने के बाद 16 सितंबर को लेफ्टिनेंट कर्नल एबी तारापोर युद्ध के मैदान पर ही शहीद हो गए। फ्लि्लौर के युद्ध में भारतीय सेना के पांच आफिसर व 64 सैनिक शहीद हुए थे।