प्रज्ञा

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प्रज्ञा वह आभास है जिससे जानना सम्भव हो जाता है।

प्रज्ञा ऊर्जा ___ हर मनुष्य की भिन्न दिनचर्या जीवनशैली और जीवनी होती है जो उसके कर्तव्य उत्तरदायित्व व उद्देश्य के कारण होता है कर्तव्य तो स्वयं के जन्म धर्म संस्कृति परिवार तथा राष्ट्र क्षेत्र के कारण होता है जो नियति होती है और उत्तरदायित्व समाज में जिस प्रकार के कार्य प्राप्त होते है वहां स्वयं के बुध्दि व विवेक से मिलाते है परन्तु उद्देश्य इच्छाओं का कारण है इच्छा भावनाओं का कारण है भावनाऐ चेतना के प्रकार के कारण चेतना का कारण प्रज्ञा होती है । प्रज्ञा एक ऐसी ऊर्जा शक्ति है जिसके कारण मनुष्य की व्यवहार स्वभाव प्रवृत्ति का निर्माण होता है जिसके कारण मनुष्य भिन्न-भिन्न परिस्थिति घटनाओं व गतिविधियों में उसके ह्रदय से भिन्न भिन्न भाव इच्छा प्रगट होकर मस्तिष्क में जाकर प्रकृति व मानव समाज के परिस्थिति घटनाओं व गतिविधियों को समझकर भिन्न कर्म करता है उम्र बुध्दि व विवेक के अनुसार ।

प्रज्ञा के कारण ही लोग प्रेम करने के लिए मित्रता व शत्रुता करने के लिए तथा हंसना रोना गुस्सा होने के लिए प्रेरित होते है इसी प्रज्ञा के कारण ही लोगों के ह्रदय में दुख सुख की भावना उत्पन्न होती है।

बुध्दि की प्राप्ति तो विश्व में ज्ञान प्राप्त करने से होता है विवेक अर्थात समझदारी जिम्मेदारी अनुभव व उम्र के साथ आती है परन्तु प्रज्ञा का निर्माण कभी नहीं होता है जिस मनुष्य को जो कर्म करना है वहां निश्चित ही करता है वही प्रज्ञा की ऊर्जा है ।

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