प्रजाधिपोक
| |
|---|---|
| राजा राम सप्तम | |
ल॰ 1930 के दशक का औपचारिक चित्र | |
| स्याम के राजा | |
| शासनावधि | 26 नवम्बर 1925 – 2 मार्च 1935 |
| राज तिलक | 25 फ़रवरी 1926 |
| पूर्ववर्ती | वाजिर्वुध (राम षष्टम) |
| उत्तरवर्ती | आनन्द महिदोल (राम अष्टम) |
| जन्म | 08 नवम्बर 1893 बैंकॉक, स्याम |
| निधन | 30 मई 1941 (उम्र 47 वर्ष) सरी, इंग्लैण्ड |
| समाधि | 3 जून 1941 गोल्डर्स ग्रीन श्मशान, लंदन, इंग्लैण्ड |
| जीवनसंगी | रामबाई बरनी (वि॰ 1918) |
| घराना | चक्री राजवंश |
| पिता | चुललंगकरण (राम पंचम) |
| माता | सावोवाभा फोंग्सरी |
| धर्म | थेरवाद बौद्ध |
प्रजाधिपोक[a] (8 नवम्बर 1893 – 30 मई 1941) स्याम राज्य की चक्री राजवंश के सातवें राजा थे। उन्हें राम सप्तम की उपाधि प्राप्त थी। स्याम की सन् 1932 की क्रांति के दौरान हुए राजनैतिक और सामाजिक बदलावों के कारण उनका कार्यकाल अशांति का रहा। चक्री राजवंश के वो एकमात्र स्याम राजा हैं जिन्होंने पद त्याग दिया।
शुरूआती जीवन
[संपादित करें]
सोमदत चोफा प्रजाधिपोक सकदिदेज (थाई: สมเด็จเจ้าฟ้าประชาธิปกศักดิเดชน์) का जन्म स्याम (वर्तमान थाइलैण्ड) के बैंकॉक में हुआ। उनके पिता राजा चुललंगकरण और माँ सावोवाभा फोंग्सरी थे। दम्पति की नौ संतानों में राजकुमार प्रजाधिपोक सबसे छोटे थे। कुल मिलाकर वो राजा के दूसरे सबसे छोटे संतान (कुल 77 में से) थे। चुलंलंगकरण के पुत्रों में वो 33वें स्थान पर थे।[1]
सिंहासन पर सीधे जाने के स्थान पर राजकुमार प्रजाधिपोक ने सैन्य जीवन चुना। अन्य राजाओं के बच्चों की तरह उन्हें भी पढ़ाई के लिए विदेश भेजा गया और वो सन् 1906 में इटन कॉलेज गये। इसके बाद उन्होंने सन् 1913 में वूलविच मिलिट्री एकेडमी से जुड़े और वहाँ पर ही अपनी स्नातक की शिक्षा पूरी की। उन्हें एल्डरशॉट स्थित ब्रितानी सेना में रॉयल होर्स आर्टिलरी में नियुक्ति मिली। सन् 1910 में चुललंगरण का निधन हो गया और उनके बाद प्रजाधिपोक के बड़े भाई (वो रानी सावोवाभा के पुत्र भी थे) क्राउन प्रिंस वाजिर्वुध ने पदभार सम्भाला। उन्हें राजा राम षष्टम की उपाधि मिली। इस समय तक राजकुमार प्रजाधिपोक को ब्रितानी सेना और रॉयल स्यामी सेना दोनों में नियुक्ति मिल गयी थी। प्रथम विश्व युद्ध के समय स्याम देश ने तटस्थता की घोषणा की। इसके साथ राजा वाजिर्वुध ने अपने छोटे भाई को ब्रितानी सेना से त्यागपत्र देने और तुरंत स्याम लौटने का आदेश दिया। राजकुमार प्रजाधिपोक पश्च्मी मोर्चे पर अपने साथियों के साथ सेवा देना चाहते थे अतः उन्हें इससे बहुत शर्मिंदगी हुई। देश वापस आते ही प्रजाधिपोक को स्याम में एक उच्च पदस्थ सैन्य अधिकारी बनाया गया। स्यामी बौद्ध परम्परा के अनुसार सन् 1917 में उन्हें अस्थायी रूप से भिक्षु नियुक्त किया गया।[2]
अगस्त 1918 में राजकुमार प्रजाधिपोक ने अपनी बचपन की मित्र और चचेरी बहन रामबाई बर्नी से विवाह किया। रामबाई राजा मोंगकुट (प्रजाधिपोक के दादा) और उनकी सहचार्या पियाम की वंशज थीं। उनका विवाह सुखोथाई महल में हुआ जो रानी सावोवाभा ने विवाह के उपहार के रूप में उन्हें दिया।[1]
यूरोप में युद्ध समाप्त होने के बाद, उन्होंने फ्रांस में इकोले सुपीरियर डे गुएरे (विशेष सैन्य विद्यालय) में भाग लिया और स्याम की सेना में वापस आ गए। इस दौरान उन्हें क्रोम लुआंग सुखोथाई (सुखोथाई के राजकुमार) की अतिरिक्त उपाधि दी गई। प्रजाधिपोक अपनी पत्नी के साथ चाओ फ्राया नदी के बगल में स्थित अपने निवास सुखोथाई महल में आम तौर पर शांत जीवन व्यतीत करते थे। दंपति के कोई संतान नहीं थी। प्रजाधिपोक ने जल्द ही खुद को सिंहासन पर उत्तराधिकार के रूप में तेजी से बढ़ते हुए पाया, क्योंकि उनके सभी भाई अपेक्षाकृत कम समय में ही मर गए थे। सन् 1925 में राजा वाजिर्वुध की केवल 44 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई। प्रजाधिपोक केवल बत्तीस वर्ष की आयु में पूर्ण सम्राट बन गए। उन्हें 25 फरवरी 1926 को स्याम के राजा का ताज पहनाया गया।
अंतिम राजा
[संपादित करें]
प्रजाधिपोक नई जिम्मेदारियों के लिए अपेक्षाकृत रूप से तैयार नहीं थे। वो लोगों के साथ सम्बंध बनाने और राजनयिक मामलों को सम्भालने में अधिक रूचि नहीं लेते थे।[3] हालांकि उन्हें अपने पूर्ववर्ति से खराब राजनैतिक और आर्थिक समस्यायें प्राप्त हुई थीं।[2]
टिप्पणी
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]बाहरी कड़ियाँ
[संपादित करें]- किंग प्रजाधिपोक इंस्टिट्यूट
- थाई फ़िल्म आर्काइव द्वारा यूट्यूब पर प्राजाधिपोक का राज्याभिषेक
प्रजाधिपोक (राम सप्तम) जन्म: 8 नवम्बर 1893 मृत्यु: 30 मई 1941 | ||
| राजसी उपाधियाँ | ||
|---|---|---|
| पूर्वाधिकारी वाजिर्वुध |
स्याम के राजा 26 नवम्बर 1925 – 2 मार्च 1935 |
उत्तराधिकारी आनन्द महिदोल |
| यह लेख एक आधार है। जानकारी जोड़कर इसे बढ़ाने में विकिपीडिया की मदद करें। |