प्रकाशमिति

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किसी प्रकाशस्रोत से उत्सर्जित प्रकाश ऊर्जा का मापन करने के लिये अनेक विधियाँ प्रचलित हैं। इनमें विविध प्रकार के यंत्रों का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिये, जब किसी प्रकाशस्रोत से उत्सर्जित प्रकाश एक तापवैद्युत पुंज (thermopile) के कृष्ण तल पर पड़ता है तब उस तल के ताप में वृद्धि होती है। जिससे प्रकाश ऊर्जा का मापन किया जा सकता है। दो प्रकाशस्रोतों द्वारा उत्सर्जित ऊर्जाओं के परिमाणों की तुलना उन स्रोतों को बारी बारी से तापीय पुंज की समान दूरी पर रखकर तथा उनसे पुंज के तल पर वर्धित ताप के कारण उत्पन्न ताप विद्युत-धाराओं की तुलना धारामापी की सहायता से करके, की जा सकती है। किंतु ये सभी विधियाँ ऊर्जा के सापेक्षिक परिमाणों की ही तुलना कर सकती हैं, उन प्रकाशस्रोतों की कांति या द्युति (brightness) की तुलना नहीं कर सकतीं, क्योंकि प्रकाशस्रोतों की द्युति उनसे उत्सर्जित प्रकाश के तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करती है। द्युति का आपेक्षिक ज्ञान हमें अपने नेत्रों द्वारा भली प्रकार होता है, किंतु हमारे नेत्र भी अधिक विश्वसनीय साधन नहीं हैं। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के नेत्र भी भिन्न भिन्न रंगों के प्रकाश को भिन्न भिन्न ढंगों से एवं भिन्न भिन्न मात्राओं में ग्रहण करते हैं। इसलिये दो प्रकाशस्रोतों की द्युतियों का मापन उनसे उत्सर्जित प्रकाश की किसी मानक स्रोत (standard source) की द्युति के साथ तुलना करके और उस मानक की द्युति को इकाई मानकर ही करना आवश्यक होता है, अन्यथा चक्षुदृष्ट कांति का मूल्यांकन करने में सभी एकमत नहीं हो सकते। अन्य विधि यह भी हो सकती है कि उन स्रोतों को द्युतियों की तुलना उनके द्वारा प्रदीप्त किसी तल पर प्रकाश की प्रदीप्ति की तीव्रताओं (intensities of illumination) की तुलना करके की जाय। प्रकाशस्रोतों की दीप्तियों या प्रदीपन शक्तियों (illuminating powers) को अथवा प्रकाशित तलों की प्रदीप्ति की तीव्रताओं की तुलना करने के लिये जो यंत्र अथवा उपकरण व्यवहृत होते हें उन्हें ज्योतिर्मापी या प्रकाशमापी (photometer) कहते हैं और प्रकाशिकी (optics) का वह अंग जो इन क्रियाओं से संबद्ध होता है, ज्योतिर्मिति या प्रकाशमिति (photometry) कहलाता है।

प्रकाशमिति की प्रक्रिया में मानक प्रकाशस्रोत का सबसे अधिक महत्व है। ऐसे मानक की प्रारंभिक अर्हता यह है कि उसके द्वारा उत्सर्जित प्रकाश स्थिर हो अथवा अत्यल्प परिवर्तनशील हो तथा जिन प्रकाशस्रोतों की तुलना के लिये उसका प्रयोग किया जा रहा है उनके स्पेक्ट्रमी वितरण (spectral distribution) की सन्निकटस्थ सीमा तक उसका भी स्पेक्ट्रमी वितरण हो। इसके अतिरिक्त वह मानक प्रकाश स्रोत सुगमता से पुनरुत्पादनीय भी होना चाहिए और प्रत्येक दशा में उसके विभिन्न भागों में पर्याप्त स्थायित्व भी रहना चाहिए। इन अर्हताओं की पूर्ति के निमित्त अनेक मानक स्रोतों का व्यवहार किया जाता रहा है। इनमें सबसे प्राचीन मानक स्पमेंसेटी कैंडिल या ब्रिटिश कैंडिल है जिसका व्यास ७/८ इंच तथा १/६ पाउंड होती है तथा वह ११० ग्रेन प्रति घंटे की दर से जलती है। किंतु इसकी द्युति पर इसमें प्रयुक्त बत्ती (wick) की तथा प्रयोगस्थल पर व्याप्त वातावरण में विद्यमान जल की मात्रा का प्रभाव अनिवार्य रूप से पड़ता है। इसलिए इसका प्रयोग अब प्राय: नहीं किया जाता और इसके स्थान पर विभिन्न प्रकार के वैद्युत्‌ मानक प्रकाश स्रोतों का व्यवहार किया जाता है। इनमें वर्नन हार्कोटे पेंटेन लैंप (Vernon Harcourt pentane lamp), दस कैंडिल लैंप तथा हेफनर (Hefner) लैंप आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। पूर्वकथित वर्नन हारकोर्ट लैंप में ऐसी व्यवस्था रहती है कि ज्वाला का आकार सदा नियत रहे। सन्‌ १९०९ तक मानक ज्योति तीव्रता (luminous intensity) इस लैंप की ज्योति के दशांश के बराबर मानी जाती रही।। सन्‌ १९२१ में ऐसे अनेक विद्युत लैंपों के समूह की औसत प्रदीपन क्षमता या प्रदीपकता को अंतरराष्ट्रीय मानक माना गया। ब्रिटेन, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमरीका की तीन प्रमुख मानकीकारक प्रयोगशालाओं में ऐसे मानकों द्वारा अन्य लैंपों के मानकीकरण किए जाते रहे। किंतु शुद्ध पेटेन (अन्य हाइड्रोकार्बनों से मुक्त) के दुष्प्राप्य होने तथा जिस बर्नर से इसकी ज्वाला निकलती है, उसमें तापवृद्धि के साथ ज्वाला की दीर्घता में अनियंत्रणीय परिवर्तन होते रहने के कारण इस लैंप का भी प्रचलन बहुत कम हो गया है। ऊपर कथित हेफ़नर लैंप में ऐमिल ऐसीटेट (amyl acetate) के दहन द्वारा ज्वाला उत्पन्न की जाती है जिसका रंग लाल होता है और जिसकी लंबाई प्राय: ४ सेंटीमीटर होती है। सुगम, सुप्राप्य एवं पुनरुत्पादनीय होने के कारण आजकल इसी लैंप का ज्योतिर्मितीय प्रयोजन के लिये अधिक उपयोग किया जाता है, इसकी ज्योति पेंटेन लैंप के अंतरराष्ट्रीय मानक की ९/१० गुनी होती है। सन्‌ १९३९ में अंतरराष्ट्रीय अनुबंध (करारनामा) के द्वारा एक नवीन एवं सर्वश्रेष्ठ प्राथमिक मानक (primary standard) का प्रयोग किया जाने लगा है जिसका नाम प्लैंकियन विकिरक (planckian radiator) है। इसमें प्लैटिनम को विद्युद्विधि से उसके गलनांक (melting point) तक उत्तप्त किया जाता है। उसकी द्युति को विशेष विकिरण व्यवस्था द्वारा ज्योतिर्मापी तक प्रेषित किया जाता है। ज्योतितीव्रता की अंतरराष्ट्रीय ईकाई का निर्धारण भी इसी विकिरक के आधार पर किया गया, किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण उसका व्यवहार स्थगित हो गया। १ जनवरी, १९४८ ई. से विश्व के कतिपय राष्ट्र पुन: उसका प्रयोग करने लगे हैं। प्लैंकियन विकिरक के प्रति ईकाई सेंटीमीटर की ज्योतीय तीव्रता के षष्ठ दशांश को अंतरराष्ट्रीय कैंडिल या कैंडेला (Candella) कहा जाता है।

मुख्य मापनीय राशियाँ[संपादित करें]

प्रकाशस्रोत की प्रदीपन क्षमता (illuminating power)[संपादित करें]

यह कैंडिल शक्ति में मापी जाती है। किसी प्रकाशस्रोत द्वारा प्रति सेकंड प्रति ईकाई घन कोण में प्रेषित ज्योतीय फ्लक्स (luminous flux) को उस स्रोत की प्रदीपन क्षमता कहते है। मान लें (चित्र 1) र (r) अर्धव्यास के गोले (sphere) के केंद्र उ (o) पर एक अंतरराष्ट्रीय कैंडिल प्रदीपन क्षमता का प्रकाशस्रोत रखा हुआ है। इस स्रोत द्वारा उत्सर्जित फ्लक्स गोले के संपूर्ण आंतरिक तल पर समान रूप से वितरित होगा। यदि इस गोले के तल के एक भाग को, जिसका क्षेत्रफल स (S) हो, लेकर उसकी परिमा (periphery) के सभी बिंदुओं को केंद्र उ (o) से मिला दिया जाय तो एक घनकोण बन जायगा जिसमें होकर जानेवाला संपूर्ण प्रकाश स (S) पर पड़ेगा। चूँकि संपूर्ण गोले के आंतरिक पृष्ठ (= 4p र2) पर कुल फ्लक्स फ (F) पड़ता है, इसेलिए स (S) पर पड़नेवाला फलक्स फ का वाँ भाग होगा।

इसमें स/र2 = घन कोण द व (S/r2 = solid angle w )। अत: यदि स = र2 = 1 (S = r2 = 1) हो तो द व = 1 (d w = 1) तथा (S) पड़नेवाला ज्योतीय फ्लक्स = 1 होगा।

अतएव ज्योतीय फ्लक्स की इकाई की परिभाषा हम इस प्रकार दे सकते हैं : एक अंतराष्ट्रीय कैंडिल की क्षमता के समरूप बिंदुवत्‌ स्रोत द्वारा ईकाई घनकोण में उत्सर्जित प्रकाश ऊर्जा अथवा इकाई अर्धव्यास के गोले के केंद्र पर रखे हुए इकाई अंतरराष्ट्रीय कैंडिल सामर्थ्य के प्रकाशस्रोत द्वारा गोले के ईकाई क्षेत्र पर प्रति सेंकेंड प्रक्षिप्त ज्योति ऊर्जा की मात्रा को ज्योतीय फ्लक्स की ईकाई कहते हैं। इस इकाई को ल्यूमेन (Lumen) कहा जाता है।

उपर्युक्त दृष्टांत से यह स्पष्ट है कि इकाई घनकोण में उत्सर्जित फ्लक्स = 1/4p ´ कुल फ्लक्स (F), किंतु एक मानक कैंडिल द्वारा उत्सर्जित कुल फ्लक्स = 4p ल्यूमेन, इसलिये किसी प्रकाश स्रोत द्वारा इकाई घन कोण में उत्सर्जित फ्लक्स =

इकाई घन कोण में किसी प्रकाशस्रोत द्वारा उत्सर्जित फ्लक्स को उस स्रोत की प्रदीपन क्षमता (illuminating power) या प्रदीप्ति (luminosity) कहते हैं। अत: किसी प्रकाशस्रोत की प्रदीपन क्षमता उस स्रोत द्वारा इकाई क्षेत्र पर प्रति सेकेंड प्रेषित प्रकाश की मात्रा तथा इन्हीं परिस्थितियों में एक मानक कैंडिल द्वारा प्रति सेकंड प्रति ईकाई क्षेत्र पर प्रेषित प्रकाश की मात्रा का अनुपात होता है।

यदि प्रकाशस्रोत सभी दिशाओं में समान रूप से प्रकाश विकिरण नहीं करता तो किसी दिशा में, किसी घनकोण दव (dw ) में उसकी प्रदीप्ति

दप = द्वारा व्यक्त होगी।

और उस दशा मे कुल फ्लक्स

=

ईकाई घनकोण के फ्लक्स के माध्यमान (mean value) को प्रकाशस्रोत की माध्यगोलीय कैंडिल शक्ति (mean shperical Candle Power) कहते हैं। इसका मान उपर्युक्त विवेचन के अनुसार होगा।

प्रदीप्त तल पर प्रदीपन की तीव्रता (intensity of illumination)[संपादित करें]

प्रदीप्त तल के प्रति इकाई क्षेत्र पर प्रक्षिप्त प्रकाश फ्लक्स या तीव्रता को ल्यूमेन प्रति वर्ग फुट या ल्यूमेन प्रति वर्ग मीटर में व्यक्त किया जाता है। मान लें क (C) कैंडिल शक्ति के एक प्रकाशस्रोत के संमुख द स (d S) क्षेत्रफल का एक छोटा सा तल क्षेत्र र (r) दूरी पर स्थित है। स्पष्ट है कि प्रति सेकंड इस क्षेत्र पर पड़नेवाला फ्लक्स = क. द व = क. दस/र2 (C dw = Cd S/r2) ल्यूमेन अर्थात्‌ क/र2 (C/r2) ल्यूमेन प्रति वर्ग क्षेत्र होगा और यह फ्लक्स दूरी र (r) के वर्ग के अनुसार घटता जायगा। अतएव प्रदीपन इकाई तीव्रता (अर्थात्‌ एक ल्यूमेन प्रति वर्ग क्षेत्र) उस क्षेत्र पर प्रदीपन की तीव्रता के बराबर होगी जो इकाई कैंडिल शक्ति के स्रोत के सम्मुख, इकाई दूरी पर, आपाती प्रकाश (incident light) के अभिलंबवत्‌ (normal) रखा गया हो। मापन की प्रचलित प्रणालियों में इसकी इकाइयाँ क्रमश: मीटर कैंडिल और फुट कैंडिल हैं। यदि विचारणीय तल दस (d S) आपाती प्रकाश की दिशा के लंबवत्‌ न होकर लंब से q कोण झुका हो और दस (d S) का प्रक्षेप (projection) अभिलंब दिशा में दस' हो तो तल दस पर प्रदीपन की तीव्रता =

इसे लैंबर्ट का कोज्या नियम (Lambert's cosine Law) कहते हैं।

प्रदीप्त तल की द्युति या चमक (Brightness or Brilliance of illuminated surface)[संपादित करें]

कोई प्रदीप्त तल अपने ऊपर प्रक्षिप्त प्रकाश का कुछ भाग अवशोषित (absorb) करता है और शेष को परावर्तित (reflect) करता है। यदि वह परावर्तित प्रकाश किसी विशेष दिशा में जाता है तो उस ओर से देखने पर वह तल अत्यंत दीप्त दिखलाई पड़ता है, जैसे दर्पणों में। किंतु यदि वह तल प्रक्षिप्त प्रकाश को चतुर्दिक्‌ विसरित करता है तो वह कम दीप्त जान पड़ता है। ऐसे परावर्तन को विसरित परावर्तन (Diffused reflection) कहते हैं तथा प्रकाश को चतुर्दिक विसरित करनेवाले तलों को विसरित परावर्तक (Diffuse reflectors) कहते हैं।

यदि किसी विसरित परावर्तक तल के सामने हम अपने नेत्र इस प्रकार रखें कि दृष्टि की दिशा उस तल के अभिलंब से q कोण बनाए और हमारे नेत्र के चक्षुताल या तारा (pupil) का क्षेत्रफल अ (A) तथा दीप्त तल के किसी बिंदु से तारा पर प्रक्षिप्त प्रकाश की सीमा, घनकोण व (w ) के अंदर हो, तो व = जहाँ र (r) उस तल से नेत्र की दूरी है। यदि नेत्र की दिशा में तल की प्रभावकारी कैंडिल शक्ति कq (Cq ) प्रति इकाई क्षेत्र हो तो दस (d S) क्षेत्रफलवाले तल द्वारा नेत्र पर प्रक्षिप्त प्रकाश की मात्रा = कq . दस. व (Cq . d S. w )। लैंबर्ट के नियम के अनुसार कq = क0 कोज्या q ), जहाँ क0 (C0) अभिलंब की दिशा में दृश्य तल की दीप्ति है।

यदि संपूर्ण तल दस (d S) से नेत्र पर बननेवाला कोण द वा (d W ) हो तो

द वा =

अर्थात्‌ दवा =

\ प्रति इकाई घन कोण में तल से नेत्र द्वारा प्राप्त प्रकाश की मात्रा या तल की द्युति

=


अत: किसी प्रदीप्त तल की प्रदीप्ति दर्शक के नेत्र की दिशा (q ) पर निर्भर नहीं करती।

पुन: मान ले कि किसी तल की प्रदीप्ति बq (Bq ) है। उसके द्वारा प्रति इकाई प्रक्षेपित (projected) क्षेत्रतल पर उत्सर्जित कुल ज्योतीय फ्लक्स (total luminous flux) ज्ञात करने के लिये मान लें दस (d S) तल से q और (q +dq ) कोणों के बीच चलनेवाला फ्लक्स दव (d w ), किसी क्षण इकाई दूरी पार करता है। उस क्षण में यह फ्लक्स इकाई अर्धव्यास के एक गोले (Sphere) के, जिसका केंद्र तल दस (d S) का मध्य बिंदु है, भीतरी तल पर एक खंड (zone) से व्याप्त होगा जैसा चित्र 2 में प्रदर्शित है। इस खंड (zone) का क्षेत्रफल (2p sin q . dq ) होगा। q की दिशा में दस (d S) का प्रक्षेप द स कोज्या q (d S cosq ) होगा और इस प्रकार q तथा dq के बीच प्रति इकाई प्रेषित प्रकाश की मात्रा बq दस कोज्याq . dq 2p sin q dq ) होगी इसलिये सभी दिशाओं में प्रति इकाई क्षेत्र में कुल प्रेषित प्रकाश की मात्रा

= होगी।

पूर्ण विसरक तलों के लिये बq (Bq ) का मान स्थिर होता है। मान लो बq = ब (Bq = B), तो कुल प्रेषित प्रकाश की मात्रा

\ तल की द्युति ब (B) = प्रति इकाई क्षेत्र पर प्रेषित कुल प्रकाश की मात्रा का 1/p वाँ भाग।

किसी प्रदीप्त तल की द्युति यदि 1/p कैंडिल शक्ति प्रति वर्ग-सेंटीमीटर होती है तो उसे एक लैबर्ट कहते हैं। इसी प्रकार 1/p कैंडिल शक्ति प्रति ईकाई वर्ग फुट की द्युति को एक फुट-लैंबर्ट कहते हैं।

स्टाइल्स क्रफ्रोर्ड प्रभाव[संपादित करें]

स्टाइल्स और क्रफोर्ड ने पता लगाया कि नेत्र में पुतली (तारा) के केंद्र के निकट प्रविष्ट होनेवाला प्रकाश चाक्षुष अनुक्रिया (visual response) उत्पन्न कर सकने में अधिक प्रभावकारी होता है। इसका कारण यह है कि तार की परिमा (periphery) के निकट से होकर नेत्र के अंदर जानेवाली प्रकाश किरणें दृष्टिपटल (retina) पर अपेक्षाकृत अधिक तिरछी पड़ती हैं। इसलिये उनकी तीव्रता पूर्वकथित प्रकाश किरणों की अपेक्षा कम प्रतीत होती हैं। यह प्रभाव प्रदीप्ति की तीव्रता एवं प्रदीपन शक्ति के अध्ययन में विशेष सहायक होता है।

मान लीजिए, नेत्र एक किरणपुंज प्राप्त करता है और उसकी ऊर्जा नेत्रतारा में समरूप वितरित हो जाती है। स्टाइल्स क्रॉफोर्ड प्रभाव विद्यमान रहने पर दृष्टिपटल तक पहुँचनेवाले प्रभावी फ्लक्स नियमन के हेतु अ (a) क्षेत्रफल का नेत्रतारा (स्टाइल्स क्रॉफर्ड प्रभाव की उपस्थिति में) स अ (S. a) क्षेत्रफल के नेत्रतारा (स्टाइल्स क्रॉफर्ड प्रभाव की अनुपस्थिति में) के तुल्य होता है। 2 मिमी. व्यास के नेत्र तारा के लिये स्टाइल्स गुणांक स (S) का मान 0.95 होता है, किंतु 4 मिमी. व्यास के नेत्रतारा के लिये यह 0.82 तथा 6 मिम. व्यास के नेत्रतारा के लिये 0.66 होता है।

प्रकाश प्रणाली द्वारा निर्मित बिंब की ज्योतिर्मयता (luminance) एवं प्रदीप्ति (illumination) ¾ मान लीजिए, किसी प्रकाशिक तंत्र (optical system) के, जिससे दस (dS) तल क्षेत्र का बिंब द स' (ds' ) बन रहा हो, प्रवेशद्वार और निर्गमद्वार क्रमश: यप (E P) और य प' (E P' ) है तथा तल दस प्रकाशीय अक्ष (optic acis) के अभिलंबवत स्थित है। ऊपर वर्णित सूत्रानुसार उपर्युक्त प्रणाली में उ तथा उ+द अ (U और U+dU) कोणों चित्र 3. के बीच स्थित वलयखंड (annular zone) में प्रविष्ट होनेवाले फ्लक्स की मात्रा

दफ उ 2p बद ज्या उ कोज्या उ. द उ

(dF = 2p Bu sin U cos U. dU)

तथा U' और U' +dU' के बीच निर्गत फ्लक्स की मात्रा

दफ' = क. द फ

(dF' = k. dF)

जहाँ क (k) उपकरण का प्रकाश संचरण गुणांक (transmission factor) है। हेल्महोल्ट्स (Helmholts) सूत्र के अनुसार

m . h ज्या उ = m ' h' ज्या उ'

(m h sin U = m ' h' sin U' )

जहाँ m और m ' क्रमश: वस्तु एवं बिंब स्थलों के अपवर्तनांक हैं तथा h और h' क्रमश: वस्तु एवं बिंब के रैखिक आकार हैं। यह देखा जा सकता है कि संबद्ध क्षेत्रतत्वों dS एवं dS' के लिए

m 2 द स ज्या2 उ = m 2 द स' ज्या2 उ'

(m 2 dS. sin2 U = m ' 2 dS' . sin2 U' )

इन्हें अवकलित (differentiate) करने पर,

m 2 . द स. ज्या2 उ कोज्या उ. द उ = m ' 2 . द स' . 2 ज्या उ' कोज्या उ' . द उ'

[m 2 dS. 2 sin U cos U dU = m ' 2 dS' . 2 sin U' cos U' dU' ]

\ द फ' = क. द फ = क. ब' 2p ज्या उ' कोज्या उ' द उ'

dF' = k dF = k.B' u 2p sin U' cos U' dU'

यही फ्लक्स उ' (U' ) तथा उ' + द उ' (U+dU' ) कोणों के बीच में द स' क्षेत्र के परे जाता है। अतएव यंत्र में प्रविष्ट होनेवाला कुल फ्लक्स

फ = p ब3 ज्या2 उ अ [F = p Bu sin2 U max]

तथा यंत्र से निर्गत फ्लक्स फ' = क फ

= क p बउ ज्या2 उ' अ

स्मरणीय है कि उअ (U max) तथा उ1अ (U' max) क्रमश: आपाती एवं निर्गत फ्लक्सों के अधिकतम मान हैं। उपर्युक्त समीकरण के अनुसार बिंब की प्रदीप्ति

अर्थात्‌ य µ ज्या2 उ1अ [Eµ sin2U' max]

इससे यह स्पष्ट है कि फोटोग्राफी के कैमरे प्रभृति यंत्रों में जो पूर्णत: बिंब की कांति पर आश्रित होते हैं, लेंस प्रणाली का द्वारक या छिद्र (aperture) काफी बड़ा होना चाहिए।

प्रदीपन क्षमता की तुलना[संपादित करें]

प्रकाशस्रोतों के प्रदीपन सामर्थ्यों का तुलनात्मक अध्ययन करने के हेतु जिन उपकरणों की सहायता ली जाती है उन्हें ज्योतिर्मापी या प्रकाशमापी (photometers) कहते हैं। इन उपकरणों में एक पर्दे के तल या उसके किसी अंश को दो प्रकाशस्रोतों द्वारा प्रकाशित किया जाता है और उन्हें ऐसा समंजित किया जाता है कि दोनों प्रकाशस्रोतों द्वारा उत्पन्न प्रदीप्ति समान हो। ऐसी स्थिति में यदि एक प्रकाशस्रोत की प्रदीपन क्षमता क1 (C1) और पर्दे से दूरी द1 (d1) तथा दूसरे के लिये ये राशियाँ क्रमश: क2 (C2) और द2 (d2) हों तो

इस सिद्धांत का अनुसरण सर्वप्रथम रमफर्ड ने 1794 ई. में किया था, किंतु उनकी विधि अधिक उपयोगी नहीं सिद्ध हुई। सन्‌ 1843 में बुन्सन ने एक अत्यंत उत्कृष्ट उपकरण का आविष्कार किया जो रमफर्ड द्वारा अनुसरित सिद्धांत पर ही आधरित था, किंतु उसमें दृष्टिगत प्रदीप्ति की तीव्रता का अनुमान के द्वारा निर्णय कर सकने के बदले सटीक निर्णय कर सकने की सुविधा थी।

प्रमुख ज्योतिर्मापी[संपादित करें]

रमफर्ड का छाया ज्योतिर्मापी (Rumford' s shadow photometer)[संपादित करें]

दो प्रकाशस्रोतों की प्रदीपन क्षमता की तुलना के हेतु प्रयुक्त प्रारंभिक कोटि के ज्योतिर्मापियों में से यह एक है। इसके प्रारंभिक स्वरूप में दो अपारदर्शी छड़ों का प्रयोग किया जाता था, किंतु अब एक ही छड़ प्रयुक्त होती है। छड़ को दो प्रकाशस्रोतों से चित्र 4. में प्रदर्शित विधि से प्रकाशित किया जाता है और उनसे पर्दे पर उत्पन्न होने वाली छड़ की छाया जब समान दीप्ति की प्रतीत होती है तब तो यह मान लेना सर्वथा तर्कसंगत है कि प्रदीप्तियाँ समान हैं। यदि पर्दे पर प्रक्षेपित प्रकाश दोनों प्रकाशस्रोतों से समान कोण पर आपतित हो तो स्रोतों की प्रदीपन क्षमता पर्दे से उनकी दूरियों के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होती है।

जॉली का ज्योतिर्मापी (Joly's photometer)[संपादित करें]

इस ज्योतिर्मापी में किसी पारदर्शी पदार्थ (सामान्यतया पैराफिन मोम) के दो सर्वसम पतले गुटके टिन की पत्तियों द्वारा परस्पर पृथक्कृत रखे होते हैं। दोनों तुलनीय प्रकाश स्रोतों को इस गुटके से इतनी दूर रखा जाता है कि गुटके के दोनों पार्श्व धरातल समान कांतियुक्त दृष्टिगोचर हों। इसमें कठिनाई यह होती है कि इस बात का निश्चय नहीं हो पाता कि दूरियाँ कहाँ से मापी जायें।

ल्युमर ब्राड्हन ज्योतिर्मापी[संपादित करें]

सर्वोत्कृष्ट ज्योतिर्मापी का निर्माण ल्युमर ब्रोड्हन ने किया था और उनके नाम पर उसे ल्युमर-ब्राड्हन ज्योतिर्मापी (Lummer Brodhun Photometer) कहा जाता है। इसकी रचना एवं कार्यविधि नीचे दिए गए चित्र 5 से समझी जा सकती है। प्रकाशस्रोत स1 और स2 से चलनेवाली प्रकाश की किरणें उत्तम विसरक (diffuser) अ के दोनों पार्श्वों पर पड़ती हैं। अ सामान्यतया प्लास्टर 'ऑव पेरिस' की चकती (disc) होता है। अ से विसरित प्रकाशकिरणें द1 ओर द2 से परावर्तित होती हैं और प्रिज्म प्रणाली प फ से होती हुई दूरदर्शी ल में जाती हैं। दूरदर्शी के दृष्टिक्षेत्र में अ के दोनों तलों की प्रदीप्ति कुछ वैसी ही दिखाई पड़ती है जैसा चित्र 5. (दृष्टिक्षेत्र का रूप) में प्रदर्शित है, प्रकाश स्रोतों की सापेक्षिक दूरियाँ इस प्रकार सम्मजित की जाती है कि दृष्टिक्षेत्र समरूप प्रदीप्त हो। तब अ से दोनों की दूरियाँ नाप ली जाती है।

बुंसन का स्नेहित बिंदु ज्योतिर्मापी (Bunsen's grease spot Photometer)[संपादित करें]

सर्वोत्तम यथार्थ परिणाम प्रदायक यह प्रथम ज्योतिर्मापी है। इसमें एक खुरदुरे श्वेत कागज की चकती के केंद्र पर तेल बिंदु स्थापित कर उसे पारभासी (transluscent) बना दिया जाता है (चित्र 6.), उसके दोनों ओर तुलनीय प्रकाशस्रोतों को रखकर उनकी दूरियाँ इस प्रकार समंजित की जाती हैं कि पारभासी बिंदु या तेल-बिंदु तथा कागज का शेष अपारदर्शी भाग समा द्युति के दृष्टिगोचर हों। यदि अपारदर्शी भाग का परावर्तन गुणांक (reflection factor) र (r) हो तथा तैल बिंदु के परावर्तन एवं अपवर्तन गुणांक क्रमश: र' (r' ) तथा ट' (t' ) हो और दाहिनी और बाई ओर की प्रदीप्तियाँ क्रमश: यद (ER) और यब (EL) हों तो अपारदर्शी की प्रदीप्ति रयब/ p (r E1/p ) तथा पारभासी अंश की प्रदीप्ति (र' यब + ट' यद)/ p [r' EL + t' E)/ p ] होगी।

जब दोनों स्रोतों को ज्योतिर्मापी के दोनों ओर रखने पर तथा बाई ओर से देखने पर दोनों तलों की दीप्तियाँ समान हो जाती हैं तो रयब = र' यब + ट' यद [r EL = r' EL + t' ER]

यदि ज्योतिर्मापी के दोनों तलों के लिये र और र' के मान समान हों और दाहिनी ओर से देखने पर ज्योतिर्मापी पट पर दीप्तियाँ समान हों तो

(र यब' = र' यद' + ट' यब' )

[r ER = r' E' R+ t' EL' )]

इन दोनों समीकरणों को संयुक्त करने पर

मान लीजिए प्रथम स्थिति में लैंपों की ज्योतिर्मापी शिर (Phootmetere head) से दूरियाँ क्रमश: दब (dL) तथा दद (DR) हों तो दूसरी स्थिति में ये दूरियाँ क्रमश: द' ब (d' L) तथा द' द (d' R) दों तो अभिलांबिक आपतन के लिये

तथा

जहाँ पब (IL) तथा पद (IR) ज्योतिर्मापी पट की क्रमश: बाईं और दाहिनी ओर की प्रदीप्ति तीव्रताएँ हैं।

यदि ज्योतिर्मापी-शिर दोनों ओर से आपाती प्रकाश की किरणों के समक्ष सममित (symmetrical) स्थित नहीं है तो उपर्युक्त विधि दोनों ओर बारी बारी से व्यवहृत की जाती है और दोनों ओर से प्राप्त प्रदीप्ति तीव्रताओं के अनुपातों का ज्यामितीय मध्यमान (geometric mean) ले लिया जाता है।

फोटोग्राफिक ज्योतिर्मिति (Photographic photometry)[संपादित करें]

इस शीर्षक के अंतर्गत वे सभी ज्योतिर्मितीय विधियाँ (Photometic methods) आती हैं जिनसे खगोलीय पिंडों (celestial bodies) का फोटोग्राफ लिया जाता है और उनकी द्युतियों की तुलना की जाती है। इन तुलनात्मक परिमाणों से प्रत्येक तारे के कांतिमान (magnitude) की गणना की जाती है और उसके लिये कांतिमान अंतर (magnitude difference) का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। तारों का, पहले एक पट्टिका (plate) पर फोटो चित्र लिया जाता है। इसके पश्चात्‌ दूरदर्शी (telescope) को थोड़ा सा घुमाया जाता है और प्रकाश घटन (light reduction) की किसी विधि का, जिसके लिये घटन अनुपात (reduction ratio) ज्ञात होता है, प्रयोग कर उस तारे के पार्श्वस्थ क्षेत्र का पुन: फोटो चित्र लिया जाता है। दोनों बार प्रभासन (exposure) की अवधि एक ही रहती है। डेवलप करने के अनंतर प्लेट पर प्रत्येक तारे के दो सन्निकटस्थ बिंब प्राप्त होते हैं। इन्हें क्रमश: पूर्ण एवं न्यूनीकृत (reduced) बिंब कहते हैं। अब प्लेट पर दो तारे ऐसे चुने जाते हैं कि एक का पूर्ण बिंब दूसरे के न्यूनीकृत बिंब के बराबर हो उनके बीच कांतिमानों के अंतर को कांतिमान अंतर (Magnitude difference) दम (D m) कहते हैं। जहाँ दम (D m) घटन अनुपात के लघुगणक (logarithm) का 2.5 गुना होता है। यदि इस प्रक्रिया को अन्य तारों के लिये चलाते रहें तो दृष्टिक्षेत्र (field of vision) के सभी तारों का एक ऐसा क्रम प्राप्त होगा जिसमें प्रत्येक अग्रवर्ती (preceding) तारे का कांतिमान पश्चवर्ती (succeeding star) के कांतिमान से D m कम होगा। ऐसे कतिपय क्रमों का चुनाव करके एक लेखा चित्र का अंकन किया जा सकता है, जिससे बिंब की माप (image measure) का संबंधी तारे तथा किसी चुने हुए तारे के कांतिमानों के अंतर में संबंध हो जायगा।

नीहारिकीय फोटोग्राफी (Nebular Photography)[संपादित करें]

यह उपर्युक्त सिद्धांत पर ही आधृत ज्योतिर्मिति की एक अत्यंत उत्कृष्ट एवं कौशलयुक्त शाखा है जिसमें किसी नीहारिका के कांतिमान का मान ज्ञात किया जाता है। इस मापनक्रम में नीहारिका को एक तारे के सदृश माना जाता है और यह ध्यान रखा जाता है कि नीहारिका का सारा प्रकाश दूरदर्शी में प्रविष्ट हो और वैसा ही प्रभाव उत्पन्न करे जैसा एक तारे से आगत प्रकाश द्वारा उत्पन्न होता है।

स्पेक्ट्रमी ज्योतिर्मिति या स्पेक्ट्रोफोटोमीट्री (Spectrophotometry) ¾ इस प्रकार की ज्योतिर्मिति प्रकाश के केवल एक अत्यंत लघु तरंग दैर्ध्य विस्तार (range of wavelength) का प्रयोग करके विभिन्न तरंगदैर्ध्य विस्तारों में किसी विचारणीय तारे के कांतिमानों का अध्ययन किया जाता है। इससे नक्षत्रीय स्पेट्रम (stellar spectra) में वर्णक्रमी ऊर्जा वितरण का अध्ययन करने में अत्यंत महत्वपूर्ण सहायता मिलती है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]