पेरोल
किसी बन्दी व्यक्ति को उसकी सजा की अवधि पूरी होने के पहले ही अस्थाई रूप से रिहा करने को पेरोल (parole) कहते हैं। पेरोल कुछ शर्तों के अधीन दिया जाता है। [1][2]
पैरोल और जमानत भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में अलग-अलग कानूनी अवधारणाएँ हैं। जमानत (Bail) मुकदमे से पहले या उसके दौरान आरोपी को दी जाने वाली अस्थायी स्वतंत्रता है, जबकि पैरोल (Parole) सजा भुगत रहे दोषी कैदी को निश्चित शर्तों के साथ सीमित अवधि के लिए दी जाने वाली रिहाई होती है। भारत में पैरोल के लिए कोई एक केंद्रीय कानून नहीं है; यह विभिन्न राज्यों के जेल नियमों, जेल मैनुअल और प्रशासनिक निर्देशों के आधार पर संचालित होती है तथा भारत संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़े जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांतों से भी प्रभावित होती है। पैरोल का उद्देश्य दंड के साथ-साथ सुधार और पुनर्वास को बढ़ावा देना है, जैसे परिवार से संपर्क बनाए रखना, मानवीय कारणों से अस्थायी रिहाई और समाज में पुनः समायोजन की तैयारी। हालांकि पैरोल प्रशासनिक निर्णय माना जाता है, फिर भी मनमाने या अनुचित इंकार की स्थिति में उच्च न्यायालय न्यायिक समीक्षा कर सकता है।[3]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "संग्रहीत प्रति". 22 दिसंबर 2015 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 12 दिसंबर 2015.
- ↑ "संग्रहीत प्रति". 10 जनवरी 2009 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 12 दिसंबर 2015.
- ↑ Goyal, Advocate Bhuvnesh Kumar (2025-12-13). "Parole in India: Meaning, Law, Procedure, Grounds, and Important Legal Aspects" (अमेरिकी अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 2026-02-17.
| यह लेख एक आधार है। जानकारी जोड़कर इसे बढ़ाने में विकिपीडिया की मदद करें। |