द्वितीय पुलकेशी

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पुलकैशिन २(कन्नड: ಇಮ್ಮಡಿ ಪುಲಿಕೇಶಿ) चालुक्य राजवंश का एक महान शासक था। इन्होंने लगभग ६२० ईसवी में शासन किया था।

पुलकेशिन द्वितीय Pulakeshin II

October 9, 2015 admin21069 Views  0 Comment

पुलकेशिन द्वितीय के बारे में हमें ऐहॉल अभिलेख में उसके समकालीन कवि रविकीर्ति द्वारा लिखी गयी प्रशस्ति से जानकारी मिलती है। यह संस्कृत भाषा में है। पुलकेशिन द्वितीय इस राजवंश का पराक्रमी व प्रसिद्ध शासक था जिसका शासन-काल 609-642 ई. है। पुलकेशिन ने गृहयुद्ध में चाचा मंगलेश पर विजय प्राप्त कर राज्याधिकार प्राप्त किया। उसने श्री पृथ्वीवल्लभ सत्याश्रय की उपाधि से अपने को विभूषित किया। वह जीवन भर युद्धों में रत रहा और संपूर्ण दक्षिण भारत पर अपना प्रभुत्व कायम किया। उसने अपनी आंतरिक स्थिति को मजबूत बनाने के लिए विद्रोही सामंतों का दमन किया। बाद में उसने पड़ोसी राजाओं के विरुद्ध अभियान किए। पुलकेशिन ने राष्ट्रकूट राजा गोविन्द को भीमा नदी के तट पर एक युद्ध में परास्त किया। विपरीत परिस्थितियों में बड़े धैर्य के साथ पुलकेशिन द्वितीय ने अपने प्रतिद्वन्द्वियों एवं विद्रोहियों को परास्त किया। बाद में कदम्बों की राजधानी बनवासी पर अपना अधिकार जमा लिया। मैसूर के गंगों व केरल के अलूपों से भी उसका मुकाबला हुआ। पुलकेशिन ने कोंकण की राजधानी पुरी पर भी अधिकार किया। लाट, मालवा व भृगुकच्छ के गुर्जरों को भी उसने पराजित किया। पल्लव राजा महेन्द्रवर्मन को पराजित कर उसकी राजधानी कांची तक उसने अपने साम्राज्य का विस्तार किया। उसकी विजयों से भयभीत होकर चेर, चोल व पाण्ड्यों ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। समकालीन स्रोतों से विदित होता है कि उसने नर्मदा से कावेरी के तट के सभी प्रदेशों पर अपना आधिपत्य कायम कर लिया था और इस प्रकार दक्षिण के एक बड़े भू-भाग पर राजनैतिक दृष्टि से एकता कायम की। दक्षि में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद उसने उत्तर की ओर प्रयाण किया। पुलकेशिन द्वितीय का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सैनिक संघर्ष उत्तर भारत के सर्वशक्तिमान शासक हर्षवर्धन के विरुद्ध हुआ।

इस सन्दर्भ में ऐहोल अभिलेख से जानकारी मिलती है। युद्ध सर्वथा निर्णायक सिद्ध हुआ एवं हर्षवर्धन को दक्षिण विजय की महत्त्वाकांक्षा सदैव के लिए त्यागनी पड़ी। इस युद्ध से पुलकेशिन द्वितीय के गौरव में वृद्धि हुई, उसने परमेश्वर व दक्षिणापथेश्वर उपाधियाँ धारण कीं। पुलकेशिन ने पूर्व अपने साम्राज्य का विस्तार किया। उसने दक्षिण कोशल, कलिग के शासकों को जीता, वेंगी को विजित कर पल्लवों को जीता। चोल, पाण्ड्य व केरल के राजाओं ने भी उससे संधि की। पुलकेशिन की इन विजयों का उल्लेख एहोल अभिलेख में हुआ है। उसकी गणना भारत के महान् शासकों में की जा सकती है जिसने छोटे से चालुक्य रही को विन्ध्यक्षेत्र से दक्षिण में कावेरी नदी के तट तक विस्तृत करके दक्षिणापथेश्वर की उपाधि धारण की। उसने हर्ष के अहियनों को अवरुद्ध क्र उसकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को अवरुद्ध किया।

महान् विजेता ही नहीं कुशल शासक भी पुलकेशिन था। उसने देश-विदेशों के शासकों से कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित किये। मुस्लिम लेख तवरी में उल्लेख आया है कि प्रमेश नामक राजा जो पुलकेशिन द्वितीय ही था, ने 615-26 ई. के लगभग तत्कालीन पारसी के सम्राट् भुखरी द्वितीय के राजदरबार में अपनादूत बहुत से उपहारों के साथ भेजा। इस सन्दर्भ में अजंता का एक भित्तिचित्र उल्लेखनीय है जिसमें किसी राजपूत को एक भारतीय राजा द्वारा स्वागत करते हुए दिखाया गया हे। इससे भारतीय शासकों की कूटनीतिक सम्बन्धों की परम्परा का बोध हो जाता है। संभव है इस चित्र का निर्माण पुलकेशिन द्वितीय के काल में हुआ हो। उसने बहुत से शासकों के पास अपने राजदूत भेजे। चीनी यात्री ह्वेनसांग स्वयं पुलकेशिन के दरबार में उपस्थित हुआ। चीनी यात्री भी कहता है कि पुलकेशिन के विदेशी राजाओं से मधुर सम्बन्ध थे। ईरानी शासक खुसरो द्वितीय उसका परम मित्र था। ईरानी राजदूत को पुलकेशिन के दरबार में विशेष सम्मान प्राप्त था। ह्वेनसांग के विवरण से पुलकेशिन की बहुत सी योग्यताओं का बोध होता है। चीनी यात्री ने उसके राज्य का पैदल भ्रमण किया था और बहुत सी सूचनाएँ राजा के बारे में उसने दी है। पुलकेशिन के राज्य के अंतिम वर्ष संकटपूर्ण थे। पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने 642 ई. में वातापी पर आक्रमण किया। इसी युद्ध में पुलकेशिन की हार हुई और संभवत: मृत्यु भी। पल्लवों ने उसकी राजधानी को लूटा और उजाड़ दिया।ref>http://www.karnataka.com/personalities/emperor-pulakesi-ii/ </ref> इन्हें पुलकैशी नाम से भी जाना जाता था।

सन्दर्भ[संपादित करें]