पुण्डीर

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पुण्डीर एक राजपूत जाति है। ये दधिमती माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं।

मान्यता है कि रघुवंशी श्रीराम के वंशज महाराजा पुण्डरीक के नाम से क्षत्रियों में पुण्डीर शाखा चली। जो पुण्डीर क्षत्रिय प्राचीन काल मे दधिमती क्षेत्र में निवास करते थे वो कालांतर में दाहिमा क्षत्रिय कहलाए। पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज चौहान के सबसे शक्तिशाली सामन्तों कैमास दाहिमा और धीर पुण्डीर दोनो का भाई होना लिखा है, जो इस तथ्य की पुष्टि करता है।

इतिहास[संपादित करें]

एरिक थॉमस स्टोक्स ने पुण्डीरों के बारे में लिखा है कि-

In the Katha the Pundir Rajputs stood out as the dominant landholders, dwelling together as a formidable clan that had never been properly brought under close administration. A proud, hardy race ... they possessed a long history of turbulence. Significantly they had successfully warded off alien intrusion ... So formidable did they appear as adversaries before the recapture of Delhi at the end of September 1857 that the British left them severely alone, despite their attacks on Deoband town and in similar depredations.[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Stokes, Eric (1980). The Peasant and the Raj: Studies in Agrarian Society and Peasant Rebellion in Colonial India. Cambridge University Press. पृ॰ 172. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-52129-770-7.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]