पवन चक्की

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पवन चक्कियों का इस्तेमाल सदियों से होता आया है, लेकिन बिजली पैदा करने के लिए इसका विकास पिछली सदी में ही हुआ।

पवन चक्की कई तरह की होती हैं, लेकिन जो सबसे अधिक प्रचलित हैं उनमें एक विशाल खंभे के ऊपरी भाग पर एक सिलेंडर लगा होता है जिसके मुंह पर 20 से 30 फ़ुट लम्बे और 3 से 4 फ़ुट चौड़े पंखे लगे रहते हैं। जब हवा चलती है तो ये पंखे घूमने लगते हैं। इससे पैदा हुई ऊर्जा को जेनेरेटर द्वारा बिजली में परिवर्तित किया जाता है।

हमारे वायुमंडल में इतनी पवन ऊर्जा है जो दुनिया की वर्तमान बिजली खपत से पांच गुना अधिक बिजली पैदा कर सकती है। वर्ष 2008 में दुनिया की कुल बिजली खपत का 1.5 प्रतिशत हिस्सा पवन ऊर्जा से पैदा किया गया। लेकिन इस दिशा में तेज़ी से प्रगति हो रही है और बड़े स्तर पर विंड फ़ार्म बनाए जा रहे हैं। ऐसे काम करती है पवन चक्की


डेनमार्क में 19 प्रतिशत बिजली इसी तरह पैदा की जाती है।

भारत में इस समय पवन ऊर्जा से 9587.14 मेगावॉट बिजली पैदा करने की क्षमता है और 2012 तक इसमें 6000 मेगावॉट की बढ़ोतरी की जाएगी.

हवा ऊर्जा का स्वच्छ, प्रदूषण रहित अक्षय स्रोत तो है, लेकिन इससे जुड़ी कुछ समस्याएं भी हैं जैसे ये महंगा है, यह हवा के बहने पर निर्भर है इसलिए हमेशा उपलब्ध नहीं होता, इसके लिए खुले मैदानों, समुद्री किनारों या ऊंचे स्थानों की आवश्यकता होती है जहां हवा का बहाव अधिक हो और ये देखने में अच्छे नहीं लगते.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

http://hi.wikipedia.org/s/lsg

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]