परती परिकथा

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परती परिकथा  
लेखक फणीश्वरनाथ रेणु
मूल शीर्षक परती परिकथा
भाषा हिंदी
प्रकार उपन्यास
प्रकाशक राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन तिथि 21 सितम्बर 1957
पृष्ठ 379

परती परिकथा एक उपन्यास है जिसके रचायिता फणीश्वर नाथ रेणु हैं। मैला आँचल के बाद यह रेणु का दूसरा आंचलिक उपन्यास है। इस उपन्यास के साथ ही हिंदी साहित्य जगत दो भागों में विभक्त हो गया: पहला वर्ग तो इसको मैला आँचल से भी बेहतर उपन्यास मानता था, वहीँ, दूसरा वर्ग इसे उपन्यास ही नहीं मानता था। सच में अगर उपन्यास के पारंपरिक मानकों से देखा जाये तो परती परिकथा में काफी अलगाव दिखेगा। यह मैला आँचल जैसा भी एकरेखीय धारा में नहीं चलता, वरन यह तो देश-काल का अतिक्रमण कर एक ही समय में सारे काल को प्रस्तुत और अप्रस्तूत दोनों करता है। यह जितना दिखाता है उससे भी ज्यादा छिपाता है। कभी यह पाठकों की परीक्षा लेता है तो कभी यह उसे बिलकुल भौचक ही कर देता है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

जिस प्रकार मैला आँचल में पूरा का पूरा अंचल ही नायक था उसी प्रकार यहाँ भी नायकत्व किसी खाश पात्र की बजाय अंचल को ही मन जायेगा किन्तु यहाँ पर कुछ पात्र जिसे की जीतेन्द्र मिश्र को नायकत्व के करीब मन जा सकता है। या यूँ कहे की आंचलिकता की धारण करते हुए भी इस कहानी में मिसर परिवार ही केंद्रीय तत्त्व है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]