नोदक

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वायुयान का नोदक

नोदक या प्रोपेलर (propeller) ऐसे यंत्र या मशीन को कहते हैं जो किसी वाहन पर लगा हो और उसे आगे धकेलने का काम करे। नोदकों के घूर्णन (रोटेशन) के द्वारा वायु या जल को पीछे फेंकने में मदद मिलती है जिससे यान पर आगे की ओर बल लगता है। समुद्री जहाज़ों और वायुयानों पर लगे पंखेनुमा नोदक जल या हवा को पीछे फेंककर यान को आगे की तरफ धकेलते हैं।[1][2][3]

नोदक शब्द से निम्नलिखित का तात्पर्य निकल सकता है:

इस तरह टरबाइन वाटर व्हील की प्राकृतिक रूप से विकसित तकनीक है। हालांकि, जब तक औद्योगिक क्रांति नहीं हुई थी, तब तक आधुनिक टरबाइन का विकास नहीं हुआ था। ऐतिहासिक तौर पर देखें तो १९वीं सदी में यह बड़ी-बड़ी फैक्टरियों में इस्तेमाल होता था। लेकिन, जब बिजली की उत्पत्ति हुई तब से कारखानों में जेनरेटर का इस्तेमाल होने लगा. अब अगर टरबाइन की कार्यप्रणाली की बात करें तो यह न्यूटन के तीसरे गति नियम के अधार पर काम करती है। यानी प्रत्येक क्रिया पर, विपरीत प्रतिक्रिया होती है। इसी तरह टरबाइन का प्रोपेलर काम करता है। प्रोपेलर में लगा स्पाइंडल हवा या पानी पर दबाव बनाता है।

इसी दबाव की वजह से प्रोपेलर टरबाइन को पीछे की ओर धक्का मारता है, जिससे वह चलती है। आमतौर पर टरबाइन को एक जगह रख दिया जाता है, ताकि जब भी पानी उससे होकर गुज़रे तो टरबाइन के हर ब्लेड पर पड़ने वाले दबाव से वह चल पड़े। हवा या पानी के टरबाइन के साथ एक ही नियम लागू होता है। जितना अधिक पानी या हवा का प्रवाह होगा, टरबाइन उतनी तेज गति से चलेगी।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Smith, Edgar C. (1905). A Short history of Naval and Marine Engineering Archived 2017-03-12 at the Wayback Machine. University Press, Cambridge. pp. 66–67.
  2. Pilot’s Handbook of Aeronautical Knowledge Archived 2015-07-01 at the Wayback Machine. Oklahoma City: U.S. Federal Aviation Administration. 2008. pp. 2–7. FAA-8083-25A.
  3. Ash, Robert L., Colin P. Britcher and Kenneth W. Hyde. "Wrights: How two brothers from Dayton added a new twist to airplane propulsion." Mechanical Engineering: 100 years of Flight, 3 July 2007.