धरमदास

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धर्मदास (या धनी धर्मदास ; १४३३ - १५४३ अनुमानित) कबीर के परम शिष्य और उनके समकालीन सन्त एवं हिन्दी कवि थे। धनी धर्मदास को छत्तीसगढ़ी के आदि कवि का दर्जा प्राप्त है। कबीर के बाद धर्मदास कबीरपंथ के सबसे बड़े उन्नायक थे।

परिचय[संपादित करें]

संत धरमदास को कबीर के शिष्यों में सर्वप्रमुख मानने की प्रवृत्ति पाई जाती हैं, किंतु ये उनके ठीक समसामयिक भी नहीं ठहरते। इनके द्वारा स्थापित कही जानेवाली 'छत्तीसगढ़ी शाखा' की कबीरपंथी परंपरा की तालिका के अनुसार इनका आविर्भाव काल विक्रम संवत् की १७वीं शताब्दी के द्वितीय वा प्रथम चरण से पहले जाता नहीं जान पड़ता जिस कारण ये कबीर के परवर्ती हो जाते हैं। इसी प्रकार कतिपय सांप्रदायिक ग्रंथों तथा स्वयं इनकी भी कुछ पंक्तियों द्वारा इनका उन्हें, जिंदरूप में (अमर सुखनिधान) तथा विदेही बनकर 'झीना परस' (घ.दा. की बानी) दिखलाते हुए ही, मानना, सिद्ध होता है। इसके सिवाय बिहारवाले दरिया साहब के ज्ञानदीपक (१५९- १६०) से भी स्पष्ट है कि, धरमदास के रूप में, स्वयं कबीर साहब ने ही दो सौ वर्ष पीछे अवतार धारण किया था और नया पंथ चलाया था। अतएव अधिक संभव है कि इन्होंने उनके आदर्श एवं उपदेशों से विशेष प्रेरणा ग्रहण करके ही उन्हें गुरुरूप में स्वीकार कर लिया हो। फिर भी कबीर पंथ के अधिकांश अनुयायी इन दोनों की प्रत्यक्ष भेंट में विश्वास करते हैं और तदनुसार इनका जीवन वृत्त भी देते हैं।

कहते हैं कि इनका पूर्व नाम 'जुड़ावन' था और ये कसौघन बनिया थे, इनका निवास स्थान बाँधवगढ़ था। इनकी पत्नी का नाम अमीन था और इनके नारायणदास एवं चूड़ामणि नामक दो पुत्र भी थे जिनमें से प्रथम कबीर साहब के प्रति विरोधभाव रखता था। ये पहले वैष्णवधर्म में दीक्षित रह चुके थे और इनके गुरु का नाम रूपदास था। कई तीर्थों की यात्रा कर लेने पर अपने जीवन के तृतीय भाग में इन्हें एक बार मथुरा में कबीर साहब के साक्षात् दर्शन हो गए और फिर काशी में भी दोनों की भेंट हुई। इसके अनंतर कबीर साहब का इनके यहाँ बांघगढ़ जाना, इन्हें उपदेश देना तथा इनके द्वारा कबीर पंथ का प्रचार किया जाना भी कहा गया है। इसी प्रकार यह प्रसिद्ध है कि इनका देहांत पुरी में हुआ जहाँ पर ये कबीर साहब के साथ रहे और इनकी समाधि भी यहीं निर्मित हुई।

संत धरमदास द्वारा रचे अनेक ग्रंथों के नाम दिए जाते हैं और उनमें अधिकतर इनका, कबीर साहब के साथ, संवाद वा प्रश्नोत्तर पाया जाता है जिससे इनके द्वारा उनका रचित भी होना पूर्णत: सिद्ध नहीं हो पाता। इनकी कई फुटकर बानियों का एक संग्रह 'धनी धरमदास की बानी' नाम से प्रयाग के बेलवेडियर प्रेस द्वारा प्रकाशित है। वहाँ पर ये एक सगुणोपासक भक्त के रूप में दिखलाई पड़ते हैं और इनकी कबीर साहब के प्रति प्रगाढ़ भक्ति एवं श्रद्धा प्रकट होती है। कबीर साहब वहाँ इनके इष्टदेव से प्रतीत होते हैं और उन्हें ये अपने स्वामी अथवा पति तक के रूप में, आर्तभाव के साथ, स्वीकार करते हैं। इनके द्वारा प्रदर्शित भावों में हृदय की सच्चाई लक्षित होती है तथा इनका अपनी अंत:साधना का वर्णन भी बहुत स्पष्ट व सरल है। दादूपंथी राघवदास ने अपनी भक्तमाल के अंतर्गत इनके सात शिष्यों के नाम दिए हैं तथा उनमें से प्रथम दो अर्थात् चूड़ामणि एवं कुलपति को इनका 'नाती' अर्थात् संबंधी ही बतलाया है। शेष पाँच में से जागू, भगता और सूरत गोपाल, वस्तुत: इनके गुरुभाई रूप में ही अधिक प्रसिद्ध हैं तथा साहिबदास एवं दल्हण के विषय में काई पता नहीं चलता। इनके जीवनवृत्त की चर्चा पर अभी तक पौराणिकता की ही छाप लगी जान पड़ती है, किंतु इसके कारण इनका महत्व कम नहीं हो सकता।

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • ब्रह्मलीन मुनि: 'सद्गुरु श्री कबीर चरितम्' (बड़ोदा, १९६० ई.)
  • डा. केदारनाथ द्विवेदी : कबीर और कबीर पंथ : एक तुलनात्मक अध्ययन

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]