धनुरासन

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धनुरासन

धनुरासन (=धनुः + आसन = धनुष जैसा आसन) में शरीर की आकृति सामान्य तौर पर खिंचे हुए धनुष के समान हो जाती है, इसीलिए इसको धनुरासन कहते हैं।

यह आसन करने के लिए सबसे पहले चटाई पर पेट के बल लेट जांय। अब अपने पैरों को घुटनों से मोड़कर हाथों से पैरों को पकड़ लें और सांस लेते हुए सिर, छाती और जांघ को उपर उठायें। शरीर के साथ कोई भी जोर जबरदस्ती ना करें।

अब इसी अवस्था में कुछ देर बने रहें, इस दौरान सांस धीरे धीरे लेते और छोड़ते रहें।

यह आसन प्रतिदिन 2 से 3 बार करें।

सावधानी[संपादित करें]

जिन लोगों को रीढ़ की हड्डी का अथवा डिस्क का अत्यधिक कष्ट हो, उन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए। पेट संबंधी कोई गंभीर रोग हो तो भी यह आसन न करें।

लाभ[संपादित करें]

आकर्ण धनुरासन (स्वामी विष्णुदेवानन्द आसन का प्रदर्शन करते हुए)
पूर्ण धनुरासन

धनुरासन से पेट की चरबी कम होती है। इससे सभी आंतरिक अंगों, माँसपेशियों और जोड़ों का व्यायाम हो जाता है। गले के तमाम रोग नष्ट होते हैं। पाचनशक्ति बढ़ती है। श्वास की क्रिया व्यवस्थित चलती है। मेरुदंड को लचीला एवं स्वस्थ बनाता है। सर्वाइकल, स्पोंडोलाइटिस, कमर दर्द एवं उदर रोगों में लाभकारी आसन है। स्त्रियों की मासिक धर्म सम्बधी विकृतियाँ दूर करता है। मूत्र-विकारों को दूर कर गुर्दों को पुष्ट बनाता है।

1) रोज नियमित धनुरासन करने से पेट मांसपेशियो में अच्छा खिंचाव आता है जिससे पेट की चर्बी कम होती है।

2) धनुरासन करते समय पीठ को अच्छा स्ट्रेच मिलता है, जिससे वह मजबूत बनती है और इससे रीठ की हड्डी भी मजबूत व लचीली बनती है।

3) इसके नियमित अभ्यास से चिन्ता और अवसाद को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

4) रोज नियमित धनुरासन करने से शरीर का पाचनतंत्र मजबूत बनता है और एसिडिटी, अजीर्ण, खट्टी डकार में भी राहत मिलती है।

5) हाथ और पेट के स्नायु को पुष्ट करता है।

6) वृक्क (किडनी) के संक्रमण से निजात मिलती है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]