द्वैताद्वैत

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द्वैताद्वैत दर्शन के प्रणेता निम्बार्क हैं। उनके दर्शन को भेदाभेदवाद (भेद+अभेद वाद) भी कहते हैं। ईश्वर, जीवजगत् के मध्य भेदाभेद सिद्ध करते हुए द्वैत व अद्वैत दोनों की समान रूप से प्रतिष्ठा करना ही निम्बार्क दर्शन (द्वैताद्वैत) की प्रमुख विशेषता रही है। द्वैताद्वैतवादी विचारकों ने अद्वैत-वेदान्त सम्मत अभेदवाद का दूषण कर भेदवाद की स्थापना की है। ब्रह्म तत्त्व के सन्दर्भ में द्वैताद्वैतवादियों का मत है कि सच्चिदानन्द ब्रह्म (परमेश्वर) अनन्त गुणों से युक्त होने के कारण सगुण साकर रूप में है, यद्यपि उसके सगुण साकार व निर्गुण निराकार रूप में तत्त्वतः भेद भी निम्बार्क दार्शनिकों को अस्वीकार्य है। इस विचारधारा में ब्रह्म, जीव व जगत के सम्बन्ध को भी धर्मतः व स्वरूपतः भिन्नाभिन्न सिद्ध करने का यत्न किया गया है। परिणामवादी निम्बार्क दर्शन के अनुसार 'भगवान पुरूषोत्तम रमाकान्त' अशेष, कल्याण-गुण-सम्पन्न होने से जगत के अभिन्ननिमितोपादान कारण हैं तथा मुमुक्षुओं द्वारा भी उनका यही स्वरूप उपास्य है। उनका मत है कि परमेश्वर ब्रह्म स्वयं को चतुयूंह (अर्थात् वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरूद्ध - इन चार रूपों में) प्रकाशित करता है।

द्वैताद्वैत के मतानुसार ब्रह्म का जीव और जगत्‌ से स्वरूपतः भेदपरक और अभेदपरक दोनों ही रूपों में सम्बन्ध हैं। इस मत को 'द्वैत भिन्नता मानने वाला' और 'अद्वैत अभिन्नता मानने वाला' मत से सम्बोधित किया जाता है। कार्य-करण सम्बध पर विचार करने से इस मत की पुष्टि हो जाती है। द्वैताद्वैत की ​स्थिति को कुछ उदाहरणों द्वारा आसानी से समझा जा सकता है -

(१) जैसे कार्य (घट या घड़ा), कारण (मिट्टी) से अभिन्न है (क्योंकि दोनो की सामग्री एक ही है) और साथ ही भिन्न भी है (क्योंकि दोनों नाम, रूप, आकार एवं प्रयोजन आदि से पृथक-पृथक हैं)।

(२) स्वर्ण से अनेक प्रकार के आभूषण निर्मित किये जाते हैं जिनके नाम, रूप एवं प्रयोजन अलग-अलग हैं, लेकिन इन सभी का एक ही सार तत्व है ’’स्वर्ण’’।

(३) सर्प के लम्बायमान रूप और कुण्डलाकार रूप की पृथक स्थिति हैं, परन्तु दोनों में भेद होते हुए भी इनमें अभेद सम्बन्ध है।

(४) जिस प्रकार सूर्य और प्रकाश अलग-अलग हैं, परन्तु सूर्य के बिना प्रकाश का अ​स्तित्व नहीं है। अर्थात् सूर्य और प्रकाश अलग-अलग होते हुये भी एक है। उसी तरह ब्रह्म तथा जीव अलग-अलग होते हुए भी एक है।

श्रीनिम्बार्काचार्य ने वेदान्तकामधेनु के एक ही श्लोक में जीव के वास्तविक स्वरूप का प्रतिपादन कर दिया है। ये आत्मवेत्ता, जीव को चैतन्य ज्योतिस्वरूप शरीर से संयुक्त और वियुक्त होने वाला, अणु परिमाण वाला, सूक्ष्म, अनेक शरीरों में अलग-अलग होने से अनन्त तथा इसे परमात्मा के अधीन कहते हैं-

ज्ञानस्वरूपं च हरेरधीनं शरीरसंयोगवियोगयोग्यम्‌।
अणुं हि जीवं प्रतिदेह-भिन्नं ज्ञातृत्ववन्तं यदनन्तमाहु:॥

ब्रह्म का अंश होने के कारण जीव भी ब्रह्म ही है, तथापि जीव और ब्रह्म का पूर्णत: अभेद स्वीकार्य नहीं, भेदाभेद सम्बन्ध ही मान्य है। जीव को स्वरूपतः अणु मानते हुए भी श्रीनिम्बार्क ने उसके गुण और ज्ञान को 'विभु' की संज्ञा दी है। अणुचित्‌ होते हुए उसका ब्रह्म से नित्य सम्बन्ध रहता है। इस प्रकार भ्गवत्‌ साधर्म्य प्राप्त कर जीव सर्वज्ञ की कोटि में पहुँच जाता है। जिस प्रकार महान्‌ गुण के कारण परमात्मा महान्‌ है, उसी प्रकार जीवात्मा अणु परिणाम का होकर भी गुण से महान्‌ है। जीवात्मा अणु परिमाण वाला होकर भी शरीर के दुःख-सुख का अनुभव करता हैं।

इसी प्रकार, ही संसार (कार्य), ब्रह्म (कारण) से भिन्न और अभिन्न दोनों है। जगत् ब्रह्म से अलग होते हुए भी एक ही है। श्रीनिम्बार्काचार्य जी के अनुसार ब्रह्म अद्वैत है, संसार द्वैत है। दोनों नित्य सत्य है। अद्वैत ब्रह्म (कारण) ही द्वैत संसार (कार्य) का वास्तविक रूप धारण करता है।

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