दिलीप चित्रे

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स्वतंत्रता बाद के युग के अग्रणी भारतीय लेखकों और आलोचकों में से एक दिलीप चित्रे मराठी कवि और आलोचक तथा अंग्रेजी लेखक होने के साथ ही पेंटर और फिल्म निर्माता भी थे। महाराष्ट्र में 1960 में हुए लघु पत्रिका आंदोलन में उनका महत्वपूर्ण योगदान था।

जीवन वृत्त[संपादित करें]

वह बड़ौदा में 17 सितंबर 1938 को एक मराठी भाषी CKP समुदाय में पैदा हुआ था। उनके पिता पुरुषोत्तम चित्रे अभिरुचि नाम का एक आवधिक प्रकाशित करते थे, जो अपने उच्च, गुणवत्ता के मामले में समझौता न करने बेहद क़ीमती समझा जाता था। दिलीप चित्रे का परिवार 1951 में मुंबई में स्थानांतरित कर गया और उन्होंने अपनी पहली कविताओं का संग्रह 1960 में प्रकाशित किया। वह साठ के दशक में मराठी में प्रसिद्ध "छोटी पत्रिका आंदोलन" के पीछे सब पहले और सबसे महत्वपूर्ण प्रभावों में से एक था। 1975 में, उन्हें आयोवा विश्वविद्यालय, आयोवा सिटी, आयोवा, संयुक्त राज्य अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय लेखन कार्यक्रम में एक विजिटिंग फैलोशिप द्वारा सम्मानित किया गया। उन्होंने भारतीय कविता पुस्तकालय, पुरालेख और अनुवाद केन्द्र भारत भवन, एक मल्टी आर्ट फाउंडेशन में एक निर्देशक के रूप भी काम किया है। उन्होंने भोपाल में एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के बाद नई दिल्ली में कवियों का एक विश्व कविता समारोह भी बुलाया।

दिलीप पुरुषोत्तम चित को लोग प्यार से दीपू के नाम से बुलाते थे। उन्होंने 14 साल की उम्र से ही लिखना शुरू किया और 18 साल की उम्र में एक पत्रकार के रूप में करिएर की शुरुआत की। महाराष्ट्र में छोटे पत्रिका को लोकप्रिय बनाने के आन्दोलन में उन्होंने अहम् योगदान दिया। उन्होंने कुछ कवियों के साथ मिलकर ' शब्द ' नाम से एक छोटी पत्रिका को मिलकर लांच किया। बाद में वे कुछ साल के लिए विदेश चले गए और कुछ साल बाद वहां से लौटने पर एक विज्ञापन कंपनी में काम करने लगे। वे पिछले कई साल से कैंसर से पीड़ित थे। 71 साल की अवस्था में उनका 10 दिसम्बर 2009, गुरुवार की सुबह को पुणे में अपने आवास पर निधन हो गया।

साहित्य कर्म[संपादित करें]

अपने अन्य कर्मों एवं व्यवसायों के साथ ही वे साहित्य से निरंतर जुड़े रहे। वर्ष 1960 में उनका पहला मराठी कविता संग्रह ' कविता ' प्रकाशित हुआ। इसके बाद उनके अनेक कविता संग्रह प्रकाशित हुए।

अनुवाद कार्य[संपादित करें]

वे एक अच्छे अनुवादक भी थे। उन्होंने 17वीं सदी के मराठी भक्ति कवि तुकाराम की रचनाओं का तुकाके नाम से अनुवाद किया। इस अंग्रेजी अनुवाद ने उनकी ख्याति भारत की सीमाओं के बाहर तक प्रसारित कर दी। उन्होंने 12वीं सदी के भक्ति कवि निनेश्वर द्वारा लिखित काव्य का भी अनुवाद किया।

पुरस्कार/सम्मान[संपादित करें]

वर्ष 1994 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया।

सहायक एवं संदर्भ श्रोत[संपादित करें]