तेलेराँ

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तेलेराँ का चित्र

तेलेराँ (Charles-Maurice de Talleyrand-Périgord [ʃaʀləmɔʀisdətaljɛʀɑ̃peʀigɔʀ] ; 2 फ़रवरी 1754 - 17 मई 1838) फ्रांस का प्रसिद्ध राजनयिक था। फ्रांस में उत्पन्न अग्रणी चतुर व्यक्तियों में तेलेराँ का स्थान प्रथम पक्ति में आता है। वह क्रान्तिकाल (1788 - 99) में बहुचर्चित प्रमुख व्यक्तित्व था। वह नेपोलियन के राज्य में तथा सम्राट् के आसीन होने पर किसी न किसी पद पर काम करता ही रहा। वह सामन्त वर्ग का था और चर्च का सदस्य भी था। एबे सिकार ने जिस निष्पक्षता से 1789 के पदासीन 134 बिशपों का मूल्यांकन किया है उनमें से केवल 15 को उसने सदाचारी धर्माधिकारियों में गिनाया है और रोहन, ब्रीएन तथा तेलेराँ जैसे बड़े-बड़े धर्माधिकारियों की उसने निन्दा की है। अनेक निष्पक्ष लेखकों ने एबे सिकार के मूल्यांकन से सहमति व्यक्त की।

परिचय[संपादित करें]

तेलेराँ बहुत चतुर और चालाक व्यक्ति था, राजनय का कुशल खिलाड़ी था और परिस्थितियों के अनुसार चालाकी से अपनी स्वामिभक्ति बदल लेता था। वह अवसरवादी राजनय में विश्वास करता था। क्रान्तिकाल में राष्ट्रीय सभा (नेशनल असेम्बली) के निर्माण के बाद जब 19 जून 1789 को पादरियों ने तृतीय स्टेट के साथ मिल जाने का फैसला किया तो आर्क बिशप तेलेराँ ने क्रान्ति को अपने पक्ष में मोड़ने का असफल प्रयास किया। प्रो॰ बालकृष्ण पंजाबी ने लिखा है -

”19 जून को उग्र विचार-विमर्श के बाद पादरियों ने 137 के विरुद्ध 149 के बहुमत से, जिनमें छः बिशप एवं आर्क बिशप थे, जन-साधारण के साथ बैठने का फैसला किया। 19 जून क्रान्ति के इतिहास की निर्णायक विधि कही जा सकती है क्योंकि इसी दिन पादरियों ने क्रान्ति की ओर मुड़ने वाला ऐतिहासिक कदम उठाया। कुलीनों में अभी भी प्रतिक्रियावादी तत्त्वों का प्रभाव अधिक था, लेकिन उनमें फैली अव्यवस्था और फूट स्पस्ट होने लगी थी। एक-दूसरे को चेतावनियाँ ओर धमकियां दी गईं और कुछ ने अपनी म्यानों से तलवारें तक निकाल लीं। इस तनावपूर्ण स्थिति में आर्क बिशप तेलेरां ने क्रान्ति को अपने पक्ष में मोड़ने का असफल प्रयास किया। क्रान्ति के इतिहास में तेलेरां जैसे भ्रष्ट एवं अवसरवादी कोई अन्य चरित्र नहीं ढूंढा जा सकता। दैनिक कोर्ट की ऐतिहासिक शपथ की पूर्व रात्रि (19 जून) को वह मारल (जहाँ इस समय राजपरिवार रह रहा था) आया तथा राजा से गुप्त मुलाकात की प्रार्थना की। चूँकि राजा उसे पसन्द नहं करता था अतएव उसने उसे अपने भाई की ओर भेज दिया। कौंत दे आरतुआ ने बिस्तर में होने पर भी उससे मुलाकात की। तेलेरां ने ‘सभा’ के कार्यों को मूर्खतापूर्ण, खतरनाक, राजतन्त्र विरोधी तथा गैर-कानूनी बताया और उसने उसे सलाह दी कि सरकार को दृढ़तजा कापरिचय देते हुए एता जैनेरी (स्टट्स जनरल) को भंग कर देना चाहिये। तेलेरां ने अपने समर्थकों के साथ मिलकर तथा शासन स्थापित करने का प्रथा भी दिया। परिवर्तित मताधिकार द्वारा नए निर्वाचन की योजना भी उसने बताईं उसने इस बात पर रोष और खेद प्रकट किया कि निर्बल व्यवस्था ने राष्ट्र को सिये के हाथों में फैंक दिया है। मोंत दे आद्तुआ ने तुरन्त लुई 16वें के कक्ष में जाकर सारी योजना उसके सामने रखी परन्तु राजा ने साफ इन्कार कर दिया। तेलेरां ने निराश होकर लौटते हुए इतना संकेत अवश्य कर दिया कि हर व्यक्ति को अपने हितों के अनुकूल परिवर्तित होने की स्वतन्त्रता है।“

तेलेराँ गुप्त और नाटकीय राजनय में माहिर था। उसका व्यवहार बड़ा नाटकीय और कभी-कभी प्रभावशाली भी होता था। वह पक्का अवसरवादी था और धूर्ततापूर्ण चालाकी के कारण वह लगभग 50 वर्ष तक फ्रांस की राजनीति से सम्बन्धित रहा। क्रान्तिकाल में तेलेरां ने ‘संधोधित चर्च’ का पिता बनना स्वीकार कर लिया और 24 फरवरल, 1791 को उसका तथा अन्य सांविधानिक बिशश्पों का शुद्धि संस्कार बड़े ठाठ-बाट के साथ किया गया। एक राजनयज्ञ और एक आध्यात्मिक अधिकारी गुरु-दोनों ही रूपों में तेलेरां ने अपना राजनयिक कमाल दिखाया। जब 14 जुलाई 1790 को ‘बास्तील के पतन’ की वर्षगांठ मनाई गई तो एक विशाल चल समारोह का आयोजन किया गया और तिरंगे लबादे तथा सफेद वस्त्र धारण किए सैंकड़ों पुजारियों ने ‘नए चर्च के पिता’ तेलेरां के साथ धार्मिक गीत गाए। 14 जुलाई 1797 को पुनर्गठित मन्त्रि-परिषद् में तेलेरां ने विदेशमंत्री पद प्राप्त कर एक कुशल राजनयज्ञ के रूप में अपने को प्रतिष्ठित किया।

फ्रांस के महान राजनयज्ञ तेलेरां और फ्रांस के राजनय पर टिप्पणी रते हुए डॉ॰ एम0पी0 राय ने लिखा है-

रिचलू और कैलियर्स ने जहाँ राजनय के सिद्धान्तों की स्थापना की वहां तेलेरां ने फ्रांस की क्रान्ति तथा नेपोलियन के काल में राजनय का वास्तविक प्रयोग किया। तेलेरां राज्य शिल्प का विशेषज्ञ था। यह इसकी राजनयिक योग्यता का ही परिणाम था कि उसने चूरोपीय राज्य व्यवस्था का पुनर्निर्माण कर संयुक्त यूरोप की स्थापना की। तेलेरां ऐ कुशल एवं निष्ठावान वार्त्ताकार था। वह समस्या के समाधान के लिए अपनी सम्पूर्ण योग्यता व शक्ति लगा देता था। वह तेलेरां की राजनयिक योग्यता, कुशलता और निपुणता ही थी कि उसने ब्रिटेन और आस्ट्रिया को रूप तथा प्रशा का डर बैठाकर फ्रांस के हितों को आगे बढ़ाया। यूरोपियन समत्व को बनाये रखने के लिए उसने यूरोपीय व्यवस्था का जो नया चित्र खींचा वह ‘राजनयिक इतिहास बहुत लाभकारी उपलब्धि है।’

नेपोलियन महान तेलेरां का प्रशंसक था। आज भी तेलेरां द्वारा लिखित सामग्री का अध्ययन किया जाता है। कुछ लोग तो सफल राजनय और तेलेरां को समानार्थक मानते हैं। फ्रांसीसी राजनय में कभी-कभी बड़प्पन का भी मित्याभाव रहा है। 1972 में प्रशान्त महासागर में अणु प्रशिक्षण के विरुद्ध न्यूजीलैण्ड सरकार द्वारा विरोध जताने तथा फ्रांसीसी जहाजों का बहिष्कार किए जाने के निर्णय पर फ्रांस सरकार ने तुरन्त न्यूजीलैण्ड के विरुद्ध व्यापारिक प्रतिबन्ध की आज्ञा दे दी थी।

सन्दर्भ[संपादित करें]