डेविड लिविंग्स्टन

डेविड लिविंग्स्टन (David Livingstone ; जन्म 19 मार्च 1813- मृत्यु 1 मई 1813) स्कॉटलैण्ड के एक प्रसिद्ध चिकित्सक, मिशनरी, अन्वेषक और समाज सुधारक थे। उन्हें अफ्रीका महाद्वीप का महान अन्वेषक कहा जाता है। लिविंग्स्टन ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में अफ्रीका के अनेक अज्ञात क्षेत्रों की खोज की और यूरोपियों के लिए इस महाद्वीप के भौगोलिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक पहलुओं का परिचय कराया।[1]
उनका उद्देश्य केवल धर्म प्रचार नहीं था, बल्कि गुलामी की प्रथा का उन्मूलन और अफ्रीका में व्यापार एवं सभ्यता का विकास करना भी था। वह मानते थे कि यदि अफ्रीका में ईसाई धर्म, वाणिज्य और सभ्यता का प्रसार किया जाए, तो वहाँ की जनता को गुलामी जैसी बुराइयों से मुक्त किया जा सकता है।
परिचय
[संपादित करें]लेविंग्स्टन का जन्म 19 मार्च 1813 को स्कॉटलैंड में ग्लासगो के निकट ब्लेंटायर नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता एक चाय व्यापारी थे और धर्मप्रचार में बहुत रुचि रखते थे। डेविड को बाल्यकाल से ही विज्ञान, भूगोल और यात्रा संबंधी पुस्तकों में बहुत रुचि थी।
केवल दस वर्ष की अवस्था में उन्हें स्थानीय कपड़ा मिल में काम करने भेजा गया ताकि परिवार की आर्थिक सहायता हो सके, लेकिन उनके मन की रूची अध्ययन और खोज की दिशा में थी। कठिन परिश्रम के बावजूद वे रात में अध्ययन जारी रखते थे।
बाद में उन्होंने ग्लास्गो विश्वविद्यालय और लंदन मिशनरी सोसाइटी के प्रशिक्षण केंद्र में शिक्षा प्राप्त की, जहाँ उन्होंने चिकित्सा और धर्मशास्त्र का अध्ययन किया। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात् वे एक चिकित्सक-मिशनरी बने और धर्मप्रचार के साथ-साथ मानवता की सेवा के उद्देश्य से अफ्रीका की ओर प्रस्थान किया।
१८४० ई. में ८ दिसम्बर को डेविड लिविंग्स्टन ने इंग्लैंड से दक्षिण अफ्रीका के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचने के बाद उन्होंने अफ्रीका की भू-आकृति, वनस्पति और प्राकृतिक जीवन का विस्तृत अध्ययन किया और वहाँ के निवासियों को खेती और स्वावलंबन के तरीके सिखाए।
कालाहारी के मरुस्थल को पार करके उन्होंने १८४९ ई. में नगामी झील की खोज की। अपने स्वास्थ्य की परवाह किए बिना उन्होंने आगे बढ़कर [[ज़ेबेसी नदी]|ज़ाम्बेज़ी नदी] के उत्तरी भाग की यात्राएँ की और अंतत: दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी समुद्रतट तक पहुँच गए।
इसके पश्चात् उन्होंने विक्टोरिया झरने का भव्य दृश्य देखा और उसका नाम रानी विक्टोरिया के सम्मान में रखा।। इसके बाद वे १८५६ ई. के अंत में इंग्लैंड लौटे जहाँ उनका भव्य स्वागत और सम्मान किया गया।
१८५८ ई. में लिविंग्स्टन ने एक बार फिर अफ्रीका की यात्रा आरंभ की। १८६२ ई. में उनकी पत्नी मैरी लिविंग्स्टन की वहीं मृत्यु हो गई। इस दुखद घटना के बावजूद उन्होंने साहस न छोड़ा अपना अन्वेषण कार्य जारी रखा। उन्होंने न्यासा झील की खोज की और १८६४ में पुन: इग्लैंड लौट आए।
कुछ समय बाद वे एक बार फिर अफ्रीका गए, जहाँ वे नील नदी के उद्गम स्थल का पता लगाने के अभियान पर निकले। लंबे समय तक उनका कोई समाचार न मिलने पर लोग चिंतत हो उठे। अंतत: अमेरिकी पत्रकार हेनरी मॉर्टन स्टैनले ने उन्हें खोजने के लिए अभियान चलाया। जब स्टेनली ने उन्हें पाया, तो उसके पहले शब्द प्रसिद्ध हो गए- “Dr. Livingstone, I presume?” (“डॉ. लिविंग्स्टन, मेरा अनुमान है?”)[2] फिर दोनों ने मिलकर टांगानयिका झील और नील नदी के उद्गम स्थान का पता लगाया।
लगातार बीमारियों और कठिन परिस्थितियों के कारण १ मई १८७३ को दक्षिण अफ्रीका के चीटाम्बो (वर्तमान ज़ाम्बिया) में उनकी मृत्यु हो गई। उनके साथियों ने उनका ह्रदय वहीं अफ्रीकी धरती में दफना दिया, और उनका शरीर इंग्लैंड भेजा गया, जहाँ उन्हें वेसटमिंस्टर ऐबी (Westminster Abbey) में पूरे सम्मान के साथ अंतिम विश्राम दिया गया।
वह एक दयालु मनुष्य थे जो अफ्रीका के निवासियों का जीवन सुधारना चाहता था। इसी भावना से प्रेरित होकर उसने अनेक कष्ट सहकर भी अफ्रीका के अज्ञात प्रदेशों की खोज की। डेविड लिविंग्स्टन को आज भी अफ्रीका के मानवतावादी अन्वेषक और गुलामी विरोधी आंदोलन के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनके अभियानों ने न केवल भौगोलिक ज्ञान बढ़ाया, बल्कि यूरोप और अफ्रीका के बीच नए ऐतिहासिक संबंधों की नींव भी रखी।