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जोहान् हाइनरिख पेस्तालॉत्सी

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जोहान् हाइनरिख पेस्तालॉत्सी
Johann Heinrich Pestalozzi
व्यक्तिगत जानकारी
जन्म12 जनवरी 1746
जुरिक, स्विटजरलैण्ड
मृत्युफ़रवरी 17, 1827(1827-02-17) (उम्र 81 वर्ष)
Brugg, Switzerland
वृत्तिक जानकारी
युग१९वीं शताब्दी का दर्शन
क्षेत्रपाश्चात्य दर्शन
विचार सम्प्रदाय (स्कूल)जर्मन रोमान्टिसिज्म
प्रमुख विचारFour-sphere concept of life
प्रभाव

जोहान् हाइनरिख पेस्तालॉत्सी (Johann Heinrich Pestalozzi ; 1746-1827 ई.) प्रसिद्ध पाश्चात्य शिक्षाशास्त्री थे।

बचपन में पिता चल बसे अतः माता ने इन्हें पाला। इनके दादा का भी इनके मन पर बहुत प्रभाव पड़ा। रूसो के विचारों में कुछ संशोधन कर इन्होंने उन्हें कार्यरूप में परिणत करने के प्रयास किए। विद्यार्थीजीवन में ही समाजसेवा की ओर झुकाव हो गया था। पत्रिकाओं में लेख लिखते थे। आगे चलकर इन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। 1781 और 1787 के बीच इनकी "लियोनार्ड ऐंड गर्ट्रूड" ( Leonard and Gertrude ) शीर्षक पुस्तक चार खंडों में प्रकाशित हुई। 1792 में जर्मनी के गेटे, फिक्टे इत्यादि विद्वानों से उन्हीं के देश में जाकर ये मिले। सौ एकड़ भूमि मोल लेकर अपने नवीन कृषिक्षेत्र (Neuhof) में इन्होंने कुछ बच्चों को उद्योग के साथ साथ शिक्षा देने का असफल प्रयास किया था। 1799 के पूर्वाध में स्टैज में इन्हें कुछ अनाथ बच्चों को शिक्षा देने का अवसर मिला। उसी वर्ष के अंत में बर्गडॉर्फ के दुर्ग में इनका विद्यालय स्थापित हुआ। इन्हें अच्छे अध्यापकों का सहयोग प्राप्त हुआ। 1801 में इनकी "हाइ गर्ट्रूड टीचेज़ हर चिल्ड्रैन" शीर्षक पुस्तक प्रकाशित हुई। प्रारंभिक शिक्षा संबंधी कुछ अन्य पुस्तकें भी लिखी गईं। 1804 में इन्हें बर्गडॉर्फ का दुर्ग सैनिकों के लिए खाली कर देना पड़ा। 1805 से 1825 तक इनका विद्यालय इवर्डन में चलता रहा। अर्थाभाव के कारण इनकी योजनाओं में बाधा पड़ जाती थी।

पेस्तालॉत्सी ने व्यक्ति की समस्त शक्तियों के सामंजस्यपूर्ण विकास को शिक्षा का उद्देश्य माना। उन्होंने मनोविज्ञान को शिक्षा का आधार बनाने के प्रयास किए। आधुनिक शिक्षण के कई प्रमुख सिद्धांतों को पेसलॉत्सी के शैक्षिक प्रयोगों द्वारा महत्व प्राप्त हुआ। शिक्षणविधि में संप्रेक्षण एवं स्वानुभव को इन्होंने मुख्य स्थान दिया। बाद में आनेवाले शिक्षाशास्त्रियों तथा अध्यापकों पर इनके विचारों का प्रचुर प्रभाव पड़ा।

पेस्टालॉजी का शैक्षिक चिन्तन

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पेस्टालॉजी का शैक्षिक चिन्तन इनके दार्शनिक चिन्तन और मनोवैज्ञानिक तथ्यों के ज्ञान पर आधारित है। इनके शैक्षिक चिन्तन पर इनके पूर्व विचारक रूसो की छाप स्पष्ट दिखाई देती है । इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में, विशेष रूप से बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में अनेक प्रयोग भी किए थे। इन्होंने अपने अनुभव एवं चिन्तन को पुस्तकों के रूप में भी संजोया है। शिक्षा की दृष्टि से इनकी तीन रचनाएँ विशेष महत्त्व की हैं - एक 'लियोनार्ड एण्ड गरर्ट्रूड' (Leonard and Gertrude), दूसरी 'हाऊ गरटूड टीचेज हर चिल्ड्रन' (How Gertrude Teaches her Children) और तीसरी 'माइ इनवैस्टीगेशन्स इन टू द कोर्स ऑफ नेचर इन द डवलपमेन्ट ऑफ द ह्यूमेन (My Investigations into the Course of Nature in the Development of the Human race)।

शिक्षा का सम्प्रत्यय

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पेस्टालॉजी ने शिक्षा को मनुष्य की जन्मजात शक्तियों के विकास के रूप में परिभाषित किया है। इन्होंने मनुष्य के विकास की व्याख्या वृक्ष के विकास के आधार पर की है । इन्होंने स्पष्ट किया कि जिस प्रकार वृक्ष के बीज में सम्पूर्ण वृक्ष निहित होता है और जिस प्रकार बीज के वृक्ष में विकसित होने के लिए उचित वातावरण की आवश्यकता होती है उसी प्रकार शिशु में पूर्ण मनुष्य निहित होता है और शिशु को पूर्ण मनुष्य के रूप में विकसित होने के लिए उचित वातावरण की आवश्यकता होती है और इस वातावरण में सर्वाधिक भूमिका शिक्षा की होती है। पेस्टालॉजी के युग में शिक्षा का अर्थ बच्चों को बाहर से ज्ञान प्रदान करने से लिया जाता था। पेस्टालॉजी ने इसके ठीक विपरीत विचार प्रस्तुत किया और कहा कि शिक्षा का अर्थ बाहर से ज्ञान फँसना नहीं, अपितु मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियों को बाहर की ओर प्रकट करना एवं विकसित करना है। यह विकास प्राकृतिक, सम और प्रगतिशील होना चाहिए। इन्होंने शिक्षा को इसी आधार पर परिभाषित किया है। इनके शब्दों में- शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक, समरस और प्रगतिशील विकास है।

शिक्षा के उद्देश्य

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पेस्टालॉजी शिक्षा द्वारा मनुष्य को एक अच्छा मनुष्य बनाने पर बल देते थे। इनका विश्वास था कि जब तक प्रत्येक मनुष्य को अच्छा मनुष्य नहीं बनाया जाता तब तक न तो व्यष्टि सुखी हो सकता है और न समाज सुखी हो सकता है। इसके लिए ये सर्वप्रथम मनुष्य की जन्मजात शक्तियों के प्राकृतिक, समरस और प्रगतिशील विकास पर बल देते थे और उसके बाद उनमें मानवीय गुणों-प्रेम, सहानुभूति, दया एवं परोपकार आद विकास पर बल देते थे। ये मनुष्यों के दुःखों को दूर करने के लिए उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर भी बल देते थे उन्हें अपनी जीविका कमाने योग्य बनाना चाहते थे। इस सबके साथ ये मनुष्यों को धर्म और नैतिकता की शिक्षा भी देना चाहते थे। इनका मत था कि धर्म एवं नैतिकता ही मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं और ये सब कार्य ये प्राथमिक स्तर से ही शुरू करने के पक्ष में थे। पेस्टालॉजी द्वारा निश्चित शिक्षा के इन उद्देश्यों को निम्नलिखित रूप में क्रमबद्ध किया जा सकता है-

मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों का विकास

पेस्टालॉजी के अनुसार मनुष्य में तीन प्रकार की आन्तरिक शक्तियाँ हैं— शारीरिक, मानसिक और नैतिक शिक्षा का पहला उद्देश्य एवं कार्य इन शक्तियों का प्राकृतिक, समरस एवं प्रगतिशील विकास करना है।

मनुष्य में मानवीय गुणों का विकास

पेस्टालॉजी के समय उसके देश के लोगों में मानवीय गुणों-प्रेम, सहानुभूति, दया, परोपकार एवं उदारता का बड़ा अभाव था। पेस्टालॉजी शिक्षा द्वारा मनुष्यों में इन गुणों के विकास पर बहुत बल देते थे ।

मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना

पेस्टालॉजी के समय इनके देश के अधिकतर लोग दुखी थे। दुःख का सबसे बड़ा कारण परनिर्भरता था। इस इसलिए इन्होंने मनुष्यों को आत्मनिर्भर बनाने पर बल दिया। मनुष्यों को आत्मनिर्भर बनाने से इनका तात्पर्य उन्हें अपनी जीविका स्वयं कमाने योग्य बनाना था। इसके लिए ये उन्हें किसी व्यवसाय की शिक्षा देने पर बल देते थे । इसे ही आज व्यावसायिक शिक्षा का उद्देश्य कहते हैं।

सामाजिक उत्थान करना

पेस्टालॉजी के अनुसार समाज की उन्नति व्यक्ति की उन्नति पर निर्भर करती है इसलिए इन्होंने सर्वप्रथम मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों के विकास और उनमें मानवीय गुणों के विकास एवं उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर बल दिया है। इस सब से समाज का विकास स्वतः हो जाएगा।

धार्मिकता एवं नैतिकता का विकास

ये मनुष्य के आचरण को धर्म एवं नैतिकता पर आधारित करना चाहते थे। इनका विश्वास था कि ये ही मनुष्य के आचरण को स्थायी आधार प्रदान करते हैं। इनकी दृष्टि से यह शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए ।

शिक्षा की पाठ्यचर्या

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पेस्टालॉजी ने मूलरूप से स्कूली शिक्षा (3 से 13 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा) की पाठ्यचर्या पर विचार व्यक्त किए हैं। इनकी दृष्टि से सर्वप्रथम बच्चों की आन्तरिक शक्तियों का विकास करना चाहिए। इसके लिए ये बच्चों को खेलने-कूदने, अपने चारों ओर की वस्तुओं को देखने-समझने और प्राकृतिक निरीक्षण करने के अवसर प्रदान करने पर बल देते थे। भाषा को ये अभिव्यक्ति का साधन मानते थे, इसलिए प्रारम्भिक स्तर की पाठ्यचर्या में सबसे पहले उसे स्थान देते थे। इनकी दृष्टि से कला एवं संगीत भी भावाभिव्यक्ति के विकास में सहायक होते हैं, इन्होंने अपने स्कूल की पाठ्यचर्या में इन्हें भी स्थान दिया था। पेस्टालॉजी ने विशेष रूप से दीन-हीनों की शिक्षा की व्यवस्था में रुचि ली थी इसलिए प्रारम्भ से ही उन्हें किसी व्यवसाय (कृषि फार्म, कताई-बुनाई आदि) की शिक्षा देने पर बल देते थे। धर्म एवं नैतिकता को ये मनुष्य जीवन का आधार मानते थे इसलिए प्रारम्भ से ही इनकी शिक्षा की बात करते थे। इन्हें ये मानवीय गुणों के विकास का आधार मानते थे। इनकी दृष्टि से कोई भी शिक्षा यदि वह बच्चों को मानवीय आचरण में दक्ष नहीं करती तो वह अधूरी शिक्षा है ।

शिक्षण विधि

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शिक्षण विधियों के सम्बन्ध में पेस्टालॉजी रूसो से प्रभावित थे। इन्होंने शिक्षा की प्रक्रिया को मनोविज्ञान पर आधारित करने का प्रयत्न किया, शिक्षण की प्रक्रिया को भी । इन्होंने बाल मस्तिष्क की तीन अवस्थाएँ बताईं।

(१) अस्पष्ट इन्द्रियगत अनुभव : इस स्तर पर मस्तिष्क इन्द्रियों द्वारा वस्तु के आकार को अस्पष्ट रूप में। करता है।

(२) स्पष्ट इन्द्रियगत अनुभव : इस स्तर पर वह उसे स्पष्ट रूप में धारण करता है।

(३) वर्गीकरण स्तर : इस स्तर पर वह वास्तविक ज्ञान प्राप्त करता है।

पेस्टालॉजी की दृष्टि से बच्चे इसी क्रम में सीखते हैं अतः विद्यालयों में भी हमें उन्हें इसी क्रम में सीखने के अवसर प्रदान करने चाहिए। ये क्रियाओं और भावनाओं को भी इसी क्रम में सीखने-सिखाने पर बल देते थे। इन्होंने आगे कहा कि इस प्रकार प्राप्त ज्ञान को स्थायी बनाने के लिए अभ्यास एवं आवृत्ति के अवसर प्रदान करने चाहिए। पेस्टालॉजी अभ्यास एवं आवृत्ति विधि के जनक माने जाते हैं।

पेस्टालॉजो के शिक्षण सम्बन्धी विचारों को आज शिक्षण सिद्धान्तों के रूप में जाना जाता है। ये - पेस्टालॉजी ने इस बात पर बल दिया कि बच्चों की शिक्षा उनके सिद्धान्त हैं-

1. मनोवैज्ञानिक आधार का सिद्धान्त- मनोविज्ञान पर आधारित होनी चाहिए, शिक्षण विधियाँ भी । बच्चे स्वतन्त्र रहना पसन्द करते हैं अतः उन्हें स्वतन्त्र रूप से सीखने के अवसर देने चाहिए। बच्चों में क्रिया करने की प्रवृत्ति होती है अतः उन्हें करके सीखने के अवसर प्रदान करने चाहिए। उनके सीखने की अपनी गति होती है अतः उन्हें अपनी गति से सीखने देना चाहिए। यही कारण है कि पेस्टालॉजी ने अपने शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम में मनोविज्ञान के अध्ययन को सर्वप्रमुख स्थान दिया था।

2. इन्द्रियों द्वारा शिक्षा का सिद्धान्त - पेस्टालॉजी इन्द्रियों को ज्ञान प्राप्ति का आधार मानते थे। इन्द्रियों द्वारा शिक्षा के सिद्धान्त पर इन्होंने एक विधि का विकास भी किया जिसे जर्मन भाषा में आश्वांग (Anschaung) कहते हैं। इस विधि में बच्चे इन्द्रियानुभव द्वारा सीखते हैं, निरीक्षण द्वारा सीखते हैं और स्वयं के प्रयत्न द्वारा सीखते हैं। पेस्टालॉजी आकार (रूप), संख्या और भाषा की शिक्षा इसी विधि से दिया करते थे ।

3. मानसिक क्रिया का सिद्धान्त - पेस्टालॉजी ने इस बात पर बल दिया कि बच्चों को उनके मस्तिष्क की अवस्थाओं के आधार पर सीखने के अवसर दिए जाएं। सर्वप्रथम बच्चों को वस्तुओं, क्रियाओं और भावों, सभी का ज्ञान प्रत्यक्ष इन्द्रियानुभवों द्वारा कराया जाए, इसके बाद उनके प्रथम इन्द्रियजन्य अस्पष्ट ज्ञान को अन्य इन्द्रियजन्य ज्ञान के आधार पर स्पष्ट ज्ञान में परिवर्तित किया जाए और अन्त में अभ्यास एवं आवृत्ति द्वारा सीखे हुए ज्ञान को स्थायी रूप प्रदान किया जाए।

4. सरल से कठिन की ओर चलने का सिद्धान्त - पेस्टालॉजी ने इस बात पर भी बल दिया कि जो कुछ भी पढ़ाना सिखाना हो पहले बच्चों को उसके सरल रूप को सीखने के अवसर प्रदान किए जाएँ, फिर कठिन से कठिनतर । बच्चे पहले किसी तथ्य से सम्बन्धित सरल समस्याओं को हल करें, फिर कठिन और उसके बाद कठिनतर को।

5. दृढिकरण का सिद्धान्त - पेस्टालॉजी ने इस बात पर विशेष बल दिया कि जब तक बच्चों को एक तथ्य पूर्णतया स्पष्ट न हो जाए तब तक उससे आगे के तथ्य पर न बढ़ा जाए।

पेस्टालॉजी ने अपने उपरोक्त सिद्धान्तों के आधार पर भिन्न-भिन्न विषयों एवं क्रियाओं के शिक्षण एवं प्रशिक्षण के लिए भिन्न-भिन्न विधियों का विकास किया था। यहाँ उनका संक्षेप में वर्णन प्रस्तुत है ।

आन्तरिक शक्तियों का विकास एवं प्रशिक्षण - पेस्टालॉजी प्रारम्भ से ही बालकों को खेलने-कूदने, निरीक्षण करने एवं बोलने चालने के स्वतन्त्र अवसर देते थे, साथ ही स्वयं निरीक्षण करने, स्वयं क्रिया करने और स्वयं अनुभव करने के अवसर देते थे। इससे बच्चों की अन्तःशक्तियों का विकास स्वतः होता था, स्वाभाविक रूप से होता था।

भाषा शिक्षण

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पेस्टालॉजी भाषा की शिक्षा वार्तालाप से शुरू करने के पक्ष में थे। इनके अनुसार जब बच्चा बोलचाल में दक्ष हो जाए तब उसे पढ़ना सिखाया जाए। पढ़ना सिखाने के लिए पेस्टालॉजी सर्वप्रथम स्वर-ध्वनि, स्वर ध्वनियों के बाद शब्द और शब्दों के बाद वाक्य पढ़ना सिखाते थे। लिखने को पेस्टालॉजी ने यान्त्रिक कला के रूप में लिया है। लिखना सिखाने के लिए ये सर्वप्रथम बच्चों को सीधी, तिरछी एवं गोल रेखाएं खींचने का अभ्यास कराते थे, फिर अक्षरोच्चरण के साथ अक्षर, शब्दोच्चारण के साथ शब्द और वाक्य बोलने के साथ वाक्य लिखना सिखाते थे।

अंकगणित का शिक्षण

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पेस्टालॉजी पहले मौखिक अंकगणित सिखाते थे और मौखिक अंकगणित सिखाने के बाद लिखित अंकगणित सिखाते थे। मौखिक अंकगणित सिखाने के लिए ये वातावरण की वस्तुओं का प्रयोग करते थे, कभी उनका योग पूछते थे, कभी उनमें से कुछ को हटाकर शेष पूछते थे । और इसी प्रकार गुणा-भाग करवाते थे। मौखिक अभ्यास होने के बाद लिखित समस्याओं को हल करने को कहते थे।

रेखागणित का शिक्षण

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रेखागणित का ज्ञान भी ये प्रत्यक्ष विधि से कराते थे। पहले बच्चों को रेखागणितीय आकृतियाँ दिखाते थे, फिर उन आकृतियों को बनाने के लिए कहते थे और इसके बाद उनके बीच सम्बन्ध देखने-समझने का अवसर देते थे।

भूगोल शिक्षण, प्रकृति अध्ययन एवं औद्योगिक शिक्षा

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भूगोल का शिक्षण और प्रकृति अध्ययन के लिए पेस्टालॉजी अवलोकन एवं निरीक्षण विधियों का प्रयोग करते थे और व्यावसायिक शिक्षण के लिए अवलोकन, अभ्यास एवं आवृत्ति विधियों का प्रयोग करते थे ।

विज्ञान शिक्षण

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विज्ञान शिक्षण के लिए ये अवलोकन, निरीक्षण और आगमन विधियों का प्रयोग करते थे और शिक्षण कार्य को बच्चों के विकास के आधार पर नियोजित करने पर बल देते थे ।

नैतिक शिक्षा

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पेस्टालॉजी के अनुसार नैतिक शिक्षा की अलग से व्यवस्था करने की आवश्यकता नहीं है। विद्यालयों का वातावरण एवं कार्य प्रणाली कुछ ऐसी होनी चाहिए कि बच्चे ईश्वर में विश्वास करें, एक-दूसरे से प्रेम करें, एक-दूसरे का सहयोग करें और एक-दूसरे की सेवा करें। इसके लिए ये शिक्षक-शिक्षार्थी में पिता-पुत्र के से निकट सम्बन्धों को महत्त्व देते थे ।

अनुशासन

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पेस्टालॉजी बच्चों के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार करने पर बल देते थे। इनकी दृष्टि से बच्चों को अनुशासन की शिक्षा भी प्रेमपूर्ण व्यवहार से देनी चाहिए, उन्हें किसी प्रकार के दण्ड द्वारा नहीं। और जब कभी बच्चे कोई अनुचित आचरण करें तब भी उन्हें प्रेमपूर्वक समझाना चाहिए। इनका विश्वास था कि प्रेम भरे पर्यावरण में बच्चों के अनुशासनहीन होने का प्रश्न ही नहीं उठता। इनके शब्दों में- अनुशासन प्रेम द्वारा ही स्थापित एवं नियन्त्रित होना चाहिए।

पेस्टालॉजी ने शिक्षा को मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान किया। ये शिक्षक से पहली अपेक्षा यह करते थे कि उन्हें बच्चों के मनोविज्ञान और सीखने-सिखाने के मनोविज्ञान का स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए। इन्हें विश्वास था कि तब शिक्षक बच्चों को विकास के स्वतन्त्र अवसर देंगे, उनके स्वाभाविक विकास में सहायक का कार्य करेंगे और उनके साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करेंगे। ये शिक्षक-शिक्षार्थी के बीच पिता-पुत्र जैसे सम्बन्ध स्थापित करने की बात करते थे। इनका मत था कि शिक्षकों को सदैव सेवा भाव से कार्य करना चाहिए।

शिक्षार्थी

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पेस्टालॉजी बालक को दैवी कृति के रूप में लेते थे। फिर ये अपने जीवन में प्रायः दीन-हीनों की शिक्षा व्यवस्था में ही लगे रहे और उनके प्रति इनके हृदय में बड़ा प्रेम व सहानुभूति थी। ये इस बात पर बल देते थे कि एक ओर बालक के व्यष्टित्व का आदर करना चाहिए और दूसरी ओर समाज के हित की बात सोचनी चाहिए। बालक का विकास कुछ इस रूप में करना चाहिए कि उसका भी विकास हो और उसके विकास से समाज का भी विकास हो। ये बालक को समाज का वैयष्टिक अंग मानते थे ।

विद्यालय

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पेस्टालॉजी के विद्यालय सम्बन्धी विचार भी प्राथमिक विद्यालयों तक सीमित हैं। ये प्राथमिक विद्यालयों को घर के रूप में बदलने के पक्ष में थे, उनमें प्रेम तथा सहानुभूतिपूर्ण वातावरण बनाने के पक्ष में थे। इनका मत था कि ऐसे वातावरण में ही बच्चों का स्वाभाविक विकास हो सकता है और वे प्रेम सहयोग एवं सेवा का सच्चा पाठ पढ़ सकते हैं। पर साथ ही ये विद्यालयों को व्यवस्थित रूप से चलाने पर बल देते थे। इन्होंने अपने यवर्दन स्थित विद्यालय में 3 से 13 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था की थी। इसमें 3 से 8 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा को प्राइमरी शिक्षा कहा जाता था। इस स्तर पर समय सारिणी का कोई बन्धन नहीं था। 8 से 11 वर्ष आयु के बच्चों की शिक्षा को लोअर शिक्षा और 11 से 13 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा को अपर शिक्षा कहा जाता था। इन स्तरों के लिए नियमित समय सारिणी होती थी। इन दोनों स्तर पर 60-60 मिनट के घण्टे (Periods) होते थे और प्रत्येक घण्टे के बाद छोटा सा अवकाश दिया जाता था। कुल मिलाकर 10 घण्टे होते थे। अन्त में शिक्षक और छात्र मिलते थे और छात्रों की व्यक्तिगत कठिनाइयों को दूर किया जाता था। इस प्रकार लगभग 12 घण्टे (Hours) स्कूल कार्य चलता था और मजे की बात यह है कि बच्चे थकते नहीं थे, उबते नहीं थे।

शिक्षा के अन्य पक्ष

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जन शिक्षा

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पेस्टालॉजी जन शिक्षा के सबसे बड़े समर्थक थे। इनकी दृष्टि से शिक्षा मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। ये तो अपने जीवन में दीन-हीनों की शिक्षा में ही लगे रहे और उनके उत्थान के लिए ही प्रयत्न करते रहे।

स्त्री शिक्षा

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स्त्री शिक्षा के विषय में पेस्टालॉजी ने अलग से तो कुछ नहीं लिखा है परन्तु उनका यह विचार कि शिक्षा ही समाज सुधार का मूल आधार है, स्त्री शिक्षा के महत्त्व को स्पष्ट करता है ।

व्यावसायिक शिक्षा

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पेस्टालॉजी जानते थे कि मनुष्यों की दीनता का मुख्य कारण उनका आत्मनिर्भर न होना है। इन्होंने दीन-हीन बच्चों को व्यावसायिक शिक्षा देकर उन्हें स्वावलम्बी बनाने का प्रयत्न भी किया।

धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा

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पेस्टालॉजी बच्चों को पहले अच्छा मनुष्य बनाने पर बल देते थे और इसके लिए धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा को आवश्यक मानते थे। उनकी दृष्टि से धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा की व्यवस्था शिशु काल से ही शुरु होनी चाहिए, घर में भी होनी चाहिए और विद्यालयों में भी होनी चाहिए पर यह शिक्षा शब्दों के माध्यम से नहीं, वातावरण के माध्यम से दी जानी चाहिए: धार्मिक एवं नैतिक आचरण के माध्यम से दी जानी चाहिए।

पेस्टालॉजी का प्रभाव

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पेस्टालॉजी के शैक्षिक चिन्तन एवं प्रयोगों का प्रभाव शिक्षा के सिद्धान्त एवं प्रयोग दोनों पक्षों पर पड़ा । इनके समय तक शिक्षा का अर्थ बच्चों को बाहर से ज्ञान देने से समझा जाता था, पेस्टालॉजी ने इसे आन्तरिक शक्तियों के आधार पर विकसित करने पर बल दिया । परिणामतः शिक्षा मनोविज्ञान पर आधारित होने लगी और बच्चों के मनोविज्ञान और सीखने के मनोविज्ञान पर आधारित होने लगी। अब तक बच्चों को कठोर नियन्त्रण में रखा जाता था, पेस्टालॉजी के प्रभाव से उनके साथ प्रेम एवं सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया जाने लगा। अब तक उन्हें सब कुछ अपनी ओर से बताया जाता था, पेस्टालॉजी के प्रभाव से उन्हें स्वयं करके स्वयं सीखने के अवसर दिए जाने लगे। कुल मिलाकर शिक्षा बाल केन्द्रित होने लगी। शिक्षकों को इस कला में प्रशिक्षित करने के लिए पेस्टालॉजी ने शिक्षक प्रशिक्षण की शुरुआत की। सच पूछिए तो किसी भी देश में शिक्षक शिक्षा का जो वर्तमान स्वरूप है उसकी नींव पेस्टालॉजी ने ही रखी थी । पेस्टालॉजी के शिष्य हरबार्ट द्वारा विकसित अनुदेशन प्रणाली और फ्रोबेल द्वारा विकसित खेल विधि का प्रयोग आज पूरे संसार में किया जाता पेस्टालॉजी आधुनिक प्रगतिशील शिक्षा के जनक माने जाते हैं।

सन्दर्भ

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  1. Barnard & Pestalozzi 1859, p. 49.
  2. Isaacson 2007, p. 65.