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जिप्सी शलभ

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वयस्क मादा जिप्सी शलभ
वयस्क नर जिप्सी शलभ

जिप्सी शलभ (Moth, Gypsy) लेपिडॉप्टेरीय (lepidopterous) कीट है, जो लाइमैनट्राइडी (Lymantridae) कुल के अंतर्गत आता है। इस कुल के अंतर्गत कुछ बड़े भयंकर कीट भी पाए जाते हैं। ये शलभ मध्यम आकार के होते हैं। इनकी टाँगें घने बालों से ढँकी रहती हैं। इस कुल के शलभ प्राय: रात्रि में उड़नेवाले होते हैं, परंतु कुछ दिन में भी उड़ते हैं।

जिप्सी शलभ के वयस्क नर का रंग भूरा होता है, जिसमें कुछ पीले निशान होते हैं जो डेढ़ इंच तक फैले होते है। दिन में यह स्वच्छंदता से उड़ता है। मादा शलभ के पंख, जिनपर काले निशान होते हैं, लगभग सफेद होते हैं। इसका शरीर भारी और पुष्ट होता है तथा पांडु रंग के बालों से ढँका रहता है। पंख लगभग दो इंच तक फैले होते हैं, परंतु ऐसे विकसित पंखों के होते हुए भी ये शरीर के भारीपन के कारण उड़तीं नहीं।

मादा जाड़े में अंडाकार गुच्छों में अंडे देती है, जो पांडु बालों से ढँके होते हैं। प्रत्येक गुच्छे में ४००-५०० अंडे होते हैं। अंडे देने के लिए मादा स्थान के चयन पर कोई विशेष ध्यान नहीं देती। ये स्थान वृक्ष की शाखाएँ, धड़, घड़ों के कोटर, पत्थर और टिन के डिब्बे तक हो सकते हैं। वसंत में अंडों के फूटने पर इल्लियाँ (caterpillars) निकल आती हैं। इल्लियाँ अनेक प्रकार की पत्तियाँ खाती हैं। सेब, बांज, विलो, अल्डर और बर्च की पत्तियाँ इन्हें विशेष प्रिय हैं। इस प्रकार खाते खाते इल्लियाँ जुलाई के प्रारंभ तक काफी बड़ी हो जात हैं।

अब तक इल्लियों का आकार लगभग तीन इंच लंबा और पेंसिल सा मोटा हो जाता है। ये भूरे रंग की होती हैं और इनके शरीर के कुछ भाग पर गुच्छेदार बाल होते हैं। इनकी पीठ पर पाँच जोड़ी नीले धब्बे होते हैं, जिनके पीछे छह जोड़े लाल धब्बे होते हैं।

भोजन के पश्चात् इल्लियाँ किसी वृक्ष की शाखा, या तने के भीतर, उपयुक्त स्थान में चली जाती हैं। वहाँ पर वे अपने शरीर को पकड़ रखने के लिए कुछ तागों का कोया (cocoon) बुनती हैं। इसी कोए में इल्लियाँ प्यूपा (pupa) बनती हैं और सात से १७ दिनों के पश्चात् शलभ के रूप में निकल आती हैं।

Parasetigena silvestrisBlepharipa pratensisGlyptapanteles liparidisGlyptapanteles porthetriae
जिपसी शलभ में परजीविता : जिप्सी शलभ को प्रभावित करने वाले विभिन्न परजीव्याभ (parasitoids) : The stage they affect and eventually kill and its duration are denoted by arrows.

शलभों का वितरण चार प्रकार से होता है :

  • (१) इल्लियों के रेंगेने से,
  • (२) जिन पदार्थों पर अंडे रहते हैं, उन्हें अन्य स्थानों को ले जाने से,
  • (३) वृक्ष से इल्लियों का तागा बुनते हुए किसी वाहन पर स्थानांतरित हो जाने से तथा
  • (४) पवन की सहायता से।

शलभों द्वारा गंभीर हानियाँ होती हैं। इल्लियाँ बड़ी पेटू होती हैं और यदि इनकी संख्या अधिक हो, तो ये वृक्षों और सदाबहार की पत्तियों को खोकर कुछ वर्षों में वृक्षों को सुखा देती हैं। इल्लियों को नष्ट करने के दो तरीके हैं :

  • (१) प्राकृतिक तथा
  • (२) कृत्रिम।

प्राकृतिक रीतियों से, यद्यपि अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं, तथापि इल्लियाँ समूल नष्ट नहीं होतीं। कृत्रिम रीतियाँ निम्नलिखित हैं :

  • (१) रूई के फाहे को क्रिओसोट में डुबाकर, अंडों के गुच्छों को उपचारित करना। इस रीति में सब अंडों का पता लगना कठिन है,
  • (२) दूसरी रीति में, इल्लियों के छोटे रहने पर ही, पेड़ों और अन्य पौधों पर लेड आर्सेंनेट छिड़का जाता है (५० गैलन जल में २ पाउंड लेड आर्सेनेट रहता है, पर जब लार्वा बड़ा हो जाता है, तब इस विष के प्रति वह प्रतिरोधी हो जाता है)।

इन्हें भी देखें

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