जयचन्द

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जयचंद्र गढ़वाल
अश्व-पति नार-पति गाज-पति राजत्रिपतिपति
शासनावधिc. 1170-1194 CE
पूर्ववर्तीविजयचंद्र
उत्तरवर्तीहरिश्चन्द्र गढ़वाल
संतानहरिश्चन्द्र
वंशगड़ावाला
पिताविजयचंद्र

जयचंद्र गढ़वाल( 1170–1194 CE) उत्तर भारत के गढ़वाला जाती के एक राजा थे। उन्होंने गंगा नदी के पास में बसे कान्यकुब्ज और वाराणसी सहित अंटारवेदी देश पर शासन किया। आज के उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ भागों पर राज किया था गड़ावाला वंश के अंतिम शक्तिशाली राजा थे।

विद्यापति के पुरुष-परिक्षा और पृथ्वीराज रासो जैसे हिन्दू स्रोतों के अनुसार ,जयचंद्र ने घुरिडों को कई बार हराया। जयचंद्र कोई गद्दार नहीं थे, वह अपनी अंतिम सांस तक मोहम्मद गौरी के कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा नेतृत्व सेना के खिलाफ लड़ते रहे लेकिन आखिरकार वह 1194ce मे चंदावर की लड़ाई मे हारे गए, लेकिन उनके हार के बाद भी उनके बेटे हरिश्चंद्र ने मोहम्मद गौरी को हराया और वाराणसी में मुसलमानों ने जितने भी घाट और मंदिर तोड़े थे वह सब वापस बनाएं।

ऐसे कोई प्रमाण नहीं हैं जिससे पता लगे कि जयचन्द ने गौरी की सहायता की थी। गौरी को बुलाने वाले देश द्रोही तो दूसरे ही थे, जिनके नाम पृथ्वीराज रासो में अंकित हैं। इसी प्रकार समकालीन फारसी ग्रन्थों में भी इस बात का संकेत तक नहीं है कि जयचन्द ने गौरी को आमन्त्रित किया था। यह एक सुनी-सुनाई बात है जो एक रूढी बन गई है। पृथ्वीराज तथा संयोगिता विवाह को इतिहासकार सत्य नही मानते।[1]

प्रारंभिक जीवन[संपादित करें]

जयचंद्र गढ़वल्ला राजपूत राजा विजयचंद्र के पुत्र थे। एक कमौली शिलालेख के अनुसार, उन्हें 21 जून 1170 ईस्वी को राजा का ताज पहनाया गया था।[2] जयचंद्र को अपने दादा गोविंदचंद्र के शाही खिताब विरासत में मिले:[2] अश्वपति नारपति गाजपति राजत्रिपतिपति[3]) तथा विदेह-विद्या-विचारा-वाचस्पति[4]).

सैन्य वृत्ति[संपादित करें]

जयचंद्र के शिलालेख पारंपरिक भव्यता का उपयोग करते हुए उनकी प्रशंसा करते हैं, लेकिन राजा की किसी भी ठोस उपलब्धि का उल्लेख नहीं करते हैं। उनके पड़ोसी राजपूत राजाओं के रिकॉर्ड में उनके साथ किसी भी संघर्ष का उल्लेख नहीं है।[5] माना जाता है कि सेना राजा लक्ष्मण सेना ने गढ़वाला क्षेत्र पर आक्रमण किया था, लेकिन यह आक्रमण जयचंद्र की मृत्यु के बाद हुआ होगा।[6]

घुरिद आक्रमण[संपादित करें]

1193 ईस्वी में मुस्लिम घुरिद ने जयचंद्र के राज्य पर आक्रमण किया। समकालीन मुस्लिम सूत्रों के अनुसार, जयचंद्र "जयचंद्र भारत के सबसे महान राजा और उनके पास भारत में सबसे बडे क्षेत्र पर राज किया था"।[6] इन स्रोतो ने उन्हें बनारस का राय बताया [7] अली इब्न अल-अथिर के अनुसार, उसकी सेना में एक लाख सैनिक थे और 700 हाथी थे।[8] जब जयचंद्र की सेना चलती थी, तो ऐसा प्रतीत होता था है कि एक पूरा शहर चल रहा है ना कि कोई सेना

विद्यापति के पुरुष-परिक्षा और [[[पृथ्वीराज रासो]] जैसे हिन्दू स्रोतों के अनुसार ,जयचंद्र ने घुरिडों को कई बार हराया।

घुरिद शासक मुहम्मद ने 1192 ई, में चौहान राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान को हराया था। हसन निज़ामी के १३ वीं शताब्दी के पाठ-ताज-उल-मासिर ’’ के अनुसार, उन्होंने अजमेर, दिल्ली पर नियंत्रण करने के बाद गढ़वाला राज्य पर हमला करने का फैसला किया। उन्होंने कुतुब अल-दीन ऐबक द्वारा संचालित 50,000-मजबूत सेना को भेजा। निज़ामी ने कहा कि इस सेना ने "धर्म के दुश्मनों की सेना" (इस्लाम) को हराया। ऐसा प्रतीत होता है कि पराजित सेना जयचंद्र की मुख्य सेना नहीं थी, बल्कि उनके सीमावर्ती पहरेदारों की एक छोटी संस्था थी।[9]

तब जयचंद्र ने 1194 ईस्वी में कुतुब अल-दीन ऐबक के खिलाफ एक बड़ी सेना का नेतृत्व किया। 16 वीं शताब्दी के इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार, जयचंद्र एक हाथी पर बैठे हुए थे, जब कुतुब अल-दीन ने उसे एक तीर से मार दिया था। घुरिडों ने 300 हाथियों को जिंदा पकड़ लिया, और असनी किले में गड़ावाला खजाने को लूट लिया।[10] [11]) इसके बाद, घुरिडो ने वाराणसी के लिए आगे बढ़े, जहां हसन निजामी के अनुसार, "लगभग 1000 मंदिरों को नष्ट कर दिया गया था और मस्जिदों को उनकी नींव पर खड़ा किया गया था"। घुरिडो के प्रति अपनी निष्ठा की पेशकश करने के लिए कई स्थानीय सामंती प्रमुख सामने आए।[10]

जय चंद्र की मौत के बाद उनके पुत्र हरिश्चंद्र गढ़वाल ने घुरिडो को हराया, और वाराणसी को वापस अपने राज्य में ले लिया, और जितने भी मंदिर और घाट जो मुसलमानों ने तोड़े थे उन सब को वापस बनाया और जितने भी मस्जिद थे सब को नष्ट कर दिया।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. S. Ramakrishnan, General Editor (2001). History and Culture of the Indian People, Volume 05, The Struggle For Empire. Public Resource. Bharatiya Vidya Bhavan.
  2. Roma Niyogi 1959, पृ॰ 102.
  3. D. C. Sircar 1966, पृ॰ 35.
  4. Roma Niyogi 1959, पृ॰ 87.
  5. Roma Niyogi 1959, पृ॰ 103.
  6. Roma Niyogi 1959, पृ॰ 105.
  7. Roma Niyogi 1959, पृ॰ 109.
  8. Roma Niyogi 1959, पृ॰ 110.
  9. Roma Niyogi 1959, पृ॰प॰ 110-111.
  10. Roma Niyogi 1959, पृ॰प॰ 111-112.
  11. D. P. Dubey 2008, पृ॰ 231.

ग्रन्थसूची[संपादित करें]