चंद्रवंशी समाज

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चंद्रवंशी समाज भारतवर्ष के प्राचीनतम क्षत्रिय समाजों में से एक है। वर्तमान समय में यह विशुद वैैैैदिक चंद्रवंशी क्षत्रिय महानंद के अत्याचार से मगध से रवाना होने के कारण बिहार और झारखंड में रवानी और रमानी के नाम से जाने जाते है!बिहार में चंद्रवंशियो की कुल आबादी 7 फीसदी हैं, जबकि झारखण्ड मे चंद्रवंशियो की कुल आबादी 13 फीसदी है।

इतिहास[संपादित करें]

इस समाज के लोग चन्द्रवंश की स्थापना को राजा बुद्ध द्वारा अपने पिता चन्द्रदेव के नाम से प्रतिष्ठानपुरी (वर्तमान झूसि, इलाहाबाद ) में किया गया मानते हैं। वे अपना संबंध अनेक पौराणिक-ऐतिहासिक शासकों से जोड़ते हैं। इनमें भगवान श्री कृष्ण चन्द्र तथा पांडव प्रसिद्ध हैं... सृष्टि की रचना के बाद संभवतः मानव सभ्यता तथा वंश पंरपरा स्थापित हुई होगी। तदोपरान्त वर्ण व्यवस्था स्थापित हुई हो, और जिस समय राजवंशावलियों के अनुसार मनु के दो पुत्र थे-मरीचि और अत्रि। मरीचि के कश्यप और कश्यप से सूर्य नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। यहीं से सूर्य वंश की उत्पत्ति हुई। इधर अत्रि से समुद्र और समुद्र से चन्द नामक पुत्र का जन्म हुआ। यहीं से चन्द वंश की उत्पत्ति हुई। चन्द से परम तेजस्वी बुध नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। चन्द्रवंशी राजा बुध बड़े धार्मिक, तेजस्वी और पराक्रमी राजा थे। वे अत्यन्त सुन्दर थे। अपनी विद्वता एवं बुद्धिमानी के कारण ही वे 'बुध' कहलाये। राजा बुध ने ऋग्वेद के उर्पयुक्त मंत्र का अध्ययन कर लोध गुण युक्त चन्द्रवंशी क्षत्रियों की एक विशाल सेना का गठन किया। इसी सेना के बल पर उन्होंने अनेक युद्ध जीते। सूर्यवंशीय क्षत्रिय राजा इक्ष्वाकु की बहन इला देवी के साथ विवाह किया तदुपरान्त चक्रवर्ती राजा हुए। महाराजा जरासंध जो एक विशाल मगध साम्राज्य के राजा थे, चन्द्रवंश क्षत्रिय वंश के अंतिम चक्रवर्ती सम्राट हुये। मगध पर शासन करने वाला प्राचीनतम ज्ञात राजवंश वृहद्रथ-वंश है। महाभारत व पुराणों से ज्ञात होता है कि प्राग्-ऐतिहासिक काल में चेदिराज वसु के पुत्र बृहदर्थ ने गिरिव्रज को राजधानी बनाकर मगध में अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित किया था। दक्षिणी बिहार के गया और पटना जनपदों के स्थान पर तत्कालीन मगध-साम्राज्य था। इसके उत्तर में गंगानदी, पश्चिम में सोन नदी, पूर्व में चम्पा नदी तथा दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वतमाला थी। बृहद्रथ के द्वारा स्थापित राजवंश को बृहद्रथ-वंश कहा गया। जरासंध इस वंश का सबसे प्रतापी शासक था, जो बृहद्रथ का पुत्र था। जरासंध अत्यन्त पराक्रमी एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण से ज्ञात होता है कि उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, काश्मीर और गांधार के राजाओं को परास्त किया। इसी कारण पुराणों में जरासंध को महाबाहु, महाबली और देवेन्द्र के समान तेज़ वाला कहा गया है।


इनके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और बाद में 'महानंद' ने 'मगध साम्राज्य' पर अपना अधिपत्य जमाकर ऐसा शोषण, दोहन एवं आतंक का वातावरण बनाया कि चंद्रवंशी क्षत्रिय परिवार को अपना घर द्वार छोड़कर अन्य जगहों पर भागना पड़ा। उसी समय से इस वंश का सिलसिला शुरू हुआ, जो काल परिवर्तन होने पर भी रुकने का नाम नहीं लिया...फिर रमन होने से "रवानी" जाति बन कर रह गये...फिर कर्म करते करते "रवानी जाति बन कर ही रह गए। रवानी राजपूत या रमानी राजपूत चंद्रवंशी क्षत्रिय है। भारत के विभिन्न प्रांतों में विभिन्न नामों से पायी जाती है।बिहार और झारखण्ड में यह चंद्रवंशी क्षत्रिय ,रवानी राजपूत या रामानी राजपूत । उत्तर प्रदेश में ठाकुर राजपूत ,राजस्थान में चंद्रवंशी रावत राजपूत और मध्य प्रदेश में पुरुवंशी राजपूत या चंदेल राजपूत तथा कुछ सोमवंशी राजपूत भी कहते हैं।रवानी राजपूत की कुल देवी ज़रा देवी हैै l

इतिहास संपादित करें

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

== सन्दर्भ =अखिल भारतवषीय चंद्रवंशी क्षत्रिय महासभा जातीय संगठन की स्थापना सन् 1906 में कि गई और इसका रजिस्ट्रेशन सन 1912 में हुआ ब्रिटिश सरकार ने 1931 के जनगणना में चंद्रवंशी क्षत्रिय(रवानी) माना। References:

  • Minutes of 1935 ,Maha-adhiveshan akhil bhartiye kshyriya smaj
  • Book-rajput vanshwali ,by thakur ishwar Singh madadh.
  • census reports national archives of india-chandravanshi kshtriya