गिलोय

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टीनोस्पोरा कार्डीफोलिया
Tinospora cordifolia.jpg
वैज्ञानिक वर्गीकरण
जगत: पादप
विभाग: मैग्नोलियोफाइटा
वर्ग: मैग्नोलियोप्सीडा
गण: Ranunculales
कुल: Menispermaceae
वंश: Tinospora
जाति: T. cordifolia
द्विपद नाम
Tinospora cordifolia
(Thunb.) Miers

गिलोय (अंग्रेज़ी:टीनोस्पोरा कार्डीफोलिया) की एक बहुवर्षिय लता होती है। इसके पत्ते पान के पत्ते की तरह होते हैं। आयुर्वेद में इसको कई नामों से जाना जाता है यथा अमृता, गुडुची, छिन्नरुहा, चक्रांगी, आदि।[1] 'बहुवर्षायु तथा अमृत के समान गुणकारी होने से इसका नाम अमृता है।' आयुर्वेद साहित्य में इसे ज्वर की महान औषधि माना गया है एवं जीवन्तिका नाम दिया गया है। गिलोय की लता जंगलों, खेतों की मेड़ों, पहाड़ों की चट्टानों आदि स्थानों पर सामान्यतः कुण्डलाकार चढ़ती पाई जाती है। नीम, आम्र के वृक्ष के आस-पास भी यह मिलती है। जिस वृक्ष को यह अपना आधार बनाती है, उसके गुण भी इसमें समाहित रहते हैं। इस दृष्टि से नीम पर चढ़ी गिलोय श्रेष्ठ औषधि मानी जाती है। इसका काण्ड छोटी अंगुली से लेकर अंगूठे जितना मोटा होता है। बहुत पुरानी गिलोय में यह बाहु जैसा मोटा भी हो सकता है। इसमें से स्थान-स्थान पर जड़ें निकलकर नीचे की ओर झूलती रहती हैं। चट्टानों अथवा खेतों की मेड़ों पर जड़ें जमीन में घुसकर अन्य लताओं को जन्म देती हैं।

तालकटोरा उद्यान, दिल्ली में गिलोय के पौधे

बेल के काण्ड की ऊपरी छाल बहुत पतली, भूरे या धूसर वर्ण की होती है, जिसे हटा देने पर भीतर का हरित मांसल भाग दिखाई देने लगता है। काटने पर अन्तर्भाग चक्राकार दिखाई पड़ता है। पत्ते हृदय के आकार के, खाने के पान जैसे एकान्तर क्रम में व्यवस्थित होते हैं। ये लगभग 2 से 4 इंच तक व्यास के होते हैं। स्निग्ध होते हैं तथा इनमें 7 से 9 नाड़ियाँ होती हैं। पत्र-डण्ठल लगभग 1 से 3 इंच लंबा होता है। फूल ग्रीष्म ऋतु में छोटे-छोटे पीले रंग के गुच्छों में आते हैं। फल भी गुच्छों में ही लगते हैं तथा छोटे मटर के आकार के होते हैं। पकने पर ये रक्त के समान लाल हो जाते हैं। बीज सफेद, चिकने, कुछ टेढ़े, मिर्च के दानों के समान होते हैं। उपयोगी अंग काण्ड है। पत्ते भी प्रयुक्त होते हैं।[2]

ताजे काण्ड की छाल हरे रंग की तथा गूदेदार होती है। उसकी बाहरी त्वचा हल्के भूरे रंग की होती है तथा पतली, कागज के पत्तों के रूप में छूटती है। स्थान-स्थान पर गांठ के समान उभार पाए जाते हैं। सूखने पर यही काण्ड पतला हो जाता है। सूखे काण्ड के छोटे-बड़े टुकड़े बाजार में पाए जाते हैं, जो बेलनाकार लगभग 1 इंच व्यास के होते हैं। इन पर से छाल काष्ठीय भाग से आसानी से पृथक् की जा सकती है। स्वाद में यह तीखी होती है, पर गंध कोई विशेष नहीं होती। पहचान के लिए एक साधारण-सा परीक्षण यह है कि इसके क्वाथ में जब आयोडीन का घोल डाला जाता है तो गहरा नीला रंग हो जाता है। यह इसमें स्टार्च की उपस्थिति का परिचायक है। सामान्यतः इसमें मिलावट कम ही होती है, पर सही पहचान अनिवार्य है। कन्द गुडूची व एक असामी प्रजाति इसकी अन्य जातियों की औषधियाँ हैं, जिनके गुण अलग-अलग होते हैं।

औषधीय गुणों के आधार पर नीम के वृक्ष पर चढ़ी हुई गिलोय को सर्वोत्तम माना जाता है क्योंकि गिलोय की बेल जिस वृक्ष पर भी चढ़ती है वह उस वृक्ष के सारे गुण अपने अंदर समाहित कर लेती है तो नीम के वृक्ष से उतारी गई गिलोय की बेल में नीम के गुण भी शामिल हो जाते हैं अतः नीमगिलोय सर्वोत्तम होती है। गिलोय के आयुर्वेदिक गुण-कर्म और प्रभाव-गिलोय त्रिदोष शामक होती है। स्निग्ध होने से वात, तिक्त-कषाय होने से कफ और पित्त का शमन करती है। गुडूची कुष्ठघ्न, वेदनास्थापन, तृष्णानिग्रह,छर्दिनिग्रह, दीपन-पाचन, पित्तसारक, अनुलोमन और कृमिघ्न है। इससे आमाशयगत अम्लता कम होती है। यह हृदय को बल देने वाली, रक्त विकार तथा पांडुरोग में गुणकारी है। खांसी, दौर्बल्यता, प्रमेह, मधुमेह में, त्वचा के रोगों में तथा कई प्रकार के ज्वर में उत्तम कार्य करती है। गिलोय को घृत के साथ सेवन करने से यह वात शामक, गुड़ के साथ सेवन करने से मलबद्धता नाशक, खांड के साथ सेवन करने से कफ शामक, सौंठ के साथ सेवन करने से आमवात शामक तथा एरण्ड तैल के साथ सेवन करने से वात शामक होती है। गुडुची का पत्र-शाक, कटु, तिक्त मधुर, उष्णवीर्य, लघु, त्रिदोष शामक, रसायन, अग्निदीपक, बलकारक, मलरोधक, चक्षुष्य तथा पथ्य होता है। यह वातरक्त, तृष्णा, दाह, प्रमेह, कुष्ठ, कामला तथा पाण्डु रोग में लाभप्रद है। गिलोय सत्व मधुर, लघु, त्रिदोष शामक, पथ्य, दीपन, नेत्र के लिए हितकरी, धातुवर्धक, मेध्य, और ववयस्थापक होता हैं।गिलोय का प्रयोग वातरक्त, पाण्डु, ज्वर, छर्दि, जीर्णज्वर, कामला, प्रमेह, अरुचि, श्वास, कास, हिक्का, अर्श, दाह, मूत्रकृच्छ, प्रदर तथा सोमरोग की चिकित्सा में किया जाता है। गिलोय के पौधे के सत्व में विषमज्वररोधी क्रिया पाई गयी है। इसके काण्ड स्वरस और चूर्ण में शोथरोधी तथा मष्तिष्क उद्दीपनरोधी क्रियाओ को प्रदर्शित करता है। गिलोय व्याधिक्षमत्व वर्धक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता हैं। गिलोय का काण्ड सार ज्वरघ्न क्रियाशीलता प्रदर्शित करता हैं।[3]



सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. ततो येयु प्रदेशेषु कपिगात्रात् परिच्युताः।
    पीयुषबिन्दवः पेतुस्तेभ्यो जाता गुडूचिका॥
  2. गिलोय क उपयोग
  3. आचार्य बालकृष्ण (2017). आयुर्वेद जड़ी-बूटी रहस्य (द्वितीय संस्करण). दिव्य प्रकाशन. पृ॰ 450. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978 -81 -89235 -44 -4.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

गिलोय जड़ी बूटी के लाभ