खेल चोट

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search
फुटबाल के एक खेल में खिलाड़ी के चोटग्रस्त टखने पर टेप चढ़ाया जा रहा है।

खेलकूद में लगने वाली चोटें (sports injuries) नियमित चोटों से अलग होती हैं, क्योंकि खिलाड़ी अपने शरीर पर बहुत दबाव डालते हैं, जो कभी-कभी मांसपेशियों, जोड़ों और हड्डियों में टूट-फूट का कारण बनता है। खेल, प्रशिक्षण और व्यायाम में भाग लेने के दौरान खेल की चोटें होती हैं। ओवरट्रेनिंग, कंडीशनिंग की कमी, और कार्य करने की अनुचित तकनीक से खेल में चोट लगती है। व्यायाम या किसी भी शारीरिक खेल को खेलने से पहले वार्म अप न करने से भी चोटों का खतरा बढ़ जाता है।

स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपी, फिजियोथेरेपी की एक विशेष शाखा है जिसकी मदद से खेल की चोटों का इलाज बेहतर तरीके से किया जाता है। स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपिस्ट के पास खेल विशिष्ट ज्ञान होता है और एथलीट की तेजी से रिकवरी करने में मदद करने में बेहतर होते हैं। आम तौर पर खेल की चोटों के उपचार में एथलीटों को राहत पहुंचाने के लिए उचित दवा के साथ स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपी का उपयोग किया जाता है। वास्तव में खेल की चोट में फिजियोथेरेपी एथलीटों की तेजी से रिकवरी काफी उपयोगी साबित हुई है और उपचार के सबसे भरोसेमंद रूपों में से एक है।

खेल में लगने वाली सामान्य चोटें[संपादित करें]

खेल की चोटों के कुछ सामान्य रूप ये हैं-

मांसपेशियों का तनाव[संपादित करें]

मांसपेशियों में खिंचाव सबसे आम खेल चोटों में से एक है, जो अक्सर तब होता है जब एक मांसपेशी अतिरंजित होती है और क्षतिग्रस्त हो जाती है। मांसपेशी में उपभेद मुख्य रूप से क्वाड्रिसेप्स, पिंडलियों, कमर, पीठ के निचले हिस्से और कंधे को प्रभावित करते हैं। चोट के इस रूप को कुछ आराम, बर्फ संपीड़न और खेल फिजियोथेरेपी के द्वारा इलाज किया जा सकता है।

फटे एसीएल[संपादित करें]

एसीएल या एंटीरियर क्रूसिएट लिगामेंट घुटने के जोड़ों को एक साथ रखने में मदद करता है और स्थिरता लाता है। एक फटा हुआ एसीएल बेहद दर्दनाक होता है और चलने की क्षमता को बहुत कम कर देता है। यह चोट घुटनों में सीधे शॉट लगने से, या गलत लैंडिंग और या रुकने और जल्दी से दिशा बदलने से होती है। इस तरह की चोट के लिए सर्जिकल मनूवर की आवश्यकता होती है और बाद में खेल फिजियोथेरेपी का सहारा लेना पड़ता है।

टोर्न एमसीएल[संपादित करें]

यह घुटने की चोट का एक और रूप है, जो तब होता है जब मीडियल कोलैटरल लिगमेंट जो फीमर को टिबिया से जोड़ता है वह घायल हो जाता है। यह तब होता है जब घुटनों को बग़ल में धकेल दिया जाता है। घुटने की चोट के इस प्रकार का उपचार बर्फ के संपीड़न, ब्रेसिज़ और स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपी की मदद से किया जा सकता है।

शिन स्प्लिट्स[संपादित करें]

यह निचले पैर या पिंडली क्षेत्र के अंदरूनी हिस्सों को प्रभावित करता है और यह अति प्रयोग (over use) की चोट है और धावकों के बीच पाई जाने वाली एक आम चोट भी है। फ्लैट पैर वाले एथलीटों को इस प्रकार की चोट लगने की अधिक सम्भावना होती है।

स्ट्रेस फ्रैक्चर[संपादित करें]

स्ट्रेस फ्रैक्चर भी अति प्रयोग की चोट का एक रूप है। स्ट्रेस फ्रैक्चर आमतौर पर निचले पैरों और पैरों पर प्रभाव डालते हैं और महिला एथलीटों को पुरुषों की तुलना में ऐसी चोट लगने का खतरा अधिक होता है।

प्लांटर फेशिआइटिस[संपादित करें]

प्लांटार फासिसाइटिस, प्लांटर फासीआ लिगमेंट की सूजन है जो एड़ी को पैर के सामने से जोड़ता है। इस प्रकार की चोट के पीछे तनाव प्रमुख कारण है और आमतौर पर आराम, बर्फ, नॉन स्टेरॉयड एंटी इंफ्लेमेटरी दवाओं और व्यायाम के द्वारा इसका इलाज किया जाता है। हालांकि गंभीर मामलों में कोर्टिसोन इंजेक्शन, स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपी और सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है।

मोचदार टखने[संपादित करें]

जब जॉइंट का समर्थन करने वाला लिगामेंट गलत तरीके से हिलने या असमान सतह पर ट्विस्ट्स और रोल्स की वजह से खिंच जाता है तब टखने में मोच आ जाती है। आमतौर पर टखने के तनाव राइस (RICE) प्रक्रिया के साथ ठीक होते हैं – आराम, बर्फ, संपीड़न और एलिवेशन। लेकिन, चोट के अधिक गंभीर रूप को उपचार प्रक्रिया में मदद करने के लिए कुछ हफ्तों तक ब्रेस या कास्ट की आवश्यकता होती है।

टेनिस एल्बो[संपादित करें]

टेनिस एल्बो भी एक अति प्रयोग की चोट है जो कोहनी के बाहर स्थित टेंडन को प्रभावित करती है। रैकेट के खिलाड़ी और क्रिकेटर इस प्रकार की चोट से अधिक पीड़ित हैं। आराम और एंटी इंफ्लेमेटरी दवा आमतौर पर उपचार प्रक्रिया में मदद करती है, लेकिन, कुछ गंभीर मामलों में सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है।

अकिलिस टेन्डोनिटिस[संपादित करें]

अकिलिस टेन्डोनिटिस, एड़ी के ठीक ऊपर पैर के निचले हिस्से की सूजन है। शारीरिक गतिविधि दर्द को बदतर कर देती है और आमतौर पर कुछ आराम, बर्फ, व्यायाम और एंटी इंफ्लेमेटरी दवा के साथ इलाज किया जाता है, इसके बाद खेल भौतिक चिकित्सा का उपयोग किया जाता है।

उपर्युक्त खेल चोटों के अलावा अन्य चोटें ये हैं- कन्कशन, लोअर बैक इंजरी, रनर नी और हिप बर्साइटिस।

खेल-चोटों से बचाव[संपादित करें]

खिलाड़ियों का जीवन बहुमूल्य होता है। खिलाड़ी को कई बार इस प्रकार की चोट लग जाती है कि वह दोबारा कभी नहीं खेल सकता। उसका खेल-जीवन समाप्त हो जाता है। हालांकि बहुत-सी खेल-चोटों का उपचार हो सकता है, लेकिन फिर भी यह एक कटु सत्य है कि “इलाज से परहेज बेहतर है”, इसीलिए खिलाड़ी, खेल-चोटों के खतरों को कम या समाप्त करना चाहते हैं।

नीचे खेल चोटों से बचने के कुछ प्रमुख उपाय दिए गए हैं-

  • उचित वार्मिग : किसी भी खेल प्रतियोगिता या खेल प्रशिक्षण आरंभ करने से पहले उचित ढंग से वार्मिग अप करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि उचित वार्मिग करने के बाद हमारे शरीर की मांसपेशियां अर्धतनाव की स्थिति में आ जाती है जो शरीर को शारीरिक क्रिया करने के लिए तैयार कर लेती है।
  • उचित अनुकूलन (Proper condition): बहुत-सी चोटें शरीर की कमजोर मांसपेशियों के कारण लग जाती है, जो आपके खेल में माँग की पूर्ति के लिए तैयार नहीं होती, इसलिए उचित मांसपेशियाँ शक्ति के लिए शरीर का उचित अनुकूलन आवश्यक है। भार व परिधि प्रशिक्षण विधियां उचित अनुकूलन की महत्त्वपूर्ण विधियां है।
  • संतुलित आहर : कमजोर अस्थियाँ खेल में चोटों का कारण बन जाती हैं। अतः संतुलित आहार कुछ सीमा तक खेल-चोटों से बचाव करने में सहायक होता है।
  • खेल कौशल का उचित ज्ञान : खेल चोटों से बचाव के लिए खेल कौशलों का उचित ज्ञान या जानकारी लाभदायक होती है। खिलाड़ी को सम्बंधित खेल कौशलों को करने में कुशल होना चाहिए। उदाहरण के लिए, ऊँची कूद लगाने वाले एथलीट को 'अवतरण' के कौशल की पूरी जानकारी होनी चाहिए। यदि वह इस कौशल में प्रवीण नहीं है तो अवतरण करते हुए उसे चोट लग सकती है।
  • सुरक्षात्मक उपकरणों का प्रयोग : खेल चोटों से बचाव करने का यह एक आसान तथा सबसे अच्छा तरीका है। केवल इसी कारण खेल-कूद के क्षेत्र में सुरक्षात्मक उपकरणों का प्रयोग आवश्यक है। ये सुरक्षात्मक उपकरण चोटों के लगने से खिलाड़ियों को सुरक्षा प्रदान करते है। इनकी भूमिका को और अच्छा बनाने हेतु सुरक्षात्मक उपकरणों की गुणवत्ता पर विशेष बल दिया जाना चाहिए।
  • उचित खेल सुविधाएँ : खेल सुविधाओं तथा खेल चोटों के मध्य एक प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। वास्तव में यदि अच्छी गुणवत्ता वाले खेल उपकरण हो तथा अभ्यास व प्रतियोगिता के लिए उचित खेल मैदान उपलब्ध हों खेल चोटों से बचाव किया जा सकता है।
  • पक्षपात-रहित खेल संचालन : यदि खेल संचालन पक्षपातरहित हो तो चोट लगने के खतरे बहुत विरल हो जाते है। यदि मैच के संचालन अधिकारी या रेफरी आदि पक्षपात करने वाले हों तो खिलाड़ियों में अनुशासन नहीं रहेगा, जिसके परिणाम स्वरूप चोट लगने के खतरे अधिक हो सकते हैं।
  • अतिभार या अति-प्रशिक्षण न करना (No Over-Training) : प्रशिक्षण में भार की मात्र खिलाड़ी की क्षमता तथा योग्यता के अनुसार होनी चाहिए। भार की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ानी चाहिए जिससे चोटों को खतरा कम होता है। प्रारंभ में ही अतिभार या अति प्रशिक्षण करने से खेल चोंटें लग सकती है। यदि लम्बी अवधि तक आपने प्रशिक्षण न किया हुआ हो तो जटिल शारीरिक क्रियाएँ लाभ की अपेक्षा अधिक हानिकारक सिद्ध हो सकती है। इसलिए हमेशा प्रशिक्षण भार (Training Load) को बुद्धिमता पूर्वक धीरे-धीरे बढ़ाना चहिए।
  • उचित तकनीक का प्रयोग : अपने खेल की उचित तकनीक के प्रयोग करने से खेल चोटों जैसे टेंडनाइटिस (Tendonitis) व दबाव अस्थिभंग (Stress Fracture) आदि के खतरों को कम किया जा सकता है। उचित तकनीक से खिलाड़ियों में लगने वाली चोटों का अनुपात कम कर सकते है।
  • खेल नियमों का पालन करना : खेल अभ्यास या प्रतियोगिता के दौरान यदि खिलाड़ी खेल के नियमों का उचित ढंग से पालन करता है तो कुछ हद तक खेल चोटों से बचाव किया जा सकता है।
  • उचित कूलिंग डाउन (Proper cooling Down): नियमित खेल अभ्यास या प्रतियोगिता के बाद कूलिग डाउन भी उतनी ही जरूरी क्रिया है, जितनी कि प्रतियोगिता से पूर्व वार्मिग-अप करना। कूलिग डाउन भी उचित ढंग से करना चाहिए। उचित कूलिग डाउन शरीर मांसपेशियों में व्यर्थ के पदार्थों जैसे लैक्टिक एसिड, फॉस्फेट आदि के निष्कासन में सहायता करता है। जिससे मांसपेशियों का कड़ापन व दर्द भी कम हो जाता है।
  • थकावट होने पर प्रशिक्षण से दूर रहना।
  • भारी प्रशिक्षण के काल के दौरान कार्बोहाइड्रेट्स के उपयोग को बढ़ाना।
  • प्रशिक्षण भार (load) को बढ़ाने से पूर्व शक्ति को बढ़ाना।
  • हल्की चोटे का अनुभव होने पर प्रशिक्षण बन्द करना तथा चोटों का उपचार करना।
  • प्रशिक्षण, प्रतियोगिता के लिए उपयुक्त जलवायु, सतह का प्रयोग करना।
  • कठिन प्रशिक्षण या प्रतियोगिता के समय संक्रमित क्षेत्रों से दूर रहें।
  • गर्म मौसम में स्वच्छता के बारे में अत्यक सतक रहना।
  • भिन्न-भिन्न सतहों पर प्रशिक्षण करे तथा सतहों व जलवायु के अनुसार उचित कपडे, जूते, उपकरणों आदि का उपयोग करे।