ख़्वाजा हुसैन अजमेरी

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मक़बरा ख़्वाजा हुसैन अजमेरी औलाद (वंशज) ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह, अजमेर शरीफ शाहजहानी मस्जिद के पीछे
मज़ार मुबारक़ ख़्वाजा हुसैन अजमेरी औलाद (वंशज) ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह

ख़्वाजा हुसैन अजमेरी ख्वाजा हुसैन चिश्ती अजमेरी English:Khwaja Husain Chishty Ajmeri اُردُو :- خواجه حسین आपको शैख़ हुसैन अजमेरी और मौलाना हुसैन अजमेरी, ख्वाजा हुसैन चिश्ती के नाम से भी जाना जाता है, ख्वाजा हुसैन अजमेरी ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती के वंशज (पोते) हैं, बादशाह अकबर के अजमेर आने से पहले से ख़्वाजा हुसैन अजमेरी अजमेर दरगाह के सज्जादानशीन व मुतवल्ली प्राचीन पारिवारिक रस्मों के अनुसार चले आ रहे थे, बादशाह अकबर द्वारा आपको बहुत परेशान किया गया और कई वर्षों तक कैद में भी रखा। दरगाह ख़्वाजा साहब अजमेर में प्रतिदिन जो रौशनी की दुआ पढ़ी जाती है वह दुआ ख़्वाजा हुसैन अजमेरी द्वारा लिखी गई थी। [1][2] [3]

ख़्वाजा हुसैन अजमेरी का वंश[संपादित करें]

ख़्वाजा हुसैन अजमेरी ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह की औलाद (पोते) हैं। आपके वालिद के विसाल के बाद अजमेर शरीफ़ के लोगों ने यह तय किया कि उनके तीनो भाइयों को रोज़ा-ए-ख़्वाजा पे ले चलते हैं, जिसके हाथ लगाने से दरवाजा रोज़ा शरीफ़ खुद ब खुद खुल जाएगा उसी को दरगाह शरीफ़ का सज्जादानशीन घोषित कर दिया जाएगा। लिहाज़ा आपके दो भाइयों के हाथ से रोज़ा शरीफ़ का दरवाजा नहीं खुला। आपके हाथ लगाते ही रोज़ा शरीफ़ का दरवाज़ा खुल गया , चुनांचे आपकी मसनदे सज्जादगी पर बैठा दिया गया।

ख़्वाजा हुसैन अजमेरी का सर चाहिए[संपादित करें]

अबुल फ़ज़ल और फ़ैज़ी जो नागौर शरीफ़ से ताल्लुक़ रखते थे, बहुत तेज़ व तर्रार थे , अकबर के ख़ास लोगों में शुमार था। अकबर बादशाह से क़ुरबत हासिल करने के लिए दिन दरोग़ गोई से काम लिया। हज़रत ख़्वाजा हुसैन अजमेरी को अबुल फ़ज़ल ने अपना खालाज़ाद भाई बताया। अकबर को ख़्वाजा बुज़ुर्ग से काफी अक़ीदत थी। अकबर बहुत ज़हीन और चालाक था। एक दिन अजमेर पहुंचकर अकबर ने ख़्वाजा हुसैन अजमेरी से मालूम कर लिया की क्या अबुल फ़ज़ल आपके ख़ालाज़ाद भाई हैं। ख़्वाजा हुसैन ने फ़रमाया तमाम मुसलमान भाई हैं। अकबर ने दूसरी बार सवाल दोहराया। आपने फिर फ़रमाया तमाम मुसलमान भाई हैं। अकबर ख़ामोश हो गया। यह सवाल सुनकर अबुल फ़ज़ल की दरोग़ गोई सामने आ गई। उसी दिन से अबुल फ़ज़ल के दिल में आपके लिए दुश्मनी पैदा हो गई। एक दिन मौका पाकर अकबर को ख़्वाजा हुसैन अजमेरी के ख़िलाफ़ करना चाहा। अकबर से कहा हुज़ूर ख़्वाजा हुसैन अजमेरी का इरादा है कि राजाओं का लश्कर जमा करके आप पर चढ़ाई करें और खुद देहली के बादशाह बन जाएं। अकबर ने ये बात सुनकर अबुल फ़ज़ल से कहा के से यकीन हुआ ? इस पर अबुल फ़ज़ल ने कहा तमाम राजा उन्हें सलाम करने हाज़िर होते हैं, अगर आपको सच्चाई मालूम करनी है तो बतौर इम्तेहान आप किसी एक रजा से यह कहिये कि मुझे ख़्वाजा हुसैन अजमेरी का सर चाहिए, सर उतार कर लाया जाए। चुनांचे अकबर ने राजा बीकानेर, राजा जयपुर, रजा जोधपुर, को अपने दरबार में तलब किया और हुक्म दिया कि मुझे ख़्वाजा हुसैन अजमेरी का सर चाहिए। तीनों राजा दस्त बस्ता अर्ज़ करने लगे, हुज़ूर हुक्म हो तो हम अपने मा बाप का सर काटकर ला सकतें हैं, मगर एक दरवेश सिफ़त भगत इंसान जो तमाम हिन्दू मुसलामानों कि बेलौस ख़िदमत कर रहे हैं ख़्वाजा हुसैन अजमेरी का सर काट कर लाना हमारे लिए नामुमकिन है। और जो कुछ हुक्म कीजिये हम तामीले हुक्म के लिए हाजिर हैं। जब रजागान दरबार से रुख़्सत हो चुके तो अबुल फ़ज़ल ने कहा देखा हुज़ूर मेने आपसे सच ही तो कहा था, अब आपको पूरा पूरा यकीन हो गया होगा। जलालुद्दीन अकबर ने फ़ौरन हुक्म दिया कि ख़्वाजा हुसैन अजमेरी से कह दो कि वो अजमेर से फ़ौरन निकल जाएं, मक्का मोअज़्ज़मा या मदीना शरीफ़ चले जाएं। चूंकि ख़्वाजा हुसैन अजमेरी साहब बे ताल्लुक़ मुज़र्रद आदमी थे, चंद ख़ादिमों को लेकर मक्का शरीफ़ को रवाना हो गए।

अकबर बादशाह का पश्चाताप[संपादित करें]

काफी दिन वहाँ कयाम रहा। एक दिन किसी ख़ादिम ने अर्ज़ की हुज़ूर बादशाह ने आपको बिलाकु़सूर सताया है, कुछ तो सज़ा दीजिए। ख़ादिम के बार बार इसरार पर एक दिन जलाल में आकार फ़रमाया इंशा अल्लाह वो खु़द माफ़ीनामा के साथ हमें अजमेर बुलाएगा। लिहाज़ा आपके इस इरशाद के दूसरे ही दिन उसके पेट में सख़्त दर्द हुआ, तमाम तबीब आज़िज़ आ गए, दिन भर तड़पता रहा। किसी भी दवा से इफ़ाक़ा न हुआ। रात को जब गु़नूदगी तरी हुई तो हज़रत ख़्वाजा साहब ने बशारत दी और ख़्वाब में फ़रमाया, अकबर तुने हमारे फरज़न्द ख़्वाजा हुसैन पर नाहक़ ज़ुल्म किया है वो बेक़सूर था, उसको जल्द वापस बुला वर्ना तेरी मौत में कुछ कमी नहीं। यह सुन कर अकबर लरज़ गया और माफ़ी माँगी। उसी वक़्त उठकर फरमान लिखया, तब जाकर अकबर को दर्द से छुटकारा हासिल हुआ। ख़्वाजा हुसैन अजमेरी मक्का मोअज़्ज़मा से वापस अजमेर शरीफ़ आकार मसनदे सज्जादगी पर रौनक़ अफ़रोज़ हुए। आपका मक़बरा बड़े गुम्बद में सौलह खम्बा, शाहजहाँनी मस्जिद, दरगाह ख़्वाजा साहब के पीछे है। औलाद-ए-ख़्वाजा साहब के मख़सूस क़ब्रिस्तान में यह मक़बरा है।

आपका विसाल (मृत्यु)[संपादित करें]

आपका विसाल 1029 हिजरी में हुआ। यही तारीख़ मालूम हो सकी। गुम्बद की तामीर बादशाह शाहजहाँ के दौर में 1047 में हुई।

अकबरी मस्जिद दरगाह अजमेर[संपादित करें]

अकबरी मस्जिद इस मस्जिद को अकबर बादशाह ने सज्जादानशीन सैयद ख़्वाजा हुसैन अजमेरी की हवेली को मस्मार करके 977 हिजरी में तामीर कराया।

रौशनी[संपादित करें]

यह दुआ दरगाह ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह में प्रतिदिन संध्या के समय ब-दस्तूर पढ़ी जाती है, जिसमे बढ़ी संख्या में जायरीन , अकीदतमंद मौजूद रहते हैं।

रौशनी की इस दुआ का इतिहास 400 वर्ष से भी ज्यादा पुराना है , इस दुआ की रचना ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह के वंशज ( पोते ) व सज्जादानशीन ख़्वाजा हुसैन अजमेरी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़ारसी भाषा में की थी, यह दुआ ख़्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह के गुम्बद मुबारक़ की भीतरी दीवारों पर सुनहरे अक्षरों से लिखी हुई है।

ख़्वाजा-ए-ख्वाज़ग़ान मोईनुद्दीन ~ अशरफ़-ए-औलिया-ए-रू-ए-ज़मीं

आफ़ताब-ए-सिपहर कोनो मकां ~ बादशाह-ए-सरीर-मुल्क-ए-यकीं

दर जमाल-ओ-कमाल-ऊँचे सुख़न ~ ईं मूबैन बूवद बाहसन-ए-हसीं

मतलहे दर सिफ़ात-ए-ऊ-गुफ़तम ~ दर इबारत बूवद चू दर-ए-समीं

ए-दिरत किबलागाह-ए-अहल-ए-यकीं ~ बर दरत मेहर-ओ-माह सौदा ज़बीं

रु-ए-बर-दर गाहत हमीं सायंद ~ सद हज़ारां मलिक चू ख़ुसरो जबीं

खादिमां दिरत हमां रिज़वा ~ दर सफा रोज़ा-अत-चू खुल्द-ए-बरीं

ज़र्रा-ए-ख़ाक-ए-ऊ अबीर-ओ-सरीश्त ~ कतरा-ए-आब-ए-ओ चू मा-ए-मोइन

जा नशीन-ए-मोईन ख़्वाजा हुसैन ~ बेहर-ए-नक्काशियश बगुफ्त चूनी

के शवद रंग ताज़ा कोहना जे नऊ ~ कब्बा-ए-ख़्वाजा-ए-मोईनुद्दीन

ईलाही ताबूद खुरशीद-ओ-माहि ~ चिराग-ए-चिश्तीयां रा रोशना-ई[4]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. The Shrine And Cult Of Mu'in al- din Chishti of Ajmer.(P. M. Currie.) Oxford University Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0195683293
  2. Syed Hussain Ali S/O Syed Siddiq vs The Durgah Committee, Ajmer And on 28 January, 1959 AIR 1959 Raj 177
  3. The Holy Biography of Hazrat Khwaja Muinuddin Hasan Chishti (W. D. Begg, 1960)
  4. Ajmer through inscriptions 1532-1852. 1968. पृ॰ 30. |first1= missing |last1= in Authors list (मदद)