कृत्रिम रबर

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रसायनशालाओं में अनुसंधान के फलस्वरूप आज कृत्रिम रबर (Synthetic rubber) भी बनने लगा है। कुछ गुणों में कृत्रिम रबर प्राकृतिक रबर से उत्कृष्ट होता है। यदि कृत्रिम रबर का उत्पादन मूल्य अधिक न होता तो इसमें कोई संदेह नहीं कि प्राकृतिक रबर का आज नामोनिशान न रहता। अनेक देश आज कृत्रिम रबर तैयार कर रहे हैं। भारत में भी कृत्रिम रबर तैयार करने के कारखाने इसलिए खोल रखे हैं कि युद्धकाल में यदि उन्हें प्राकृतिक रबर न मिलेगा, तो कृत्रिम रबर ही तैयार कर अपना काम चलाएँगे। कुछ विशेष कामों के लिए तो कृत्रिम रबर प्राकृतिक रबर से अधिक उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

कृत्रिम रबर का निर्माण अपेक्षया आधुनिक है। प्रथम विश्वयुद्ध के समय ही जर्मनी में पहले पहल इसका निर्माण बड़े पैमाने पर शुरू हुआ था। कृत्रिम रबर एलास्टमोर (Elastmore), इलास्टिन (Elastin), इथेनॉयड (Ethanoid), थायोप्लास्ट (Thioplast), इलास्टोप्लास्ट (Elastoplast) इत्यादि नामों से जाने जाते हैं। इनके निर्माण में अनेक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन आइसोप्रीन, व्यूटाडीन, क्लोरोप्रीन, पिपरिलीन, साइक्लोपेंटाडीन, स्टाइरिन, तथा अन्य असंतृप्त हाइड्रोकार्बन आइसोप्रीन, व्यूटाडीन, क्लोरोप्रीन, पिपरिलीन, साइक्लोपेंटाडीन, स्टाइरिन, तथा अन्य असंतृप्त यौगिक मेथाक्रिलिक अम्ल, मेथाइल मेथाक्रिलेट विशेष उल्लेखनीय हैं। ये रसायनक अनेक स्रोतों से प्राप्त हुए हैं। कुछ रसायनक पेट्रोलियम से भी प्राप्त हुए हैं। रबर बनाने में इनका बहुलकीकरण होता है। बहुलकीकरण की अनेक रीतियाँ मालूम हैं और उनका उपयोग हो रहा है। कृत्रिम रबर का भी प्राकृतिक रबर सा ही वल्क्नीकरण होता है। व्यूटाडीन से प्राप्त कृत्रिम रबर व्यूना-एस, परव्यूनान और परव्यूनानएक्स्ट्रा कहे जाते हैं। व्यूना-एस का बना टायर पर्याप्त टिकाऊ होता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]