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काफ़िरिस्तान

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काफिरिस्तान

क़ाफ़िरिस्तान आज के पाक-अफ़ग़ान क्षेत्र में स्थित एक क्षेत्र है जिसे १८९६ में अफ़गानिस्तान के शासक अब्दिर-रहमान ख़ान ने इस्लाम में परिवर्तित कर दिया था। इसका नाम बदलकर नूरिस्तान कर दिया गया था।

काफ़िरिस्तान अफगानिस्तान का एक प्रांत है जिसके उत्तर में बदख़्शाँ का प्रदेश, उत्तर-पूर्व में चित्राल तथा दक्षिण-पूर्व में कुनार की घाटी है। सन्‌ 1885-86 से पहले इस पर्वतीय प्रदेश के बारे में बहुत कम ज्ञान था। काफ़िर लोगों का यह देश 1859 ई. तक पूर्ण रूप से स्वतंत्र रहा। इसके पश्चात्‌ काबुल के अमीर अब्दुर्रहमान ने इस भाग को अपने अधिकार में कर लिया तथा यहाँ के निवासियों को इस्लाम धर्म का समर्थक बना लिया।

देश में विभिन्न सँकरी घाटियाँ हैं जो ऊँची परिवर्तित चट्टानों से बनी हुई पर्वतश्रेणियों द्वारा अलग-अलग कर दी गई है। पूरा प्रदेश बहुत ही ऊँचा नीचा है। मैदान या समतल क्षेत्र नाममात्र के लिए भी नहीं हैं। सारा पर्वतीय क्षेत्र जंगलों से ढका हुआ है। ढालों पर चरागाह हैं। यहाँ पर फल तथा तरकारियाँ पैदा की जाती हैं। नदियों में पर्याप्त मछलियाँ पाई जाती हैं। घाटियों में फल, फूल तथा अन्न पैदा किए जाते हैं।

सन्दर्भ

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इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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काफिरिस्तान का नाम सुने हैं ?? पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर एक छोटा सा इलाका है यह। बड़ा ही महत्वपूर्ण क्षेत्र ! जानते हैं क्यों ?? क्योंकि आज से सवा सौ वर्ष पूर्व तक वहाँ विश्व की सबसे प्राचीन परंपरा को मानने वाले लोग बसते थे। रुकिए ! हिन्दू ही थे वे, पर हमसे थोड़े अलग थे। विशुद्ध वैदिक परम्पराओं को मानने वाले हिन्दू... सूर्य, इंद्र, वरुण आदि प्राकृतिक शक्तियों को पूजने वाले वैदिक हिन्दू... वैदिक काल से अबतक हमारी परम्पराओं में असँख्य परिवर्तन हुए हैं। हमने समय के अनुसार असँख्य बार स्वयं में परिवर्तन किया है, पर काफिरिस्तान के लोगों ने नहीं किया था।

बड़े शक्तिशाली लोग थे काफिरिस्तान के! इतने शक्तिशाली कि मोहम्मद बिन कासिम से लेकर अहमद शाह अब्दाली तक हजार वर्षों में हुए असँख्य अरबी आक्रमणों के बाद भी वे नहीं बदले।

वर्तमान अफगानिस्तान के अधिकांश लोग अशोक और कनिष्क के काल में हिन्दू से बौद्ध हो गए थे। आठवीं सदी में जब वहाँ अरबी आक्रमण शुरू हुआ तो ये बौद्ध स्वयं को पच्चीस वर्षों तक भी नहीं बचा पाए। वे तो गए ही, साथ ही शेष हिन्दू भी पतित हो गए। पर यदि कोई नहीं बदला, तो वे चंद सूर्यपूजक सनातनी लोग नहीं बदले। युग बदल गया, पर वे नहीं बदले। तलवारों के भय से धर्म बदलने वाले हिन्दू और बौद्ध धीरे-धीरे इन प्राचीन लोगों को काफिर, और इनके क्षेत्र को काफिरिस्तान कहने लगे। वैदिक सनातनियों का यह क्षेत्र बहुत ऊँचा पहाड़ी क्षेत्र है। ऊँचे ऊँचे पर्वतों और उनपर उगे घने जंगलों में बसी सभ्यता इतनी मजबूत थी कि वे पचास से अधिक आक्रमणों के बाद भी कभी पराजित नहीं हुए। न टूटे न बदले... काफिरिस्तान के लोग जितने शक्तिशाली थे, उतने ही सुन्दर भी थे। वहाँ की लड़कियाँ दुनिया की सबसे सुन्दर लड़कियां लगती हैं। माथे पर मोर पंख सजा कर फूल की तरह खिली हुई लड़कियां, जैसे लड़कियाँ नहीं परियाँ हों... वहाँ के चौड़ी छाती और लंबे शरीर वाले पुरुष, देवदूत की तरह लगते थे। दूध की तरह गोरा रङ्ग, बड़ी-बड़ी नीली आँखें... जैसे स्वर्ग का कोई निर्वासित देवता हो। अरबी तलवार जब आठ सौ वर्षों में भी उन्हें नहीं बदल पायी, तो उन्होंने हमले का तरीका बदल दिया। अफगानी लोग उनसे मिल-जुल कर रहने लगे। दोनों लोगों में मेल जोल हो गया। फिर ! सन अठारह सौ छानबे...

अफगानिस्तान के तात्कालिक शासक अब्दीर रहमान खान ने काफिरिस्तान पर आखिरी आक्रमण किया। इस बार प्रतिरोध उतना मजबूत नहीं था। काफिरों में असँख्य थे जिन्हें लगता था कि हमें प्रेम से रहना चाहिए, युद्ध नहीं करना चाहिए। फल यह हुआ कि हजार वर्षों तक अपराजेय रहने वाले काफिरिस्तान के सनातनी एक झटके में समाप्त हो गए। पूर्णतः समाप्त हो गए... पराजित हुए। फिर हमेशा की तरह हत्या और बलात्कार का ताण्डव शुरू हुआ। आधे लोग मार डाले गए, जो बचे उनका धर्म बदल दिया गया। कोई नहीं बचा! कोई भी नहीं... काफिरिस्तान का नाम बदल कर नूरिस्तान कर दिया गया। आज काफिरिस्तान का नाम लेने वाला कोई नहीं।

चैतन्य योगी की पोस्ट ...