कवाध प्रथम
| कवाद प्रथम | |
|---|---|
| ईरानियों और अनीरानियों के शहंशाह | |
| सासानी साम्राज्य के शहंशाह | |
| पहला शासनकाल | 488–496 |
| पूर्ववर्ती | बलाश |
| उत्तरवर्ती | जामास्प |
| दूसरा शासनकाल | 498/9–531 |
| पूर्ववर्ती | जामास्प |
| उत्तरवर्ती | ख़ुसरो प्रथम |
| जन्म | 473 |
| निधन | 13 सितम्बर 531 (उम्र Error: Need valid year, month, day वर्ष) |
| जीवनसंगी |
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| संतान | |
| घराना | सासानी राजवंश |
| पिता | पीरोज़ प्रथम |
| धर्म | पारसी धर्म |
कवाद प्रथम (मध्य फ़ारसी: 𐭪𐭥𐭠𐭲; 473 – 13 सितंबर 531) 488 to 531 तक ईरान के सासानी शहंशाह थे। वह पीरोज़ प्रथम के पुत्र थे और उन्होंने अपने चाचा बलाश की जगह ली।
कवाद प्रथम अपने चाचा बलास की जगह गद्दी पर बैठा। कवाद के दीर्घ राज्यकाल का पहला वीरकार्य उन बर्बर खज्रों के विरुद्ध सफल अभियान था जो तुर्की जाति के थे और कोहकाफ लाँघकर कूर की घाटी में प्राय: धावे किया करते थे।
मजदक द्वारा स्थापित सामूहिक सत्तावादी सप्रदाय की सहायता करने के कारण कवाद को प्राय: अपना सिंहासन ही छोड़ना पड़ा। उसे गद्दी से उतार दिया गया और सूसियाना के प्रसिद्ध गढ़ में (जिसे साधारणत: 'विस्मृति का गढ़' कहते हैं) कैद कर दिया गया (४९८-५०१ई.)। उसका उत्तराधिकार उसके भाई ज़मास्प को मिला। कवाद अपनी पत्नी की मदद से कैद से निकल भागा। उसने अपनी गद्दी पर भी फिर से अधिकार कर लिया। इस बार उसने मजदकों के संबंध में बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार किया, उनसे अपनी संरक्षा हटा ली और उनमें से बहुतों को बाद में मरवा तक डाला।
रोम के साथ ससानियों का जो मित्रता संबंध अब तक चला आ रहा था, उसे कवाद ने तोड़ दिया। दोनों ओर से एक दूसरे पर लगातार धावे होते रहे और इन धावों ने दोनों पक्षों को कमजोर कर भावी अरब विजयों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। श्वेत हूणों के साथ कवाद का संघर्ष प्राय: १० वर्ष (५०३-५१३ ई.) चलता रहा और उसने उनकी शक्ति प्राय: नष्ट कर दी। कवाद दूरदर्शी और शक्तिमान शासक था। तबरी का कहना है कि कवाद ने जितने नगर बसाए उतने किसी अन्य राजा ने नहीं बसाए। उसकी मृत्यु के समय ईरान की शक्ति और मान चोटी पर थे।
सन्दर्भ ग्रन्थ
[संपादित करें]- पर्सी साइक्स : ए हिस्ट्री ऑव पर्शिया (दो भाग, लंदन, १९५८)।