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कपालविद्या

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१८८३ में निर्मित कपालविद्या का एक चार्ट

कपालविद्या (Phrenology) एक छद्म आयुर्विज्ञान (pseudomedicine) है जो मुख्यतः कपाल के मापन से सम्बन्धित है। जिसमें यह दावा किया जाता था कि किसी व्यक्ति की खोपड़ी की आकृति, उभारों और गड्ढों का अध्ययन करके उसके व्यक्तित्व, मानसिक क्षमताओं, नैतिक गुणों तथा व्यवहारगत प्रवृत्तियों का अनुमान लगाया जा सकता है।[1][2] यह विचार इस धारणा पर आधारित था कि मस्तिष्क ही मन का केंद्र है और उसके विभिन्न भाग विशिष्ट मानसिक कार्यों के लिए उत्तरदायी होते हैं।[3] कपालविद्या के समर्थकों का मानना था कि मस्तिष्क अनेक स्वतंत्र "मानसिक अंगों" या "क्षमताओं" से मिलकर बना है और जिन भागों का अधिक उपयोग होता है, वे अधिक विकसित होकर खोपड़ी की बाहरी सतह पर उभार उत्पन्न करते हैं, जबकि कम सक्रिय भाग अपेक्षाकृत छोटे बने रहते हैं।[1][4]

यद्यपि यह विचार कि मस्तिष्क मानसिक क्रियाओं का प्रमुख अंग है तथा उसके विभिन्न क्षेत्रों के अलग-अलग कार्य हो सकते हैं, आधुनिक तंत्रिका विज्ञान के अनुरूप है, किंतु कपालविद्या ने इन अवधारणाओं का अत्यधिक सामान्यीकरण करते हुए ऐसे निष्कर्ष प्रस्तुत किए जिनका कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक आधार नहीं था। विशेष रूप से, खोपड़ी की बाहरी आकृति के आधार पर व्यक्तित्व, बुद्धिमत्ता या नैतिक गुणों का निर्धारण किया जा सकता है, इस मूल धारणा को वैज्ञानिक अनुसंधानों ने असत्य सिद्ध कर दिया है।[5] आधुनिक शरीररचना विज्ञान, तंत्रिका विज्ञान और मनोविज्ञान के अनुसार खोपड़ी की आकृति और व्यक्ति के मानसिक गुणों के बीच ऐसा कोई प्रत्यक्ष और विश्वसनीय संबंध स्थापित नहीं किया जा सका है।

कपालविद्या का विकास वर्ष 1796 में जर्मन चिकित्सक फ्रांज जोज़ेफ़ गाल ने किया था।[6] उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों, विशेषकर 1810 से 1840 के बीच, यह विचार यूरोप और उत्तरी अमेरिका के अनेक भागों में अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। उस समय इसे मानव स्वभाव और व्यवहार को समझने की एक नवीन पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया गया, यद्यपि बाद में वैज्ञानिक परीक्षणों ने इसके दावों का समर्थन नहीं किया।

ब्रिटेन में कपालविद्या का प्रमुख केंद्र एडिनबर्ग था, जहाँ वर्ष 1820 में एडिनबर्ग कपालविद्या सोसायटी की स्थापना की गई। इस संस्था ने कपालविद्या के सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार और अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय के साथ, वैज्ञानिक प्रमाणों के अभाव और आधुनिक तंत्रिका विज्ञान की प्रगति के कारण कपालविद्या को छद्मविज्ञान के रूप में वर्गीकृत कर दिया गया और आज इसे वैज्ञानिक दृष्टि से मान्य अनुशासन नहीं माना जाता।

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. 1 2 विहे, जे.वी.. (2002). “Science and Pseudoscience: A Primer in Critical Thinking”. Encyclopedia of Pseudoscience: 195–203. कैलिफोर्निया: संशयवादी समाज.
  2. हाइन्स, टी. (2002). Pseudoscience and the Paranormal. न्यूयॉर्क: प्रोमेथियस बुक्स. p. 200.
  3. फोडोर, जेरी ए. (1983). Modularity of Mind: An Essay on Faculty Psychology. कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स: एमआईटी प्रेस. pp. 14, 23, 131. ISBN 0-262-56025-9.
  4. बुंगे, एम. (2018). From a Scientific Point of View: Reasoning and Evidence Beat Improvisation across Fields. कैम्ब्रिज: कैम्ब्रिज स्कॉलर पब्लिशिंग. p. 74.
  5. पार्कर जोन्स, ओ.; अल्फारो-अल्माग्रो, एफ.; जब्ब्दी, एस. (2018). "An empirical, 21st century evaluation of phrenology". कॉर्टेक्स. 106: 26–35. डीओआई:10.1016/j.cortex.2018.04.011. पीएमसी 6143440. पीएमआईडी 29864593.
  6. ग्राहम, पैट्रिक (2001) Phrenology [videorecording (DVD)]: revealing the mysteries of the mind. रिचमंड हिल, ओंटारियो: अमेरिकन होम ट्रेजर्स. ISBN 0-7792-5135-0