आर एल चन्दापुरी

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त्यागमूर्ति राम लखन सिंह चन्दापुरी जो कि आर एल चन्दापुरी के नाम से जाने जाते हैं का जन्म 20 नवंबर 1923 को पटना जिले के बसुहार गांव में अपने ननिहाल में हुआ था और पालन पोषण पैतृक गांव चन्दापुर मगध के बोधगया में हुआ था इनके पिता महावीर सिंह "खलीफा" कुर्मी किसान परिवार से थे इनकी मां हीरामणि कुंअर एक धार्मिक महिला थी इनके पूर्वज शिवाजी महाराज के उन सेनानियों में थे जो उनके रक्षार्थ आगरा के किले से छिपकर भागते हुए बिहार की भूमि मगध पहुंच गए थे जिनका नाम बालाजी राव था बालाजी राव की सातवीं पीढ़ी के थे आर एल चन्दापुरी सन 1951 में आर एल चन्दापुरी का विवाह महाराष्ट्र के बुलढाणा जिला के सिविल सर्जन डॉक्टर बी पी सिंह की बेटी सरस्वती सिंह के साथ हुआ था सरस्वती सिंह ने नागपुर विश्वविद्यालय के नागपुर कॉलेज फॉर विमेंस से बी ए, बी टी की डिग्री सन 1950 में प्राप्त की थी बाद में पटना विश्वविद्यालय से एम ए किया था। बचपन से ही आर एल चन्दापुरी जी में विलक्षण प्रतिभा थी सन 1938 में जब यह मसौढ़ी हाई स्कूल की नवीं कक्षा के अव्वल छात्र थे वह स्कूल की पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम के समय छात्र आंदोलन में शामिल हो गए थे चंदा पुरी जी सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय सर्वप्रथम चहारदीवारी लांघकर पटना सचिवालय में घुस गए थे और झंडा फहरा दिया था उसी दिन वहां पुलिस की गोलियों से 7 छात्र शहीद हुए थे तब यह पटना विश्वविद्यालय के छात्र थे सन 1946 में नोवाखाली (बंगाल) में भीषण दंगे के फल स्वरुप बिहार प्रदेश का पटना जिला उसकी भीषण लपटों में घिर गया चंदा पुरी जी एम ए की अंतिम वर्ष की पढ़ाई को छोड़कर दंगाई आग को बुझाने में लग गए और अपने इलाके को जलने से बचा लिया। सन 1947 में शांति मिशन के सिलसिले में महात्मा गांधी मसौढ़ी पधारे तो उन्होंने इनकी बहादुरी की भूर भूर प्रशंसा की और तत्काल इन्हें पुनर्वास का भार सौंपा और आशीर्वाद दिया उस समय वहां पर अब्दुल गफ्फार खान और अफ्रीकन कांग्रेस के नेता दादू भी उपस्थित थे सन 1947 में 10 सितंबर के दिन चंदा पुरी जी ने पिछड़ी जाति के कुछ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सहयोग से बिहार की राजधानी पटना में अपने सभापतित्व में बिहार प्रदेश पिछड़ा वर्ग संघ की स्थापना की और पिछड़ी जातियों का आंदोलन छेड़ दिया तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अमेरिका जाने की यात्रा स्थगित कर दी थी उन्होंने सर्वप्रथम पिछड़ा वर्ग (बैकवर्ड क्लासिस) दो शब्दों को हिंदी में परिभाषित किया था जिसे संविधान में संलग्न किया गया और फिर बाद में यह दो शब्द भारत के गांव-गांव में विख्यात हो गए। सन 1948 में चंदा पुरी जी ने संविधान निर्मात्री परिषद के अध्यक्ष डॉ बी आर अंबेडकर से दिल्ली में उनके निवास स्थान पर भेंट की फल स्वरुप संविधान में 340 वीं धारा का समावेश हुआ उसी धारा के तहत राष्ट्रपति द्वारा सन् 1953 में पिछड़ा वर्ग आयोग को काका कालेलकर आयोग के नाम से भी जाना जाता है की नियुक्ति हुई सन 1949 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद से भेंट की और उसी वर्ष से पिछड़ी जाति के छात्रों की छात्रवृत्ति के लिए सरकारी रकम करवा दी। सन 1950 में दिल्ली स्थित दीवान हाल में देश के प्रमुख नेताओं और प्रतिनिधियों के सम्मेलन में महाराष्ट्र के प्रतिष्ठित नेता पंजाब राव देशमुख "अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग" के सभापति चुने गए इस प्रकार बिहार राज्य पिछड़ा वर्ग संगठन और आंदोलन को त्यागमूर्ति आर एल चन्दापुरी जी ने पूरे देश में इस तरह खड़ा कर दिया और देश के विभिन्न राज्यों में तेजी के साथ संगठन बढ़ने लगे। सन 1955 में जब पिछड़ा वर्ग आयोग ने पिछड़ी जातियों के उन्नयन संबंधी सिफारिशें सरकार को सुपुर्द की तो उसी वर्ष 24 अक्टूबर को त्यागमूर्ति आर एल चन्दापुरी प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिले करीब 50 मिनट के वार्तालाप के फल स्वरुप पंडित नेहरू ने आर एल चन्दापुरी जी को आयोग की सिफारिशों को शीघ्र ही सरकार द्वारा लागू करने का आश्वासन दिया लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया और पिछड़े वर्ग को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने से वंचित कर दिया इस पर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और आर एल चन्दापुरी जी के बीच विभेद पैदा हो गया, विस्तार में "नेहरू बनाम चन्दापुरी" पुस्तक में उपलब्ध है।

सन 1956 में प्रधानमंत्री के घोर विरोधी डॉ राम मनोहर लोहिया आर एल चन्दापुरी जी से मिलने पटना आए और 3 दिनों तक इनके पटना निवास स्थान पर ठहर कर गंभीर वार्ता की दोनों नेताओं की वार्ता के फल स्वरुप देश की राजनीति में एक नया मोड़ लिया और डॉक्टर लोहिया भी पिछड़े वर्गों के आरक्षण के घोर समर्थक बन गए, और डॉक्टर लोहिया आर एल चन्दापुरी जी को गुरु जी कहकर संबोधित करने लगे।
1967 तक बिहार राज्य में उच्च वर्ग का ही व्यक्ति मुख्यमंत्री हुआ करता था उच्च वर्गों के लोगों का कहना था कि उनके अलावा पिछड़े वर्गों में से कोई भी व्यक्ति मुख्यमंत्री नहीं बन सकता ऐसी ही स्थिति दक्षिण भारत के कुछ राज्यों को छोड़कर देश के अन्य राज्यों में भी थी इस चुनौती को स्वीकार करते हुए इन्होंने बिहार राज्य पिछड़ा वर्ग संघ के अध्यक्ष बी पी मंडल को बिहार का प्रथम मुख्यमंत्री बनाकर उच्च वर्गों की जाति सत्ता की परंपरा को तोड़ा उस समय वे "अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग" के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे,भी पी मंडल ही बाद में दूसरा "पिछड़ा वर्ग आयोग" के चेयरमैन बनाए गए थे।