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आनन्द मार्ग

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आनन्द मार्ग (शाब्दिक अर्थ : "आनन्द का मार्ग") भारत की एक सामाजिक एवं आध्यात्मिक पन्थ है। इसका आरम्भ सन् १९५५ में बिहार के जमालपुर में श्री प्रभात रंजन सरकार (१९२१ - १९९०) द्वारा की गयी थी। आनन्द मार्ग का पूरा नाम आनन्द मार्ग प्रचारक संघ है ।

शुरु में इस संगठन का मूल उद्देश्य यह प्रभात रंजन सरकार द्वारा प्रस्तावित दर्शन और जीवन शैली, सामाजिक-आध्यात्मिक संगठन और आंदोलन, जिसे व्यक्तिगत विकास, सामाजिक सेवा और समाज के आसपास के परिवर्तन रूप में वर्णित किया गया है। आनंदमार्गियों के अनुसार पश्चिम बंगाल में उनके आंदोलन को कुचलने के लिए वामपंथियों ने आनंदमार्गियों को कई तरह से प्रताड़ित किया ।

तंत्र और योग पर आधारित इस संगठन का उद्देश्य- आत्मोद्धार, मानवता की सेवा और जीव मात्र की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। आनंदमार्ग के दुनिया भर में चिंतन केंद्र हैं जहाँ तंत्र, योग और ध्यान सिखाया जाता है। इस एकेश्वरवादी संगठन का मूल मंत्र है 'बाबा नाम केवलम्’ है। यह आनंदमूर्ति द्वारा दिया गया एक सार्वभौमिक कीर्तन मंत्र है।

आज आनंद मार्ग 180 से भी ज्यादा देशों में अपना सेवा मूलक कार्य एवं आध्यात्मिक साधना के बल पर मान्यता प्राप्त कर चुका है।

25 जून 1975 को जब भारत में आपातकाल की घोषणा हुई, तो सिर्फ देश में उस वक्त की विपक्षी नेता ही निशाने पर नहीं थे, बल्कि कई सामाजिक और धार्मिंक संगठनों से जुड़े नेता और उनके समर्थक और प्रशंसकों पर भी गाज गिरी। यही कारण है कि हर वर्ष आनंदमार्गी 25 जून को काला दिवस के रूप में मनाते हैं।[1]

आनन्द वाणी
मनुष्य का सुदृढ़ संकल्प ही उसे महान बना देता है। सुदृढ़ संकल्प के कारण एक अति साधारण मनुष्य भी असाधारण व्यक्तित्व प्राप्त करता है। इसलिए लक्ष्य तक पहुंचने के लिए यदि तुम्हारा वज्र कठोर संकल्प हो तो तुम भी महान हो सकते हो याद रखो इस वज्र कठोर संकल्प के बिना जीवन में कुछ भी महत्त्व नहीं किया जा सकता है।

प्रभात रंजन सरकार

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प्रभात रंजन सरकार (श्री आनंदमूर्ति) का जन्म 1921 में बैसाखी पूर्णिमा के दिन बिहार के जमालपुर में एक साधारण परिवार में हुआ था। परिवार का दायित्व निभाते हुए वे सामाजिक समस्याओं के कारण का विश्लेषण, उनके निदान ढूंढ़ने तथा लोगों को योग साधना आदि की शिक्षा देने में अपना समय देने लगे। उन्होंने ऐसे समाज की स्थापना का संकल्प लिया, जिसमें हर व्यक्ति को अपना सर्वांगीण विकास करते हुए अपने मानवीय मूल्य को ऊपर उठने का सुयोग प्राप्त हो। हर एक मनुष्य देव शिशु है, इस तत्व को मन में रखकर समाज की हर कर्म पद्धति पर विचार करना उचित होगा। अपराध संहिता या दंड संहिता के विषय में उन्होंने कहा कि मनुष्य को दंड नहीं, बल्कि उनका संशोधन करना होगा।

1939 में कोलकाता के विद्यासागर कॉलेज में प्रवेश लेने के लिए सरकार ने कोलकाता के लिए जमालपुर छोड़ दिया। अपने पिता की मृत्यु के बाद अपने परिवार की देखभाल करने के लिए सरकार को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और 1944 से 1950 तक प्रभात रंजन सरकार ने जमालपुर, बिहार में भारतीय रेलवे मुख्यालय में एक एकाउंटेंट के रूप में काम किया। यहीं पर उन्होंने अपने कुछ चुनिंदा साथियों को प्राचीन तंत्र साधना की तकनीक सिखाई और धीरे-धीरे उनके द्वारा सिखाई जाने वाली आध्यात्मिक पद्धतियों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों उनसे जुड़ते चले गए।

बाहरी कड़ियाँ

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सन्दर्भ

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