आधुनिक मनोविज्ञान

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

मनोविज्ञान आधुनिक युग की नवीनतम विद्या है। वैसे तो मनोविज्ञान की शुरूआत आज से 2,000 वर्ष पूर्व यूनान में हुई। प्लेटो ओर अरस्तू के लेखों में उसे हम देखते हैं। मध्यकाल में मनोविज्ञान चिंतन की योरप में कमी हो गई थी। आधुनिक युग में इसका प्रारंभ ईसा की अठारहवी शताब्दी में हुआ। परंतु उस समय मनोविज्ञान केवल दर्शनशास्त्रों का सहयोगी था। उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था। मनोविज्ञान का स्वतंत्र अस्तित्व 19 वीं शताब्दी में हुआ, परंतु इस समय भी विद्वानों को मनुष्य के चेतन मन का ही ज्ञान था। उन्हें उसके अचेतन मन का ज्ञान नहीं था। जब अचेतन मन की खोज हुई तो पता चला कि जो ज्ञान मन के विषय में था वह उसके क्षुद्र भाग का ही था।

आधुनिक मनोविज्ञान की खोज, चिकित्सा विज्ञान के कार्यकर्ताओं की देन हैं। इन खोजों की शुरुआत डॉ॰ फ्रायड ने की। उनके शिष्य अलफ्रेड एडलर चार्ल्स युगं विलियम स्टेकिल और फ्रेंकजी ने इसे आगे बढ़ाया। डॉ॰ फ्रायड स्वयं प्रारंभ में शारीरिक रोगों के चिकित्सक थे। उनके यहाँ कुछ ऐसे रोगी आए जिनकी सब प्रकार की शारीरिक चिकित्सा होते हुए भी रोग जाता नहीं था। ऐसे कुछ जटिल रोगियों का उपचार डॉ॰ ब्रूअर ने केवल प्रतिदिन बातचीत करके तथा रोगी की व्यथा को प्रति दिन सुनकर किया। डॉ॰ ब्रूअर के इस अनुभव से यह पता चला कि मनुष्य के बहुत से शारीरिक ओर मानसिक रोग ऐसे भी होते हैं, जो किसी प्रकार की प्रबल भावनाओं के दमित होने से उत्पन्न हो जाते हैं, ओर जब इन भावनाओं का धीरे-धीरे प्रकाशन हो जाता है तो ये समाप्त भी हो जाते हैं।

डॉ॰ फ़्रायड की प्रमुख देन दमित भावनाओं की खोज की ही है। इनकी खोज करते हुए उन्हें पता चला कि मुनष्य के मन के कई भाग हैं। साधारणतया जिस भाग को वह जानता है, वह उसका चेतन मन ही है। इस मन के परे मन का वह भाग है जहाँ मनुष्य का वह ज्ञान संचित रहता है जिसे वह बड़े परिश्रम के साथ इकट्ठा करता है। इस भाग में ऐसी इच्छाएँ भी उपस्थित रहती हैं जो वर्तमान में कार्यन्वित नहीं हो रही होतीं, परंतु जिन्हें व्यक्ति ने बरबस दबा दिया है। मन का यह भाग अवचेतन मन कहा जाता है।

इसके परे मनुष्य का अचेतन मन है। मन के इस भाग में मुनष्य की ऐसी इच्छाएँ, आकांक्षाएँ, स्मृतियाँ और संवेग रहते हैं, जिन्हें उसे बरबस दबाना और भूल जाना पड़ता है। ये दमित भाव तथा इच्छाएँ व्यक्ति के अचेतन मन में संगठित हो जाती हैं और फिर वे उसके व्यक्तित्व में खिंचाव और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर देती हैं। इस प्रकार के दमित भावों, इच्छाओं ओर स्मृतियों को मानसिक ग्रंथियाँ कहा जाता हैं। मानसिक रोगी के मन में ऐसी अने प्रबल ग्रंथियाँ रहती हैं इनका रोगी को स्वयं ज्ञान नहीं रहता और उनकी स्वीकृति भी वह करना नहीं चाहता। ऐसी ही दमित ग्रंथियाँ अनेक प्रकार के मानसिक तथा शारीरिक रोगों में व्याप्त होती हैं। हिस्टीरिया का रोग उन्हीं में से एक हैं। यह रोग कभी कभी शारीरिक रोग बनकर प्रगट होता है तब इसे रूपांतररित हिस्टीरिया कहा जाता है।

मनुष्य के अचेतन मन में न केवल दमित अवांछनीय और अनैतिक भाव रहते हैं, वरन् उन्हें दमन करनेवाली नैतिक धारणाएँ भी रहती हैं। इन नैतिक धारणाओं का ज्ञान व्यक्ति के चेतन मन को न होने के कारण उनमें सरलता से परविर्तन नहीं किया जा सकता। मनुष्य के सुस्वत्व और उसके अचेतन मन में उपस्थित वासनात्मक, असामाजिक भावों और इच्छाओं का संघर्ष मुनष्य के अनजाने ही होता है। मुनष्य का सुस्वत्व उस कुत्ते के समान है जो मनुष्य के अचेतन मन में उपस्थित असामाजिक विचारों और इच्छाओं को चेतना के स्तर पर आकर प्रकाशित नहीं होने देता। फिर ये दमित भाव अपना रूप बदलकर मनुष्य की जाग्रत अवस्था में अथवा उसकी स्वप्नावस्था में, जबकि उसका सुस्वत्व कुछ ढीला हो जाता है, रूप बदलकर प्रकाशित होते हैं। यही भाव अनेक प्रकार के रूप बदलकर शारीरिक रोगों अथवा आचरण के दोषों में प्रकाशित होते हैं। डॉ॰ फ्रायड ने स्वप्न के लिए नया विज्ञान ही खड़ा कर दिया। उनके कथनानुसार स्वप्न अचेतन मन में उपस्थित दमित भावनाओं के कार्यों का परिणाम है। किसी व्यक्ति के स्वप्न को जानकर और उसका ठीक अर्थ लगाकर हम उसके दमित भावों को जान सकते हैं और उसके मानसिक विभाजन को समाप्त करने में उसकी सहायता कर सकते हैं।

आधुनिक मनोविज्ञान की खोज डॉ॰ फ़्रायड के उपर्श्युक्त खोजों के आगे भी गई हैं। उनके शिष्य डॉ॰ युंग ने बताया कि मनुष्य के सुस्वत्व की जड़ केवल उसके व्यक्तिगत अनुभव में नहीं है, वरन् यह संपूर्ण मानवसमाज के अनुभव में है। इसी कारण जब मनुष्य समाज की मान्यताओं के प्रतिकूल आचरण करता है तो उसके भीतरी मन में अकारण ही दंड का भय उत्पन्न हो जाता है। यह भय तब तक नहीं जाता जब तक मनुष्य अपनी नैतिकता संबंधी भूल स्वीकार नहीं कर लेता और उसका प्रायश्चित नहीं कर डालता। इस तरह की आत्मस्वीकृति और प्रायश्चित से मनुष्य के भोगवादी स्वत्व और सुस्वत्व अर्थात् समाजहितकारी उपस्थित स्वत्व में एकता स्थापित हो जाती है। मनुष्य को मानसिक शांति न तो भोगवादी स्वत्व की अवहेलना से मिलती है और न सुस्वत्व की अवहेलना से। दोनों के समन्वय से ही मानसिक स्वास्थ्य और प्रसन्नता का अनुभव होता है।

इंग्लैंड के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ॰ विलियम ब्राउन मन के उपर्युक्त सभी स्तरों के परे मनुष्य के व्यक्तित्व में उपस्थित एक ऐसी सत्ता को भी बताते हैं, जो देश और काल की सीमा के परे है। इसकी अनुभूति मनुष्य को मानसिक और शारीरिक शिथिलीकरण की अवस्था में होती है। उनका कथन है कि जब मनुष्य अपने सभी प्रकार के चिंतन को समाप्त कर देता है और जब वह इस प्रकार शांत अवस्था में पड़ जाता है, तब वह अपने ही भीतर उपस्थित एक ऐसी सत्ता से एकत्व स्थापित कर लेता है जो अपार शक्ति का केंद्र है और जिससे थोड़े समय के लिए भी एकत्व स्थापित करने पर अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोग शांत हो जाते हैं। इससे एकत्व स्थापित करने के बाद मनुष्य के विचार एक नया मोड़ ले लेते हैं। फिर ए विचार रोगमूलक न होकर स्वास्थ्यमूलक हो जाते हैं।

आधुनिक मनोविज्ञान अब भगवान बुद्ध और महर्षि पातंजलि की खोजों की ओर जा रहा है। मन के उपर्युक्त तीन भागों के परे एक ऐसी स्थिति भी है जिसे एक ओर शून्य रूप और दूसरी ओर अनंत ज्ञानमय कहा जा सकता है। इस अवस्था में द्रष्टा और दृश्य एक हो जाते हैं और त्रिपुटी जन्य ज्ञान की समाप्ति हो जाती है।