अभंग

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

अभंग विट्ठल या विठोबा की स्तुति में गाये गये छन्दों को कहते हैं।

महाराष्ट्र के वारकरी सम्प्रदाय के संतों ने 13वीं सदी के दौरान समाज में अलख जगाने के जो छंद क्षेत्रीय भाषा में गाये, उन्हें अभंग के नाम से जाना जाता है। यह एक प्रकार से हिंदी के छंद की तरह है। मोटे और पर छंद के उलट, अभंग में मात्राओं के स्थान पर अक्षरों की संख्या गिनी जाती है। अक्षरों की संख्या का पालन कठोरता से नहीं किया जाता बल्कि, यों कहना सही होगा कि उच्चारण की सुविधानुसार अक्षरों की संख्या कम-ज्यादा हो सकती है।

अभंग दो प्रकार के होते हैं - चार चरणों के और दो चरणों के.चार चरणों वाले अभंग की प्रथम तीन चरणों में 6-6 अक्षर होते हैं जबकि अंतिम चरण में चार अक्षर. इसके साथ ही दूसरे और तीसरे चरणों में यमक का पुट होता है। रही बात चौथा चरण की तो वह अभंग को पूर्णता प्रदान करता है-

काय करूँ आता, धरुनिया भीड़

नि:शंक हे तोंड, वाजविले।।

नव्हे जगी कोणी, मुक्तियांचा जाण

सार्थक लाजुण, नव्हे हित।।

दो चरणों वाले अभंग के प्रत्येक चरण में 8-8 अक्षर होते हैं और अंत में यमक होता है-

जे का रंजले गांजले। त्यासी म्हणे जो आपुले।।

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]