2012 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन

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2012 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन
2012 BRICS summit

शिखर सम्मेलन का आधिकारिक प्रतीक
मेजबान Flag of भारत भारत
तिथि 29 मार्च, 2012
आयोजन स्थल ताजमहल होटल
शहर नई दिल्ली

2012 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन, ब्रिक्स (पहले ब्रिक) देशों का चौथा वार्षिक शिखर सम्मेलन है, जिसमें इसके पाँच सदस्य राष्ट्रों ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्र या सरकार प्रमुखों ने भाग लिया। शिखर सम्मेलन का आयोजन भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित पाँच सितारा होटल ताज महल में 29 मार्च, 2012 को किया गया था। यह पहली अवसर है जब भारत ने किसी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की है। शिखर सम्मेलन का विषय था "वैश्विक सुरक्षा, स्थिरता और समृद्धि के लिए ब्रिक्स भागीदारी"। शिखर सम्मेलन में चर्चा का मुख्य विषय विकासशील देशों के लिए विश्व बैंक के समान एक ब्रिक्स बैंक का गठन करना था। शिखर सम्मेलन कड़ी सुरक्षा के बीच आयोजित किया गया था, लेकिन् इसके बावजूद इसे कई विवादों का सामना करना पड़ा, जिनमें सबसे प्रमुख तिब्बतियों द्वारा चीन का विरोध किया जाना था।

प्रतिभागी प्रतिनिधिमंडल[संपादित करें]

निम्न पाँच देशों के राष्ट्र प्रमुखों/सरकार प्रमुखों ने इस शिखर सम्मेलन में भाग लिया।

ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, चीन, भारत और दक्षिण अफ्रीका) सम्मेलन का आयोजन किया गया. सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ, रूस के राष्ट्रपति देमित्री मेदवेदेव, ब्राजील के राष्ट्रपति डिल्मा रोसेफ, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जूमा तथा भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भाग लिया. सम्मेलन का मुख्य विषय वैश्विक स्थायित्व, सुरक्षा एवं समृद्धि के लिए ब्रिक्स की भागीदारी थी. भविष्य की संभावनाओं और चुनौतियों के बीच यह सम्मेलन संपन्न हुआ. पांचों देश के प्रतिनिधियों ने कई मुद्दों पर चर्चा की. सम्मेलन में मुख्य मुद्दा आर्थिक संकट के इस दौर में अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना ही रहा.

ब्रिक्स देशों का भौगोलिक क्षेत्रफल दुनिया का 26 फीसदी है तथा जनसंख्या 43 फीसदी. साथ ही वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इसकी भागीदारी 40 फीसदी है. ऐसे में अर्थव्यवस्था का मुद्दा उठना लाज़िमी हो जाता है. इन देशों के बीच आपसी व्यापार में सालाना 28 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई है तथा इनका आपस में व्यापार 230 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जिसे बढ़ाकर 500 अरब डॉलर करने का संकल्प लिया गया है. यूरोजोन के आर्थिक संकट का प्रभाव ब्रिक्स देशों पर भी पड़ा है, लेकिन इन देशों ने अपनी कुशल आर्थिक नीतियों के कारण मंदी से जूझ रही वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रभावों को कम कर दिया है. आगे की रणनीति तय की गई, जिससे आपसी व्यापार को बढ़ाया जाए, ताकि विकसित देशों से इनकी निर्भरता कम हो सके. आपसी व्यापार को बढ़ाने के लिए आपसी व्यापार को पांचों देशों की मुद्राओं में करने की बात की गई. अपने देशों की मुद्राओं में व्यापार करने से डॉलर के ऊपर इनकी निर्भरता में कमी आएगी, जिससे व्यापार भी बढ़ेगा. हालांकि इसे व्यवहार में लाने के रास्ते में अभी कई रुकावटें आ सकती हैं, क्योंकि इन पांचों देशों के पास एक दूसरे की मुद्राओं का पर्याप्त भंडार नहीं है. साथ ही उत्पादक, निर्यातक और खरीददार के सामने भी यह समस्या आएगी. अगर उत्पादक इन पांचों देशों के अतिरिक्त किसी अन्य देश का है तो वह इन देशों के मुद्रा में व्यापार करना पसंद नहीं करेगा. यही स्थिति निर्यातक और खरीददार के लिए भी होगी. हालांकि अगर ब्रिक्स देश थोड़ा धैर्य रखेंगे तो इन मुश्किलों को आसान किया जा सकता है और भविष्य में इसका फायदा मिलेगा.

विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर विकसित देशों के वर्चस्व को कम करने के लिए क़दम उठाने की ज़रूरतों पर भी इस सम्मेलन में चर्चा की गई. भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहले से ही कहते रहे हैं कि जब तक इन अंतरराष्ट्रीय संगठनों में विकासशील देशों की भागीदारी नहीं बढ़ाई जाती है, तब तक सही मायनों में इन संगठनों का उद्देश्य सफल नहीं होगा. ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों ने भी समय-समय पर इन मुद्दों को उठाया है. इन देशों ने आईएमएफ में अपने कोटे को बढ़ाने के लिए संयुक्त प्रयास करने की बात की है. इसमें कहा गया है कि आईएमएफ में कोटा और अभिशासन सुधारों की गति मंद है. यह चिंता का विषय है. ब्रिक्स देशों का मानना है कि 2012 में होने वाली अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की बैठक से पहले पूर्व में हुई सहमति के अनुरूप 2010 के अभिशासन और कोटा सुधारों को कार्यान्वित किया जाए तथा कोटा फॉर्मूले की व्यापक समीक्षा की जाए. आईएमएफ में कोटा बढ़ने से इन देशों को अधिक ऋण मिल पाएगा. अगर यह सुधार लागू होता है, तो ब्रिक्स देश इन वैश्विक संगठनों में अपना योगदान भी बढ़ा पाएंगे. देखा जाए तो इन संगठनों में सुधार की प्रक्रिया का़फी धीमी होने के कारण ही ब्रिक्स देशों को विकास बैंक की स्थापना की बात सोचनी प़ड रही है. विकास बैंक के लिए ब्रिक्स देशों के बीच सहमति बन भी गई है. इसके लिए एक कार्यदल का गठन किया जाएगा जो इसके सभी पहलुओं की समीक्षा करेगा. इस बैंक से इन देशों की मुद्राओं में क़र्ज़ दिया जा सकेगा, जिससे आपसी व्यापार को बढ़ावा दिया जा सके.

आपसी व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए कारोबारी वीजा नियमों को पहले से अधिक सरल करने के लिए भी ब्रिक्स देशों के बीच सहमति बनी. उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले इन देशों को निवेश की आवश्यकता है. पांचों देशों को अलग-अलग क्षेत्रों में महारत हासिल है. रूस के पास तेल और गैस का विशाल भंडार है, तो भारत और चीन के पास विशाल बाज़ार. इसके साथ ही कुशल मानव संसाधन और तकनीक भी भारत और चीन के पास है. दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के पास प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है, जहां से कच्चा माल प्राप्त किया जा सकता है. ऐसे में अगर कारोबारी वीजा नियमों को सरल किया जाएगा तो आपसी निवेश में बढ़ोत्तरी होगी, जो इन देशों की अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करेगी.

आर्थिक पहलुओं पर चर्चा करने तथा आपसी सहमति बनाने के अलावा इस सम्मेलन में अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को भी उठाया गया. भारत ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार के मुद्दे पर ब्रिक्स देशों को आपसी सहमति बनाने की बात कही है. भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों की संख्या में वृद्धि का पक्षधर है. भारत का कहना है कि वैश्विक परिदृश्य में बदलाव आया है, जिसे नकारा नहीं जा सकता है. समय के साथ बदलाव होना चाहिए. अगर बदलाव नहीं होता है तो फिर सुरक्षा परिषद की प्रासंगिकता धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी. भारत इस संगठन का स्थाई सदस्य बनने की सारी योग्यता रखता है. इसे भी सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनाया जाना चाहिए, ताकि इस संगठन को और लोकतांत्रिक बनाया जा सके.

संयुक्त राष्ट्र में सुधार के अलावा जलवायु संकट, सीरिया संकट, अरब-इज़रायल संघर्ष, ईरान की समस्या पर भी बातचीत की गई तथा दिल्ली घोषणा पत्र में कहा गया कि सीरिया में राजनीतिक अस्थिरता का शांतिपूर्ण समाधान होना चाहिए तथा ईरान के मुद्दे पर जल्दबाज़ी करने की ज़रूरत नहीं है. दिल्ली घोषणा पत्र में यह भी कहा गया है कि ब्रिक्स देश अरब-इज़रायल संघर्ष का व्यापक, न्यायसंगत एवं स्थाई समाधान चाहते हैं तथा इसके लिए वे भरपूर प्रयास करेंगे. हालांकि चौथे ब्रिक्स सम्मेलन में पहले तीन सम्मेलनों की तरह बड़ी-बड़ी बातें की गईं और कई प्रतिबद्धताएं दोहराई गईं, लेकिन इन देशों के बीच आपसी सहमति कैसे बने, इस मुद्दे पर कम ही बात की गई है. संभव है कि कई आर्थिक मुद्दों पर सहमति बन जाए, लेकिन जब तक राजनीतिक मुद्दों पर सहमति नहीं बनती है तब तक इस संगठन को सफल कैसे कहा जा सकता है.

इस संगठन में दो देश भारत और चीन के बीच आपसी रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं. दोनों के बीच सीमा संबंधी विवाद सुलझने का नाम नहीं ले रहा है. दोनों देश अपनी विदेश नीति तय करने में, अपनी प्रतिरक्षा नीति तय करने में एक दूसरे का ध्यान रखते हैं. चीन की भारत की सीमा पर अस्थिरता पैदा करने की कोशिश जारी है. कई वैश्विक मुद्दों पर दोनों देशों का नज़रिया अलग-अलग है. सीरिया के मुद्दे पर ही इसे देखा जा सकता है. संयुक्त राष्ट्र संघ में जब सीरिया के मुद्दे को उठाया गया तथा सीरिया में अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की बात की गई तो चीन और रूस ने इस पर वीटो कर दिया, जबकि भारत पश्चिमी देशों के साथ खड़ा नज़र आया. ईरान के मुद्दे पर भी इन देशों के बीच आपसी सहमति नहीं हो पाती है. चीन और भारत की प्रतिद्वंद्विता आर्थिक क्षेत्र में भी है. हाल में जब भारतीय कंपनी ने वियतनाम में पेट्रोलियम की खोज का काम शुरू किया तो चीन ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई. अफ्रीका में निवेश को लेकर भी दोनों देशों के बीच तनातनी चलती रहती है. हालांकि भारत-चीन के बीच का व्यापार चीन के पक्ष में है, इसलिए चीन भारत के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाना चाहता है. इसी तरह पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर भी भारत, चीन और रूस का मत अलग-अलग दिखाई देता है. कार्बन उत्सर्जन को कम करने के मुद्दे पर चीन पश्चिमी देशों के क़रीब जाता दिखाई देता है. रूस की स्थिति भी कुछ इसी तरह की है.

ब्रिक्स के पांचों देश विश्व व्यापार संगठन में भी एकजुटता नहीं दिखाते हैं. कुछ समय पहले ही रूस को विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बनाया गया है. अब इसका रु़ख कैसा रहता है, यह देखना बाक़ी है. संयुक्त राष्ट्र में सुधार का मुद्दा भारत हर मंच पर उठाता है. सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की मांग भारत बहुत पहले से कर रहा है. इस ब्रिक्स सम्मेलन में भी यह मुद्दा उठाया गया. हालांकि रूस भारत के दावे का खुला समर्थन करता है, लेकिन चीन अपना रु़ख स्पष्ट नहीं करता है. लगता है उसे भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपने समकक्ष हैसियत देना पसंद नहीं है. हालांकि भारत अकेले यह दावेदारी पेश नहीं करता है, बल्कि अन्य देशों को भी स्थाई सदस्य बनाना चाहता है, जिसमें दो देश ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स के सदस्य भी हैं. लेकिन फिर भी चीन इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रहा है. ऐसे में कैसे कहा जा सकता है कि ब्रिक्स देशों के बीच एक मज़बूत गठबंधन बनेगा.

यह सही है कि इस संगठन का जन्म ही आर्थिक आधार पर हुआ है. लेकिन लंबे समय तक किसी गठबंधन को ज़िंदा रखने के लिए वैचारिक एकता की आवश्यकता तो होती ही है. ब्रिक्स मज़बूत तभी होगा, जबकि इसके सदस्य देश वैश्विक मुद्दों पर सहमति क़ायम करेंगे. आर्थिक ताक़त से राजनीति को प्रभावित किया जा सकता है. इसे यूरोपीय यूनियन तथा अमेरिका के उदाहरण से समझा जा सकता है. अमेरिका का वर्चस्व इस कारण नहीं है कि उसके पास सैन्य शक्ति है, बल्कि उसका वर्चस्व इस कारण है कि उसके पास आर्थिक ताक़त है. अमेरिका को यूरोपीय संघ का सहयोग भी मिलता है. सैन्य ताक़त के मामले में रूस या चीन अमेरिका से कमज़ोर नहीं है, लेकिन अभी भी अमेरिकी नीतियों का खुलकर विरोध नहीं कर पाता है. इसलिए ब्रिक्स देशों को भी इस बात पर ग़ौर करना चाहिए. इस सम्मेलन में की गई प्रतिबद्धताओं को कितना पूरा किया जाता है, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन निकट भविष्य में चीन और भारत के बीच वैश्विक मुद्दों पर सहमति होता नहीं दिखाई देता है. ब्रिक्स देशों में सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश यही दोनों हैं, जिसके कारण इनकी मांग भी अधिक है. ऐसे में अगर यही दोनों देश आपस में उलझे रहे तो फिर ब्रिक्स को सफलता कैसे मिलेगी.

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