मोइनुद्दीन चिस्ती

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मोइनुद्दीन चिस्ती का जन्म ११४१ में और निधन १२३६ ई॰ में हुआ। उन्हें ग़रीब नवाज़ के नाम से भी जाना जाता है। वो भारतीय उपमहाद्वीप के चिस्ती क्रम के सूफ़ी सन्तों में सबसे प्रसिद्ध सन्त थे। मोइनुद्दीन चिस्ती ने भारतीय उपमहाद्वीप में इस क्रमा की स्थापना एवं निर्माण किया था।

पूर्व जीवन एवं पृष्ठभूमि[संपादित करें]

यह माना जाता है कि मोइनुद्दीन चिस्ती का जन्म ५३६ हिज़री संवत् अर्थात ११४१ ई॰ पूर्वी पर्सिया के सिस्तान क्षेत्र में हुआ।[1] दरगाह शरीफ़ का आधिकारिक जालस्थल]। अन्य खाते के अनुसार उनका जन्म ईरान के इस्फ़हान नगर में हुआ।

हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़[संपादित करें]

हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़ विश्व् के महान सूफी सन्त् हैं।हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़ का असलि नाम "हज़्रत ख्वाजा मोइनुद्दिनहसन चिश्टि" हैं।उन्को गरीब नवाज़ नाम इसलिये दिय गया हैं, क्युँकि जब उन के यहाँ कोइ मन्नत् माँगते है तो वो पुरि होति है,और हर गरीब, फकिर और सबकि मन्नत पुरि होति है।हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़ (र.अ) विश्व के अद्यथत्म्वाद चिकित्सकौ में एक बहुत महत्व स्थान हैं।उनकी जीवन कि परस्थित्यों और स्वभ्व के कारन वे एक अपुर्व कार्य को अप्नायलिय।उन्होंने मलद्खतथि सभ्यता,जहाँ अद्यत्म्वादके लिये कोइ जगह नहीं थी,वहाँ उन्होंने अप्नी कुशलहता और महानता से सरे बँद्नों को तोड् दिया।वे महानता और लवन्या के अच्छे मिश्रण थे। वे हमेशा सत्य का साथ देते थे और वे बहुत अच्छे और महान व्यक़्ति थे।वे प्रेम,समार्स्ता,एकता और सत्य क़े प्रतिक हैं।उन्के इन गुणों और शक्ति का मुल कारण् और स्त्रोत उनक अपवाद ध्रम्दय हैं।उन्होनें महान और सकर्मिय जीवन बिताया, इनके आद्र्श पैग्ंबर मुहमम्द (स.अ.व्) से मिलते हैं,कयों न हो वे उनके परिवर से हैं।

जन्म[संपादित करें]

हज़्रत गरीब नवाज़(र.अ) का जन्म ५३६ हिज़री संवत् अर्थात ११४१ ई॰ में खुर्स्न प्रान्त् के संजर गांव (इरान्) मैं हुआ था।खन्डह्र के उत्तरि दिशा में हैं,यह जगह २४ घ्ंटों मैं पहुँचा जा सकते हैं। गरीब नवाज़ के पिता "स्यिद ग्यासुददिन हासन" (र.अ) के दादा हज़्रत मुसा करीम (रअ) थे।गरीब नवाज़(रअ) की माँ " बिबी माह-ए-नूर" के प्रदादा "हज़्रत इम्मम हुस्सैन (रअ)" थे।तो हज़्रत गरीब् नवज़ अपने पिता के परिवर से हुस्सैनि सैयद थे और माँ की तरफ से ह्सेनि सयीद हैं।गरिब नवाज़(र अ) की माँ हज़्रत बिबी उम्मुलव्रा कह्ती हैं कि"जब उनके प्रिय पुत्र उनके ग्र्भ में थे, तब उनके घर में खुशीयाँ,सुख और उन्नती थी,उनके शत्रु भी उनके मित्र बन गये और उन्हें शुभ् और धृमनिश्ष्ट् स्वप्न आते थे।"[2]

शिक्षा[संपादित करें]

ख्वाजा सहेब (र्.अ) ने अपनी पेहली शिक्षा अपने घर में ही पाई।उनके पिता बहुत महान और ग्यानी थे,ख्वाजा साहेब ने क़ुरान ९ साल की आयु में खतम कर लिया।उसके बाद वे संजर् के म्क्त्बास में गए, उन्होँने वहाँ तफ्सीर,फीकाह,और हदित बहुत् कम समय में सीख लीया,उस विषैय में उन्होनें आधिक ग्यन प्राप्त कर लिय।

नया जीवन[संपादित करें]

अल्लह के इच्छा के अनुसार हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़् के पिताजी स्वर्ग सीधार गये,वे अनाथ हो गये।उन्होनें अपने पिता से एक उपवन और मिल्ल प्राप्त हुआ। उनके पिता कि म्रुत्य के कुछ् महीनो के बाद उनकी माँ का देहाँत् हो गया।ख्वाजा सहाबा (र.अ) अपनी छोटी आयु से भी हमेशा फकीर और द्र्वेशीयों के साथ पाये जाते थे।उनके मन में गरीबों और फकिरों के लिये बहुत सम्मान् और आदर था। एक दिन जब वे पेडों को पानी दे रहे थे, तब एक म्ज़्जुब आए थे।वह म्ज़्जुब "शेक इब्रहिम कुन्दोज़ि (र.अ)"हैं,जब हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़ ने एक बुढे, वृद्ध आदमी को देखा,वे अपना कार्य को छोड कर, उनका स्वागत करते हैं।वे उनके हाथ को चुम्ते हैं और उन से अनुरोध करते हैं कि वे पेड की छाया में बेंटे।तब हज़्रत के पास उन्हें देने के लिये कुछ नहीं था।वह अँगुर का मोसम था,और पेड पर अँगुर लगे हुए थे,तौ उन्होंने उसे तोडा, साफ करके उन रसिले, मिटे अँगुर उन्हें देते हैं,और अदर से उनके सामने बैट्ते हैं।वह म्ज़्जुब को ख्वाजा क स्वभाव् बहुत पसंद आता हैं,और वे कुछ अँगुर खाते हैं।अल्लह के प्रेम से प्रबुध्द होकर वह म्ज़्जुब तुरंत पेह्नचान् लेते हैं कि वह् बालक सत्य की खोज मैं हैं।वह मज़जुब ने एक मिटाई का टुक्डा निकाला और थोडा स चबाया और ख्वाजा साहेब् के मुहँ में डाल दिय,ख्वाजा सहेब् ने उसे खालिया क्युँकि उनके मन में गरीबों और फकिरों के लिये बहुत प्रेम, आदर और सम्मान था। जब वे उसे खा लेते है तब उन्हें अचानक् सारा संसार उनके लिये बेकार हो जाता हैं, एसा लगता है जेसे उन के और अल्लह के बीच कोइ बाधा नहीं हैं।जब वे अपनी स्म्र्तियों से वापस आते हैं, तब वे अपने आप को अकेला पाते हैं,शेक इब्रहिम (र.अ) ने ख्वाजा साहेब को अकेला छोद दिया, लेकिन ख्वाजा साहेब् उन स्म्रुथियाँ भुल नहीं पाये थे और वो उस आभास को बार-बार अनुभव् करना चाहते थे। उन्होंने अपने उपर बहुत नियत्रंन् रखने का प्रयास करते हैं,लेकिन नहीं रख पाते।वे अल्लाह के प्रति प्रेम और जुनुन् अपनी सीमा पार कर गया तब उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ती और धन गरीबों मैं बाट्ँ दिया और सत्य की खोज मैं लग गये।शेख इब्रहिम कुन्डोज़ी (र्.अ) के दैविय प्रकश के बाद ख्वाजा साहेब ग्यान पाने के लिये और भी उत्सुक हो गए थे,य्ह उपभ्धी की प्यास ने उन्हें और प्रोत्साहन देति हैं,और वे सामरख्ंड छोड दिया।अल्लाह के स्म्र्ण में वे पश्चिम की ओर मुर्शिद-ए-कमील कि खोज में चले गये और "हारून" नामक एक गाव्ँ मे पहुँचे जो निशापुर से दुर् हैं।

अल्लाह का वरदान[संपादित करें]

ख्वाजा साहेब (र अ) मेक्का पहुँचे और एक दिन जब वे नमाज़ पढ् रहे थे, तब उन्हे आवाज़ सुनाइ दि,"मुइनुद्दिन मैं आपसे बहुत प्रभावित हूँ और तुम्हें वरदान देता हूँ, पुछों जो तुम्हें चाहिए ताकी हम उसे पुरा कर सके।"उन्होंने आदर से कहा "ए महान अल्लाह, मुइनुद्दीन के प्रश्ंस्कों को मोक्ष प्राधान् करें" जवाब आया "ए मुइनुद्दीन,आपकी इच्छा पुरी हो गई हैं।मैं मुइन्नुद्दीन के हर प्रशंसक को क्यामत तक मोक्ष प्रधान करुँगा"।जब् वे काबे में थे और हज पुरा कर चुके थे और् तब वे मदिने के खुबा मसाजीद में प्रार्थना कर र्हें थे, उन्हें पैह्मबर मुहम्म्द (स.अ.व्) क संदेश मिला, उसमें उन्हें आदेश मिला की"मुइन्नुद्दीन,आप हमारे ध्रम के सहायक हैं;मैं आप पर विश्वास कर के आपकों हिंदुस्थान जाने के लिये कह रहा हुँ,जहाँ अंधकार हैं, जाईये भारत और सत्य का उपदेश दिजीए"।इस संदेश को सुनकर वे बहुत उत्सुक और प्रभावित थे, लेकिन ख्वाजा साहेब् सोच् रहे थे कि अजमेर् कहाँ हैं,तब ख्वाजा साहेब को मुह्म्म्द (स अ व्) स्वपन में आते है और् उन्हें वह शहर, किला दिखाते हैं और अजमेर जाने का मार्गद्र्ष्ण देते हैं।

ख्वाजा साहेब का हिन्दुस्थान और अजमेर में प्रवेश[संपादित करें]

हज़्र्त ख्वाजा सहेब (र अ) भरत की तरफ आ रहे थे,अपने शिष्यों के साथ अल्लाह के प्रेम और हज़्रत मुहम्म्द (स अ व्) के अशीर्वाद के साथ।वे पेहले हैरत् पहुँचे,फिर सब्ज़्वार हये, वहाँ के राजा सब्ज़वार शेक मोहम्म्द यादगार से मिले जो तानाशाह और बुरे स्वभाव के थे।जब वे हज़्रत से मिले तो वे शरमींदा हो गया,और गरीब् नवाज़(र अ) से अनुरोध करते हैं कि वे उन्हें ध्रम में जाने के लिये मार्गद्र्ष्ण दे,वे उस की सहायता करते हैं और वों भक्ति मैं इतना लीन होजाते हैं कि वो अपना राज्य छोड देते हैं।सब्ज़्वर से ख्वाजा सहेब (र अ) गज्नवी पहुँचे और फिर वहाँ के सुल्तान् माशेक स्यीद अब्दुल वाहिद (र अ) से मिले, फिर हज़्रत ख्वाजा क़ुतबुद्दीन ब्खतियार काकी,हज़्रत क़ुतुब उल अक़्ताब (र अ),और भी अपने शिष्यों के साथ यात्रा कर रहे थे,मुश्किल था जब वे भारत की सीमा पर थे,वहाँ बडे पर्वत ते लेकिन वे अल्लाह का नाम लेकर पार कर गए।फिर उनका काफिमला पंजाब,लहोर,और फिर पटियाला गये,तब वहाँ के राजा पृथवीरज चौहान कि माँ एक ज्योतिषि थी और उसने भाविष्यानी की है कि एक आदमी के कारण उसका विनाश होगा,इसलिये उसने उनका नक्षा बनाया और जो भी उनके चेहरे से मलता-जुलता हैं उस को भी मार दिया जाए।जब हज़्रत से उसके सैनिकों मिलते हैं तब वे उन्हें रोक नहीं पाए।

अज्मेर मैं उनका प्रवेश[संपादित करें]

ज्ब वे अजमेर् मैं एक वृक्ष की छाया मैं बेटे थे,तब राजा के सैनिक अपने ऊँटों के साथ आए और क्रुरता के साथ उन्हें वहाँ से उट ने के लिये कहा,जब हज़्र्त ने उन्हें कई ओर बांद् ने के लिये कहा तो उन सैनिकों ने उनकी बात् नहीं सुनी और खडे रहे, तो हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़ ने सुशिष्टता से कहा कि"लो, हम यहाँ से चले जाते हैं और तुम्हारे ऊँट यहाँ बैटे हि रहेंगे"।यह बोलकर वे और उनके प्रश्ंसकों के साथ् अन्ना सागर तालाब के पास चले गये।दुसरे दिन सैनिकों ने ऊँटू को उटाने का बहुत प्रयास किया लेकिन नहीं उटा पए, एसा लग रहा था जैसे वे पृथ्वी से चिपक गये हों।फिर वे जाकर राजा को पुरी घटना बतात्ते हैं,तू राजा आश्च्र्यच्कित हो जाता हैं,और गर्व् करते हैं,और अपने सैनिकों से जाकर क्षमा माँग ने के लिये कहते हैं,तो सैनीक् जकर गारीब नवाज़ से क्षमा मांगते हैं,तो हज़्रत उन्हें कहते हैं " वापस जाओ, अल्लाह के करम से ऊँट अपने पैरुं पर खडे हो जाएँगा"।वापस जाकर देखते हैं तो ऊँट खडे रेहते हैं।वे प्रसन्न हो जाते हैं।यह हज़्रत का पहला चम्तकार हैं। हज़्रत और उनके प्रश्ंसक अन्ना सागर रोज़ स्न्नान करने जाते हैं,लेकिन एक दिन राजा के सैनिकों ने हज़्रत के प्रशंसकों को रोक दिया तब उनके एक् प्रशंसक वपस आकर उन्हें सारी घट्ना बताते हैं,तब् ख्वाजा सहेब (र अ) ने उनके प्रश्ंसक को एक कुज़ा (मट्का) दिया,और उसमें पानी भर कर् लाने के लिये दिया और जब उन्होंने उसमें पानी भरा तो सारा तालाब का पानी उस मटके मैं आगया।जब यह बात सब को मालुम हुई तो सब आश्च्रय चकित हो गये।सारा तालाब सुख गया,ख्वाजा साहेब् बहुत दयालु थे, उसके बाद कुछ लोगों ने ख्वाजा सहेब से क्षमा माँगी तो उन होनें पानी वापस तालाब में दाल दिया।इस घट्ना के बाद बहुत लोगों ने इस्लाम अपना लिया।हज़्रत ख्वाजा गरिब नवाज़ के पास अल्लाह का वरदान हैं,जो भी उनके पास जाते हैं उन की बातों से इतने प्रभावित होते हैं कि उनसे दुर नहीं होना चाहते।बहुत लोगों ने इस्लाम अपना लिया।कुछ उद्दाह्र्ण हैं:शादि दिओ,अजए पाल जोगी। "शाद दोई" उस समय का पदा लिखा मनुष्य, जो हज़्रत को देख कर उनके पैरुँ पर पडा और इस्लाम क़ुब्बुल कर लिया,और उस्का नाम हज़्रत ने साढ् रख दिया। दुसरा था "अजय पाल" बहुत बडा जादुगर् था, जो हज़्रत के ऊपर पत्तर दाल दिया,लेकिन ख्वाजा सहेब को कुछ नहीं हुआ।तो वो उनकी शृण मैं आजाते हए और इस्लाम क़ुब्बुल कर लेता हैं और उसका नाम ख्वाजा साहेब ने अब्द्दुल्लाह रख दिय हैं। शाद दोई उस समय का शिक्षित आद्मी था,जो ख्वाजा साहेब से सामना करने आया था, लेकिन उन्हें देखथे हि उसका मन परिवर्तित हो गया और हज़्रत के पैरों पर गीर पडा और इसलाम को अपना लिया।ख्वाजा साहेब ने उस का नाम "साढ्"दिया। अजाय पाल जोगी बाहुत बडा जादुगर था,उसको राजा ने ख्वाजा साहेब को ट्क्कर देने के लिये भेजा था।अजय पाल ने ख्वाजा सहेब पर् एक बडा सा पत्थर पैंका लेलिन ख्वाजा सहेब को कुछ नहीं हुआ।और वो भी ख्वाजा सहेब के पैरों पर गीर जाता हैं और क्षमा माँगता हैं,और इस्लाम को अपना लेता हैं,तो हज़्रत ख्वाजा सहेब उसका नाम "अब्दुल्लाह्" रख दिया। हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़ भारत मैं सीर्फ् इस्लाम,प्रेम,एकता,और शांति का सांदेश देने के लिये आए थे,और वे सफल भी रहे।

उनके अखरी पल[संपादित करें]

६३३ हिज़री के आते ही उन्हें पता था कि यह उनका अखरी वृष हैं इसलिए जब वे अजमेर के जुम्मा मसाजीद में अपने प्रशंसको के साथ बैटे थे,तो उनहोंने शेख अली संगल (र अ) से केहते हैं की वे हज़्रत ब्खतीयार काकी (र अ) को पत्र लिखकर आने के लिये कहें हैं।ख्वाजा साहेब के बाद क़ुरान-ए-पाक, उनका गालिचा और उनके चप्पल काकी (र अ) को दिया गया और कहा"यह विशवास मुहम्म्द (स अ व्) का हैं,जो मुझे मेरे पीर-ओ-मुर्शीद से मिला हैं,मैं आप पर विशवास करके आप को दे रहा हुँ और उसके बाद उनका हाथ लिया और नभ की ओर देखा और कहा "मैंने तुम्हें अल्लाह पर न्यास्त किया हैं और तुम्हें यह मौका दिया हैं उस आदर और सम्मान प्राप्त करने के लिए।" उस के बाद ५ और६ रजब को ख्वाजा साहेब अपने कमरे के अंदर गए और क़ुरान-ए-पाक पडने लगे,रात भर उनकी आवाज़ सुनाई दि लेकिन सुबाह को आवाज़ सुनाई नहीं दि।जब कमरे को खोल कर देखा गया,तब वे स्वर्ग चले गये थे, उनके माथे पर सीर्फ यह पंक्ति चमक रही थी "वे अल्लाह के मित्र थे और इस संसार को अल्लाह का प्रेम पाने के लिए छोड दिया।"उसी रात को काकी (र अ) को मुहम्म्द (स अ व्) स्वपन में आए थे और कहा "ख्वाजा साहेब अल्लाह के मित्र हैं और मैं उनहें लेने के लिये आया हुँ। उनकी जनाज़े की नमाज़ उन के बडे पुत्र ख्वाजा फाकरुद्दिन (र अ) ने पदा।वहाँ उनके बहुत सारे प्रशंसक आए थे,और आते रहेंगे। हर साल हज़्रत के यहाँ उनका उर्स होता हैं बहुत बडे पैमाने प्र हो ता हैं और उनके प्रशंसक भी आते हैं।


[3]

सन्दर्भ[संपादित करें]