मोइनुद्दीन चिश्ती

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मोइनुद्दीन चिश्ती - معین الدین چشتی

दर्गाह, मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेर, भारत
पूरा नाम मोइनुद्दीन चिश्ती
जन्म हिज्री 536 या ई-1142 [1]
जन्मस्थान सीस्तान इलाका (पश्चिमी अफ़ग़ानिस्तान या पूरबी इरान)[2]
मृत्यु 6 रज्जब 633 हि।श।
˜ मार्च 15, 1236 CE
समाधि गरीब नवाज़, सुल्तान-उल-हिन्द "भारत के च्क्रवर्ती" शेख, क़लीफ़ा
क्रम चिष्ती
पूर्ववर्ती उस्मान हारून
उत्तराधिकारी कुतुबुद्दीन बक्तियार काकी
शिष्य कुतुबुद्दीन बक्तियार काकी
निज़ामुद्दीन औलिया
फ़रीदुद्दीन गंजषकर
नसीरुद्दीन चिराग देहल्वी
धर्म इस्लाम
अजमेर शरीफ़ दर्गाह में मक़्बिरे के बाहर का मन्ज़र

मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ११४१ में और निधन १२३६ ई॰ में हुआ। उन्हें ग़रीब नवाज़ के नाम से भी जाना जाता है। वो भारतीय उपमहाद्वीप के चिस्ती क्रम के सूफ़ी सन्तों में सबसे प्रसिद्ध सन्त थे। मोइनुद्दीन चिस्ती ने भारतीय उपमहाद्वीप में इस क्रमा की स्थापना एवं निर्माण किया था।

पूर्व जीवन एवं पृष्ठभूमि[संपादित करें]

यह माना जाता है कि मोइनुद्दीन चिस्ती का जन्म ५३६ हिज़री संवत् अर्थात ११४१ ई॰ पूर्व पर्षिया के सीस्तान क्षेत्र में हुआ।[3] अन्य खाते के अनुसार उनका जन्म ईरान के इस्फ़हान नगर में हुआ।

हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़[संपादित करें]

हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़ विश्व् के महान सूफी सन्त माने जाते हैं। गरीब नवाज़ का असली नाम "ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन" है, और चिश्तिया तरीक़े या सिलसिले से हैं इस लिए "चिश्ती" कहलाते हैं।

गरीब नाज़ का लक़ब[संपादित करें]

मोईनुद्दीन हसन अपने दौर में ग्यान प्रदान करने वाले गुरू या ख्वाजा के रूप में जाने जाते हैं। वो लोग जिन के पास धार्मिक ग्यान नही होता था, या धार्मिक ग्यान के एतेबार से गरीब जो होते थे उन्हें वे ग्यान से नवाज़ते थे।

लैकिन आज कल यूं माना जाता है कि जो भी उन के दर्बार में जाकर मांगता है वह उस्को देते हैं या नवाज़ते हैं, इस लिये भी उन्हें गरीब नवाज़ पुकारा जाता है। हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़ (र.अ) को विश्व के आध्यात्मिक चिकित्सकों में एक महत्व स्थान है। उनकी जीवन परस्थित्यों और स्वभाव के कारण् वे एक अपुर्व कार्य को अपना लिया। वे महानता और लवण्यता के अच्छे मिश्रण थे। वे हमेशा सत्य का साथ देते थे और वे बहुत अच्छे और महान व्यक़्ति थे। वे प्रेम, समार्स्ता, एकता और सत्य क़े प्रतीक हैं। इन के परिवार का सिलसिला पैग्ंबर मुहमम्द (स.अ.व्) से मिलता है।

जन्म[संपादित करें]

मोईनुद्दीन हसन का जन्म ५३६ हिज़री संवत् अर्थात ११४१ ई॰ में खुर्स्न प्रान्त् के संजर गांव (इरान्) मैं हुआ था। मोइनुद्दीन के पिता "सय्यद ग़ियासुद्दीन हसन" (र.अ) और माँ "बीबी माह-ए-नूर (रअ), दादा हज़्रत मूसा करीम (रअ), परदादा "हज़्रत इमाम हुसैन (रअ)" थे। तो हज़्रत गरीब् नवज़ अपने पिता के परिवर से हुसैनी सय्यद (इमाम हुसैन इब्न अली) थे और माँ की तरफ से ह्सनी सय्यद (इमाम हसन इब्न अली) थे।"[4]

शिक्षा[संपादित करें]

ख्वाजा सहेब (र्.अ) ने अपनी पहली शिक्षा अपने घर में ही पाई। उनके पिता बहुत महान और ग्यानी थे, ख्वाजा साहेब ने क़ुरान ९ साल की आयु में खतम कर लिया। उसके बाद वे संजर् के मकतब (प्राथमिक पाठशाला) में गए, उन्होँने वहाँ तफ़्सीर, फ़िक़ह, और हदीस बहुत् कम समय में सीख लीया, उस विषय में उन्होनें आधिक ग्यान प्राप्त कर लिया।

नया जीवन[संपादित करें]

पिताजी स्वर्ग सीधार गये, वे अनाथ हो गये। उन्हें अपने पिता से एक उपवन और मिल्ल प्राप्त हुआ। उनके पिता कि म्रुत्य के कुछ् महीनो के बाद उनकी माँ का देहाँत् हो गया। मोईनुद्दीन छोटी आयु ही में सन्तों और फ़क़ीरों का सत्संग किया। वे गरीबों के प्रती दयालू थे।

एक दिन एक मजज़ूब (ईश्वर की याद में खोया हुवा पागल व्यक्ती) शेख इब्राहीम क़ुन्दूज़ से मुलाक़ात हुवी। मोईनुद्दीन उन्की अच्छी सेवा की, वह मजज़ूब प्रसन्न हुए और उन्हें मिठाई खिलाई और कुछ उपदेश दिये। मोईनुद्दीन को उपदेश पाकर ऐसा लगा कि सारा संसार बेकार है। और ऐसा भी लगा कि उन्के और ईश्वर के दर्मियान कोई है ही नहीं। अपनी सारी सम्पत्ती दान कर, उच्छ ग्यान के लिये बुखारा चले गये। वहां उस्मान हारूनी के मुरीद (शिष्य) बन गये।

प्रवास और अनेक देशों की यात्रा[संपादित करें]

मोईनुद्दीन समर्कन्द, बुखारा सफ़र किये, और यहां तक कि मक्का और मदीना भी गये। उन्हें ऐसा लगा कि कोई दिव्यवाणी उन्हें आदेश देरही है कि "मोईनुद्दीन, तुमारी आध्यात्मिक सेवा विश्व को जरूरी है, आप हिन्दूस्तन जाइये, वहां सत्य का प्रचार कीजिये"। और उन्हें ऐसा लगा कि हजरत मुहम्मद उन्हें अजमेर का रास्ता दिखा रहे हैं। बहुत ही प्रसन्न मोइनुद्दीन हिन्दुस्तान तश्रीफ़ लाये।

ख्वाजा साहेब का हिन्दुस्थान और अजमेर में प्रवेश[संपादित करें]

मोईनुद्दीन चिश्ती हिन्दुस्तान का रुख किया। मुल्तान में पान्च वर्श रहे, यहां इन्हों ने संस्कृत भाषा सीखी। थोडे दिन लाहोर में रुके, बाद में अजमेर आये। अपने हमराह मोइज़ुद्दीन के साथ अजमेर अपना निवास स्थल बना लिया।

चिश्तिया तरीका - पुनस्थापना[संपादित करें]

चिश्तिया तरीका अबू इसहाक़ शामी ने ईरान के शहर "चश्त" में शुरू किया था, इस लिए इस तरीक़े को "चश्तिया" या चिश्तिया तरीका नाम पड गया। लैकिन वह भारत उपखन्ड तक नहीं पहुन्चा था। मोईनुद्दीन चिश्ती साहब ने इस सूफ़ी तरीक़े को भारत उप महाद्वीप या उपखन्ड में स्थापित और प्रचार किया। यह तत्व या तरीक़ा आध्यात्मिक था, भारत भी एक आध्यात्म्कि देश होने के नाते, इस तरीक़े को समझा, स्वागत किया और अपनाया। धार्मिक रूप से यह तरीका बहुत ही शान्तिपूर्वक और धार्मिक विग्नान से भरा होने के कारण भारतीय समाज में इन्के सिश्यगण अधिक हुवे। इन्की चर्चा दूर दूर तक फैली और लोग दूर दूर से इनके दरबार में हाजिर होते, और धार्मिक ग्यान पाते।

अजमेर में उनका प्रवेश[संपादित करें]

अजमेर में जब वे, धार्मिक प्रचार कर्ते तो चिश्ती तरीके से कर्ते। इस तरीके में ईश्वर ग्नान पद्य रूप में गाने के साधनों द्वारा लोगों तक पहुन्चाया जाता। मतलब ये कि, क़व्वाली, समाख्वानी, और उपन्यासों द्वारा लोगों को ईश्वर के बारे में बतान और मुक्ति मार्ग दर्शन करवाना। स्थानीय हिन्दू राजाओं से भी कयी मत भेद हुवे परन्तु वह सब मतभेद स्वल्पकालीन थे। स्थानीय राजाओं ने भी मोईनुद्दीन साहब के प्रवचनों से मुग्द हुवे और उन्हें कोई कश्ट या आपदा आने नहीं दिया।

इस तरह स्थानीय लोगों के ह्रुदय भी जीत लिये, और लोग भी इनके मुरीद (शिश्य) होने लगे।

उनके आखरी पल[संपादित करें]

मोईनुद्दीन चिश्ती दरगाह, अजमेर।

६३३ हिज़री के आते ही उन्हें पता था कि यह उनका आखरी वर्श है, जब वे अजमेर के जुम्मा मस्जिद में अपने प्रशंसको के साथ बैठे थे, तो उनहोंने शेख अली संगल (र अ) से कहा कि वे हज़रत बख्तियार काकी (र अ) को पत्र लिखकर आने के लिये कहें। ख्वाजा साहेब के बाद क़ुरान-ए-पाक, उनका गालिचा और उनके चप्पल काकी (र अ) को दिया गया और कहा "यह विशवास मुहम्म्द (स अ व्) का है, जो मुझे मेरे पीर-ओ-मुर्शिद से मिला हैं, मैं आप पर विशवास करके आप को दे रहा हुँ और उसके बाद उनका हाथ लिया और नभ की ओर देखा और कहा "मैंने तुम्हें अल्लाह पर न्यास्त किया है और तुम्हें यह मौका दिया है उस आदर और सम्मान प्राप्त करने के लिए।" उस के बाद ५ और ६ रजब को ख्वाजा साहेब अपने कमरे के अंदर गए और क़ुरान-ए-पाक पढने लगे, रात भर उनकी आवाज़ सुनाई दी, लेकिन सुबह को आवाज़ सुनाई नहीं दी। जब कमरा खोल कर देखा गया, तब वे स्वर्ग चले गये थे, उनके माथे पर सिर्फ यह पंक्ति चमक रही थी "वे अल्लाह के मित्र थे और इस संसार को अल्लाह का प्रेम पाने के लिए छोड दिया।" उसी रात को काकी (र अ) को मुहम्मद (स अ व्) स्वपन में आए थे और कहा "ख्वाजा साहेब अल्लाह के मित्र हैं और मैं उनहें लेने के लिये आया हुँ। उनकी जनाज़े की नमाज़ उन के बडे पुत्र ख्वाजा फ़क्रुद्दीन (र अ) ने पढाई। हर साल हज़रत के यहाँ उनका उर्स बडे पैमाने पर होता है।

साधारण संस्क्रुती में[संपादित करें]

हुसैन इब्न अली के पाशस्त में इन्हों ने यह कविता लिखी, जो दुनियां भर में मशहूर हुई।

शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन
शाह हैं हुसैन, बादशाह हैं हुसैन

दीन अस्त हुसैन, दीनपनाह अस्त हुसैन
धर्म हैं हुसैन, धर्मरक्षक हैं हुसैन

सरदाद न दाद दस्त दर दस्त ए यज़ीद
अपना सर पेश किया, मगर हाथ नहीं पेश किया आगे यज़ीद के

हक़्क़ाक़-ए बिना-ए ला इलाह अस्त हुसैन
सत्य है कि हुसैन ने शहादा की बुनियाद रखी

चिश्ती तरीक़े के सूफ़ीया[संपादित करें]

मोइनुद्दीन साहब के तक्रीबन एक हज़ार खलीफ़ा और लाखों मुरीद थे। कयी पन्थों के सूफ़ी भी इनसे आकर मिल्ते और चिश्तिया तरीके से जुड जाते। इन्के शिश्यगणों में प्रमुख ; क़ुत्बुद्दीन बख्तियार काकी, बाबा फ़रीद्, निज़ामुद्दीन औलिया, हज़रत अह्मद अलाउद्दीन साबिर कलियरी, अमीर खुस्रो, नसीरुद्दीन चिराग दहलवी, बन्दे नवाज़, अश्रफ़ जहांगीर सिम्नानी और अता हुसैन फ़ानी.

आज कल, हज़ारो भक्तगण जिन में मुस्लिम, हिन्दू, सिख, ईसाई व अन्य धर्मों के लोग उर्स के मोके पर हाज़िरी देने आते हैं।

मक़्बरे का बाहरी मन्ज़र

आध्यात्मिक परंपरा[संपादित करें]

  1. हसन अल बस्री
  2. अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद
  3. फ़ुदैल बिन ल्याद
  4. इब्राहीम बिन अदहम
  5. हुदैफ़ा अल-मराशी
  6. अमीनुद्दीन अबू हुबैरा अल बस्री
  7. मुम्शाद दिन्वारी

चिश्ती तरीक़े का आरम्भ:

  1. अदुल इसहाक़ शामी चिश्ती
  2. अबू मुहम्मद अब्दाल चिश्ती
  3. अबू मुहम्मद चिश्ती
  4. अबू यूसुफ़ बिन समआन हुसेनी
  5. मौदूद चिश्ती
  6. शरीफ़ ज़न्दानी
  7. उस्मान हारूनी
  8. मुनीरुद्दीन हाजी चिश्ती
  9. यूसुफ़ चिश्ती
  10. मोईनुद्दीन चिश्ती

इनके भक्तगण और भक्तजन[संपादित करें]

भारत उपमहाद्वीप के हर हिस्से में इन्के चाह्ने वाले मिलेंगे। जब इनका उर्स होता है तो देश विदेशों से अक़ीदतमन्द लोग इन्के दर्गाह पर हाज़री देते हैं और दुआयें कर्ते हैं। इस उर्स के मोक़े पर भारत सर्कार और दीगर राज्य सर्कारें अनेक सुविधायें करती हैं। जैसे, स्पेशल रैल गाडियां लगाना, सर्कारी तोर पर उर्स के निर्वाहण के लिये सुविधायें कर्ना, सर्कारी यंत्रांग तायेनात करना। भारत सर्कार और राजस्थान राज्य सरकार की तरफ़ से चादर भी चढाई जाती है।

यह भी देखें[संपादित करें]

मीडिया में[संपादित करें]

इनके करामात पर कयी हिन्दी अथवा उर्दू फिल्में बनीं। और इन के जीवन पर कयी गीत भी लिखे गये और गाये भी गये।

भारत उपमहाद्वीप में जहां कहीं भी क़व्वाली होती है, तो उन क़व्वालियों में इनके बारे में "मनक़बत" (वलियों की प्रशंसा करते हुए गीत या पद्य) गाना एक आम परंपरा है।

  • उर्दू फ़िल्म - मेरे गरीब नवाज़
  • उर्दू फ़िल्म - सुल्तान-ए-हिन्द

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कडियां[संपादित करें]

Official website of Dargah, Ajmer