मानचित्रकला
मानचित्र तथा विभिन्न संबंधित उपकरणों की रचना, इनके सिद्धांतों और विधियों का ज्ञान एवं अध्ययन मानचित्रकला (Cartography) कहलाता है। मानचित्र के अतिरिक्त तथ्य प्रदर्शन के लिये विविध प्रकार के अन्य उपकरण, जैसे उच्चावचन मॉडल, गोलक, मानारेख (cartograms) आदि भी बनाए जाते हैं।
मानचित्रकला में विज्ञान, सौंदर्यमीमांसा तथा तकनीक का मिश्रण है। 'कार्टोग्राफी' शब्द ग्रीक Χάρτης, chartes or charax = कागज तथा graphein = 'लिखना' से बना है।
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मानचित्रकला का इतिहास [संपादित करें]
मानचित्र निर्माण की विद्या अति प्राचीन है। मार्शल द्वीपवासी ताड़ के डंठलों एवं कौड़िओ की सहायता से समुद्र संतरण के मार्गों तथा द्वीपों को दिखाने के लिए चार्ट तैयार करते थे। एस्किमो, अमरीका के रेड इंडियन आदि भी नदियों, बनों, मंदिरों तथा बस्तियों, शिकार के रास्तों आदि का उल्लेख भौगोलिक शुद्धता के साथ रेखाचित्र पर कर लेते थे। इसी प्रकार एशिया तथा अफ्रीका के आदिवासियों तथा अन्य जातियों में भी मानचित्र बनाने के अनेक उदाहरण मिलते हैं।
प्राचीन भारतीय मानचित्र कला [संपादित करें]
अभी प्राचीन भारत की मानचित्र कला तथा संबंधित भौगोलिक ज्ञान के विषय में शोध कार्य नहीं हुआ है, लेकिन अन्य विषयों के शोध कार्यों से संबंधित तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन भारतीयों ने मानचित्र कला में पर्याप्त उन्नति की थी। परिलेखन ज्ञान, प्रक्षेप, सर्वेक्षण, शुल्व सूत्र तथा तत्संबंधी विविध प्रकार के यंत्रों के निर्माण एवं ज्ञान का आभास प्राचीन पुस्तकों में मिलता है। यह कला रोमनों से बहुत पहले ऋग्वेद (4,000 ई0 पू0 से 1,500 ई0 पू0), बौधायन (800 ई0 पूर्व), आपस्तंब एवं कात्यायन के काल में उन्नत अवस्था में थी। भूमि पर विभिन्न आकृतियों और योजना लेखों के खींचने की परिपाटी बौधायन से पहले ही प्रारंभ हो चुकी थी। पाणिनि के अष्टाध्यायी से भी सर्वेक्षण ज्ञान की स्थिति का पता चलता है। मौर्य काल में सुसंगठित सर्वेक्षण ज्ञान की स्थिति, मानचित्रों को समाहित कर्यों में उपयोग करने की परंपरा तथा जातकों में शुल्व कार्य में यष्टि और रज्जु के प्रयोग आदि तथ्यों के उल्लेख से स्पष्ट हैं कि भारतीय लोग मानचित्रों के निर्माता ही नहीं थे, वरन् उसका कुशल और व्यावहारिक उपयोग भी करते थे। सूर्यसिद्धांत तथा विविध ज्योतिष ग्रंथों में भूगोल एवं तत्संबंधी चित्रों एवं सीमांकन रेखाचित्रों आदि के संबंध में सर्वार्थवाची शब्द 'परिलेख' का उपयोग हुआ है। विभिन्न खगोल संबंधी कार्यों तथा ग्रहण आदि के अवसर पर विविध ग्रह उपग्रहों की स्थितियों, मार्गों आदि को प्रक्षेप प्रतिपाद के द्वारा दिखलाया जाता था। सूर्यसिद्धांत के अनुसार गोलक पर अक्षांश, देशांतर, क्रांति, विषुवत आदि को अंकित करने की रीतियाँ बताई गई हैं। उसी पुस्तक से स्पष्ट होता है कि जल द्वारा तलमापन (levelling) किया जाता था, जो आजकल स्पिरिट लेवल (spirit level) से किया जाता है।
अक्षांश, देशांतर के स्थान पर सर्वप्रथम भारतीय पुराणकारों ने पृथ्वी के चारों ओर चार प्रमुख स्थानों, यथा श्रीलंका, श्रीलंका से 90° पूर्व यमकोटि, श्रीलंका से 90° पश्चिम सिद्धपुर तथा उसके विपरीत अध:भाग में रोमकपत्तन, का उल्लेख करते हुए सूर्य की दृश्यमान गति को स्पष्ट किया है। यहीं से बाद में अक्षांश तथा देशांतर का सूत्रपात होता है। प्रक्षेप की पद्धति का सूत्रपात भी सर्वप्रथम ज्योतिष ग्रंथों में ही मिलता है। आर्यभट्ट ने ही सर्वप्रथम पाई का वास्वविक फल तथा वृत्त का क्षेत्रफल निकलने की रीति बतलाई। पौराणिक काल में जंबू द्वीप आदि का मानचित्र बनाकर उन्हें मंजूषा में रखा जाता था। एक वर्ग हस्त के समपटल पर मानचित्र बनाने की पद्धति पाई जाती है।
अन्य प्राचीन देशों में मानचित्र कला [संपादित करें]
भारतीयों के अतिरिक्त अन्य प्राचीन संस्कृतिवाले देशों में भी मानचित्र कला का ज्ञान था। बेबिलोनिया से प्राप्त एक मृत्तिका पट्टिका पर अंकित पर्वतसंकुल घाटी का चित्र 2,300 ई0 पू0 का बताया जाता है। लगभग उसी समय मिस्त्र निवासियों को तथा बाद में फारस तथा फिनीशिया निवासियों को इस कला का ज्ञान हो चुका था। तीसरी सदी ई0 पू0 में यूनानी मानचित्रों पर अक्षांश, देशांतर तथा प्रक्षेपश् आदि खींचते थे। रोम निवासियों ने युद्ध तथा प्रशासनिक कार्यों के लिये सर्वेक्षण द्वारा विभिन्न ज्ञात देशों, पर्वतों, मैदानों, घाटियों, बंदरगाहों तथा राजमार्गों के मानचित्र तैयार किए। रोमनों ने मानचित्रों के व्यावहारिक पक्ष पर अधिक बल दिया, जबकि यूनानियों के मानचित्रों में वैज्ञानिक पक्ष को अधिक महत्व दिया जाता था।
ऐलेग्जैंड्रिया (मिस्त्र) निवासी क्लॉडियस टॉलिमी द्वारा निर्मित 150 ई0 के लगभग का, ज्ञात संसार का, मानचित्र सुविख्यात है। उनकी आठ जिल्दोंवाली पुस्तक ज्योग्राफिया में तत्कालीन ज्ञात संसार के 32 भूभागों तथा क्षेत्रों का समावेश हुआ है। 1410 में ई0 में टॉलिमी की पुस्तक का अनुवाद करके मानचित्रावली का रूप दिया गया। इस काल में मानचित्र कला का पुनर्जन्म माना जाता है। बाद में 16वीं सदी में उसमें नई दुनिया (अमरीका) तथा अफ्रीका के दक्षिण से होते हुए पूर्व एशिया के समुद्री भागों का समावेश किया गया। मानचित्र कला में अरब विद्वानों का महत्वपूर्ण वैज्ञानिक योगदान है। दसवीं सदी में उन्होंने सर्वप्रथम स्कूल ऐटलस बनाया। अरब भूगोलवेत्ता इद्रिशी के संसार के मानचित्र (1154 ई0) में विविध तथ्यों का समावेश है।
आधुनिक मानचित्र कला का विकास [संपादित करें]
14वीं एवं 15वीं सदी में यूरोपीय सामुद्रिक नाविक चार्ट का बहुत उपयोग करते थे। समुद्रतटीय प्रदेशों, बंदरगाहों, बस्तियों आदि का उसमें आलेख होता था। बहुधा ये मानचित्र भेड़ की खाल पर बनाए जाते थे। कोलंबस स्वयं मानचित्र निर्माता था, यद्यपि उसके स्वयं बनाए मानचित्र उपलब्ध नहीं है। 1500 ई0 के लगभग बनाया हुआ उसके साथी ह्वान डे ला कोसा (Juon ds la Cosa) का मानचित्र मैड्रिड (स्पेन) के सामुद्रिक संग्रहालय में सुरक्षित है। संसारव्यापी समुद्रसंतरण के सिलसिले में नए रास्ते एवं अन्य खोजों का समावेश तीव्रता से बढ़ता गया।
16वीं एवं 17वीं सदी में डच लोग (हॉलैंड निवासी) यूरोप में सर्वश्रेष्ठ मानचित्रकार थे। मर्केटर ने, जो डच मानचित्र परिलेखन का जन्मदाता माना जाता है, अपना सुप्रसिद्ध मर्केटर मानचित्र प्रक्षेप (Mercator's map projection) बनाया (देखें मर्केटर प्रक्षेप) इंग्लैंड निवासी चार्ल्स सेक्स्टन को इंग्लैंड के मानचित्र कला की परंपरा का पिता माना जाता है। उन्होंने बहुत से उच्च कोटि के मानचित्र बनाए। 17वीं सदी के अंत तक सर्वेक्षण के विभिन्न यंत्र, जैसे प्लेनटेबुल, सेक्स्टैंट, थियोडोलाइट (Theodolite) आदि का प्रयोग अच्छी तरह होने लग गया था, जिससे प्राप्त आँकडों (data) से मानचित्र निर्माण की प्रचुर सामग्री प्राप्त होने लगी।
त्रिकेणमितीय सर्वेक्षण और देशांतरों की शुद्ध माप के 18वीं सदी में संभव हो जाने पर मानचित्रों का शुद्धिकरण एवं सेशोधन युग प्रारंभ हुआ। पहले फ्रेंच लोग इसमें अगुआ थे। सी0 एफ0 कैसिनी (C.F. Cassini) तथा उसके पुत्र ने फ्रांस में विश्व का प्रथम राष्ट्रीय सर्वेक्षण प्रारंभ किया। बाद में इंग्लैंड की सैनिक एवं राजनीतिक शक्ति बढ़ी और लंदन मनचित्र निर्माण एवं छापने में अग्रणी हो गया। 1801 ई0 में सर्वप्रथम 1 इंच =1 मील का मानचित्र वहाँ तैयार किया गया। बाद में स्पेन, जर्मनी, स्विट्सरलैंड आदि अन्य देशों में भी राष्ट्रीय सर्वेक्षण प्रारंभ किए गए। 19वीं तथा 20वीं सदी में मानचित्र विज्ञान की अत्यधिक प्रगति हुई है। नई नई वैज्ञानिक पद्धतियों के विकास से मानचित्र तैयार किए गए है। फ्रांस, संयुक्त राज्य (अमरीका) एवं सोवियत रूस ने राष्ट्रीय ऐटलस निर्माण की पद्धति प्रारंभ की, जिसमें राष्ट्र के बारे में शोधपूर्ण संसाधन तथ्यों का आलेख रहता है। वायुयान द्वारा भूभागों की फोटो लेने की पद्धति ने पिछले दशकों, विशेषकर द्वितीय युद्ध तथा इसके उत्तरकाल में, मानचित्र कला की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान किया है।
भारत में भी मानचित्र कला की प्रगति के दो महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ किए गए हैं: राष्ट्रीय ऐटलस का निर्माण तथा वायुयान द्वारा भू-सर्वेक्षण। अब तक भूगोलविदों के संरक्षण में राष्ट्रीय ऐटलस योजना ने हिंदी तथा अंग्रेजी में राष्ट्रीय ऐटलस का संस्करण प्रकाशित किया है। जनसंख्या वितरण के कुछ प्रत्रक भी प्रकाशित हो गए हैं।
इन्हें भी देखें [संपादित करें]
बाहरी कड़ियाँ [संपादित करें]
- International Cartographic Association (ICA), the world body for mapping and GIScience professionals
- Cartography and Geographic Information Society (CaGIS), USA The CaGIS(ociety)promotes research, education, and practice to improve the understanding, creation, analysis, and use of maps and geographic information. The society serves as a forum for the exchange of original concepts, techniques, approaches, and experiences by those who design, implement, and use cartography, geographical information systems, and related geospatial technologies.
- North American Cartographic Information Society (NACIS)
- Deutsche Gesellschaft für Kartographie (German Cartographic Society)
- British Cartographic Society
- The Canadian Cartographic association (CCA)
- Swiss Society of Cartography
- SSSI Spatial Information & Cartography Commission, Australia
- Comité Français de Cartographie (French Cartographic Society)
- The New Zealand Cartographic Society
- Associazione Italiana di Cartografia (Italian Association of Cartography)
- Japan Cartographers Association
- Society of Cartographers supports the practising cartographer and encourages and maintains a high standard of cartographic illustration
- National Cartographic Center of Iran (NCC), Tehran
- Mapping History - a learning resource from the British Library
- Geography and Maps, an Illustrated Guide, by the staff of the US Library of Congress.
- The history of cartography at the School of Mathematics and Statistics, University of St. Andrews, Scotland
- Antique Maps by Carl Moreland and David Bannister - complete text of the book, with information both on mapmaking and on mapmakers, including short biographies of many cartographers
- Concise Bibliography of the History of Cartography, Newberry Library
- UPCT : project aimed at creating a world map (a French map to begin) with voluntaries using GPS
- OpenStreetMap : project aimed squarely at creating and providing free geographic data of the world.
- GITTA - A webbased open content eLearning course with basic and intermediate cartography lessons based on the eLML XML framework.
- cartographers on the net SVG, scalable vector graphics: tutorials, examples, widgets and libraries
See Maps for more links to modern and historical maps; however, most of the largest sites are listed at the sites linked below.
- Odden's fascinating world of maps and mapping has a huge database of links on maps and cartography (under "Literature").
- Online map catalogs in North America and Europe lists some good places to search for online maps.
- A listing of over 5000 websites describing holdings of manuscripts, archives, rare books, historical photographs, and other primary sources for the research scholar
- UNEP/GRID-Arendal Maps and Graphics Library, web-site from the UN Environment Programme with hundreds of examples of thematic maps
- Kartografi-Indonesia A website displaying cartograms of various Indonesian-related data made by the Dept. Computational Sociology of Bandung Fe Institute.
- Mapping Our World Oxfam's interactive site to help pupils develop geography skills through activities all about maps, globes and how we view the world