भारतीय सर्वेक्षण विभाग

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सर्वे ऑफ इण्डिया
भारतीय सर्वेक्षण विभाग
Survey of india.jpg
संस्था अवलोकन
स्थापना १७६७
पूर्ववर्ती संस्थाएं ट्राइगोनोमेट्रीकल सर्वे ऑफ इंडिया, १८०२
 
रेवेन्यू सर्वे और मैपिंग सर्वे
अधिकार क्षेत्र भारतीय भूमि
मुख्यालय पोस्ट बॉक्स.३७, देहरादून, १८४५
उत्तरदायी मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री
संस्था कार्यपालकगण सचिव विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार
 
मेजर जनरल आर एस तंवर, अतिरिक्त महासर्वेयर
मातृ संस्था विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार
चित्र:India Map based on Survey of India rivers.png
भारत का राजनीतिक रेखांकन नक्शा भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा प्रकाशित। कश्मीर विवाद पर भारतीय स्थिति राष्ट्रीय सीमाओं द्वारा दर्शित है।

भारतीय सर्वेक्षण विभाग, भारत की नक्शे बनाने और सर्वेक्षण करने वाली केन्द्रीय एजेंसी है। इसका गठन १७६७ में ब्रिटिश इंडिया कम्पनी के क्षेत्रों को संगठित करने हेतु किया गया था। यह भारत सरकार के पुरातनतम अभियांत्रिक विभागों में से एक है। सर्वेक्षण विभाग की अद्भुत इतिहास रचना में व्याल/मैमथ महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण भी आते हैं।[1]

परिचय

आधुनिक काल में किसी भी सभ्य देश की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परिशुद्ध मानचित्र अत्यंत आवश्यक है। प्रशासन, सुरक्षा, कृषि, सिंचाई, वनप्रबंध, उद्योग, संचार, आदि विविध क्षेत्रों में जनता की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानचित्र पहली आवश्यकता है। इस कार्य को समुचित रीति से करने के लिये भारत सरकार ने भारतीय सर्वेक्षण विभाग स्थापित किया है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत सर्वे ऑफ इंडिया, नेशनल सर्वे और मैपिंग आर्गेनाइजेशन ऑफ दि कंट्री भारत सरकार के सबसे पुराने वैज्ञानिक विभाग हैं। इसकी स्थापना कैप्टन टी जी मोंटोगोमरी के निर्देशन में की गई थी। देश की मुख्य मैपिंग एजेंसी के रूप में यह संस्थान प्रशंसनीय भूमिका निभाता आ रहा है।[2] यह अभियान और एकीकृत विकास के लिए भी आधार मानचित्र उपलब्ध कराता है और सुनिश्चित करता है कि सभी संसाधनों का उपयोग देश की प्रगति, उन्नति और सुरक्षा के लिए हो। सर्वे ऑफ इंडिया ट्राइगोनोमेट्रीकल सर्वे, रेवेन्यू सर्वे और मैपिंग सर्वे नामक तीन संस्थानों का एक संयोग है।[1]

भारत के पहले सर्वेयर जनरल ऑफ सर्वे कर्नल विलियम लेम्बटन को १८०२ में ट्राइगोनोमेट्रीकल सर्वे ऑफ इंडिया की स्थापना का श्रेय जाता है। इसे पूरा करने में ४० साल लगे और यह २४०० मील के क्षेत्र पर फैला हुआ है। १८३० में मेजर जॉर्ज एवरेस्ट भारत के सर्वेयर जनरल ऑफ सर्वे बने और उन्होंने मसूरी में ट्रांग्यूलेशन के जरिए मैपिंग का काम पूरा कराया।[2] उन्होंने मसूरी इन स्टेट, जो पार्क कहलाता था, में अपना आवास रखा। यह पार्क ७८°द. देशांतर की वजह से काफी महत्त्वपूर्ण है जो उपमहाद्वीप को दो भागों में बांटता है और यह इस घर से गुजरता है। सर्वे ऑफ इंडिया का मुख्यालय १८४५ से ही देहरादून में स्थित है[3] और इसके संग्रहालय में लेम्बार्ट और एवरेस्ट द्वारा उपयोग किया गया मूल थियोडोलाइट है। इसने वृद्धि और परिवर्तन का वर्षो से आई.एम.ए में स्थान प्राप्त कर लिया है।[2]

यह विभाग मानचित्र प्रकाशित करता है और अप्रतिबंधित वर्ग के मानचित्र इससे अति लघु मूल्य पर प्राप्त किये जा सकते हैं।[3] प्रतिबन्धित नक्शों के क्रय हेतु सरकारी सक्षम अधिकारियों की अनुमति आवश्यक है। केवल भारतीय नागरिक ही इससे टोपोग्राफिकल नक्शा क्रय कर सकते हैं और वे भी इसका निर्यात किसी कारण से भी नहीं कर सकता है। इसकी नीतियां समय समय पर बदलतीं और अद्यतित होतीं रहतीं हैं।[3]

सर्वेक्षण विभाग का मुख्यालय देहरादून, उत्तराखंड में स्थित है। इसमें १८ नागर अभियांत्रिकी मंडल हैं, जिनका कार्यक्षेत्र ज्वारों के पूर्वानुमान से हवाई सर्वेक्षण तक विस्तृत है। इसके भारत पर्यन्त २३ भूगर्भ-स्पेशियल आंकड़े केन्द्र हैं, प्रत्येक अपने प्रशासनिक क्षेत्र से जुड़ा है।

इतिहास

ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों ने 1750 ई. में ही बंबई, कलकत्ता और मद्रास के आसपास प्रशासन, राजस्वनिर्धारण और व्यापार की दृष्टि से जहाँ-तहाँ सर्वेक्षण प्रारंभ किया था। 1767 ई. में मेजर रेनेल बंगाल के प्रथम महासर्वेक्षक नियुक्त हुए। इनकी नियुक्ति का उद्देश्य सफल प्रशासन और वाणिज्यप्रसार के लिये बंगाल का एक बृहत्‌ मानचित्र तैयार करना था। इनके सहायक अधिकतर सैनिक इंजीनियर थे जिन्हें खगोलीय निरीक्षण द्वारा मार्गसर्वेक्षण का अनुभव था और जिन्हें शांति के दिनों में सेना से मुक्त किया जा सका था। ये मानचित्र सन्‌ 1776 में इंग्लैंड में उत्कीर्ण और मुद्रित हुए और सारे बंगाल में 60 वर्षो तक ये ही प्राप्य नक्शे थे।

विश्वस्त अभिलेखों और सर्वेक्षणों के आधार पर बना हुआ रेनेल का 'हिंदुस्तान का मानचित्र' इंग्लैंड में 1782 ई. में उत्कीर्ण हुआ। इस मानचित्र का अधिकांश यात्रियों के रोजनामचों के आधार पर चित्रित हुआ था। समुद्र-तट-रेखा तो नौचालकों के निरीक्षणों के आधार पर कुछ हद तक शुद्ध अंकित हुई थी लेकिन देश के भीतरी भाग का रेखांकन शुद्ध नहीं कहा जा सकता था।

देश भर में धरातल तथा भौगोलिक सर्वेक्षणों के आधारभूत परिशुद्ध बिंदुओं का निर्धारण करने के लिए 1800 ई. में कैंप्टन लैंबटन नियुक्त हुए। उन्होंने देश भर में फैले हुए संबंधित बिंदुओं के अक्षांश और देशांतर का ज्ञान करने के लिए आधाररेखा (base line) और त्रिकोणीय ढाँचे (triangulation frame work) पर त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण किया। अन्य भूगणितीय (geodetic) कार्य गौण महत्व के समझे गए। लैंबटन की मृत्यु के बाद इस सर्वेक्षण का नाम 1 जनवरी, 1818 को 'भारत का महान्‌ त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण (The Great Trignometrical Survey of India) रखा गया और लैंबटन की मृत्यु के पश्चात्‌ कर्नल ऐवरेस्ट ने 1840 ई. के बाद इस कार्य को उत्तर में हिमालय की ओर बढ़ाया।

1815 ई. तक बंगाल, मद्रास और बंबई में अलग अलग एक एक महासर्वेक्षक था जो स्थानीय सरकार के अधीन कार्य करता था। 1815 ई. में तीन स्वाधीन महासर्वेक्षकों के पद को मिलाकर एक पद कर दिया गया, जिसपर कर्नल मैकेंजी भारत के एक महासर्वेक्षक नियुक्त हुए। कर्नल मैकेंजी का पहला कार्य भारत का प्रामाणिक मानचित्र तैयार करना था। 1830 से 1861 ई. और 1878 से 1883 ई. तक भारत का महासर्वेक्षक ही त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण का अधीक्षक था, यद्यपि यह एक स्वतंत्र विभाग बना रहा। भारत का चौथाई इंच ऐटलस चालू होने पर लगभग 1825 ई. में भारत का मानचित्र सामने आया और इस माला का पहला नक्शा 1827 ई. में मुद्रित हुआ। यह नक्शा केवल महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण के आधार पर ही बना और लंदन में संकलित तथा उत्कीर्ण हुआ। इस ऐटलस में 1868 ई. तक, जब उत्कीर्णन भारत में होने लगा, देश के आधे से अधिक भाग के मानचित्रों को प्रदर्शित कर दिया गया था। इस ऐटलस का कार्य 1905 ई. तक आगे बढ़ता रहा। पर 1905 ई. में इंच अंश मानचित्रों के एक नए विन्यास और एक इंच नक्शों की लगातार मालाओं ने पुराने मानचित्रों का स्थान ले लिया।

1905 ई. के बाद के आधुनिक सर्वेक्षण और मानचित्र

1905 ई. तक के किए गए स्थलाकृति सर्वेक्षण आधुनिक आवश्यकताओं को देखते हुए परिमाण और गुण में अपर्याप्त थे। अतएव 1904- 1905 ई. में इस समस्या की जाँच के लिये इंडियन सर्वे कमेटी नामक समिति गठित हुई। इस प्रकार भारत में आधुनिक सर्वेक्षण का प्रारंभ 1905 ई. में हुआ। उक्त समिति ने बृहत्‌ योजना बनाकर भावी सर्वेक्षणों के सम्बंध में नीति निश्चित की और 'भारतीय सर्वेक्षण' विभाग ने अनेक रंगों में स्थलाकृति मानचित्र माला (जंगलों के नक्शे सहित) तैयार करने का दायित्व सँभाला। राजस्व मानचित्रों का सर्वेक्षण प्रांतों पर छोड़ दिया गया। इस कदम से भारत के सर्वेक्षण विभाग को सारे देश का मानचित्र शीघ्रता से तैयार करने में काफी मदद मिली। इन प्रारंभिक कार्यो से यह विभाग शनै: शनै: स्थलाकृतिक सर्वेक्षण, खोज और दक्षिण एशिया के अधिकांश भूभाग के भौगोलिक मानचित्रों का अनुरक्षण तथा भूगणितीय कार्य के लिये जिम्मेदार बन गया है। आजकल एक सुस्थापित सरकारी विभाग है जिसकी परिशुद्ध भारतीय सर्वेक्षण, मानचित्र सर्वेक्षण और भूगणितीय कार्यो की परम्परा प्रशंसनीय है। देश की विकास योजनाओं के लिए आधुनिक सर्वेक्षणों को निष्पादित करने और स्थलाकृतिक तथा भौगोलिक मानचित्रों के अनुरक्षण में इसका महत्वपूर्ण हाथ है।

भारतीय सर्वेक्षण विभाग में मानचित्र उत्पादन के आँकडे

भारतीय सर्वेक्षण विभाग निम्नलिखित कोटि और प्रकार के मानचित्रों की तैयारी और देखभाल करता है :

स्थलाकृतिक मानचित्र

  • (क) समूचे भारत की व्याप्ति, 1:50,000 पैमाने पर।
  • (ख) 1:2,50,000 पैमाने पर मानचित्रों की माला में भारत की पूर्ण व्याप्ति।

अंतरराष्ट्रीय मानचित्र

  • (क) भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय विशिष्टियों पर 1:10,00,000 कार्टे इंटरनैशनल ड्यू मांड मानचित्र माला : विश्वव्याप्ति के एक भाग के रूप में।
  • (ख) आई. सी. ए. ओ. विशिष्टयों के एक भाग के रूप में 1:10,00,000 आई. सी. ए. ओ. मानचित्र
  • (ग) भारत के हवाई अड्डों के 'इंस्ट्रमेंट' ऐप्रोच चार्ट पैमाना 1:2,50,000
  • (घ) 2 इंच में 1 मील (1:31,680) पैमाने पर भारत के हवाई अड्डों का अवतरण चार्ट (मीट्रिक माप 1:30,000 होगी)।
  • (च) प्रधान हवाई अड्डों के लिए 1:12,000 और लघु हवाई अड्डों के लिए 1:20,000 पैमाने पर अवरोध चार्ट।

भौगोलिक मानचित्र

  • (क) दक्षिणी एशिया माला; पैमाना 1:20,00,000,
  • (ख) भारत और सीमावर्ती देशों का मानचित्र तथा
  • (ग) भारत का सड़क मानचित्र, पैमाना 1:2,50,000,
  • (घ) भारत का रेलवे मानचित्र, पैमाना 1 इंच से 67.08 मील (मीट्रिक माप 1:35,00,000)।
  • (च) भारत का राजनीतिक मानचित्र,
  • (छ) भारत का प्राकृतिक मानचित्र तथा
  • (ज) भारत के पर्यटक मानचित्र, पैमाना 1 इंच में 70 मील (मीट्रिक माप 1:40,00,000);
  • (झ) भारत और सीमावर्ती देशों का मानचित्र, पैमाने 1 इंच में 128 मील (मीट्रिक माप 1:80,00,000),
  • (ट) भारत और सीमावर्ती देशों का मानचित्र, पैमाने 1 इंच मे 192 मील (मीट्रिक माप 1:1,20,00,000),
  • (ठ) भारत और सीमावर्ती देशों का मानचित्र, पैमाना 1:10,00,000,
  • (ढ) चार इंच से एक मील पैमाने पर चुने क्षेत्र के वन मानचित्र (मीट्रिक माप 1:25,001)।

विविध मानचित्र

  • (क) भारत के प्रमुख नगरों एवं कस्बों के संदर्शक मानचित्र विविध पैमाने के;
  • (ख) तदर्थ आधार पर केंद्रीय और राज्य सकार के विभागों के लिए बहुप्रयोजनी योजना मानचित्र तथा
  • (ग) सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं के लिए अन्य विविध विभागीय मानचित्र।

विविध मानचित्र को छोड़कर 1905 ई से अब तक फुट पाउंड पद्धति पर छपे हुए अन्य मानक मानचित्र मालाओं की संख्या लगभग 3,600 है और हर 25 से 40 वर्षो में इनका बराबर पुनरीक्षण होता है।

भारतीय सर्वेक्षण विभाग का संगठन

अनेक प्रकार के मानचित्रों की तैयारी और सर्वेक्षण के लिए भारतीय सर्वेक्षण विभाग का संगठन नीचे दिया गया है :

भारत का महासर्वेक्षक जो सैनिक सर्वेक्षण का निदेशक भी होता है, इसका प्रशासनिक और तकनीकी नियंत्रण करता है। महासर्वेक्षक का मुख्य कार्यालय देहरादून में है और उसका कार्यालय उपमहासर्वेक्षक के अधीन है जो निदेशक की कोटि का होता है। वह भारत के महासर्वेक्षक का सहायक होता है और विभाग के तकनीकी काम, बजट और विनिमय, एवं भंडार का उत्तरदायी होता है। अधीक्षक सर्वेक्षक की कोटि का एक अफसर और होता है जिसके पद का नाम सहायक महासर्वेक्षक है और वही तकनीकी काम और विभाग की नित्यचर्या प्रशासन का उत्तरदायी होता है।

स्थलाकृतिक मंडल निम्नलिखित हैं :

  • (1) मानचित्र प्रकाशन कार्यालय,
  • (2) भूगणितीय तथा अनुसंधान शाखा,
  • (3) हवाई सर्वेक्षण और प्रशिक्षण निदेशालय

भूगणितीय तथा अनुसंधान शाखा को छोड़कर, जो उपनिदेशक के नियंत्रण में हैं, शेष सभी मंडल निदेशालय निदेशक के नियंत्रण में हैं। ये सभी भारत के महासर्वेक्षक के समक्ष उत्तरदायी हैं। प्रत्येक निदेशक के अधीन एक उपनिदेशक होता है जिसके अधीन विविध क्षेत्रीय हवाई सर्वेक्षण और फोटो माप सर्वेक्षण दल और प्राय: एक रेखन कार्यालय होता है। कुल तीन मानचित्र पुन: रचना कार्यालय हैं : दो देहरादून में निदेशक, मानचित्र प्रकाशन के अधीन और एक कलकत्ते में निदेशक, पूर्वी मंडल के अधीन।

निदेशक मानचित्र प्रकाशन

इसका मुख्यालय देहरादून में है। इसके अधीन एक रेखन कार्यालय, दो मानचित्र पुनरंचना कार्यालय (हाथी बरकला लिथो आफिस और फोटोजिको कार्यालय, छपाई कार्यालय को सम्मिलित करके), एक मानचित्र संग्रह तथा निकास कार्यालय ओर एक लघु मोटर परिवहन वर्कशाप है। यह निदेशक मानचित्र संबंधी नियम और नीति के निर्धारण मे भारतके महासर्वेक्षक का परामर्शदाता है। वह इस बात का उत्तरदायी है कि सब विभागीय मानचित्रों का रेखन और छपाई के काम का ठीक समन्वय करता है। सभी भौगोलिक मानचित्रों का रेखन, रेखन कार्यालय सं. 1 में होता है जो इसके अधीन हैं। मानचित्र विक्रय, नई दिल्ली का संचालन भी यही निदेशालय करता है।

निदेशक, उत्तरी मंडल

इसका मुख्यालय देहरादून में है। वह उत्तर भारत के जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरप्रदेश और पंजाब तथा मध्यप्रदेश के भागों के कुछ स्थलाकृतिक, छावनी, वन और आयोजन सर्वेक्षण के लिए उत्तरदायी है। इसकी देखरेख में देहरादून में एक रेखन कार्यालय और कई क्षेत्रीय दल हैं।

निदेशक, पूर्वी मंडल

इसका मुख्यालय कलकत्ता में है। पूर्वी भारत में उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, बिहार, असम (नेफा सहित), सिक्किम, भूटान, अंदमन और निकोबार द्वीप के सर्वेक्षण और मानचित्र बनाने के लिये उत्तरदायी है। इसके अधीन एक मंडल रेखन कार्यालय, एक मुद्रण कार्यालय और कई क्षेत्रीय दल हैं।

निदेशक, पश्चिमी मंडल

इसका मुख्यालय आबु में है। यह राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र राज्यों के सर्वेक्षण और मानचित्र बनाने के लिए उत्तरदायी है। इसके अधीन एक रेखन कार्यालय और कई क्षेत्रीय दल हैं।

निदेशक, हवाई सर्वेक्षण और प्रशिक्षण निदेशालय

इसका मुख्यालय देहरादून में है। यह हवाई सर्वेक्षणों के आयोजन और क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी है और उस कार्य का नियंत्रण करता है जो फोटोमापी सर्वेक्षण की आलेखन मशीनों पर बहुत मितव्ययिता से हो सके। वह सभी अफसरों और विभाग के कुछ कर्मचारीवृंद के प्रशिक्षण के लिये भी उत्तरदायी है। उसके अधीन दो प्रशिक्षण दल तथा कई फोटोमापी सर्वेक्षण के दल कार्य करते हैं।

उपनिदेशक, भूमगणितीय तथा अनुसंधानशाखा

इसका मुख्यालय देहरादून में है। यद्यपि इसके पद का नाम उपनिदेशक है, तथापि इसे निदेशक के सभी प्रशासनिक अधिकार प्राप्त हैं। यह भारत भर में सभी भूगणितीय और भूभौतिकीय (Geophysical) सर्वेक्षणों के लिए उत्तरदरायी है। इसके कार्य के अंतर्गत हैंश् : उच्च परिशुद्ध, प्रधान और गौण तलेक्षण तथा ज्वारीय प्रेक्षण। वह भूगणितीय और भूभौतिकीय अनुसंधान कार्य, विभागीय कार्य, अनुषंगी तालिकाओं (auxiliary tables) और गणना फार्म तैयार कराने के लिए उत्तरदायी है। इसके अधीनस्थ एक गणना दल, एक ज्वारीय दल, एक भूभौतिकीय दल और अन्य क्षेत्रीय दल हैं। देहरादून में इसके अंतर्गत वेधशालाएँ और एक वर्कशॉप भी है।

भारतीय सर्वेक्षण के मानचित्रों का विक्रय

मानचित्रों को सीधे ही भारतीय सर्वेक्षण विभाग के देहरादून, कलकत्ता, बेंगलूर और दिल्ली के कार्यालय से मोल लिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त मानचित्र भारत कें सर्वत्र स्थापित मानचित्र विक्रय एजेंसियों से भी खरीदे जा सकते हैं, जो सारे देश में विख्यात पुस्तक विक्रेताओं और प्रकाशकों को दी गई हैं। भारतीय सर्वेक्षण के मानचित्र विक्रय कार्यालय इन पतों पर हैं :

  • मैप रिकार्ड ऐंड इशू ऑफिस, हाथीबरकला, देहरादून।
  • मैप रिकार्ड ऐंड इशू ऑफिस, 13, वुड स्ट्रीट, कलकत्ता।
  • सदर्न सर्कल, सर्वे ऑव इंडिया, 22, रिचमंड रोड, बेंगलूर।
  • मानचित्र विक्रय विभाग, जनपथ बैरक्स, फ्लोर 'ए', नई दिल्ली।

संदर्भ

  1. "अबाउट अस" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएमएल). भारतीय सर्वेक्षण विभाग. pp. ०१. http://www.surveyofindia.gov.in/about%20us.html. अभिगमन तिथि: २००९. 
  2. फिलिमोर, रेजिनाल्ड हेनरी. "हिस्टॉरिकल रिकार्ड्स अफ सर्वे आफ इण्डिया" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएमएल). देहरादून, भारतीय सर्वेक्षण विभाग. pp. ५ खण्ड. http://www.surveyofindia.gov.in/Activities.htm. अभिगमन तिथि: 1945-1968. 
  3. "गतिविधियां" (अंग्रेज़ी में) (एचटीएमएल). भारतीय सर्वेक्षण विभाग. pp. ०१. http://www.surveyofindia.gov.in/Activities.htm. अभिगमन तिथि: २००९. 

इन्हें भी देखें

बाहरी कड़ियाँ