बिरजू महाराज

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बिरजू महाराज या पंडित बिरजू महाराज प्रसिद्ध कथक नर्तक एवं शास्त्रीय गायक हैं।

पद्म विभूषण से सम्मानित, जानेमाने कत्थक गुरू पंडित बिरजू महाराज मानते हैं कि नृत्य और संगीत में प्रयोग कतई ग़लत नहीं है, बशर्ते कलाकार उसके दायरे को पहचाने और अपनी पहचान को क़ायम रखे। संगीत और नृत्य की तमाम विधाओं में निपुण बिरजू महाराज वर्तमान भारतीय फ़िल्मों में नृत्य को लेकर हो रहे प्रयोगों के प्रति चिंतित भी हैं। आज कत्थक को एक मुकाम तक पहुँचाने वाले लखनऊ घराने के इस कलाकार का शुरुआती दौर संघर्ष का रहा और इसीलिए वो आज भी अपने को गुरू के अलावा एक अच्छा शागिर्द और शिष्य मानते हैं।

ऐसे ही कुछ पहलुओं पर पिछले दिनों उनसे हुई ख़ास बातचीत के अंश:

शुरुआती दिन[संपादित करें]

कत्थक और बिरजू महाराज का साथ कैसे हुआ, कुछ शुरुआती दिनों की स्मृतियों से बताएँ

मेरा जन्म ही लखनऊ के एक बड़े कत्थक घराने में हुआ। पिता अच्छन महाराज, चाचा शंभू महाराज का ख़ासा नाम था पर जब मैं केवल नौ वर्ष का था, पिता जी गुज़र गए। एक वक़्त घर में नौकर थे, पर पिताजी के देहांत के बाद कर्ज़ और ग़रीबी का दौर झेला। एक वक़्त था जब घर में घोड़े-गाड़ी, आठ-आठ नौकर थे, सब कुछ था पर पिताजी के गुज़र जाने के बाद कर्ज़ में भी रहे और ग़रीबी का दौर भी झेला।

उन दिनों न टेप था, न रेडियो था, हाँ मगर दिमाग पर उस वक्त जो याददाश्त क़ायम हो पाई थी, वो आज भी वैसी ही है। हमारी गुरूबहन कपिला वात्स्यायन उन दिनों लखनऊ आईं और वह मुझे अपने साथ दिल्ली ले आईं. इसी तरह मेरी कथक यात्रा शुरू हुई।

छोटी उम्र में पिता को खोना, बड़े घराने से होने के कारण लोगों की आपसे अपेक्षाएँ और आपकी अपनी पहचान की लड़ाई, उस शुरुआती दौर के संघर्ष को कैसे याद करते हैं?

दिल्ली में शुरुआत के दिन काफ़ी संघर्ष भरे थे। 175 रूपए की नौकरी थी, जामा मस्ज़िद से ख़रीदी हुई रॉबिन हुड साइकिल मेरे पास आज भी रखी है। उन दिनों पाँच और नौ नंबर की बसें दिल्ली में चलती थीं, कनॉट प्लेस से दरियागंज के लिए. मैंने कोलकाता से अपने सफलता के सफ़र की शुरुआत की और फिर मुंबई में काफ़ी आगे बढ़ा. मैं कोलकाता को अपनी माँ और मुंबई को अपना पिता कहता हूँ.

मुझे बैले में काफ़ी रुचि थी। लगता था कि एक आदमी की जगह अगर कई लोग नाचें तो लोगों को कितना पसंद आएगा और फिर शुरुआत मैंने मालती माधो, शानेअवध, कुमार संभव, दालिया जैसे कितने ही कंपोजीशन तैयार किए। संघर्ष के बिना जिसका जीवन शुरू हो, जो आदमी सुख में ही पैदा हो, उसे संघर्ष करना आता ही नहीं और वह बहुत कुछ कर भी नहीं पाता

मतलब यह है कि संघर्ष के बिना जिसका जीवन शुरू हो, जो आदमी सुख में ही पैदा हो, उसे संघर्ष करना आता ही नहीं और वह बहुत कुछ कर भी नहीं पाता। मैंने अपनी सीखने की ललक नहीं छोड़ी और न ही पद्म विभूषण जैसे सम्मान पाकर मेरे दिमाग में शान का भाव आया। मैं आज भी अच्छा शागिर्द और अच्छा शिष्य हूँ।

कथक घराने की परंपरा[संपादित करें]

अपने कथक घराने की परंपरा के बारे में कुछ बताएँ

घराना वहाँ होता है जहाँ कोई काम पुश्तैनी तौर पर हो. हमारे यहाँ से तमाम कला साधकों के अलावा भांडों, तवायफ़ों, अलग-अलग जगह के लोगों ने भी सीखा और जो अच्छा करते थे वो अपने को शागिर्द कहते थे। पर बाद में वो जहाँ के थे, उसी घराने के नाम से बताए जाने लगे. मैं इस बहस में ज़्यादा नहीं जाता क्योंकि मेरा मानना है कि अगर कोई अंग्रेज़ भी अगर अच्छा कर रहा है और उसकी कला की तासीर हमें आनंद दे तो वह व्यक्ति भी अपनेआप में एक घराना है।

शैली[संपादित करें]

प्रयोग का आपकी कला और जीवन में कितना महत्व रहा है?

मैंने कई तरह के प्रयोग किए हैं और मैं इसका विरोध नहीं करता हूँ पर इसका भी एक दायरा होना चाहिए. प्रयोग हो पर उसके साथ अपनी पहचान भी. प्रयोग के साथ अपनी पहचान नहीं खोनी चाहिए। 'प्रयोग के साथ अपनी पहचान नहीं खोनी चाहिए'

आज की फ़िल्मों में शास्त्रीय नृत्य को लेकर हो रहे प्रयोगों को किस रूप में देख रहे हैं?

आज इतने तरह के संसाधन और लोगों की पहुँच बढ़ गई है लेकिन 50 वर्ष पहले की फ़िल्मों को देखें तो कोठे से लेकर कॉमेडी तक कथक का प्रयोग फ़िल्मों में दिखता था और लच्छू महाराज जैसे लोगों ने तो नृत्य निर्देशन मं भी इसका ख़ूब इस्तेमाल किया है। आज तो पश्चिमी प्रभाव के आने के बाद उसे फ़्यूज़न कहें या फिर कन्फ़्यूज़न कहें, नए तरह का नाच सामने है पर यह सब ज़्यादा दिनों तक नहीं टिकेगा।

(साभार बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम)

पुरस्कार[संपादित करें]