डी एन ए अंगुली छापन

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डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तकनीक का उपयोग आपराधिक मामलों की गुत्थियां सुलझाने के लिए किया जाता है। इसके साथ ही मातृत्व, पितृत्व या व्यक्तिगत पहचान को निर्धारित करने के लिए इसका प्रयोग होता है।[1] वर्तमान में पहचान ढूंढने के तरीकों में अंगुल छापन (फिंगरप्रिंटिंग) सबसे बेहतर मानी जाती है। जीव जंतुओं, मनुष्यों में विशेष संरचनायुक्त वह रसायन जो उसे विशिष्ट पहचान प्रदान करता है, उसे डीएनए (डाई राइबो न्यूक्लिक एसिड) कहते हैं। इस पद्धति में किसी व्यक्ति के जैविक अंशो जैसे- रक्त, बाल, लार, वीर्य या दूसरे कोशिका-स्नोतों के द्वारा उसके डीएनए की पहचान की जाती है। डीएनए फिंगरप्रिंट विशिष्ट डीएनए क्रम का प्रयोग करता है, जिसे माइक्रोसेटेलाइट कहा जाता है। माइक्रोसेटेलाइट डीएनए के छोटे टुकड़े होते हैं। शरीर के कुछ हिस्सों में इनकी संख्या अलग-अलग होती है।

तकनीक[संपादित करें]

१९८४ में ब्रिटिश लीसेस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक सर एलेक जेफ्रेज ने इस तकनीक का विकास किया था।

शरीर में उपस्थित अरबों-खरबों कोशिकाओं के क्रियाकलाप डीएनए द्वारा निश्चित किये जाते हैं। हालांकि डीएनए कणों का ढांचा हर व्यक्ति में एक समान होता है, लेकिन उन्हें गढ़ने वाले बुनियादी अवयवों का क्रम सभी में समान नहीं होता। एक ही प्रजाति के सदस्यों के बीच पहचान ढूंढने के लिए इस अंतर का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया को जेनेटिक फिंगरप्रिंटिंग और डीएनए प्रोफाइलिंग भी कहा जाता है।[1] १९८४ में ब्रिटिश लीसेस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक सर एलेक जेफ्रेज ने इसका विकास किया था। फोरेंसिक विज्ञान में डीएनए फिंगरप्रिंट का उपयोग होता है। अब फोरेंसिक जांच के लिए वास्तविक अंगुल छाप की आवस्यकता नहीं पड़ती है। इसकी मदद से अपराधी को मात्र एक बूंद के आधार पर ही पकड़ा जा सकता है। डीएनए के नमूने को लिए गए डीएनए एंजाइम द्वारा सेंगमेंटाइज्ड किया जाता है। इसके बाद इसकी छानबीन करके इसे एक्स-रे फिल्म पर एक्सपोज किया जाता है जहां वह ब्लैक बार बनाते हैं, जिन्हें डीएनए फिंगरप्रिंट कहते हैं।

जीवन सूत्र यानि डी एन ए संसार के सभी जीवधारियों में, मानवों की तरह वंशानुक्रम पर आधारित होता है। यह किसी भी जीव की हर सूक्ष्म इकाई में पाया जाता है। अपने जैविक माता-पिता से प्राप्त इस जीवन सूत्र में छिपी हुई सूक्ष्म विभिन्नताओं के आधार पर प्रत्येक जीव को किसी भी अन्य जीव से अलग पहचाना जा सकता है। जीवन सूत्र के इन अत्यधिक परिवर्ती खंडों को अलग करके, रेडियो सक्रिय बनाये जाने के बाद वैज्ञानिक विधि द्वारा विश्लेषण करने से एक व्यक्ति विशेष का क्रमादेश प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि क्रमादर्श मनुष्य के लिये उसी तरह विशिष्ट होता है, जैसे कि अंगूठे का निशान। अतः इस विधि को प्रचलित रूप से डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग के नाम से जाना जाता है। इसमें थोड़े से ही डी एन ए का प्रयोग करके, डि एन ए के उन विशिष्ट भागों, जो वैविध्यपूर्ण होते हैं, को एक रासायनिक शृंखला अभिक्रिया से वृद्धिगत करकों को विशिष्ट जैली समान माध्यम से अलग करके हर टुकड़े का अध्ययन किया जा सकता है।

मानवों में[संपादित करें]

मानव की पहचान उसके गुणों तथा नाम से की जाती है। दो व्यक्ति सभी गुणों में समान नहीं होते। जुड़वां भी चाहे कितने भी समान क्यों ना हों, फिर भि उनमें भिन्नता पायीं जातीं हैं। त्वचा का रंग, बालों का रंग, आंखों की पुतलियों का रंग, लंबाई, आवाज़, चलने, उठने बैठने का ढंग, बात करने का तरीका, रहन-सहन आदि ऐसे लक्षण हैं, जिनसे मनुष्यों में अंतर और पहचान की जा सकती है।

मानव की व्यक्तिगत पहचान और अंतर को कानूनी रूप देने की आवश्यकता पड़ी। प्रत्येक मानव के अंगुलियों के निशान भिन्न होते हैं। उनमें उभार भिन्न स्थानों पर होते हैं। इस कारण जो चित्र बनता है, उसे अंगुल छाप या फिंगर प्रिंट कहते हैं। वस्तुतः यह कानूनी रूप से मानव की पहचान का तरीका है, जो बहुत पहले फ्रांसिस-गॉल्टन ने निकाला था और आज भी प्रचलित है। यह प्रकृति की देन है।

जीवन सूत्र यानि डी एन ए संसार के सभी जीवधारियों में, मानवों की तरह वंशानुक्रम पर आधारित होता है। यह किसी भी जीव की हर सूक्ष्म इकाई में पाया जाता है। अपने जैविक माता-पिता से प्राप्त इस जीवन सूत्र में छिपी हुई सूक्ष्म विभिन्नताओं के आधार पर प्रत्येक जीव को किसी भि अन्य जीव से अलग पहचाना जा सकता है।

जीवन सूत्र के इन अत्यधिक परिवर्ती खंडों को अलग करके, रेडियो सक्रिय बनाये जाने के बाद वैज्ञानिक विधि द्वारा विश्लेषण करने से एक व्यक्ति विशेष का क्रमादेश प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि क्रमादर्श मनुष्य के लिये उसी तरह विशिष्ट होता है, जैसे कि अंगूठे का निशान। अतः इस विधि को प्रचलित रूप से डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग के नाम से जाना जाता है। इसमें थोड़े से ही डी एन ए का प्रयोग करके, डि एन ए के उन विशिष्ट भागों, जो वैविध्यपूर्ण होते हैं, को एक रासायनिक शृंखला अभिक्रिया से वृद्धिगत करकीक विशिश्ट जैली समान माध्यम से अलग करके हर टुकड़े का अध्ययन किया जा सकता है।

शरीर के हर अंग की कोशिकाओं में जीवन सूत्र अनिवार्य रूप से एक सा होता है। अतः किसी भी अंग की कोशिकाओं, रक्त की कुछ बूंदें, या कपड़े पर लगा रक्त का धब्बा, मूलरोम, मृत शरीर का कोई छोटा सा ऊतक या अंग, त्वचा, दांत, वीर्य आदि से जीवन सूत्र निकालकर डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग द्वारा आण्विक स्तर पर विश्लेषण करने से किसी भि व्यक्ति की सकारात्मक पहचान की जा सकती है।

सभ्यता और विज्ञान के विकास के साथ विश्व में अपराधों की संख्या दोनोंदिन बढ़ रही है। अपराधों के तरीकों के नये प्रकार विकसित हो गये हैं। इन अपराधों की बाढ़ को रोकने के लिये सर्व[प्रथम फिंगर प्रिंटिंग का ही सहारा लिया जाता है। रक्त परीक्षण से भि अपराधियों को पकड़ने में सहायता मिली है। डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र की अत्यंत विलक्षण नवीन जैविक तकनीक है। इस तकनीक का विकास सर्वप्रथम 1985 में इंग्लैंड के लायसेस्टर विश्वविद्यालय के प्रो॰ एलेक जेफरीज ने किया था।

डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग तकनीक आनुवांशिक विज्ञान की देन है। ग्रेगर जॉन मेंडल द्वारा आनुवांशिकी से अंबंधित्नियमों का प्रतिपादन किया गया, जो सर्वाधिक प्रमाणित और बाद में अनुसंधानों के लिये अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुए। जीवन सूत्र एक बहुत ही स्थिर रासायनिक तत्त्व है, अतः नमूना लिये जाने के बहुत बाद तक भी, इससे व्यक्ति विशेष का क्रमादेश बताया जा सकता है। डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग द्वारा बनाया गया क्रमादर्श जीवन पर्यंत एक सा ही रहता है।

प्रक्रिया चरण[संपादित करें]

डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग तकनीक के विविध चरणइस प्रकार होते हैं।

  • प्रथम चरण में डी एन ए का पृथक्करण तथा शुद्धिकरण किया जाता है। शुद्ध डी एन ए में अनेक टैंडम पुनरावृत्त होते हैं।
  • द्वितीय चरण में डी एन ए को विशिष्ट जगहों पर काटकर विखंडित किया जाता है। इसके लिए विशेष रेस्ट्रिक्शन एंज़ाइम प्रयोग में लाए जाते हैं। ये रासायनिक कैंचियों की तरह कार्य करते हैं।
  • तृतीय चरण में विखण्डित डी एन ए को जैल पर लगाया जाता है। विद्युत आवेश देने पर ये खण्ड अपने स्थान से विस्थापित होने लगते हैं। अपनी लम्बाई के हिसाब से डी एन ए खाण्ड अलग हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को इलेक्ट्रोफोरेसिस कहते हैं।
  • चतुर्थ चरण में उपर्युक्त अलग किए गए डी एन ए खंडों का डी-नैचुरेशन किया जाता है, यानि दोनों तंतुओं को अलग-अलग किया जाता है।
  • पंचम चरण में संपूरक डी एन ए से बने हुए रेडियो सक्रिय प्रोब की मदद से पुराने विखण्डित डी एन ए में से विशेष खण्डों की पहचान की जाती है। अतः रेडियो सक्रिय प्रोब के कारण विशेष डी एन ए खण्डों को पहचान लिया जाता है।

यहां तीन विभिन्न व्यक्तियों के जैल प्रतिचित्र देखिए, जिनका आपस में कोई रिश्ता नहीं है। ये प्रतिचित्र आपस में एक दूसरे से काफी अलग दिखते हैं और प्रत्येक प्रतिचित्र व्यक्ति विशिष्ट है। एक ही परिवार के तीन सदस्यों के जैल प्रतिचित्र गैलरी में दिखाए हैं। यहां माता और पिता के प्रतिचित्र तो भिन्न हैं, परंतु पुत्र का प्रतिचित्र माता और पिता –दोनों के प्रतिचित्रों से कुछ ना कुछ समानता रखता है। यहां समान जुड़वां बच्चों के प्रतिचित्र को देखेंगे, तो दिखता है; कि ये दोनों पूर्णतया एकसमान हैं। इस प्रकार डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग द्वारा विभिन्न व्यक्तियों की पहचान की जा सकती है, संतान के माता या पिता को पहचाना जा सकता है; लेकिन समान जुड़वों की पहचान करना संभव नहीं है।

उपयोग[संपादित करें]

डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग एक नूतन एवं सशक्त तकनीक है, जो निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रयोग में लायी जा सकती है:-

  1. अपराधों एवं पारिवारिक मामलों की जाँच,
  2. प्रतिरक्षा प्रलेख,
  3. आयुर्विज्ञान एवं स्वास्थ्य जाँच,
  4. वंशावली विश्लेषण
  5. कृषि एवं बागवानी,
  6. शोध एवं उद्योग।

अपराधों एवं पारिवारिक मामलों की जाँच[संपादित करें]

डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग के द्वारा रक्त वीर्य, बाल, विक्षत मृत शरीर के अवशेष, दांत या हड्डी के टुकड़े आदि के माध्यम से वैयक्तिक स्तर पर सकारात्मक पहचान की जा सकती है। अतः यह विधि हत्या, बलात्कार, अमानुशःइक कृत्यों तथा जघन्य अपराधों, प्रवस-पत्र प्राप्ति, सम्पत्ति उत्तराधिकार, विवाह विच्छेद एवं दीवानी मुकदमों में माता-पिता की सकारात्मक पहचान इत्यादि मामलों में अत्यंत आवश्यक मानी जाने लगी है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में माता-पिता –दोनों ही के डी एन ए होते हैं, अतः डी एन ए की छाप के आधार पर इस बात की पुष्टि की जा सकती है।

फॉरेंसिक जैव प्रौद्योगिकी अभी एक नया क्षेत्र है, जो जंगलों में होने वाले अपराधों को सुलझाएन के लिये एक हथियार की तरह प्रयोग किया जा सकता है। भारतीय न्याय व्यवस्था नेडी एन ए फिंगर प्रिंटिंग को ठोस साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर लिया है। मृतक के शरीर के बिखरे हुए टुकड़ों की पहचान करने के लिये भि इस तकनीक का प्रयोग किया गया है। पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी एवं पंजाब के पूर्व मुख्य मंत्री बेअंत सिंह के लिये इसी तकनीक का उपयोग हुआ था। इनके अतिरिक्त अनेकों अपराधों के मामले इस तकनीक द्वारा सुलझाए गए हैं।

प्रतिरक्षा प्रलेख में[संपादित करें]

प्रतिरक्षा कर्मियों के जीवन सूत्र पैच्छेदिका में संकलित व्यक्ति विशेष क्रमादेशों की दुर्घटनाओं –जैसे युद्ध काल, या जहाज नष्ट होने के समय मृत रक्षाकर्मियों के शरीर के अवशेषों से डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग द्वारा प्राप्त क्रमादेशों की तुलना रक्षाकर्मियों की पहचान के लिये एक बहुत ही अर्थपूर्ण विधि सिद्ध हो सकती है।

आयुर्विज्ञान एवं स्वास्थ्य जाँच[संपादित करें]

गर्भ-धारण से पूर्व या गर्भ के दौरान ही, इस विधि द्वारा आनिवांशिक रोगों एवं अंतर्जात त्रुटियों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है और इन विकारों की आवृत्ति को एक सीमा तक नियंत्रित करके समस्त मानव जाति की इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।

वंशावली विश्लेषण[संपादित करें]

डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग द्वारा किये गए वंशावली विश्लेषण के आधार पर पशुओं में वांछित गुणों का चयन किया जा सकता है। इस विधि को पशुओं की विशेष जाति के सुधार के लिए प्रयुक्त करके इस क्षेत्र में वांछित सफलता प्राप्त की जा सकती है।

कृषि एवं बागवानी[संपादित करें]

कृषि एवं बागवानी के क्षेत्र में बीजों की सही जाति का परीक्षण डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग के द्वारा किया जा सकता है। यह अधिक उत्तम और वांछित जातियों के विकास में सहायक सिद्ध हो सकता है। यह विधि एक ही प्रकार के नर या मादा पौधों के चयन में सहायक सिद्ध हो सकती है। जैसे अमरूद, खजूर आदि, जिनमें मादा पौधे ही वांछित हैं, तथा लिंग का पता एक लंबे समय के बाद ही चलता है। ऐसे मामलों में इस विधि का प्रयोग करके समय, श्रम एवं धन की बचत की जा सकती है।

शोध एवं उद्योग[संपादित करें]

डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग विधि द्वारा कोशिका की मौलिकता प्रमाणित कर अन्यान्य शोध कार्यों में प्रयुक्त करके शोध एवं उद्योग, या उद्योग मात्र –दोनों क्षेत्रों में उन्नति की अपेक्षा की जा सकती है। जब डी एन ए के बहुत से भागों का अध्ययन एक ही साथ किया जाता है, तो वह डी एन ए फिंगर प्रिटिंग कहलाता है, तथा जब डी एन ए के एक ही भाग का परीक्षण किया जाता है, तो उसे डी एन ए टाइपिंग कहते हैं। जितने अधिक भागों को एक साथ जाँचा जाता है, फिंगर प्रिंट की विश्वसनीयता उतनी ही बढ़ जाती है।

भारत में डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग[संपादित करें]

1988 में भारत में हैदराबाद में स्थित कोशिकीय व आण्विक जीवविज्ञान केंद्र (सी सी एम बी) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ॰ लाल जी सिंह के शोध समूह ने इस विधि के लिये बी के एम (ब्रैंडेड क्रेट माइनर) नामक रोग को विकसित किया। इस प्रकार डॉ॰लाल जी सिंह के प्रयासों से आज भारत विश्व का तीसरा देश है, जहां पूर्णतया स्वदेशी डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग प्रोब को विकसित किया गया है। इस तकनीक का पूर्ण लाभ उठाने के लिए जन साधारण में यह चेतना बहुत जरूरी है। सी सी एम बी का प्रमुख लक्ष्य यही है, कि भारत में इस प्रिंटिंग तकनीक को बढ़ावा मिले, तथा इसका प्रयोग वैज्ञानिक अनुसंधानों के साथ साथ, आम आदमी की सहज पहुंच में हो और दैनिक कठिनाइयों से जूझना उसके लिए सरल हो जाए।

कुछ महत्वपूर्ण रोचक तथ्य[संपादित करें]

  1. मानव की कोशिका के डी एन ए की कुल लंबाई लगभग छः फीट होती है।
  2. आयु के साथ व्यक्ति के डी एन ए में कोई बदलाव नहीं आता है। अतः जन्म से मृत्यु पर्यंत डी एन ए एक सा ही रहता है।
  3. एक व्यक्ति के किसी भी ऊतक की किसी भी कोशिका से लिया गया डी एन ए एक ही प्रकार की डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग प्रतिचित्र प्रदर्शित करता है।
  4. सामूहिक बलात्कार की घटाना में सम्मिलित हर बलात्कारी की पहचान डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग द्वारा अलग-अलग की जा सकती है।
  5. ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया ने आपने देश में प्रवेश के लिए डी एन ए फिंगर प्रिंटिंग को अनिवार्य बना दिया है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. डीएनए फिंगरप्रिंटिंग। हिन्दुस्तान लाइव। १९ जनवरी २०१०

बाहरी सूत्र[संपादित करें]