ट्रैक्टर

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सामान से भरी ट्रॉली खींचता हुआ कर्षित्र

ट्रैक्टर (कर्षित्र) आधुनिक कृषि के उपयोग में आने वाला प्रमुख उपकरण है। यह एक ऐसी गाड़ी है जो कम चाल पर अधिक कर्षण बल (ट्रैक्टिव इफर्ट) प्रदान करने के लिये डिजाइन की गयी होती है। यह अपने पीछे जुडी हुई कृषि उपकरण, सामान लदी ट्रैलर, ट्राली आदि खींचने का कार्य भी करता है। इसके उपर कुछ ऐसे कृषि उपकरण भी लगाये जाते हैं जिन्हें ट्रैक्टर से प्राप्त शक्ति से चलाया जाता है।

परिचय[संपादित करें]

कर्षित्र (Tractor) वह स्वयंचालित (self-propelled) यंत्र है। इसका व्यवहार मुख्यत:

  • 1. कर्षण (tractive) कार्य, जैसे चल यंत्रों के खींचने और
  • 2. स्थिर कार्य (stationary work), जैसे पट्टक घिरनी आदि उपकरणों की सहायता से स्थिर या चल यंत्रों के यंत्रविन्यास (mechanism) को चलने के लिये होता है।

साधारणत: कर्षण कार्य ये हैं:
(क) जमीन को जोतकर तैयार करना,
(ख) बीज डालना,
(ग) पौध लगाना,
(घ) फसल लगाना,
(ड) फसल काटना, आदि।

स्थिर कार्य ये हैं:
(क) जल को पंप करना,
(ख) गाहना (threshing),
(ग) भरण पेषण (Feed Grinding),
(घ) लकड़ी चीरना, आदि।

विभिन्न प्रकर के कार्यों के लिये पाँच प्रकार मुख्य मूल चालक (prime movers) निम्नलिखित हैं: 1. घरेलू जानवर,
2. वायुचालित यंत्र,
3. जलचालित यंत्र,
4. विद्युच्चालित यंत्र,
5. उष्माइंजन (heat engines)

इन मूल चालकों में से केवल घरेलू जानवरों एवं उष्माइंजन का ही कर्षण कार्य के लिए सफलतापूर्वक व्यवहार किया जाता है। वायु, जल एवं बिजली द्वारा प्राप्त शक्ति का उपयोग सिर्फ स्थिर कार्यों के लिय ही हो सकते है। युनाइटेड किंगडम, अमरीका आदि देशों में 1920 ई0 तक कृषि संबंधी कार्यों के लिये घोड़ों एवं खच्चरों का उपयोग किया जाता था; किंतु उसके बाद पशुओं का व्यवहार कम होत गया। आजकल वहाँ इन कार्यों के लिये प्राय: ट्रैक्टर का ही व्यवहार किया जाता हैं।

लाभ[संपादित करें]

घरेलू पशुओं की तुलना में ट्रैक्टर के मुख्य लाभ ये हैं:

1. इससे कठिन कार्य लगातार लिया जा सकता है,

2. प्रतिकूल जलवायु का इसपर प्रभाव नहीं पड़ता,

3. यह विभिन्न गतियों से कार्य कर सकता है,

4. जब इसका व्यवहार नहीं होता तब इसपर कम ध्यान देने की आवश्यकता होती है एवं ईंधन की आवश्यकता बिलकुल नहीं होती।

ट्रैक्टर का इतिहास[संपादित करें]

चित्र:Harrison Machine Works 1882 tractor.JPG
१८८२ में 'हैरिसन मशीन वर्क्स' द्वारा निर्मित वाष्पचालित ट्रैक्टर
१९०३ के आसपास हस्त-निर्मित पेट्रोलचालित ट्रैक्टर
वाष्पचालित 'ब्लैक लेडी' ट्रैक्टर (१९११)

सबसे पहले शक्ति-चालित कृषि उपकरण उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में आये। इनमें पहियों पर जड़ा एक वाष्प-इंजिन हुआ करता था। एक बेल्ट की सहायता से यह सम्बन्धित कृषि उपकरण को चलाता था। इन्हीं मशीनों में तकनीकी सुधार और विकास के परिणामस्वरूप सन १८५० के आसपास पहला ट्रैक्टर का अविर्भाव हुआ। इसके बाद इनका कृषि कार्यों में जमकर प्रयोग हुआ। ट्रैक्टरों में वाष्प-चालित इंजन बीसवीं शताब्दी में भी बहुत वर्षों तक आते रहे। जब आन्तरिक ज्वलन इन्जन (इन्टर्नल कम्बश्शन इंजिन) पर्याप्त रूप से विश्वसनीय बनने लगे तब इस नयी प्रौद्योगिकी पर आधारित ट्रैक्टरों ने पुरानी प्रौद्योगिकी का स्थान ले लिया।

सन १८९२ में जान फ्रोलिक ने पहला पेट्रोल चालित ट्रैक्टर बनाया। इसके केवल दो ही ट्रैक्टर बिके। इसके बाद सन १९११ में ट्विन सिटी ट्रैक्टर इंजन कम्पनी ने एक डिजाइन विकसित की जो सफल रही।

भाप इंजन का आविष्कार एवं विकास अंतर्दहन इंजन से एक सौ वर्ष पहले हुआ था। उस समय ट्रैक्टर का व्यवहार केवल गाहने की मशीन (thresher) के चलाने में किया जाता था। भाप ट्रैक्टर में कुछ विकास होने के बाद इसका व्यवहार खेत को तैयार करने, बीज बोने और फसल काटने के लिए किया जाने लगा। कृषि के लिए भाप ट्रैक्टर उपयोगी सिद्ध नहीं हुआ, क्योंकि यह अत्यंत भारी एवं मंदगतिगामी (slow moving) था। इसके अतिरिक्त इसके लिय प्रचुर मात्रा में ईंधन एवं वाष्पित्र जल की अवश्यकता होती थी जिसकी देखभाल के लिए दूसरे आदमी की आवश्यता पड़ती थी।

भाप-ट्रैक्टर की इन त्रुटियों के कारण अन्वेषकों का ध्यान अंतर्दहन इंजन की ओर आकर्षित हुआ। 19वीं शताब्दी के अंत में प्रथम गैस ट्रैक्टर का निर्माण किया गया। 1905 ई. तक गैस ट्रैक्टर का व्यवहार खेतों में होने लगा। इसमें चार पहियों पर स्थित भारी पंजर (frame) पर एक बड़ा सिलिंडर गैस ईजंन लगा हुआ था। भाप ट्रैक्टर की तरह यह भी भारी भरकम था। इसमें ईंधन, जल आदि कम मात्रा में लगता था और एक ही आदमी पूरे यंत्र को नियंत्रित और संचालित कर सकता था। 1910 ईं. के लगभग अभिकल्पियों का ध्यान हल्के गैस ट्रैक्टर के निर्माण की ओर गया। 1913 ई. से दो एवं चार सिलिंडरोंवाले इंजन के हल्के गैस ट्रैक्टरों का निर्माण किया जाने लगा। उसके बाद विभिन्न प्रकर के गैस ट्रैक्टर का निर्माण किया जाने लगा, तब विभिन्न प्रकार के गैस ट्रैक्टर बनाए गए।

प्रथम डीजल इंजन युक्त ट्रैक्टर का निर्माण 1931 ई. में किया गया। यद्यपि इस तरह के ट्रैक्टर का दाम अधिक था। फिर भी अनेक गुणों के कारण इसकी माँग अधिक थी। ट्रैक्टर में निम्नदाब वायवीय टायर का व्यवहार सर्वप्रथम 1932 ई. में हुआ था। आजकल भी ट्रैक्टर के विकास के लिये अन्वेषण कार्य हो रहे हैं।

ट्रैक्टर के प्रकार[संपादित करें]

कर्षण एवं स्वयंचालन के तरीकों के अनुसार[संपादित करें]

कर्षण एवं स्वयंचालन (self-propulsion) के तरीकों के अनुसार ट्रैक्टर के दो भेद हैं:

1. चक्र टैक्टर (Wheel tractor)- यह ट्रैक्टर बड़े महत्व का और कृषि संबंधी कार्यों के लिये अत्यंत उपयोगी है। चक्र ट्रैक्टर या तो तीन पहिएवाला होता है या चार पहिएवाला।

2. लीक प्रकार के ट्रैक्टर (Track-type tractor) ऐसे ट्रैक्टर के कर्षण यंत्र विन्यास में दो भारी पटरियाँ (Tracks) लगी रहती हैं। इसमें लोहे के दो पहियों का व्यवहार होता है जिनमें से एक चालक (driver) का कार्य करता है दूसरा मंदक (idler) की तरह होता है। यह ट्रैक्टर भारी कार्य, जैसे बाँध के निर्माण और अन्य औद्योगिक कार्यों के लिये बड़े पैमाने पर व्यवहृत होता है। कृषि में इसका व्यवहार कम है।

उपयोगिता के अनुसार[संपादित करें]

उपयोगिता के अनुसार कर्षित्र के निम्नलिखित पाँच भेद हैं:

1. सामान्य कार्य कर्षित्र (General purpose tractor) - ये कर्षित्र मानक अभिकल्प के होते हैं, जैसे चार चक्रवाले या लीक प्रकार के कर्षित्र।

2. सर्वकार्य कर्षित्र (All purpose tractor) - ऐसे कर्षित्र से प्राय: सभी तरह के कर्षित्र कार्य लिए जा सकते हैं।

3. फलोद्यान कर्षित्र (Orchard tractor) - ये छोटे या मध्यम आकारवाले यंत्र हैं। इनकी बनावट ऐसी होती है कि इनसे फलोद्यान में सुचारु रूप से कार्य लिया जा सकत है। इस प्रकार के कर्षित्र बहुत कम ऊँचाई वाले होते हैं एवं इनमें बहुत कम प्रक्षेपी (projecting) पुर्जे होते हैं।

4. औद्यागिक कर्षित्र (Industrial tractor) - इन प्रकार के यंत्र किसी भी आकार या प्रकार के हो सकते हैं। इनका व्यवहार कारखानों और हवाई पत्तन (airports) इत्यादि स्थानों में होता है। ये रबर के पहिए तथा उच्च चाल पारेषण (High speed transmission) उपकरणों से युक्त होते हैं।

5. बाग-कर्षित्र (Garden tractor) - यह बगीचों या छोटे छोटे खेतों में व्यवहार किया जानेवाला सबसे छोटे आकार का ट्रैक्टर होता है। यह तीन आकार का बनाया जाता है: छोटा आकार, मध्यम आकार और बड़ा आकार। छोटे आकारवाले यंत्र से बगीचों में पौधा लगाने का एवं खेती का कार्य लिया जाता है। मध्यम और बड़े आकारवाले बाग कर्षित्र का व्यवहार हल चलाने आदि के कार्य के लिये लिया जाता है। इस यंत्र को चालक चलाता है ओर उत्तोलक (Lever) की सहायता से इसे नियंत्रित करता है।

ट्रैक्टर की बनावट[संपादित करें]

सभी ट्रैक्टरों में निम्नलिखित तीन भाग होते हैं:

1. इंजन और उसके साधन,

2. शक्ति पारेषण प्रणाली (power transmitting system),

3. चेजिस (chassis)

इंजन और उसके साधन[संपादित करें]

इंजन[संपादित करें]

प्राचीन समय के ट्रैक्टरों में मन्दगामी विशाल क्षैतिज इंजन लगाए जाते थे जिनमें केवल एक या दो सिलिंडर होते थे। इस तरह के भारी भरकम इंजनों को संभालने के लिये मजबूत पंजर, बड़े पहिए आदि की आवश्यकता होती थी जिसके फलस्वरूप स्वयं ट्रैक्टर ही बहुत भारी हो जाता था और इसमें कार्य लेने में कठिनाई होती थी। आजकल उच्च गतिवाले हल्के इंजनों का प्रयोग अधिक हो रहा है जिनमें मुख्यत: दो सिलिंडर क्षैतिज इंजन और चार या छ: सिलिंडर वाले ऊर्ध्वाधर इंजन हाते हैं। टैक्टर इंजन के मुख्य पुर्जे, जैसे पिस्टन, क्रैक शाफ्ट (crank shaft) बेयरिंग (bearing), वाल्व (valve) आदि मोटर गाड़ी इंजन के पुर्जो की अपेक्षा अधिक बड़े और भारी होते हैं। सभी सिलिंडर एक ही ढलाई (casting) में बनाए जाते हैं। ट्रैक्टर इंजन के सिलिंडर शीघ्र ही नष्ट होने लगते हैं। इस कठिनाई को सुलझाने के लिये ये दो विधियाँ काम में लाई जाती हैं।

  • (अ) सिलिंडर का प्रतिस्थापन (replacement) तथा
  • (ब) पुराने सिलिंडरों को पुनर्वेधन (reboring) द्वारा ठीक करके बड़े आकार के पिस्टन का व्यवहार।

ये विधियाँ मँहगी एवं अधिक समय लेनेवाली होती हैं। इसीलिये आधुनिक अभिकल्प के इंजन में अपनेय सिलिंडर दीवारें (removable cylinder walls) या स्लीव (sleeves) लगाए जाते हैं, जो इंजन को ट्रैक्टर से बिना बाहर निकाले सुगमता से पुन: प्रतिस्थापित किए जा सकते हैं। स्लीव की कीमत नए सिलिंडर या अच्छा पुनर्वेधन कराने की कीमत से बहुत कम होती है। ट्रैक्टर इंजन के लिये सिलिंडर शीर्ष अलग से ढलाई द्वारा बनाए जाते हैं। ऐसा करने से दहनकक्ष में जमे कार्बन को साथ करने में सुगमता होती है। बाल्व को सिलिंडर शीर्ष में लगाया जाता है जिससे वाल्व के समंजन (valve adjustment) में आसानी होती है। ट्रैक्टर पिस्टन प्राय: ढलाई लोहे का बना होता है एवं इसमें तीन से लेकर सात तक वलय लगे रहते हैं। सभी ट्रैक्टरों के क्रैंक शाफ्ट पात गढ़ाई (Drop Forging) द्वारा एक ही टुकड़े में बनाए जाते हैं। साधारणत: बड़े आकारवाले दो और चार सिलिंडरवाले इंजन 900 से 1,200 और छोटे आकारवाले चार और छ: सिलिंडरवाले इंजन 1500 से 2000 परिक्रमण प्रति मिनट पर चलते हैं।

ईंधन[संपादित करें]

अंतर्दहन इंजन में व्यवहृत ईंधन गैसीय ईंधन या (तरल ईंधन होते हैं। गैसीय इंधन भी प्राकृतिक गैस या कृत्रिम गैस - वातभ्रष्ट गैस, कोक चूल्हा गैस या उत्पादक गैस - हो सकता है। तरल ईंधन में पेट्रोल, किरासन, डीजल] तेल, एल्कोहल आदि आते हैं।

ईंधन को जलाने के साधन के अनुसार ट्रैक्टर ईंजन दो प्रकार के होते हैं: प्रथम, संपीडन प्रज्वलन इंजन (Compression Ignition engine) और द्वितीय, स्फुलिंग प्रज्वलन इंर्जन (Spark Ignition engine)। प्रथम प्रकार के इंजन में चूषण स्ट्रोक (suction stroke) में केवल वायु सिलिंडर में प्रवेश करती है और वहाँ पर यह संपीडन स्ट्रोक (compression stroke) में संपीडित होती है। इस स्ट्रोक के पूर्ण होने के लगभग अंत:क्षेपक (injector) द्वारा ईंधन सूक्ष्मकणों के रूप में गर्म संपीडित वायु में अंत:क्षेपित (inject) किया जाता है जिससे दहन (combustion) होता है। इस तरह के ईंजन में डीजल तेल का व्यवहार किया जाता है। द्वितीय प्रकार के स्फुलिंग प्रज्वलन इंजन में ईंधन और वायु का संमिश्रण कार्बूरेटर (carburettor) नामक भाग में होता है और वहाँ से चूषण स्ट्रोक द्वारा यह मिश्रण सिलिंडर में प्रवेश करता है। सिलिंडर में संपीडन स्ट्रोक द्वारा मिश्रण के संपीडित होते ही स्फुलिंग प्लग द्वारा दहन संपन्न होता है। इस तरह के ईंधन में पेट्रोल और गैस का व्यवहार किया जाता है। दहन के बाद उपर्युक्त दोनों प्रकार के इंजन में प्रसार स्ट्रोक होता है जिसमें शक्ति प्राप्त होती है। प्रसार के अंत में जली हुई गैस निम्न दाब पर रह जाती है जिसे निकास (exhaust) स्ट्रोक द्वारा बाहर निकालकर चक्र की पुनरावृत्ति होती है।

शीतनप्रणाली (Cooling system)[संपादित करें]

इंजन में गरम गैसों के कारण एवं पिस्टन के सिलिंडर में पश्चाग्र (reciprocating) चाल के कारण घर्षण द्वारा उष्मा की उत्पत्ति होती है जिससे ईंजन के पुर्जे शीघ्र ही खराब हो जाते हैं। इससे बचने के लिये इंजन के पुर्जों को वायुशीतन या तरलशीतन द्वारा ठंडा कर उष्मा कम की जाती है।

ट्रैक्टर गतिनियंत्रण (Tractor Governing)[संपादित करें]

ट्रैक्टर पर पड़नेवाले परिवर्तित भार के साथ बदलती हुई गति में एकरूपता लाने के लिये ट्रैक्टर इंजन पर गतिनियंत्रक का रहना आवश्यक है। प्राय: सभी ट्रैक्टर गतिनियंत्रण की अवरुद्ध प्रणाली (throttle system) से युक्त होते हैं। इसमें परिभ्रामी (rotating) भार द्वारा होनेवाले अपकेंद्री बल की सहायता से गति नियंत्रित की जाती है।

शक्तिपारेषण प्रणाली[संपादित करें]

ट्रैक्टर के इंजन की शक्ति को इसके पहियों या लीकों में पारेषित करनेवाले यंत्रविन्यास के तीन भाग हैं:

  • (क) गतिपरिवर्तक गियर (speed changing gear)
  • (ख) भिन्नक (differential),
  • (ग) अंतिम चालन यंत्रविन्यास (final drive mechanism)।

विभिन्न ट्रैक्टरों में ये पुर्जे विभिन्न अभिकल्प के बने होते हैं। यह प्रणाली स्वयंप्रणोदन का एक साधन है। इसकी सहायता से इंजन के क्रैंक शाफ्ट की गति कम या अधिक की जा सकती है एवं इच्छानुसार ट्रैक्टर की गति प्राप्त की जाती है। इस प्रणाली द्वारा गतिदिशा (direction of motion) को भी प्रतिवर्तित (reverse) किया जाता है। स्वयंचालित वाहिनियों के शक्ति एकक (power unit) को इसके पारेषण गियर और चालन पहिए से पृथक्‌ करने के साधन की आवश्यकता होती है क्योंकि

  • (क) अंतर्दहन इंजन को हाथ से या किसी विशेष आरंभ यंत्रविन्यास (starting mechanism) से क्रैंक किया जाता है,
  • (ख) इस तरह के इंजन निश्चित गति प्राप्त करने के बाद ही कुछ शक्ति पैदा कर सकते हैं।

विभिन्न गतियों को प्राप्त करने के लिए पारेषण गियर (ट्रांसमिशन गीयर) को हटाना पड़ता है। इन सारी क्रियाओं के लिए इंजन और पारेषण गियर तथा पट्टक घिरनी के बीच ग्राभ (clutch) का प्रयोग किया जाता है। इन ग्राभों में संकुचन ग्राभ (contracting clutch), शंकु ग्राभ (cone clutch) और विस्तारण ग्राभ (expanding clutch) प्रमुख हैं। आजकल प्राय: सभी ट्रैक्टरो के ग्राभ चकती प्रकार के होते हैं। आधुनिक ग्राभ अभिकल्प में बहुचकती प्रकार के ग्राभ के बदले द्विचकती और एकपट्ट ग्राभ का व्यवहार अधिक होता है। आधुनिकतम अभिकल्प में शक्ति पारेषण के लिये तरल पदार्थ की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) या दाब ऊर्जा (Presure Energy) का उपयोग किया जाता है। इसमें तरल युग्मन और बलघूर्ण परिवर्तक (torque converter) आदि प्रमुख हैं।

ट्रैक्टर चेजिस[संपादित करें]

ट्रैक्टर चेजिस के अंतर्गत ढाँचा, पहिए या कर्षण के अन्य साधन और मोड़न यंत्रविन्यास (steering mechanism) आते हैं ढाँचे पर यंत्र के अन्य एकक लगे रहते हैं, इसलिये इसका मजबूत होना आवश्यक है। पहले यह संधान (welding) रिवट जोड़ (rivetted joint) द्वारा बनाया जाता था किंतु आजकल ट्रैक्टर को हल्का, छोटा एवं संहत (compact) बनाने के लिये यह दो भागों में ढलाई द्वारा तैयार किया जाता है जिसमें से एक इंजन क्रैंक खोल (crank case) एवं दूसरा पारेषण कोष्ठ (transmission housing) का कार्य करता है। आजकल प्राय: सभी ट्रैक्टरों के पहिए निम्न दाब बायवीय रबर के बने होते हैं किंतु धान की खेती इत्यादि के लिए व्यवहार में लाए जानेवाले ट्रैक्टरों में आजकल भी इस्पात के पहिए लगाए जाते हैं। मोड़न यंत्रविन्यास का सबसे प्रमुख भाग गियर है जो मोड़न चक्र से मोड़न दंड को गति पारेषित करता है। ये गियर हमेशा एक कोष्ठ में बंद रहते हैं ताकि इनमें धूलिकण आदि का प्रवेश न हो सके।

ट्रैक्टर की देखभाल[संपादित करें]

किसी भी ट्रैक्टर की आयु और इसके द्वारा किया गया कार्य इस यंत्र की देखरेख पर निर्भर करता है। इस यंत्र को जितनी ही अधिक सावधानी से रखा जायगा उतना ही अच्छा कार्य वह देगा और उसी के अनुसार यह टिकाऊ होगा। यदि अच्छी देखरेख की जाय तो यह शायद ही कभी कठिनाई उपस्थित करेगा। प्राय: सभी ट्रैक्टरों में कठिनाइयाँ इंजनों में ही होती है। कठिनाइयों के कारण मुख्यत: निम्नलिखित चार प्रकार के हो सकते हैं:

संपीडन कठिनाई[संपादित करें]

किसी भी इंजन को सुगमतापूर्वक आरंभ (start) करने एवं दक्षतापूर्वक कार्य देने के लिए उचित संपीडन न होने का करण पिस्टन, पिस्टन वलय सिलिंडर, सिलिंडर, दीवारों आदि का घिसना, सिलिंडर शीर्ष या स्फुलिंग प्लग के चारों ओर चूना तथा बाल्व के नीचे कार्बन का जमा होना है।

ईंधन एवं कार्बूरेशन कठिनाई[संपादित करें]

वाल्व के कुछ बंद हो जाने, ईंधनपथ में कोई बाहरी बस्तु आ जाने, कार्बूरेटर प्लव (float) के कहीं अटक जाने के कारण ईंधन के प्रवाह में अवरोध होता है जिससे कम ईंधन ही आ पाता है। कभी कभी वाल्व के नीचे मल जमा होने अथवा प्लव में छेद हो जाने के कारण ईंधन अधिक मात्रा में आने लगता है। कार्बूरेटर का उचित रूप से न बैठाने पर ईंधन मिश्रण दुर्बल या आवश्यकता से अधिक शक्तिशाली (weak of strong) हो जाता है।

प्रज्वलन कठिनाई[संपादित करें]

दहनकक्ष में उचित समय पर बिजली के अच्छे स्फुलिंग का होना बहुत से नाजुक पुर्जों पर निर्भर करता है। धातु का एक कण, जल की एक बूंद या बिजली का कोई ढीला संयोजन पूरी प्रज्वलन प्रणाली में बाधा डाल सकत है। इसका अर्थ होगा विलंब और समय की क्षति। क्रैंक करते समय इंजन का प्रारंभण न होना या चलते चलते हठात्‌ रुक जाना प्रज्वलन की कठिनाई का सूचक है।

अवधि कठिनाई[संपादित करें]

वाल्व को उचित समय पर खुलना या बंद होना चाहिए एवं पिस्टन की गति के साथ उचित समय पर स्फुलिंग का निर्माण होना चाहिए। इए समय में जरा सा भी परिवर्तन होने से 'अवधि संबंधी कठिनाई' होती है। इससे चलते इंजन का प्रारंभण होने या सुचारु रूप से चलने में बाधा नहीं होती है, बल्कि इससे इंजन की शक्ति कम हो जाती है, इंजन अत्यंत गरम हो जाता है एवं ईंधन की खपत बढ़ जाती है।

इन सारी कठिनाइयों के कारणों की ओर सदा ध्यान देते रहने से ट्रैक्टर हमेशा अच्छी अवस्था में रहता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]