अन्तर्दहन इंजन
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अन्तर्दहन इंजन (अन्तः दहन इंजन या आन्तरिक दहन इंजन या internal combustion engine) ऐसा इंजन है जिसमें ईंधन एवं आक्सीकारक सभी तरफ से बन्द एक कक्ष में जलते हैं। दहन की इस क्रिया में प्रायः हवा ही आक्सीकारक का काम करती है। जिस बन्द कक्ष में दहन होता है उसे दहन कक्ष (कम्बस्सन चैम्बर) कहते हैं।
दहन की यह अभिक्रिया वाह्य उष्म ( exothermic reaction ) होती है जो उच्च ताप एवं दाब वाली गैसें उत्पन्न करती है। ये गैसें दहन कक्ष से लगे हुए एक पिस्टन/रोटर को धकेलते/घुमाते हुए फैलतीं है। इस प्रकार ईंधन कीं रासायनिक उर्जा पहले उष्मीय उर्जा में बदलती है और फिर उष्नीय उर्जा यांत्रिक उर्जा में बदल जाती है।
अन्तर्दहन इंजन के विपरीत वाह्य दहन इंजन, (जैसे, वाष्प इंजन) में कार्य करने वाला तरल (जैसे वाष्प) किसी अन्य कक्ष में किसी तरल को गरम करके प्राप्त किया जाता है। प्रायः पिस्टनयुक्त रेसिप्रोकेटिंग इंजन, जिसमें कुछ-कुछ समयान्तराल के बाद दहन होता है (लगातार नहीं) , को ही अन्तर्दहन इंजन कहा जाता है किन्तु जेट इंजन, अधिकांश रॉकेट एवं अनेकों गैस टर्बाइनें भी अन्तर्दहन इंजन की श्रेणी में आती हैं जिनमें दहन की क्रिया अनवरत (continuous) रूप से चलती रहती है।
[संपादित करें] इतिहास
- १७वीं शताब्दी: अंग्रेजी आविष्कारक सैमुएल मोर्लैण्ड (Samuel Morland) ने पानी के पम्प चलाने के लिये बारूद का प्रयोग किया। इसे प्रथम अन्तर्दहन इंजन कहा जा सकता है।
- १८०६ : स्विट्जरलैण्ड के इंजीनियर फ्रैको आइजक रिवाज (François Isaac de Rivaz) ने हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन के मिक्षण से चलने वाला अंतर्दहन इंजन बनाया।
- 1823: Samuel Brown patented the first internal combustion engine to be applied industrially. It was compressionless and based on what Hardenberg calls the "Leonardo cycle," which, as the name implies, was already out of date at that time.
- 1824: French physicist Sadi Carnot established the thermodynamic theory of idealized heat engines. This scientifically established the need for compression to increase the difference between the upper and lower working temperatures.
- 1826 April 1: American Samuel Morey received a patent for a compressionless "Gas or Vapor Engine."
- 1838: a patent was granted to William Barnet (English). This was the first recorded suggestion of in-cylinder compression.
- 1854: The Italians Eugenio Barsanti and Felice Matteucci patented the first working efficient internal combustion engine in London (pt. Num. 1072) but did not go into production with it. It was similar in concept to the successful Otto Langen indirect engine, but wasn't so well worked out in detail.
- 1856: in Florence at Fonderia del Pignone (now Nuovo Pignone, a subsidiary of General Electric), Pietro Benini realized a working prototype of the Barsanti-Matteucci engine, supplying 5 HP. In subsequent years he developed more powerful engines—with one or two pistons—which served as steady power sources, replacing steam engines.
- 1860: Belgian Jean Joseph Etienne Lenoir (1822–1900) produced a gas-fired internal combustion engine similar in appearance to a horizontal double-acting steam beam engine, with cylinders, pistons, connecting rods, and flywheel in which the gas essentially took the place of the steam. This was the first internal combustion engine to be produced in numbers.
- 1862: German inventor Nikolaus Otto designed an indirect-acting free-piston compressionless engine whose greater efficiency won the support of Langen and then most of the market, which at that time was mostly for small stationary engines fueled by lighting gas.
- 1870: In Vienna, Siegfried Marcus put the first mobile gasoline engine on a handcart.
- 1876: Nikolaus Otto, working with Gottlieb Daimler and Wilhelm Maybach, developed a practical four-stroke cycle (Otto cycle) engine. The German courts, however, did not hold his patent to cover all in-cylinder compression engines or even the four-stroke cycle, and after this decision, in-cylinder compression became universal.
- 1879: Karl Benz, working independently, was granted a patent for his internal combustion engine, a reliable two-stroke gas engine, based on Nikolaus Otto's design of the four-stroke engine. Later, Benz designed and built his own four-stroke engine that was used in his automobiles, which became the first automobiles in production.
- 1882: James Atkinson invented the Atkinson cycle engine. Atkinson’s engine had one power phase per revolution together with different intake and expansion volumes, making it more efficient than the Otto cycle.
- 1891: Herbert Akroyd Stuart built his oil engine, leasing rights to Hornsby of England to build them. They built the first cold-start compression-ignition engines. In 1892, they installed the first ones in a water pumping station. In the same year, an experimental higher-pressure version produced self-sustaining ignition through compression alone.
- 1892: Rudolf Diesel developed his Carnot heat engine type motor burning powdered coal dust.
- 1893 February 23: Rudolf Diesel received a patent for the diesel engine.
- 1896: Karl Benz invented the boxer engine, also known as the horizontally opposed engine, in which the corresponding pistons reach top dead center at the same time, thus balancing each other in momentum.
- 1900: Rudolf Diesel demonstrated the diesel engine in the 1900 Exposition Universelle (World's Fair) using peanut oil (see biodiesel).
- 1900: Wilhelm Maybach designed an engine built at Daimler Motoren Gesellschaft—following the specifications of Emil Jellinek—who required the engine to be named Daimler-Mercedes after his daughter. In 1902 automobiles with that engine were put into production by DMG.
- 1908: New Zealand inventor Ernest Godward started a motorcycle business in Invercargill and fitted the imported bikes with his own invention – a petrol economiser. His economisers worked as well in cars as they did in motorcycles.
[संपादित करें] उपयोग
आजकल आटोमोबाइल में प्रयुक्त अधिकांश इंजन अन्तर्दहन इंजन ही होते हैं।
[संपादित करें] अन्तर्दहन इंजन का कार्य सिद्धान्त
अंतर्दहन इंजन के आविष्कार का विचार मध्ययुग से प्रारंभ हुआ। 1680ई. में डच वैज्ञानिक क्रिश्चियन हाइगेस ने एक ऊर्ध्व सिलिंडर और पिस्टन के इंजन का सुझाव रखा था, जिसमें बारूद के विस्फोट से पिस्टन ऊपर चढ़े। किंतु इस तरह का इंजन कभी काम में नहीं आया। बाद में दहनशील गैसों तथा खनिज तैलों के आविष्कार से उनका सुझाव व्यावहारिक हो गया क्योंकि बारूद की जगह ईधन देने की समस्या सुलझ गई। लेकिन फिर भी इस वर्ग के इंजनों को व्यावहारिक उपयोगिता के अनुकूल बनाने में अनेक वर्षो के प्रायेगिक और सैद्धांतिक अध्ययन की आवश्यकता हुई।
अंतर्दहन इंजनों में ईधन के रूप में डीजल (गाढ़े मिट्टी के तेल), पेट्रोल, ऐल्कोहल अथवा प्राकृतिक या कृत्रिम गैस इत्यादि का प्रयोग होता है। लेकिन साधारणत: पेट्रोल और गाढ़े मिट्टी के तेल का ही उपयोग होता है।
अंतर्दहन इंजन दो सिद्धांतो पर कार्य करते हैं - (1) चतुर्घात चक्र और (2) द्विघात चक्र।
[संपादित करें] चतुर्घात चक्र का इंजन (four stroke engine)
प्रत्येक इंजन में एक खोखला बेलन होता है, जिसे सिलिंडर कहते हैं । सिलिंडर के भीतर एक पिस्टन चलता है, जिसे हम मुषली कह सकते हैं। इस पिस्टन का काम ठीक वहीं होता है जो बच्चों की रंग खेलने की पिचकारी के भीतर चलनेवाली डाट का। पिस्टन ऐल्यूमिनियम या इस्पात का बनता है और इसमें इस्पात की कमानीदार चूड़ियाँ (rings) लगी रहती हैं, जिससे वायु या गैस, पिस्टन के एक ओर से दूसरी ओर नहीं जा सकती। सिलिंडर का माथा (head) बंद रहता है, परंतु इसमें दो वाल्व रहते हैं। एक के खुलने पर वायु, या वायु और पेट्रोल का मिश्रण, भीतर आ सकते हैं। दूसरे के खुलने पर सिलिंडर के भीतर की वायु या गैस बाहर निकल सकती है। माथे में एक स्पार्क प्लग भी लगा रहता है जिसके सिरे पर दो तार होते हैं। उचित समयों पर इन दोनों तारों के बीच बिजली की चिनगारी (स्पार्क) निकलती है, जिसका नियंत्रण इंजन के चलते रहने पर अपने-आप होता रहता है। क्रैंक का काम है पिस्टन के आगे पीछे चलने की गति को धुरी के अक्षघूर्णन में बदलता। क्रैंक के कारण पिस्टन के आगे पीछे चलने पर इंजन की धुरी (शैफ्ट) घूमती है। ईधन के बार-बार जलने से पिस्टन बहुत गरम न हो जाए इस विचार से सिलिंडर की दीवारें होती हैं और उनके बीच पंप द्वारा पानी प्रवाहित होता रहता है। मोटरकार आदि में एक के बदले चार, छह या आठ सिलिंडर रहते हैं और लोहे की जिस इष्टिका में ये बने रहते हैं उसे ब्लॉक कहते हैं।
ऊपर बताए गए वाल्व, कमानी (स्प्रिन्ग) के कारण चिपककर, वायु आदि के मार्ग को बंद रखते हैं, परंतु वाल्व कैम द्वारा उचित समय पर उठ जाता है, जिससे वायु या गैस के आने का मार्ग खुल जाता है। कैम जिस धुरी पर जड़े रहते हैं उसको कैम-धुरी (cam shaft) कहते हैं। यह धुरी इंजन से ही चलती रहती है और वाल्वों को उचित समयों पर खोलती रहती है। (कैम, इस्पात के टुकड़े होते हैं, जिनका रूप कुछ-कुछ पान की आकृति का होता है; जब कैम का चौड़ा भाग वाल्व के तने (स्टेम) के नीचे रहता है तो वाल्व बंद रहता है; जब इसका लंबा भाग घूमकर वाल्व के तने के नीचे आ जाता है तो वाल्व उठ जाता है। )
इंजन की विविध संधियों (joints) को, जहाँ एक पुरजा दूसरे पर घूमता या चलता रहता है, बराबर तेल से तर रखना नितांत आवश्यक है। इसीलिये सर्वत्र स्नेहक तेल (lubricating oil) पहुँचाने का प्रबंध रहता है। मोटरकारों में इंजन का निचला हिस्सा बहुधा थाल के रूप में होता है जिसमें तेल डाल दिया जाता है। प्रत्येक चक्कर में क्रैंक तेल में डूब जाता है और छींटे उड़ाकर सिलिंडर को भी तेल से तर कर देता है। अन्य स्थानों में तेल पहुँचाने के लिए पंप लगा रहता है।
[संपादित करें] चतुर्घात चक्रवाले इंजन का कार्यकरण
चतुर्घात चक्रवाले इंजन का कार्यकरण-चतुर्घात चक्र (फ़ोर स्ट्रोक साइकिल) के अनुसार काम करनेवाले इंजनों में पिस्टन के चार बार चलने पर (दो बार आगे, दो बार पीछे चलने पर) इसके कार्यक्रम का एक चक्र पूरा होता है। ये चार निम्नलिखित हैं:
- (क) सिलिंडर में पिस्टन माथे से दूर जाता हैं; इस समय अंतर्ग्रहरण वाल्व (इन-टेक-वाल्व) खुल जाता है और वायु, तथा साथ में उचित मात्रा में पेट्रोल (या अन्य ईधन), सिलिंडर के भीतर खिंच आता है। इसे अंतर्ग्रहण घात कहते हैं।
- (ख) जब पिस्टन लौटता है तो अंतग्र्रहण वाल्व बंद हो जाता है; दूसरा वाल्व भी (जिसे निष्कास वाल्व कहते हैं) बंद रहता है। इसलिए वायु और पेट्रोल मिश्रण को बाहर निकलने के लिए कोई मार्ग नहीं रहता। अत: वह संपीडित (कंप्रेस्ड) हो जाता है। इसी कारण इसे संपीडन घात (कंप्रेशन स्ट्रोक) कहते हैं।
- (ग) ज्यों ही पिस्टन लौटने लगता है, स्पार्क प्लग से चिनगारी निकलती है और संघनित पेट्रोल-वायु-मिश्रण जल उठता है। इससे इतनी गरमी और दाब बढ़ती है कि पिस्टन को जोर का धक्का लगता है और पिस्टन हठात् माथे से हटता हे। इस हटने में पिस्टन और उससे संबंद्ध प्रधान धुरी (मेन शैफ्ट) भी बलपूर्वक चलते हैं और बहुत सा काम कर सकते हैं। पेट्रोल के जलने की ऊर्जा इसी प्रकार धुरी के घूमने में परिवर्तित होती है। धुरी पर एक भारी चक्का जड़ा रहता है जिसे फ्लाईहील कहते हैं। यह भी अब वेग से चलने लगता है।
- (घ) फ्लाईहील की झोंक से पिस्टन जब फिर माथे की ओर चलता है तो दूसरा वाल्व खुल जाता है। इस वाल्व को निष्कास वाल्व (एग्ज़ॉस्ट वाल्व) कहते हैं। इसके खुले रहने के कारण और पिस्टन के चलने के कारण, पेट्रोल के जलने से उत्पन्न सब गैंसे बाहर निकल जाती हैं।
अब फ्लाईहील की झोंक से फिर पिस्टन वायु और पेट्रोल चूसता है (चूषण घात), उसे संपीडित करता है (संपीडन घात), ईधन जलकर शक्ति उत्पन्न करता है (शक्ति घात) और जली गैसें बाहर निकलती हैं (निष्कास घात)। यही क्रम तब तक चालू रहता है जब तक स्विच बंद करके चिनगारियों को बंद नहीं कर दिया जाता।
इंजन को चालू करने के लिए इसकी प्रधान धुरी में हैंडिल लगाकर घुमाना पड़ता हे, या बैटरी द्वारा संचालित विद्युतमोटर से (जिसे सेल्फ स्टार्टर कहते हैं) उसे घुमाना पड़ता है। एक बार फ्लाईहील में शक्ति आ जाने पर इंजन चलने लगता है।
डीज़ल इंजनों में चूषण घात में पिस्टन केवल हवा खींचता है, ईधन नहीं; ईधन को शक्ति घात के आरंभ में सिलिंडर में सूक्ष्म नली द्वारा, पंप की सहायता से, बलपूर्वक छोड़ा जाता है और वह, संपीडित वायु के तप्त रहने के कारण, बिना चिनगारी लगे ही, जल उठता है।
[संपादित करें] द्विघात चक्र
ऊपर बताए गए इंजन में निष्कासघात का एकमात्र उद्देश्य है सिलिंडर को खाली करना, जिसमें ईधन और वायु फिर एक बार चूसी जा सके। परंतु शक्ति घात के अंतिम खंड में ही जली गैसों के निकालने की प्रबंध किया जा सकता है। उस स्थिति में जली गैसें बाहर निकालने की क्रिया को सम्मार्जन (स्कैवंजिंग) कहते हैं। इस व्यवस्था से पिस्टन के दो घातों में ही इंजन के कार्यक्रम का एक चक्र पूरा हो जाता है। इसलिए इस चक्र को द्विघातचक्र (टू स्ट्रोक साइकिल) कहते हैं।
चतुर्वात चक्र में प्रधान धुरी के दो चक्करों में एक शक्ति घात होता है जबकि द्विघात चक्र के प्रत्येक चक्कर में एक शक्ति घात होता है। तो भी नाप में अपने ही बराबर चतुर्घात इंजन की अपेक्षा दुगुनी ऊर्जा उत्पन्न करने के बदले द्विघात-इंजन केवल 70% से 90% तक अधिक ऊर्जा उत्पन्न करता है। कारण ये है: (1) अपूर्ण संमार्जन, (2) दी हुई नाप के सिलिंडर में अपेक्षाकृत कम ही ईधन-वायु-मिश्रण का पहुँच पाना, (3) ईधन का अधिक मात्रा में बिना जला रह जाना, (4) निष्कास वाल्व के शीघ्र खुल जाने से दाब का क्षय।
[संपादित करें] एकदिश और उभयदिश सक्रिय इंजन
अंतर्दहन इंजनों में (और आगे-पीछे चलनेवाले पिस्टन युक्त अन्य इंजनों में भी) दो जातियाँ होती हैं, एकदिश सक्रिय (सिंगल-ऐÏक्टग) इंजन और उभयदिश सक्रिय (डबल-ऐÏक्टन) इंजन। एकदिश सक्रिय इंजनों में कार्यकरण पदार्थ (पेट्रोल, डीज़ल तेल, आदि) पिस्टन के केवल एक ओर रहता है; उभयदिश सक्रिय इंजनों में दोनों ओर। उनमें सिलिंडर लंबा रहता है और पिस्टन के दोनों के भागों में चूषण, संपीडन इत्यादि होता रहता है। अधिकांश अंतर्दह इंजन एकदिश सक्रिय होते हैं। उदाहरणत:, मोटरकारों में इंजन इसी प्रकार के होते हैं। परंतु बहुतेरे बड़े इंजन उभयदिश सक्रिय बनाए जाते हैं। एकदिश सक्रिय इंजन की अपेक्षा उभयदिश सक्रिय इंजन में लगभग दुगुनी ऊर्जा उत्पन्न होती है और नाप में मात्र ही वृद्धि होती परंतु उभददिश सक्रिय इंजनों के निर्माण में कई याँत्रिक कठिनाइयाँ पड़ती हैं। इसलिए केवल बड़ी नाव के इंजनों में ही उभयदिश सक्रिय इंजन लाभ दायक होते हैं। दूसरी ओर, वाष्प इंजन और वायु संपीडक साधारणत: उभयदिश सक्रिय बनाए जाते हैं, यद्यपि यह अनिवार्य नियम नहीं है।
[संपादित करें] ओटो चक्र (Otto Cycle)
आज के अधिकांश अंतर्दहन इंजन ओटो चक्र (ओटो साइकिल) के सिद्धांत पर बनते हैं। गणना की सरलता के लिए हम कल्पना कर सकते हैं कि चक्र में दो क्रियाएँ समऊर्जिक (आइसेंट्रॉपकि) और दो स्थिरआयतनिक (ऐट कॉन्स्टैंट वॉल्यूम) होती हैं ।
कल्पित चक्र के विश्लेषण में सुगमता के लिए मान लिया जाता है कि कार्यकरण पदार्थ केवल वायु है। यह भी मान लिया जाता है कि न तो चूषण घात होता है ओर न निष्कास घात। इस विश्लेषण को वायु प्रामाणिक विश्लेषण कहते हैं। वास्तविक इंजन में गैसों का निष्कास होता है। उसके बदले माना जाता है कि स्थिर आयतन पर गैसें ठंढी हो जाती हैं । कर्म का उतना ही होता है (घर्षण की उपेक्षा करने पर), चाहे गैसों का निष्कास किया जाए, चाहे उन्हें ठंढा किया जाए प्रत्येक दशा में ईधन के जलने से उत्पन्न उष्मा उतनी ही रहती है.
[संपादित करें] सामर्थ्य और कार्य के एकक
जिस दर से ऊर्जा कर्म में रूपांतरित होती है उसे सामर्थ्य कहते हैं; यह समय के एक एकक में कर्म की मात्रा है। वह कर्म जो आगे पीछे चलनेवाले पिस्टन युक्त इंजन के पिस्टन पर किया जाता है, निर्दिष्ट कर्म (इंडिकेटेड वर्क) कहलाता है और निर्दिष्ट कर्म के अनुसार गणना किया हुआ सामर्थ्य निर्दिष्ट अश्वसामर्थ्य (इंडिकेटेड हॉर्स पावर) कहलाता है। इंजन की धुरी तक जितना कर्म पहुँचता है वह धुरी कर्म (शैफ्ट वर्क) अथवा ब्रेक कर्म (ब्रेक वर्क) कहलाता है और इस कर्म के अनुसार उत्पन्न सामर्थ्य को ब्रेक अश्वसामर्थ्य (ब्रेक हॉर्स पावर) कहते हैं।
[संपादित करें] निर्धारित सामर्थ्य
किसी अंतर्दहन इंजन के कितना सामर्थ्य प्राप्त हो सकता है, इसे निर्धारित करने के लिए कई आधार लिए जा सकते हैं। मोटरकार इंजन बनानेवाले अपने विज्ञपनों में अपने इंजन का महत्तम सामर्थ्य बताते हैं, जो तब प्राप्त होता है जब समस्त परिस्थितियाँ महत्तम रूप से अनुकूल होती हैं। परंतु औद्योगिक इंजन का निर्माता अपने इंजनों का सामर्थ्य साधारणत: लगभग महत्तम उष्मीय दक्षता (maximum thermal efficiency) पर उत्पन्न होनेवाले सामर्थ्य के अनुसार निर्धारित करता है। औद्योगिक इंजनों का सामर्थ्य इसी प्रकार निर्धारित करना उत्तम भी है। कारण यह है कि यदि इंजन निर्धारित सामर्थ्य पर चलाए जाएँगे तो ईधन का खर्च न्यूनतम होगा और फिर आवश्यकता होने पर कुछ समय तक वे अधिक सामथ्र्य पर भी काम कर सकेंगे।
[संपादित करें] सुपरचार्जर
प्रत्येक अंतर्दहन इंजन में प्राप्त सामर्थ्य इसपर निर्भर रहता है कि पिस्टन की एक दौड़ में जितना ईधन-वायु-मिश्रण सिलिंडर में प्रविष्ट होता है उसकी तौल क्या है। इसलिए जिन कारणों से यह तौल घटेगी उनसे इंजन का सामर्थ्य घटेगा। वास्तविक इंजन में ईधन-वायु-मिश्रण को घटाने बढ़ानेवाले यंत्र से, जिसे प्ररोध (थ्रटल) कहते हैं, तथा अंतर्ग्रहण और निष्कास वाल्वों से मिश्रण की गति में कुछ बाधा पड़ती है। इसलिए मिश्रण को चूसते समय सिलिंडर में दाब वायुमंडलीय दाब से कम ही रह जाती है। फलत: उतना मिश्रण नहीं घुस पाता जितना सैद्धांतिक गणना में माना जाता है। सैद्धांतिक गणना में तो मान लिया जाता है कि सिलिंडर के भीतर मिश्रण की दाब वायुमंडलीय दाब के बराबर है। फिर, सिलिंडर का भीतरी पृष्ठ, तथा मिश्रणपूर्ण अपेक्षाकृत तप्त रहते हैं। इसलिए सिलिंडर में पहुँचने पर ईधन मिश्रण गरम हो जाता है। आयतन ताप-दाब नियम के अनुसार ताप बढ़ने के कारण सिलिंडर में मिश्रण की तौल उस तौल की अपेक्षा कम होती है जो ठंडे रहने पर होती। फिर, वास्तविक इंजन में सिलिंडर के छूट स्थान (क्लियरैंस स्पेस) में, निष्कास घात के पूर्ण हो जाने पर भी, गैसें आदि वायुमंडलीय दाब से अधिक दाब पर रह जाती हैं और चूषण घात के आरंभ में वे सिलिंडर में फैल जाती हैं। इनकी दाब वायुमंडलीय दाब के बराबर हो जाने के बाद ही चूषण का आरंभ होता है। इससे भी सिद्धांतनुसार निकली मात्रा से कम ही मिश्रण सिलिंडर में प्रवेश करता है। अंत में, इंजन समुद्रतल से जितनी ही अधिक ऊँचाई पर काम करेगा वहाँ वायुमंडलीय दाब उतनी ही कम होगी। इसलिए तौल के अनुसार जितना मिश्रण सिलिंडर में समुद्रतल पर प्रविष्ट हो सकेगा उससे कम ही मिश्रण ऊँचे स्थलों में प्रविष्ट हो पाएगा।
अंतर्दहन इंजन की आयतनीय दक्षता केवल ऊँचाई बढ़ने पर ही नहीं घटती, वह इंजन की चाल (स्पीड) बढ़ने पर भी घटती है। इसलिए दौड़ प्रतियोगिता में प्रयुक्त इंजनों और अधिक ऊँचाई पर काम करनेवाले इंजनों में बहुधा सुपरचार्जर लगा दिया जाता है। इस यंत्र में एक छोटा सा सेंट्रफुगल पंखा (ब्लोअर) रहता है जो ईधन-वायु-मिश्रण को सिलिंडर में वायुमंडलीय दाब के कुछ अधिक दाब पर ठूँस देता है। सुपरचार्जर लगाने से आयतनीय दक्षता बढ़ जाती है, यहाँ तक कि यह 1 से अधिक भी हो जा सकती है।
[संपादित करें] संपीडन अनुपात और ओटो इंजनों में अधिस्फोटन
ओटो चक्र के विश्लेषण में यह दिखाया जा चुका है कि संपीडन अनुपात बढ़ाने से दक्षता बढ़ती है। वास्तविक इंजनों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। ओटो चक्र के अनुसार काम करनेवाले इंजनों में चूषण घात में वायु के साथ ही ईधन भी घुसता है और इसलिए संपीडन घात में भी वह वर्तमान रहता है। जब संपीडन अनुपात बहुत बड़ा रखा जाता है तो संपीडन के एक नियत मात्रा से अधिक होते ही ईधन मिश्रण में अधिस्फोट होता है, अर्थात् ईधन स्वयं, बिना स्पार्क प्लग से चिनगारी आए, जल उठता है। फिर, यदि ऐसा न भी हुआ, तो स्पार्क प्लग की चिनगारी से जलना आरंभ होने पर संपीडन लहरें उठती हैं, जो चिनगारी के पास जलते हुए मिश्रण के आगे आगे चलती हैं। इन संपीडन लहरों के कारण चिनगारी से दूर का मिश्रण स्वयं जल उठ सकता है, जो अवांछनीय है। फिर, सिलिंडर में कहीं पेट्रोल आदि के जले अवशेष के दहकते रहने से, अथवा पिस्टन के भीतर बढ़े पेट्रोल आदि के जले अवशेष के दहकते रहने से, अथवा पिस्टन के भीतर बढ़े किसी अवयव की तप्त नोक से भी ईधन मिश्रण समय के पहले जल सकता है।
जब कभी संपीडित मिश्रण समय से पहले जल उठता है तो उसका यह जलना अधिस्फोटक (डिटोनेटिंग) होता है। यह कान से सुनाई पड़ता है - जान पड़ता है कि किसी धातु को हथौड़े से ठोंका जा रहा है। शीघ्रतापूर्वक जलने वाले ईधनों में अधिस्फोट की आशंका अधिक रहती है। पिछली कुछ दशाब्दियों में कई नवीन खोजें हुई हैं, जिनसे बिना अधिस्फोट हुए संपीडन अनुपात अधिक बड़ा रखा जा सकता है। उदाहरणत:
- (1) ऐसे ईधन बनाए गए हैं जो अधिक धीरे धीरे जलते हैं, जैसे बेंज़ोल और पेट्रोल के मिश्रण, पॉलीमेराइज़ किया हुआ पेट्रोल और ऐसा पेट्रोल जिसमें थोड़ी मात्रा में टेट्रा-एथिल-लेड मिला रहता है;
- (2) दहनकक्ष के उस भाग को, जो पिस्टन के ऊपर रहता है, ऐसा नवीन रूप दिया गया है कि अधिस्फोट कम हो;
- (3) दहनकक्ष से उष्मा के निकलने का वेग बढ़ा दिया गया है। यह काम इंजन के माथे को पहले से पतला और अधिक दृढ़ धातुओं का (जैसे ऐल्युमिनियम की संकर धातु य काँसे का) बनाया गया है, जो उष्मा के अधिक अच्छे चालक (कंडक्टर) हैं। साथ ही पिस्टन भी ऐसे पदार्थो का बनता है जो उष्मा के अच्छे चालक होते हैं।
काँसे (ब्राञ्ज़) के माथे बनाने से संपीडन अनुपात के बहुत अधिक रहने पर भी इंजन बिना अधिस्फोट के चलते है; इसका कारण यह है कि काँसा उष्मा का बहुत अच्छा चालक है। इसलिए उष्मा सिलिंडर से शीघ्रता से दूर होती रहती हैं। परंतु, बहुत शीघ्रता से उष्मा का दूर होना भी अवगुण है, क्योंकि इससे अधिक संपीडन के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो पाती। हमारा उद्देश्य सदा यह रहता है कि उष्मीय दक्षता बढ़े। परंतु कुछ इंजनों में इतनी उष्मा इधर उधर चली जाती है कि उष्मीय दक्षता बढ़ने के बदले घट जाती है। ऐल्यूमिनियम के माथे में कभी कभी यही दोष देखा जाता है।
- (4) दहनकक्ष के भीतरी भाग को अधिक चिकना बनाया जाता है, जिससे कोई ऐसे दाने नहीं रह पाते जो तप्त होकर लाल हो जायँ और ईधन-मिश्रण का जलना आरंभ कर दें; तथा
- (5) दहनकक्ष के आसपास के भागों को (जैसे स्पार्क प्लग, वाल्व मुंड आदि को) अधिक ठंढा रखने का प्रबंध किया गया है।
सन् 1920-25 के लगभग मोटरकार के इंजनों में संपीडन अनुपात लगभग 4.5 रहता था; कभी-कभी तो यह 3.5 ही रहता था। वर्तमान समय में यह अनुपात 6.5 या कुछ अधिक रहता है; कुछ इंजनों में तो यह अनुपात 7.5 तक होता है।
[संपादित करें] अंतर्दहन इंजनों की त्वरा
इंजनों की त्वरा (चाल, स्पीड) साधारणत: चक्कर प्रति मिनट (च.प्र.मि., आर.पी.एम., रेवोल्यूशंस पर मिनट) में बताई जाती है परंतु यह निर्धारित नहीं है कि कितने चक्कर प्रति मिनट रहने पर इंजन को इनमें से किस विशेष वर्ग में रखा जाए। इसके अतिरिक्त तीव्रगति वाष्प इंजन में जितने चक्कर प्रति मिनट होते हैं, वे अत्यंत मंदगति अंतर्दह इंजन के चक्कर प्रति मिनट 4,000 या कुछ अधिक चक्कर का वेग रहता है, परंतु दौड़ की प्रतियोगिता के लिए बने इंजनों में चक्कर प्रति मिनट 6,000 के आसपास होते हैं। वे डीज़ल इंजन, जिनमें चक्कर प्रति मिनट लगभग 1,000 होते हैं तीव्रगति डीज़ल कहलाते हैं। बड़ी नाप के सिलिंडरवाले इंजन छोटे सिलिंडरोंवाले इंजनों की अपेक्षा मंद गति से चलते हैं, क्योंकि बड़े पिस्टन भारी होते हैं और उनके चलन की दिशा बदलते समय इतना झटका लगता है कि उसे सँभालना कठिन होता है।
पिस्टन का वेग भी इंजनों की गति की सीमा निर्धारित करता है, क्योंकि पिस्टन का वेग बहुत बढ़ाने से इंजन घिसकर शीघ्र नष्ट हो जाता है। मोटरकार के इंजनों में पिस्टन-वेग अब 2,800 फुट प्रति मिनट या इससे भी कुछ अधिक रखा जाता है। डीज़ल इंजनों में पिस्टन का औसत वेग 1,000 और 1,200 फुट प्रति मिनट के बीच रहता है।
[संपादित करें] इंजन की नाप
इंजनों की नाप सिलिंडर के व्यास और पिस्टन की दौड़ से बताई जाती है। उदहारणत:, 12-18 इंच के इंजन का अर्थ यह है कि सिलिंडर का व्यास 12 इंच है और पिस्टन की दौड़ 18 इंच है।
आधुनिक मोटरकार इंजनों में अपने उसी नाप के 20-30 वर्ष पहले के पूर्वजों की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्य रहता है। सामर्थ्य निम्नलिखित कारणों से बढ़ा है:
(1) वाल्वों का अधिक ऊँचाई तक उठना और अंतग्र्रहण छिद्र का बड़ा होना, जिससे ईधन मिश्रण के आने में कम द्रवघर्षण उत्पन्न होता है और इसलिए सिलिंडर में घुसनेवाले मिश्रण की तौल अधिक होती है;
(2) निष्कासक वाल्व का कुछ शीघ्र खुल जाना, जिससे पिस्टन पर उल्टी दाब नहीं पड़ती और ऋण कर्म नहीं करना पड़ता;
(3) निष्कासक वाल्व का कुछ देर में बंद होना, जिसके कारण जली गैसों को बाहर निकलने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है और वे अपने ही झोंके से सिलिंडर से लगभग पूर्णत: निकल जाती हैं;
(4) अंतग्र्रहण वाल्व का कुछ बाद में बंद होना, जिससे संपीडन घात के पश्चात् पिस्टन के चल पड़ने पर भी आनेवाला ईधन-मिश्रण अपनी झोंक (इनर्शिया) से आता रहता है और इस प्रकार तीव्रगति इंजनों में पहले की अपेक्षा अब अधिक मिश्रण सिलिंडरों में घुस पाता है;
(5) अधिक अच्छी अंतग्र्रहण नलिकाएँ, जिनसे विविध सिलिंडरों में अधिक बराबरी से ईधन मिश्रण पहुँचता है;
(6) चल भागों का बढ़िया आसंजन (फ़िट) और अधिक अच्छी याँत्रिक रचना, जिससे घर्षण और घरघराहट दोनों में कमी होती है;
(7) अधिक तीव्रगति इंजन, जिसका बनना अधिक शुद्ध निर्माण और चल भागों के अधिक उत्तम संतुलन से संभव हो सका है।
[संपादित करें] वर्गीकरण
- प्रत्यागामी इंजन (reciprocating engine)
- घूर्णी इंजन (rotary engine)
- इंधन के अनुसार
[संपादित करें] रेसिप्रोकटिंग इंजन
[संपादित करें] जेट इंजन
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गणकीय तरल यांत्रिकी से अनुमानित जेट इंजन के निकट प्रवाह क्षेत्र |
[संपादित करें] गैस टरबाइन
[संपादित करें] डीजल इंजन
[संपादित करें] पेट्रोल इंजन
[संपादित करें] इन्हें भी देखें
[संपादित करें] वाह्य सूत्र
- Animated Engines - अनेकों प्रकार के इंजनों की व्याख्या
- Intro to Car Engines - Cut-away images and a good overview of the internal combustion engine
- The Fuel and Engine Bible - A good resource for different engine types and fuels
- youtube - Animation of the components and built-up of a 4-cylinder engine
- youtube - Animation of the internal moving parts of a 4-cylinder engine
- [http://www.gsparkplug.com/ Spark Plug Retailer UK Classic and Vintage Cars




