क्विनोलीन

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क्विनोलीन (Quinoline) एक हेटेरोसाइक्लिक एरोमैटिक कार्बनिक यौगिक है। इसका अणुसूत्र C9H7N है। इसे रुंगे (Runge) ने अलकतरे के उच्चतापीय आंशिक आसवन से प्राप्त किया। पर बाद में गेरहार्ट (Gerhardt) ने बताया कि क्विनीन (Quinine) अथवा सिनकोनीन (Cinchonine) और कास्टिक पोटाश के आसवन से भी यह प्राप्त होता है। क्विनीन से प्राप्त होने के कारण इसका नाम क्विनोलीन पड़ा। यह अस्थितैल तथा अलकतरा में प्राप्य है।

गुणधर्म[संपादित करें]

क्विनोलीन शुद्ध रूप से रंगहीन तैलीय द्रव है, पर हवा के संपर्क से धीरे-धीरे काला पड़ जाता है। इसका आपेक्षिक घनत्व १.०९५ और क्वथनांक २९९ डिग्री सें. हैं। इसमें लाक्षणिक दुर्गध होती है। यह जल में थोड़ा विलेय है लेकिन गरम जल तथा अधिकांश कार्बनिक विलायकों में सरलता से विलेय है। लिटमस के साथ क्षारीय परख देता है तथा एकाम्लीय समाक्षार की भाँति अम्लों, जैसे हाइड्रोजन अम्ल, के साथ मणिभीय लवण बनाता है, जो पानी में अधिक विलेय होते हैं।

निर्माण[संपादित करें]

अपरिष्कृत क्विनोलीन को, जो कोलतार अथवा अस्थितैल से प्राप्त होता है, विशुद्ध बनाना कठिन है, क्योंकि उसमें उसके सजातीय भी मिश्रित रहते हैं। इसलिये शुद्ध क्विनोलीन कृत्रिम विधि से प्राप्त किया जाता है। स्क्राउप (Skraup) की विधि के अनुसार ऐनिलीन (१९ भाग), ग्लिसरीन (६० भाग), सल्फ्यूरिक अम्ल (५० भाग) तथा नाइट्रोबेंजीन (१२ भाग) के मिश्रण को दो घंटे तक उबालते है। नाइट्रोबेंज़ीन (आक्सीकारक) के स्थान पर आर्सेनिक अम्ल का प्रयोग अधिक उपयोगी होता है। इस रासायनिक क्रिया में ग्लिसरीन ऐक्रोलीन में परिवर्तित हो जाता है। यह ऐनिलीन के साथ संयोजित होकर ऐक्रोलीन ऐनिलीन बनाता है, जो आक्सीकृत होकर क्विनोलीन बन जाता है। यह तृतीय ऐमिन होने के कारण ऐल्किल-आयोहइडों के साथ चतुष्क ऐमोनियम लवण और अकार्बनिक लवणों के साथ द्विगुण लवण बनाता है, जैसे प्लैटीनीक्लोराइड के साथ (C9H7N) 2H2 Pt Cl6 2H2 O क्विनोलीन के ऊपर नाइट्रिक और क्रोमिक अम्ल की कोई क्रिया नहीं होती पर क्षारीय परमैंगनेट इसे क्विनोलिनिक अम्ल में आक्सीकृत करता है। इसकी अणुरचना नैफ्थेलीन की भाँति है, जिसे हम दो नाभिकों, एक बेंजीन तथा दूसरे पिरिडीन के संगलन से प्राप्त समझ सकते है :

पिरिडीन नाभिक का शीघ्र ही हाइड्रोजीनकरण होता है। टिन और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से अपचयित होकर क्विनोलीन के बहुत से प्रतिस्थापन उत्पाद पदार्थ ज्ञात हैं, और इसके संजातों (Homologues) में क्विनैल्डीन, लेपिंडीन तथा गामा फेनील क्विनोलीन महत्वपूर्ण हैं।

उपयोग[संपादित करें]

कुछ क्विनोलीन संजातों का उपयोग ओषधि में प्रतिपूय तथा पीड़ानाशक के रूप में किया जाता है। डिफ्थीरिया रोग में गला धोने के लिये भी इसका उपयोग किया जाता है। कृत्रिम रंजकों के सश्लेषण में यह महत्वपूर्ण मध्यवर्ती है।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

अन्य यौगिक देखें

कार्बन के रासायनिक यौगिकों को कार्बनिक यौगिक कहते हैं। प्रकृति में इनकी संख्या 10 लाख से भी अधिक है। जीवन पद्धति में कार्बनिक यौगिकों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें कार्बन के साथ-साथ हाइड्रोजन भी रहता है। ऐतिहासिक तथा परंपरा गत कारणों से कुछ कार्बन के यौगकों को कार्बनिक यौगिकों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। इनमें कार्बनडाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड प्रमुख हैं। सभी जैव अणु जैसे कार्बोहाइड्रेट, अमीनो अम्ल, प्रोटीन, आरएनए तथा डीएनए कार्बनिक यौगिक ही हैं। कार्बन और हाइड्रोजन के यौगिको को हाइड्रोकार्बन कहते हैं। मेथेन (CH4) सबसे छोटे अणुसूत्र का हाइड्रोकार्बन है। ईथेन (C2H6), प्रोपेन (C3H8) आदि इसके बाद आते हैं, जिनमें क्रमश: एक एक कार्बन जुड़ता जाता है। हाइड्रोकार्बन तीन श्रेणियों में विभाजित किए जा सकते हैं: ईथेन श्रेणी, एथिलीन श्रेणी और ऐसीटिलीन श्रेणी। ईथेन श्रेणी के हाइड्रोकार्बन संतृप्त हैं, अर्थात्‌ इनमें हाइड्रोजन की मात्रा और बढ़ाई नहीं जा सकती। एथिलीन में दो कार्बनों के बीच में एक द्विबंध (=) है, ऐसीटिलीन में त्रिगुण बंध (º) वाले यौगिक अस्थायी हैं। ये आसानी से ऑक्सीकृत एवं हैलोजनीकृत हो सकते हैं। हाइड्रोकार्बनों के बहुत से व्युत्पन्न तैयार किए जा सकते हैं, जिनके विविध उपयोग हैं। ऐसे व्युत्पन्न क्लोराइड, ब्रोमाइड, आयोडाइड, ऐल्कोहाल, सोडियम ऐल्कॉक्साइड, ऐमिन, मरकैप्टन, नाइट्रेट, नाइट्राइट, नाइट्राइट, हाइड्रोजन फास्फेट तथा हाइड्रोजन सल्फेट हैं। असतृप्त हाइड्रोकार्बन अधिक सक्रिय होता है और अनेक अभिकारकों से संयुक्त हा सरलता से व्युत्पन्न बनाता है। ऐसे अनेक व्युत्पंन औद्योगिक दृष्टि से बड़े महत्व के सिद्ध हुए हैं। इनसे अनेक बहुमूल्य विलायक, प्लास्टिक, कृमिनाशक ओषधियाँ आदि प्राप्त हुई हैं। हाइड्रोकार्बनों के ऑक्सीकरण से ऐल्कोहॉल ईथर, कीटोन, ऐल्डीहाइड, वसा अम्ल, एस्टर आदि प्राप्त होते हैं। ऐल्कोहॉल प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक हो सकते हैं। इनके एस्टर द्रव सुगंधित होते हैं। अनेक सुगंधित द्रव्य इनसे तैयार किए जा सकते हैं। इसी प्रकार क्विनोलीन को भी विभिन्न प्रयोगों में लिया जा सकता है।