कन्फ्यूशियस

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कन्फ्यूशियस का 1922 में बना चित्र, चित्रकार E.T.C. Werner)

जिस समय भारत में भगवान महावीर और बुद्ध धर्म के संबध में नए विचार रख रहें थे, चीन में भी एक सुधारक का जन्म हुआ, जिसका नाम कन्फ्यूशियस था. उस समय चीन में चाऊ वंश का शासन था. इनकी शक्ति शिथिल पड़ने के कारण चीन में बहुत से राज्य कायम हो गये थें, जो सदा आपस में लड़ते रहते थे. अतः चीन की प्रजा बहुत ही कष्ट झेल रही थी. ऐसे समय में चीन वाशियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने हेतु महात्मा कन्फ्यूशियस का आविर्भाव हुआ.
इनका जन्म ईसा मसीह के जन्म से करीब 50 वर्ष पहले चीन के शानटुंग प्रदेश में हुआ था. बचपन में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई. उनके ज्ञान की आकांक्षा असीम थी. बहुत अधिक कष्ट करके उन्हें ज्ञान अर्जन करना पड़ा था. 17 वर्ष की उम्र में उन्हें एक सरकारी नौकरी मिली. कुछ ही वर्षों के बाद सरकारी नौकरी छोड़कर वे शिक्षण कार्य में लग गयें. घर में ही एक विद्दालय खोलकर उन्होंने विद्दार्थियों को शिक्षा देना प्रारंभ कीया. वे मौखिक रूप से विद्दार्थियों को इतिहास, काव्य, और नीतिशास्त्र की शिक्षा देते थे. काव्य, इतिहास, संगीत और नीतिशास्त्र पर कई पुस्तकों की रचना भी किए.
53 वर्ष की उम्र में लू राज्य में एक शहर के वे शासनकर्ता तथा बाद में वे मंत्री पद पर नियुक्त हुए. मंत्री होने के नाते इन्होंने दंड के बदले मनुष्य के चरित्र सुधार पर बल दिया. कन्फ्यूशियस ने अपने शिष्यों को सत्य, प्रेम और न्याय का संदेश दिया. वे सदाचार पर अधिक बल देते थे. वे लोगों को विनयी, परोपकारी, गुणी और चरित्रवान बनने की प्रेरणा देते थें. वे बड़ों एंव पुर्वजों को आदर-सम्मान करने के लिए कहते थें. वे कहते थे कि दुसरो के साथ वैसा वर्ताव न करो जैसा तुम स्वंय अपने साथ नहीं करना चाहते हो.
कन्फ्यूशियस एक सुधारक थें, धर्म प्रचारक नहीं. उन्होने ईश्वर के बारे में कोई उपदेश नहीं दिया, परन्तु फिर भी बाद में लोग उन्हें धार्मिक गुरू मानने लगे. इनकी मृत्यु 480 ई. पू. में हो गई थी. कन्फ्यूशियस के समाज सुधारक उपदेशों के कारण चीनी समाज में एक स्थिरता आइ. कन्फ्यूशियस का दर्शन शास्त्र आज भी चीनी शिक्षा के लिए पथ प्रदर्शक बना हुआ है. कन्फ्यूशियस के प्रसंग/संस्मरण

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