ईसा मसीह

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ईसा या यीशु मसीह या जीज़स क्राइस्ट (इब्रानी : येशुआ),इस्लाम के अज़ीम तरीन पेग़मबरों मे से एक है और ईसाई धर्म के प्रवर्तक माने जाते हैं। ईसाई लोग उन्हें परमपिता परमेश्वर का पुत्र और ईसाई त्रिमूर्ति का तृतीय सदस्य मानते हैं। ईसा की जीवनी और उपदेश बाइबिल के नये नियम (ख़ास तौर पर चार शुभसन्देश -- मत्ती , लूका, युहन्ना और मर्कुस) में दिये गये हैं । ईसा को ईस्लाम मै भी अज़ीम पैग़्बरो मै है.।

जन्म[संपादित करें]

ईसा मसीह का जन्म

उन दिनों में औगूस्तुस कैसर की ओर से आज्ञा निकली, कि सारे जगत के लोगों के नाम लिखे जाएं। यह पहिली नाम लिखाई उस समय हुई, जब क्विरिनियुस सूरिया का हाकिम था। और सब लोग नाम लिखवाने के लिये अपने अपने नगर को गए। सो यूसुफ भी इसलिये कि वह दाऊद के घराने और वंश का था, गलील के नासरत नगर से यहूदिया में दाऊद के नगर बैतलहम को गया। कि अपनी मंगेतर मरियम के साथ जो गर्भवती थी नाम लिखवाए। उन के वहां रहते हुए उसके जनने के दिन पूरे हुए। और वह अपना पहिलौठा पुत्र जनी और उसे कपड़े में लपेटकर चरनी में रखा: क्योंकि उन के लिये सराय में जगह न थी। और उस देश में कितने गड़ेरिये थे, जो रात को मैदान में रहकर अपने झुण्ड का पहरा देते थे। और प्रभु का एक दूत उन के पास आ खड़ा हुआ; और प्रभु का तेज उन के चारों ओर चमका, और वे बहुत डर गए। तब स्वर्गदूत ने उन से कहा, मत डरो; क्योंकि देखो मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूं जो सब लोगों के लिये होगा। कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और यही मसीह प्रभु है। और इस का तुम्हारे लिये यह पता है, कि तुम एक बालक को कपड़े में लिपटा हुआ और चरनी में पड़ा पाओगे। तब एकाएक उस स्वर्गदूत के साथ स्वर्गदूतों का दल परमेश्वर की स्तुति करते हुए और यह कहते दिखाई दिया। कि आकाश में परमेश्वर की महिमा और पृथ्वी पर उन मनुष्यों में जिनसे वह प्रसन्न है शान्ति हो॥ जब स्वर्गदूत उन के पास से स्वर्ग को चले गए, तो गड़ेरियों ने आपस में कहा, आओ, हम बैतलहम जाकर यह बात जो हुई है, और जिसे प्रभु ने हमें बताया है, देखें। और उन्होंने तुरन्त जाकर मरियम और यूसुफ को और चरनी में उस बालक को पड़ा देखा। इन्हें देखकर उन्होंने वह बात जो इस बालक के विषय में उन से कही गई थी, प्रगट की। और सब सुनने वालों ने उन बातों से जो गड़िरयों ने उन से कहीं आश्चर्य किया। परन्तु मरियम ये सब बातें अपने मन में रखकर सोचती रही। और गड़ेरिये जैसा उन से कहा गया था, वैसा ही सब सुनकर और देखकर परमेश्वर की महिमा और स्तुति करते हुए लौट गए॥ जब आठ दिन पूरे हुए, और उसके खतने का समय आया, तो उसका नाम यीशु रखा गया, जो स्वर्गदूत ने उसके पेट में आने से पहिले कहा था। और जब मूसा की व्यवस्था के अनुसार उन के शुद्ध होने के दिन पूरे हुए तो वे उसे यरूशलेम में ले गए, कि प्रभु के सामने लाएं। (जैसा कि प्रभु की व्यवस्था में लिखा है कि हर एक पहिलौठा प्रभु के लिये पवित्र ठहरेगा)। और प्रभु की व्यवस्था के वचन के अनुसार पंडुकों का एक जोड़ा, या कबूतर के दो बच्चे ला कर बलिदान करें। और देखो, यरूशलेम में शमौन नाम एक मनुष्य था, और वह मनुष्य धर्मी और भक्त था; और इस्राएल की शान्ति की बाट जोह रहा था, और पवित्र आत्मा उस पर था। और पवित्र आत्मा से उस को चितावनी हुई थी, कि जब तक तू प्रभु के मसीह को देख ने लेगा, तक तक मृत्यु को न देखेगा। और वह आत्मा के सिखाने से मन्दिर में आया; और जब माता-पिता उस बालक यीशु को भीतर लाए, कि उसके लिये व्यवस्था की रीति के अनुसार करें। तो उस ने उसे अपनी गोद में लिया और परमेश्वर का धन्यवाद करके कहा, हे स्वामी, अब तू अपने दास को अपने वचन के अनुसार शान्ति से विदा करता है। क्योंकि मेरी आंखो ने तेरे उद्धार को देख लिया है। जिसे तू ने सब देशों के लोगों के साम्हने तैयार किया है। कि वह अन्य जातियों को प्रकाश देने के लिये ज्योति, और तेरे निज लोग इस्राएल की महिमा हो। और उसका पिता और उस की माता इन बातों से जो उसके विषय में कही जाती थीं, आश्चर्य करते थे। तब शमौन ने उन को आशीष देकर, उस की माता मरियम से कहा; देख, वह तो इस्राएल में बहुतों के गिरने, और उठने के लिये, और एक ऐसा चिन्ह होने के लिये ठहराया गया है, जिस के विरोध में बातें की जाएगीं -- वरन तेरा प्राण भी तलवार से वार पार छिद जाएगा-- इस से बहुत हृदयों के विचार प्रगट होंगे। और अशेर के गोत्र में से हन्नाह नाम फनूएल की बेटी एक भविष्यद्वक्तिन थी: वह बहुत बूढ़ी थी, और ब्याह होने के बाद सात वर्ष अपने पति के साथ रह पाई थी। वह चौरासी वर्ष से विधवा थी: और मन्दिर को नहीं छोड़ती थी पर उपवास और प्रार्थना कर करके रात-दिन उपासना किया करती थी। और वह उस घड़ी वहां आकर प्रभु का धन्यवाद करने लगी, और उन सभों से, जो यरूशलेम के छुटकारे की बाट जोहते थे, उसके विषय में बातें करने लगी। और जब वे प्रभु की व्यवस्था के अनुसार सब कुछ निपटा चुके तो गलील में अपने नगर नासरत को फिर चले गए॥ और बालक बढ़ता, और बलवन्त होता, और बुद्धि से परिपूर्ण होता गया; और परमेश्वर का अनुग्रह उस पर था। उसके माता-पिता प्रति वर्ष फसह के पर्व में यरूशलेम को जाया करते थे। जब वह बारह वर्ष का हुआ, तो वे पर्व की रीति के अनुसार यरूशलेम को गए। और जब वे उन दिनों को पूरा करके लौटने लगे, तो वह लड़का यीशु यरूशलेम में रह गया; और यह उसके माता-पिता नहीं जानते थे। वे यह समझकर, कि वह और यात्रियों के साथ होगा, एक दिन का पड़ाव निकल गए: और उसे अपने कुटुम्बियों और जान-पहचानों में ढूंढ़ने लगे। पर जब नहीं मिला, तो ढूंढ़ते-ढूंढ़ते यरूशलेम को फिर लौट गए। और तीन दिन के बाद उन्होंने उसे मन्दिर में उपदेशकों के बीच में बैठे, उन की सुनते और उन से प्रश्न करते हुए पाया। और जितने उस की सुन रहे थे, वे सब उस की समझ और उसके उत्तरों से चकित थे। तब वे उसे देखकर चकित हुए और उस की माता ने उस से कहा; हे पुत्र, तू ने हम से क्यों ऐसा व्यवहार किया? देख, तेरा पिता और मैं कुढ़ते हुए तुझे ढूंढ़ते थे। उस ने उन से कहा; तुम मुझे क्यों ढूंढ़ते थे? क्या नहीं जानते थे, कि मुझे अपने पिता के भवन में होना अवश्य है? परन्तु जो बात उस ने उन से कही, उन्होंने उसे नहीं समझा। तब वह उन के साथ गया, और नासरत में आया, और उन के वश में रहा; और उस की माता ने ये सब बातें अपने मन में रखीं॥ और यीशु बुद्धि और डील-डौल में और परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़ता गया॥

जन्म और बचपन[संपादित करें]

दो हजार साल पहले की बात है। फिलिस्तीन में उन दिनों हिरोद का राज था। सम्राट आगस्ट्स के हुक्म से रोमन जगत की मर्दुमशुमारी हो रही थी। उसमें शामिल होने के लिए यूसुफ नाम का यहूदी बढ़ई नज़रथ नगर से बैतलहम के लिए रवाना हुआ। वहीं पर उसकी पत्नी मरियम (मेरी) के गर्भ से ईसा का जन्म हुआ।

संयोग ऐसा था कि उस समय इन बेचारों को किसी धर्मशाला में भी ठिकाना न मिल सका। इस लाचार बच्चे को कपड़ों में लपेटकर चरनी (पशुओं की नाद) में रख दिया गया। आठवें दिन बच्चे का नाम रखा गया, यीसु या ईसा। सौरी से निकलने के बाद मरियम और यूसुफ बच्चे को लेकर यरुशलम गए। उन दिनों ऐसी प्रथा थी कि माता-पिता बड़े बेटे को मंदिर में ले जाकर ईश्वर को अर्पित कर देते थे। इन लोगों ने भी इसी तरह ईसा को अर्पित कर दिया। ईसा दिन-दिन बड़े हो रहे थे। यूसुफ और मरियम हर साल यरुशलम जाते थे। ईसा भी साथ जाते थे।

ईसा जब बारह वर्ष के हुए, तो यरुशलम में दो दिन रुककर पुजारियों से ज्ञान चर्चा करते रहे। सत्य को खोजने की वृत्ति उनमें बचपन से ही थी।

यूहन्ना बपतिस्माद।ता (भविष्यद्वक्ता)[संपादित करें]

ईसा मसीह जब 30 साल के हुए, यूहन्ना कहते थे- कि जंगल में एक पुकारने वाले का शब्द हो रहा हे कि प्रभु का मार्ग तैयार करो, उस की सड़कें सीधी बनाओ। हर एक घाटी भर दी जाएगी, और हर एक पहाड़ और टीला नीचा किया जाएगा; और जो टेढ़ा है सीधा, और जो ऊंचा नीचा है वह चौरस मार्ग बनेगा। और हर प्राणी परमेश्वर के उद्धार को देखेगा॥ जो भीड़ की भीड़ उस से बपतिस्मा लेने को निकल कर आती थी, उन से वह कहता था; हे सांप के बच्चों, तुम्हें किस ने जता दिया, कि आने वाले क्रोध से भागो। सो मन फिराव के योग्य फल लाओ: और अपने अपने मन में यह न सोचो, कि हमारा पिता इब्राहीम है; क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि परमेश्वर इन पत्थरों से इब्राहीम के लिये सन्तान उत्पन्न कर सकता है। और अब ही कुल्हाड़ा पेड़ों की जड़ पर धरा है, इसलिये जो जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में झोंका जाता है। और लोगों ने उस से पूछा, तो हम क्या करें? उस ने उन्हें उतर दिया, कि जिस के पास दो कुरते हों वह उसके साथ जिस के पास नहीं हैं बांट दे और जिस के पास भोजन हो, वह भी ऐसा ही करे। और महसूल लेने वाले भी बपतिस्मा लेने आए, और उस से पूछा, कि हे गुरू, हम क्या करें? उस ने उन से कहा, जो तुम्हारे लिये ठहराया गया है, उस से अधिक न लेना। और सिपाहियों ने भी उस से यह पूछा, हम क्या करें? उस ने उन से कहा, किसी पर उपद्रव न करना, और न झूठा दोष लगाना, और अपनी मजदूरी पर सन्तोष करना॥ जब लोग आस लगाए हुए थे, और सब अपने अपने मन में यूहन्ना के विषय में विचार कर रहे थे, कि क्या यही मसीह तो नहीं है। तो यूहन्ना ने उन सब से उत्तर में कहा: कि मैं तो तुम्हें पानी से बपतिस्मा देता हूं, परन्तु वह आनेवाला है, जो मुझ से शक्तिमान है; मैं तो इस योग्य भी नहीं, कि उसके जूतों का बन्ध खोल सकूं, वह तुम्हें पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देगा।

प्रभु के बादशाहत का उपदेश[संपादित करें]

इसके बाद प्रभु ईसा जगह-जगह प्रवचन करने लगे। वे लोगों से कहते, प्रभु का बादशाहत कहीं दूर नहीं है वह हमारे भीतर ही है। हमारी आत्मा के ही भीत है। हमें ही उसकी स्थापना करनी होगी। हम अपने आपको बदलकर, अपने में परिवर्तन करके प्रभु का बादशाहत ला सकते हैं।

उसके लिए हमें सबके साथ प्रेम करना होगा। सबके सुख में सुखी होना होगा। सबके दुःख में दुःखी होना होगा। हम अलग-अलग नहीं हैं, हम सब एक हैं- इस तरह हमें सोचना होगा और एक-दूसरे के साथ इसी तरह का व्यवहार करना होगा।

प्रभु के बादशाहत में अहंकार और घमंड के लिए स्थान नहीं है। अमीरों का वहाँ प्रवेश नहीं है। जो नाज़ुक हैं, विनीत हैं, गरीब हैं, दीन हैं, सच्चे हैं, ईमानदार हैं, दयालु हैं, उन्हीं को उस बादशाहत में प्रवेश मिलेगा।

स्वर्ग के बादशाहत में, प्रभु के बादशाहत में वे ही लोग जा सकेंगे, जो ईश्वर को आदेश को मानकर उसे अमल में लाकर दिखाएँगे।

ईसा मसीह के पाँच आदेश[संपादित करें]

ईसा मसीह ने पाँच आदेश दिए। उन्होंने कहा, 1. पुराने धर्मग्रंथ में कहा है कि किसी की हत्या मत करो और जो आदमी हत्या करता है, वह गुनहगार है। पर मैं तुमसे कहता हूँ कि जो आदमी अपने भाई पर गु़स्सा करता है, वह परमात्मा की नज़र में गुनहगार है। जो आदमी अपने भाई को गालियाँ देता है, कड़वी बातें कहता है, वह और ज़्यादा गुनहगार है। अपने भाई पर मन में जो क्रोध हो, उसे प्रार्थना करने के पहले निकाल दो। उससे सुलह कर लो।

2. पुराने धर्मग्रंथों में कहा है कि व्यभिचार मत करो और पत्नी से अलग होते हो, तो उसे तलाक़ दे दो। पर मैं तुमसे कहता हूँ कि व्यभिचार तो करना ही नहीं चाहिए। किसी पर बुरी नज़र डालने वाला भी ईश्वर के आगे गुनहगार है। जो आदमी पत्नी को तलाक़ देता है, वह खु़द व्यभिचार करता है और पत्नी से भी व्यभिचार कराने का कारण बनता है। जो आदमी उससे विवाह करता है, उसे भी वह गुनहगार बनाता है।

3. पुराने धर्मग्रंथ में कहा है कि क़सम न खाओ, मगर परमात्मा के आगे अपनी प्रतिज्ञाओं पर डटे रहो। पर मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम्हें किसी भी हालत में क़सम नहीं खानी चाहिए। किसी के बारे में पूछा जाए, तो 'हाँ' या 'न' में ही जवाब दे देना चाहिए।

4. पुराने धर्मग्रंथ में कहा है कि 'आँख के बदले आँख फोड़ दो, दाँत के बदले दाँत तोड़ दो।' पर मैं तुमसे कहता हूँ कि बुराई का बदला बुराई से मत दो। कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर चाँटा मारे, तो तुम बायाँ गाल भी उसके सामने कर दो।

5. पुराने धर्मग्रंथ में कहा है कि 'केवल अपनी ही नस्ल के लोगों से प्रेम करो। पर मैं तुमसे कहता हूँ क तुम्हें हर आदमी से प्रेम करना चाहिए। जो तुम्हें दुश्मन मानते हों, उनसे भी प्रेम करना चाहिए। सभी मनुष्य एक ही पिता की संतान हैं। सब भाई-भाई हैं। सबके साथ तुम्हें प्रेम का व्यवहार करना चाहिए।

पवित्र जीवन[संपादित करें]

'सत्यमय जीवन बिताओ। सब पर प्रेम करो। सब पर दया करो। दान करो। क्रोध मत करो। लोभ मत करो। विषय वासना के फेर में मत पड़ो। अपराधी को भी क्षमा करो। पाप से नफ़रत करो, पापी से नहीं। जो सत्य हो, उसे प्रकट करने में झिझको मत। न अन्याय करो, न अत्याचार न दिखावा करो, न प्रदर्शन। ईश्वर पर विश्वास करो। ग़रीबों की सेवा करो।'

यही था ईसा का संदेश, जिसे उन्होंने जनता के सामने रखा और अपने जीवन में चरितार्थ करके दिखा दिया। उनका सारा जीवन त्याग, सेवा और समर्पण की भावना से भरा पड़ा है।

चमत्कार[संपादित करें]

'विश्वास : फलदायकः'- विश्वास का फल होता है। कितने ही रोगी विश्वास से अच्छे हो गए। ईसा की प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी बारह लोग ईसा के शिष्य बने।

ईसा मसीह का विरोध[संपादित करें]

'पैसे वालों का स्वर्ग के बादशाहत में प्रवेश नहीं हो सकता। सूई के छेद से ऊँट भले निकल जाए, धनवान व्यक्ति प्रभु के बादशाहत में नहीं पहुँच सकता। अपनी सारी दौलत ग़रीबों में बाँटकर, किंन बनकर मेरे साथ आओ। ऐसी बातें सुनकर पैसे वाले लोग ईसा के विरोधी बन गए।

पुरानी ग़लत प्रथाओं का भी ईसा मसीह ने विरोध किया। सत्य के लिए वे किसी की परवाह नहीं करते थे। नतीजा यह हुआ कि दिन-दिन उनका विरोध बढ़ने लगा।

ईसा मसीह का बलिदान[संपादित करें]

ईसा मसीह गधे पर चढ़कर यरुशलम पहुँचे। वही उनको पकड़ने और दंडित करने की साज़िश रची गई।

पिलातुस बोला, 'यह निर्दोष है'।

विरोधी बोले, 'यह अपने को 'ईश्वर का पुत्र' कहता है। इसे क्रूस (सलीब) पर लटकाना चाहिए।'

आखिर विरोधियों की ही बात मान ली गई।

ईसा मसीह ने क्रूस पर लटकते समय परमेश्वर से प्रार्थना की, 'हे प्रभु, क्रूस पर लटकाने वाले इन लोगों को क्षमा करं। वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।

ईसा मसीह का संदेश[संपादित करें]

प्रभु ईसा मसीह ने जब से होश सँभाला, तभी से उन्हें लगा कि उनके यहूदी समाज में नाना प्रकार की ग़लत मान्यताएँ फैली हैं। उन्होंने उनका विरोध करके मनुष्य को सही रास्ते पर चलने की सीख दी। उस समय के समाज में आदमी अपने आपको बहुत नीच, पापी और अपवित्र मानकर आत्मग्लानि से पीड़ित रहता था। आदम-हौवा की ग़लती की मान्यता उसके सिर पर चढ़कर बोलती थी।

ईसा मसीह को यह चीज़ बुरी तरह खटकी। उन्होंने मनुष्य को संदेश दिया कि तुम तो पृथ्वी के नमक हो। विश्व के प्रकाश हो। तुम किसलिए अपने को अपवित्र और पापी समझते हो? परम पवित्र प्रभु की संतान को ऐसी मान्यता शोभा नहीं देती तुम अपने को नीच और अपवित्र मत समझो। अपना आदर करो। अपना आत्मसम्मान जगाओ। तुम सब परमपिता की संतान हो। सब बराबर हो। कोई नीचा नहीं, कोई ऊँचा नहीं।

क्रोध मत करो[संपादित करें]

क्रोध सारे उत्पात की जड़ है। दुनियाभर की बुराइयाँ क्रोध में भरी हैं, इसलिए क्रोध को दूर करना ज़रूरी है। सारी लड़ाइयाँ जरा-जरा सी बातों को लेकर होती हैं। ईसा ने इसे रोकने के लिए कहा-

1. जो कोई अपने किसी भाई पर क्रोध करता है, उसे ईश्वर की तरफ़ से सजा़ भोगनी पड़ेगी। 2. तुम दूसरे का सामना हमले से मत करो। चाहे जितना गुस्सा भरा रहे, दूसरे पर वार न करो। बुराई का बदला बुराई से मत दो। 3. दोस्त को ही नहीं, दुश्मन को भी प्यार करो।

जो तोकू काँटा बुवै, ताहि बोउ तू फूल!

सत्य बोलो[संपादित करें]

ईसा ने देखा कि लोग सत्य नहीं बोलते, झूठ बोलते हैं नमक-मिर्च लगाकर बता का बतंगड़ बना देते हैं और खू़ब झूठी कसमें काया करते हैं। यह आदत ठीक नहीं। उन्होंने कहा, 'तुम्हें जो कहना हो, 'हाँ' या 'न' में कह दो। ज़्यादा शब्द मुँह से निकालोगे, तो वे तुम्हारे भीतर भरे किसी पाप की वजह से ही निकलेंगे।' किसी पर बुरी नज़र न डालो ईसा ने मन की पवित्रता पर बहुत जोर दिया। उन्होंने कहा, 'जो आदमी मन से भी किसी स्त्री पर बुरी नज़र डालता है, उसने मानो उससे बदचलनी कर ही ली!'

नेकी कर और दरिया में डाल[संपादित करें]

ईसा ढोंग और दिखाए को बहुत बुरा मानते थे। उन्होंने इसकी कड़ी निंदा की। उनका कहना था कि 'नेकी कर और दरिया में डाल।' ईमानदार रहो। लोगों के साथ भला व्यवहार करो और क़सूर करने वाले को हमेशा क्षमा करते रहो।

ईश्वर पर विश्वास करो[संपादित करें]

हम मुँह से तो कहते हैं कि हम ईश्वर को मानते हैं, पर भीतर से अपने पर ही भरोसा रखते हैं। ईसा ने कहा, जीवन की ज़रूरतों की चिंता तुम व्यर्थ ही करते हो।

आगे-पीछे हरि खड़े, जब माँगूँ तब देय। माँगो, मिलेगा। दरवाजा खटखटाओ, खुलेगा। यह है, ईसा का पवित्र संदेश! सत्य, प्रेम और करुणा से ओतप्रोत!

जो कोई इसका पालन करेगा, उसका कल्याण हुए बिना नहीं रहेगा। जरूरत है, सच्चे जीसे, ईमानदारी से इस पर चलने की। काश, हम इस पवित्र मार्ग पर चल सकें!

धर्म-प्रचार[संपादित करें]

तीस साल की उम्र में ईसा ने इस्राइल की जनता को यहूदी धर्म का एक नया रूप प्रचारित करना शुरु कर दिया । उन्होंने कहा कि ईश्वर (जो केवल एक ही है) साक्षात प्रेमरूप है और उस वक़्त के वर्त्तमान यहूदी धर्म की पशुबलि और कर्मकाण्ड नहीं चाहता । यहूदी ईश्वर की परमप्रिय नस्ल नहीं है, ईश्वर सभी मुल्कों को प्यार करता है । इंसान को क्रोध में बदला नहीं लेना चाहिए और क्षमा करना सीखना चाहिए । उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे ही ईश्वर के पुत्र हैं, वे ही मसीह हैं और स्वर्ग और मुक्ति का मार्ग हैं । यहूदी धर्म में क़यामत के दिन का कोई ख़ास ज़िक्र या महत्त्व नहीं था, पर ईसा ने क़यामत के दिन पर ख़ास ज़ोर दिया - क्योंकि उसी वक़्त स्वर्ग या नर्क इंसानी आत्मा को मिलेगा । ईसा ने कई चमत्कार भी किए ।

विरोध, मृत्यु और पुनरुत्थान[संपादित करें]

ईसा अपना ही क्रूस उठाये हुए

यहूदियों के कट्टरपन्थी रब्बियों (धर्मगुरुओं) ने ईसा का भारी विरोध किया । उन्हें ईसा में मसीहा जैसा कुछ ख़ास नहीं लगा । उन्हें अपने कर्मकाण्डों से प्रेम था । ख़ुद को ईश्वरपुत्र बताना उनके लिये भारी पाप था । इसलिये उन्होंने उस वक़्त के रोमन गवर्नर पिलातुस को इसकी शिकायत कर दी । रोमनों को हमेशा यहूदी क्रान्ति का डर रहता था । इसलिये कट्टरपन्थियों को प्रसन्न करने के लिए पिलातुस ने ईसा को क्रूस (सलीब) पर मौत की दर्दनाक सज़ा सुनाई ।

बाइबल के मुताबिक़, रोमी सैनिकों ने ईसा को कोड़ों से मारा। उन्हें शाही कपड़े पहनाए ,उनके सर पर कांटों का ताज सजाया और उनपर थूका, और ऐसे उन्हें तौहीन में "यहूदियों का बादशाह" बनाया। पीठ पर अपना ही क्रूस उठवाके, रोमियों ने उन्हें गल्गता तक लिया, जहां पर उन्हें क्रूस पर लटकाना था। गल्गता पहुंचने पर, उन्हें मदिरा और पित्त का मिश्रण पेश किया गया था। उस युग में यह मिश्रण मृत्युदंड की अत्यंत दर्द को कम करने के लिए दिया जाता था। ईसा ने इसे इंकार किया। बाइबल के मुताबिक़, ईसा दो और के बीच क्रूस पर लटकाया गया था।

ईसाइयों का मानना है कि क्रूस पर मरते समय ईसा मसीह ने सभी इंसानों के पाप स्वयं पर ले लिए थे और इसलिए जो भी ईसा में विश्वास करेगा, उसे ही स्वर्ग मिलेगा । मृत्यु के तीन दिन बाद ईसा वापिस जी उठे और 40 दिन बाद सीधे स्वर्ग चले गए । ईसा के 12 शिष्यों ने उनके नये धर्म को सभी जगह फैलाया । यही धर्म ईसाई धर्म कहलाया ।

इस्लाम[संपादित करें]

जनम हेरोदेस राजा के दिनों में जब यहूदिया के बैतलहम में यीशु का जन्म हुआ, तो देखो, पूर्व से कई ज्योतिषी यरूशलेम में आकर पूछने लगे। कि यहूदियों का राजा जिस का जन्म हुआ है, कहां है? क्योंकि हम ने पूर्व में उसका तारा देखा है और उस को प्रणाम करने आए हैं। यह सुनकर हेरोदेस राजा और उसके साथ सारा यरूशलेम घबरा गया। और उस ने लोगों के सब महायाजकों और शास्त्रियों को इकट्ठे करके उन से पूछा, कि मसीह का जन्म कहाँ होना चाहिए?

उन्होंने उस से कहा, यहूदिया के बैतलहम में; क्योंकि भविष्यद्वक्ता के द्वारा यों लिखा है। 
कि हे बैतलहम, जो यहूदा के देश में है, तू किसी रीति से यहूदा के अधिकारियों में सब से छोटा नहीं; क्योंकि तुझ में से एक अधिपति निकलेगा, जो मेरी प्रजा इस्राएल की रखवाली करेगा। 
तब हेरोदेस ने ज्योतिषियों को चुपके से बुलाकर उन से पूछा, कि तारा ठीक किस समय दिखाई दिया था। 

और उस ने यह कहकर उन्हें बैतलहम भेजा, कि जाकर उस बालक के विषय में ठीक ठीक मालूम करो और जब वह मिल जाए तो मुझे समाचार दो ताकि मैं भी आकर उस को प्रणाम करूं। वे राजा की बात सुनकर चले गए, और देखो, जो तारा उन्होंने पूर्व में देखा था, वह उन के आगे आगे चला, और जंहा बालक था, उस जगह के ऊपर पंहुचकर ठहर गया॥ उस तारे को देखकर वे अति आनन्दित हुए। और उस घर में पहुंचकर उस बालक को उस की माता मरियम के साथ देखा, और मुंह के बल गिरकर उसे प्रणाम किया; और अपना अपना यैला खोलकर उसे सोना, और लोहबान, और गन्धरस की भेंट चढ़ाई। और स्वप्न में यह चितौनी पाकर कि हेरोदेस के पास फिर न जाना, वे दूसरे मार्ग से होकर अपने देश को चले गए॥ उन के चले जाने के बाद देखो, प्रभु के एक दूत ने स्वप्न में यूसुफ को दिखाई देकर कहा, उठ; उस बालक को और उस की माता को लेकर मिस्र देश को भाग जा; और जब तक मैं तुझ से न कहूं, तब तक वहीं रहना; क्योंकि हेरोदेस इस बालक को ढूंढ़ने पर है कि उसे मरवा डाले। वह रात ही को उठकर बालक और उस की माता को लेकर मिस्र को चल दिया। और हेरोदेस के मरने तक वहीं रहा; इसलिये कि वह वचन जो प्रभु ने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा था कि मैं ने अपने पुत्र को मिस्र से बुलाया पूरा हो। जब हेरोदेस ने यह देखा, कि ज्योतिषियों ने मेरे साथ ठट्ठा किया है, तब वह क्रोध से भर गया; और लोगों को भेजकर ज्योतिषियों से ठीक ठीक पूछे हुए समय के अनुसार बैतलहम और उसके आस पास के सब लड़कों को जो दो वर्ष के, वा उस से छोटे थे, मरवा डाला। तब जो वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था, वह पूरा हुआ, कि रामाह में एक करूण-नाद सुनाई दिया, रोना और बड़ा विलाप, राहेल अपने बालकों के लिये रो रही थी, और शान्त होना न चाहती थी, क्योंकि वे हैं नहीं॥ हेरोदेस के मरने के बाद देखो, प्रभु के दूत ने मिस्र में यूसुफ को स्वप्न में दिखाई देकर कहा। कि उठ, बालक और उस की माता को लेकर इस्राएल के देश में चला जा; क्योंकिं जो बालक के प्राण लेना चाहते थे, वे मर गए। वह उठा, और बालक और उस की माता को साथ लेकर इस्राएल के देश में आया। परन्तु यह सुनकर कि अरिखलाउस अपने पिता हेरोदेस की जगह यहूदिया पर राज्य कर रहा है, वहां जाने से डरा; और स्वप्न में चितौनी पाकर गलील देश में चला गया। और नासरत नाम नगर में जा बसा; ताकि वह वचन पूरा हो, जो भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा कहा गया था, कि वह नासरी कहलाएगा॥

लड़कपन

और बालक बढ़ता, और बलवन्त होता, और बुद्धि से परिपूर्ण होता गया; और परमेश्वर का अनुग्रह उस पर था। उसके माता-पिता प्रति वर्ष फसह के पर्व में यरूशलेम को जाया करते थे। जब वह बारह वर्ष का हुआ, तो वे पर्व की रीति के अनुसार यरूशलेम को गए। और जब वे उन दिनों को पूरा करके लौटने लगे, तो वह लड़का यीशु यरूशलेम में रह गया; और यह उसके माता-पिता नहीं जानते थे। वे यह समझकर, कि वह और यात्रियों के साथ होगा, एक दिन का पड़ाव निकल गए: और उसे अपने कुटुम्बियों और जान-पहचानों में ढूंढ़ने लगे। पर जब नहीं मिला, तो ढूंढ़ते-ढूंढ़ते यरूशलेम को फिर लौट गए। और तीन दिन के बाद उन्होंने उसे मन्दिर में उपदेशकों के बीच में बैठे, उन की सुनते और उन से प्रश्न करते हुए पाया। और जितने उस की सुन रहे थे, वे सब उस की समझ और उसके उत्तरों से चकित थे। तब वे उसे देखकर चकित हुए और उस की माता ने उस से कहा; हे पुत्र, तू ने हम से क्यों ऐसा व्यवहार किया? देख, तेरा पिता और मैं कुढ़ते हुए तुझे ढूंढ़ते थे। उस ने उन से कहा; तुम मुझे क्यों ढूंढ़ते थे? क्या नहीं जानते थे, कि मुझे अपने पिता के भवन में होना अवश्य है? परन्तु जो बात उस ने उन से कही, उन्होंने उसे नहीं समझा। तब वह उन के साथ गया, और नासरत में आया, और उन के वश में रहा; और उस की माता ने ये सब बातें अपने मन में रखीं॥ और यीशु बुद्धि और डील-डौल में और परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़ता गया॥

माँ मरियम[संपादित करें]

छठवें महीने में परमेश्वर की ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत गलील के नासरत नगर में एक कुंवारी के पास भेजा गया। जिस की मंगनी यूसुफ नाम दाऊद के घराने के एक पुरूष से हुई थी: उस कुंवारी का नाम मरियम था। और स्वर्गदूत ने उसके पास भीतर आकर कहा; आनन्द और जय तेरी हो, जिस पर ईश्वर का अनुग्रह हुआ है, प्रभु तेरे साथ है। वह उस वचन से बहुत घबरा गई, और सोचने लगी, कि यह किस प्रकार का अभिवादन है? स्वर्गदूत ने उस से कहा, हे मरियम; भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है। और देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना। वह महान होगा; और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा; और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उस को देगा। और वह याकूब के घराने पर सदा राज्य करेगा; और उसके राज्य का अन्त न होगा। मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, यह क्योंकर होगा? मैं तो पुरूष को जानती ही नहीं। स्वर्गदूत ने उस को उत्तर दिया; कि पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ तुझ पर छाया करेगी इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।

चमत्कार[संपादित करें]

क़ुरान मे[संपादित करें]

क़ुरान मे इसा का नाम 25 बार अया हे । सुराह मर्यम मे इंके जनम की कथा हे और इसी तरह सुराह अलि इम्रान मे भी।

मुहम्मद ओर ईसा मसीह[संपादित करें]

मुहम्मद के हदिसो मे हे कि "तमाम नबी भाइ हे ओर ईसा मसीह मेरे सब्से क़रीबी भाई है क्यूंकि मेरे ओर ईसा मसीह के दर्मियान कोइ नबी नही अया है"।

इस्लाम के अनुसार , ईसा मसीह का मृत्यू या धर्ती से ज़िंदा उठाऐ गऐ[संपादित करें]

ईसा मसीह उन से कहा, यों लिखा है; कि मसीह दु:ख उठाएगा, और तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठेगा। और यरूशलेम से लेकर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा। तुम इन सब बातें के गवाह हो। और देखो, जिस की प्रतिज्ञा मेरे पिता ने की है, मैं उस को तुम पर उतारूंगा और जब तक स्वर्ग से सामर्थ न पाओ, तब तक तुम इसी नगर में ठहरे रहो॥ तब वह उन्हें बैतनिय्याह तक बाहर ले गया, और अपने हाथ उठाकर उन्हें आशीष दी। और उन्हें आशीष देते हुए वह उन से अलग हो गया और स्वर्ग से उठा लिया गया। और वे उस को दण्डवत करके बड़े आनन्द से यरूशलेम को लौट गए। और लगातार मन्दिर में उपस्थित होकर परमेश्वर की स्तुति किया करते थे॥

इस्लाम और यहूदी मत[संपादित करें]

इस्लाम बाइबिल में ईसा मसीह को एक आदरणीय नबी (मसीहा) माना जाता है, जो ईश्वर ने इस्राइलियों को उनके संदेश फैलाने को भेजा था। क़ुरान में ईसा के नाम का ज़िक्र मुहम्मद से भी ज़्यादा है, और मुसुल्मान ईसा के कुंआरी द्वारा जन्म में मानते हैं।

इस्लाम में ईसा मसीह महज़ एक नश्वर इंसान माना जाता है, सब नबियों की तरह, और ईश्वर-पुत्र या त्रिमूर्ति का सदस्य नहीं , और उनकी पूजा पर मनाही है । उन्हें चमत्कार करने की क्षमता ईश्वर से मिली थी, और ख़ुद ईसा मसीह में ऐसी शक्तियां नहीं मौजूद थीं। यह भी नहीं माना जाता है कि वे क्रूस पर लटके। इस्लामी परंपरा के मुताबिक़, क्रूस पर मरने के ब-वजूद, ईश्वर ने उन्हें सीधे स्वर्ग में उठाया गया था। सब नबियों की तरह, ईसा मसीह भी क़ुरान में एक मुस्लिम कहलाता है। क़ुरान के मुताबिक़, ईसा मसीह ने अपने आप को ईशवर-पुत्र कभी नहीं माना और वे क़यामत के दिन पर इस बात का इंकार करेंगे। मुसुल्मानों की मान्यता है कि क़यामत के दिन पर, ईसा मसीह पृथ्वी पर लौटएगा और न्याय क़ैयाम करेगा।


यहूदी ईसा मसीह को न तो मसीहा मानते हैं न ईश्वर-पुत्र । वे अपने मसीहा का आज भी इंतज़ार करते हैं ।