ईसा मसीह
ईसा या यीशु मसीह या जीज़स क्राइस्ट (इब्रानी : येशुआ),इस्लाम के अज़ीम तरीन पेग़मबरों मे से एक है और ईसाई धर्म के प्रवर्तक माने जाते हैं। ईसाई लोग उन्हें परमपिता परमेश्वर का पुत्र और ईसाई त्रिमूर्ति का तृतीय सदस्य मानते हैं। ईसा की जीवनी और उपदेश बाइबिल के नये नियम (ख़ास तौर पर चार शुभसन्देश -- मत्ती , लूका, युहन्ना और मर्कुस) में दिये गये हैं । ईसा को ईस्लाम मै भी अज़ीम पैग़्बरो मै है.।
अनुक्रम |
जन्म [संपादित करें]
ईसा मसीह का जन्म २ ईसापूर्व में इस्राइल के नासिरत प्रान्त के एक गाँव बैतलहम में बहुत कठिन परिस्थितियों में हुआ था । उनकी माता मरियम उनके जन्म के समय कुमारी थीं (नाम-मात्र के लिये उनकी यूसुफ़ से शादी हो गई थी) । बाइबिल के मुताबिक़ मरियम को ईश्वर द्वारा सन्देश मिला था कि उनके गर्भ से ईश्वरपुत्र जन्म लेगा । यहूदी धर्म के नबियों ने सदियों पहले एक उद्धारक या मुक्तिदाता (मसीहा) के आने की भविष्यवाणी की थी । ईसा और उनका परिवार जन्मजात यहूदी थे ।
जन्म और बचपन [संपादित करें]
पौने दो हजार साल पहले की बात है। फिलिस्तीन में उन दिनों हिरोद का राज था। सम्राट आगस्ट्स के हुक्म से रोमन जगत की मर्दुमशुमारी हो रही थी। उसमें शामिल होने के लिए यूसुफ नाम का यहूदी बढ़ई नज़रथ नगर से बैतलहम के लिए रवाना हुआ। वहीं पर उसकी पत्नी मरियम (मेरी) के गर्भ से ईसा का जन्म हुआ।
संयोग ऐसा था कि उस समय इन बेचारों को किसी धर्मशाला में भी ठिकाना न मिल सका। इस लाचार बच्चे को कपड़ों में लपेटकर चरनी (पशुओं की नाद) में रख दिया गया। आठवें दिन बच्चे का नाम रखा गया, यीसु या ईसा। सौरी से निकलने के बाद मरियम और यूसुफ बच्चे को लेकर यरुशलम गए। उन दिनों ऐसी प्रथा थी कि माता-पिता बड़े बेटे को मंदिर में ले जाकर ईश्वर को अर्पित कर देते थे। इन लोगों ने भी इसी तरह ईसा को अर्पित कर दिया। ईसा दिन-दिन बड़े हो रहे थे। यूसुफ और मरियम हर साल यरुशलम जाते थे। ईसा भी साथ जाते थे।
ईसा जब बारह वर्ष के हुए, तो यरुशलम में दो दिन रुककर पुजारियों से ज्ञान चर्चा करते रहे। सत्य को खोजने की वृत्ति उनमें बचपन से ही थी।
यूहन्ना इस्तिबग़ी से बपतिस्मा [संपादित करें]
ईसा जब 30 साल के हुए, तो एक दिन किसी से उन्होंने सुना कि पास के जंगल में जॉर्डन नदी के किनारे एक महात्मा रहते हैं। उनका नाम है, यूहन्ना (जॉन)। बहुत से लोग उनका उपदेश सुनने जाते थे।
यूहन्ना कहते थे- अब धरती पर प्रभु के बादशाहत का समय आ गया है। प्रभु के बादशाहत में हर आदमी यह जान लेगा कि सब आदमी बराबर हैं न कोई किसी से ऊँचा है, न कोई किसी से नीचा। सब लोगों को आपस में मिल-जुलकर प्यार से रहना चाहिए और सबके साथ अच्छा बर्ताव करना चाहिए। इस तरह रहने और बुरे काम छोड़ देने से ही धरती पर प्रभु का बादशाहत आ सकेगा। सैनिक उनके पास जाते, तो वे उनसे कहते, दूसरों का माल मत छीनो। जो कुछ तुम्हें मिला है, उसी में खु़श रहो। किसी से गाली-गलौज मत करो। लोग पूछते, तब हम करें क्या? यूहन्ना कहते, जिसके पास दो कोट हैं, वह एक कोट उसे दे दे, जिसके पास एक भी नहीं है। जिसके पास भोजन है, वह उसे खिला दे, जिसके पास खाने के लिए कुछ नहीं है।
अमीर लोग यूहन्ना के पास जाते, तो वे उसे कहते, तुम ग़रीबों को सताओ मत। उन्हें लूटो मत। यूहन्ना लोगों से कहते, अच्छी करनी करो। अपना जीवन बदल डालो, नहीं तो तुम्हारी भी गति उस बिना फल वाले पेड़ की तरह होगी, जो ईंधन के लिए काट दिया जाता है। जो लोग उनसे कहते कि हम अपना जीवन बदलेंगे, बदी छोड़कर नेकी करेंगे, उन्हें वे यर्दन नदी में नहलाते और कहते, मैंने तुम्हें पानी से पवित्र किया है। तुम्हारी अंतरात्मा में प्रभु की जो शक्ति भरी है, वह तुम्हें पूरे तौर से पवित्र करेगी।
प्रभु के बादशाहत का उपदेश [संपादित करें]
इसके बाद प्रभु ईसा जगह-जगह प्रवचन करने लगे। वे लोगों से कहते, प्रभु का बादशाहत कहीं दूर नहीं है वह हमारे भीतर ही है। हमारी आत्मा के ही भीत है। हमें ही उसकी स्थापना करनी होगी। हम अपने आपको बदलकर, अपने में परिवर्तन करके प्रभु का बादशाहत ला सकते हैं।
उसके लिए हमें सबके साथ प्रेम करना होगा। सबके सुख में सुखी होना होगा। सबके दुःख में दुःखी होना होगा। हम अलग-अलग नहीं हैं, हम सब एक हैं- इस तरह हमें सोचना होगा और एक-दूसरे के साथ इसी तरह का व्यवहार करना होगा।
प्रभु के बादशाहत में अहंकार और घमंड के लिए स्थान नहीं है। अमीरों का वहाँ प्रवेश नहीं है। जो नाज़ुक हैं, विनीत हैं, गरीब हैं, दीन हैं, सच्चे हैं, ईमानदार हैं, दयालु हैं, उन्हीं को उस बादशाहत में प्रवेश मिलेगा।
स्वर्ग के बादशाहत में, प्रभु के बादशाहत में वे ही लोग जा सकेंगे, जो ईश्वर को आदेश को मानकर उसे अमल में लाकर दिखाएँगे।
ईसा के पाँच आदेश [संपादित करें]
ईसा ने पाँच आदेश दिए। उन्होंने कहा, 1. पुराने धर्मग्रंथ में कहा है कि किसी की हत्या मत करो और जो आदमी हत्या करता है, वह गुनहगार है। पर मैं तुमसे कहता हूँ कि जो आदमी अपने भाई पर गु़स्सा करता है, वह परमात्मा की नज़र में गुनहगार है। जो आदमी अपने भाई को गालियाँ देता है, कड़वी बातें कहता है, वह और ज़्यादा गुनहगार है। अपने भाई पर मन में जो क्रोध हो, उसे प्रार्थना करने के पहले निकाल दो। उससे सुलह कर लो।
2. पुराने धर्मग्रंथों में कहा है कि व्यभिचार मत करो और पत्नी से अलग होते हो, तो उसे तलाक़ दे दो। पर मैं तुमसे कहता हूँ कि व्यभिचार तो करना ही नहीं चाहिए। किसी पर बुरी नज़र डालने वाला भी ईश्वर के आगे गुनहगार है। जो आदमी पत्नी को तलाक़ देता है, वह खु़द व्यभिचार करता है और पत्नी से भी व्यभिचार कराने का कारण बनता है। जो आदमी उससे विवाह करता है, उसे भी वह गुनहगार बनाता है।
3. पुराने धर्मग्रंथ में कहा है कि क़सम न खाओ, मगर परमात्मा के आगे अपनी प्रतिज्ञाओं पर डटे रहो। पर मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम्हें किसी भी हालत में क़सम नहीं खानी चाहिए। किसी के बारे में पूछा जाए, तो 'हाँ' या 'न' में ही जवाब दे देना चाहिए।
4. पुराने धर्मग्रंथ में कहा है कि 'आँख के बदले आँख फोड़ दो, दाँत के बदले दाँत तोड़ दो।' पर मैं तुमसे कहता हूँ कि बुराई का बदला बुराई से मत दो। कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर चाँटा मारे, तो तुम बायाँ गाल भी उसके सामने कर दो।
5. पुराने धर्मग्रंथ में कहा है कि 'केवल अपनी ही नस्ल के लोगों से प्रेम करो। पर मैं तुमसे कहता हूँ क तुम्हें हर आदमी से प्रेम करना चाहिए। जो तुम्हें दुश्मन मानते हों, उनसे भी प्रेम करना चाहिए। सभी मनुष्य एक ही पिता की संतान हैं। सब भाई-भाई हैं। सबके साथ तुम्हें प्रेम का व्यवहार करना चाहिए।
पवित्र जीवन [संपादित करें]
'सत्यमय जीवन बिताओ। सब पर प्रेम करो। सब पर दया करो। दान करो। क्रोध मत करो। लोभ मत करो। विषय वासना के फेर में मत पड़ो। अपराधी को भी क्षमा करो। पाप से नफ़रत करो, पापी से नहीं। जो सत्य हो, उसे प्रकट करने में झिझको मत। न अन्याय करो, न अत्याचार न दिखावा करो, न प्रदर्शन। ईश्वर पर विश्वास करो। ग़रीबों की सेवा करो।'
यही था ईसा का संदेश, जिसे उन्होंने जनता के सामने रखा और अपने जीवन में चरितार्थ करके दिखा दिया। उनका सारा जीवन त्याग, सेवा और समर्पण की भावना से भरा पड़ा है।
चमत्कार [संपादित करें]
'विश्वास : फलदायकः'- विश्वास का फल होता है। कितने ही रोगी विश्वास से अच्छे हो गए। ईसा की प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी बारह लोग ईसा के शिष्य बने।
ईसा का विरोध [संपादित करें]
'पैसे वालों का स्वर्ग के बादशाहत में प्रवेश नहीं हो सकता। सूई के छेद से ऊँट भले निकल जाए, धनवान व्यक्ति प्रभु के बादशाहत में नहीं पहुँच सकता। अपनी सारी दौलत ग़रीबों में बाँटकर, किंन बनकर मेरे साथ आओ। ऐसी बातें सुनकर पैसे वाले लोग ईसा के विरोधी बन गए।
पुरानी ग़लत प्रथाओं का भी ईसा ने विरोध किया। सत्य के लिए वे किसी की परवाह नहीं करते थे। नतीजा यह हुआ कि दिन-दिन उनका विरोध बढ़ने लगा।
ईसा का बलिदान [संपादित करें]
सन् 29 ई. के लगभग प्रभु ईसा गधे पर चढ़कर यरुशलम पहुँचे। वही उनको पकड़ने और दंडित करने की साज़िश रची गई।
पिलातुस बोला, 'यह निर्दोष है'।
विरोधी बोले, 'यह अपने को 'ईश्वर का पुत्र' कहता है। इसे क्रूस (सलीब) पर लटकाना चाहिए।'
आखिर विरोधियों की ही बात मान ली गई।
ईसा ने क्रूस पर लटकते समय परमेश्वर से प्रार्थना की, 'हे प्रभु, क्रूस पर लटकाने वाले इन लोगों को क्षमा करं। वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।
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ईसा का संदेश [संपादित करें]
प्रभु ईसा ने जब से होश सँभाला, तभी से उन्हें लगा कि उनके यहूदी समाज में नाना प्रकार की ग़लत मान्यताएँ फैली हैं। उन्होंने उनका विरोध करके मनुष्य को सही रास्ते पर चलने की सीख दी। उस समय के समाज में आदमी अपने आपको बहुत नीच, पापी और अपवित्र मानकर आत्मग्लानि से पीड़ित रहता था। आदम-हौवा की ग़लती की मान्यता उसके सिर पर चढ़कर बोलती थी।
ईसा को यह चीज़ बुरी तरह खटकी। उन्होंने मनुष्य को संदेश दिया कि तुम तो पृथ्वी के नमक हो। विश्व के प्रकाश हो। तुम किसलिए अपने को अपवित्र और पापी समझते हो? परम पवित्र प्रभु की संतान को ऐसी मान्यता शोभा नहीं देती तुम अपने को नीच और अपवित्र मत समझो। अपना आदर करो। अपना आत्मसम्मान जगाओ। तुम सब परमपिता की संतान हो। सब बराबर हो। कोई नीचा नहीं, कोई ऊँचा नहीं।
क्रोध मत करो [संपादित करें]
क्रोध सारे उत्पात की जड़ है। दुनियाभर की बुराइयाँ क्रोध में भरी हैं, इसलिए क्रोध को दूर करना ज़रूरी है। सारी लड़ाइयाँ जरा-जरा सी बातों को लेकर होती हैं। ईसा ने इसे रोकने के लिए कहा-
1. जो कोई अपने किसी भाई पर क्रोध करता है, उसे ईश्वर की तरफ़ से सजा़ भोगनी पड़ेगी। 2. तुम दूसरे का सामना हमले से मत करो। चाहे जितना गुस्सा भरा रहे, दूसरे पर वार न करो। बुराई का बदला बुराई से मत दो। 3. दोस्त को ही नहीं, दुश्मन को भी प्यार करो।
जो तोकू काँटा बुवै, ताहि बोउ तू फूल!
सत्य बोलो [संपादित करें]
ईसा ने देखा कि लोग सत्य नहीं बोलते, झूठ बोलते हैं नमक-मिर्च लगाकर बता का बतंगड़ बना देते हैं और खू़ब झूठी कसमें काया करते हैं। यह आदत ठीक नहीं। उन्होंने कहा, 'तुम्हें जो कहना हो, 'हाँ' या 'न' में कह दो। ज़्यादा शब्द मुँह से निकालोगे, तो वे तुम्हारे भीतर भरे किसी पाप की वजह से ही निकलेंगे।' किसी पर बुरी नज़र न डालो ईसा ने मन की पवित्रता पर बहुत जोर दिया। उन्होंने कहा, 'जो आदमी मन से भी किसी स्त्री पर बुरी नज़र डालता है, उसने मानो उससे बदचलनी कर ही ली!'
नेकी कर और दरिया में डाल [संपादित करें]
ईसा ढोंग और दिखाए को बहुत बुरा मानते थे। उन्होंने इसकी कड़ी निंदा की। उनका कहना था कि 'नेकी कर और दरिया में डाल।' ईमानदार रहो। लोगों के साथ भला व्यवहार करो और क़सूर करने वाले को हमेशा क्षमा करते रहो।
ईश्वर पर विश्वास करो [संपादित करें]
हम मुँह से तो कहते हैं कि हम ईश्वर को मानते हैं, पर भीतर से अपने पर ही भरोसा रखते हैं। ईसा ने कहा, जीवन की ज़रूरतों की चिंता तुम व्यर्थ ही करते हो।
आगे-पीछे हरि खड़े, जब माँगूँ तब देय। माँगो, मिलेगा। दरवाजा खटखटाओ, खुलेगा। यह है, ईसा का पवित्र संदेश! सत्य, प्रेम और करुणा से ओतप्रोत!
जो कोई इसका पालन करेगा, उसका कल्याण हुए बिना नहीं रहेगा। जरूरत है, सच्चे जीसे, ईमानदारी से इस पर चलने की। काश, हम इस पवित्र मार्ग पर चल सकें!
धर्म-प्रचार [संपादित करें]
तीस साल की उम्र में ईसा ने इस्राइल की जनता को यहूदी धर्म का एक नया रूप प्रचारित करना शुरु कर दिया । उन्होंने कहा कि ईश्वर (जो केवल एक ही है) साक्षात प्रेमरूप है और उस वक़्त के वर्त्तमान यहूदी धर्म की पशुबलि और कर्मकाण्ड नहीं चाहता । यहूदी ईश्वर की परमप्रिय नस्ल नहीं है, ईश्वर सभी मुल्कों को प्यार करता है । इंसान को क्रोध में बदला नहीं लेना चाहिए और क्षमा करना सीखना चाहिए । उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे ही ईश्वर के पुत्र हैं, वे ही मसीह हैं और स्वर्ग और मुक्ति का मार्ग हैं । यहूदी धर्म में क़यामत के दिन का कोई ख़ास ज़िक्र या महत्त्व नहीं था, पर ईसा ने क़यामत के दिन पर ख़ास ज़ोर दिया - क्योंकि उसी वक़्त स्वर्ग या नर्क इंसानी आत्मा को मिलेगा । ईसा ने कई चमत्कार भी किए ।
विरोध, मृत्यु और पुनरुत्थान [संपादित करें]
यहूदियों के कट्टरपन्थी रब्बियों (धर्मगुरुओं) ने ईसा का भारी विरोध किया । उन्हें ईसा में मसीहा जैसा कुछ ख़ास नहीं लगा । उन्हें अपने कर्मकाण्डों से प्रेम था । ख़ुद को ईश्वरपुत्र बताना उनके लिये भारी पाप था । इसलिये उन्होंने उस वक़्त के रोमन गवर्नर पिलातुस को इसकी शिकायत कर दी । रोमनों को हमेशा यहूदी क्रान्ति का डर रहता था । इसलिये कट्टरपन्थियों को प्रसन्न करने के लिए पिलातुस ने ईसा को क्रूस (सलीब) पर मौत की दर्दनाक सज़ा सुनाई ।
बाइबल के मुताबिक़, रोमी सैनिकों ने ईसा को कोड़ों से मारा। उन्हें शाही कपड़े पहनाए ,उनके सर पर कांटों का ताज सजाया और उनपर थूका, और ऐसे उन्हें तौहीन में "यहूदियों का बादशाह" बनाया। पीठ पर अपना ही क्रूस उठवाके, रोमियों ने उन्हें गल्गता तक लिया, जहां पर उन्हें क्रूस पर लटकाना था। गल्गता पहुंचने पर, उन्हें मदिरा और पित्त का मिश्रण पेश किया गया था। उस युग में यह मिश्रण मृत्युदंड की अत्यंत दर्द को कम करने के लिए दिया जाता था। ईसा ने इसे इंकार किया। बाइबल के मुताबिक़, ईसा दो और के बीच क्रूस पर लटकाया गया था।
ईसाइयों का मानना है कि क्रूस पर मरते समय ईसा मसीह ने सभी इंसानों के पाप स्वयं पर ले लिए थे और इसलिए जो भी ईसा में विश्वास करेगा, उसे ही स्वर्ग मिलेगा । मृत्यु के तीन दिन बाद ईसा वापिस जी उठे और 40 दिन बाद सीधे स्वर्ग चले गए । ईसा के 12 शिष्यों ने उनके नये धर्म को सभी जगह फैलाया । यही धर्म ईसाई धर्म कहलाया ।
इस्लाम [संपादित करें]
जनम [संपादित करें]
लड़कपन [संपादित करें]
माँ मर्यम [संपादित करें]
चमत्कार [संपादित करें]
मक़ाम और मर्तबा [संपादित करें]
इस्लाम मै इसा उन पाँच अज़ीम अनबिया मै से है जिन्को अ़ला कहा जाता हे।इस्लाम मे इंको बड़ा मक़ाम हासिल हे।इस्लाम में ईसा महज़ एक नश्वर इंसान माना जाता है, सब नबियों की तरह, और ईश्वर-पुत्र या त्रिमूर्ति का सदस्य नहीं , और उनकी पूजा पर मनाही है।
क़ुरान मे [संपादित करें]
क़ुरान मे इसा का नाम 25 बार अया हे । सुराह मर्यम मे इंके जनम की कथा हे और इसी तरह सुराह अलि इम्रान मे भी।
मुहम्मद ओर ईसा [संपादित करें]
मुहम्मद के हदिसो मे हे कि "तमाम नबी भाइ हे ओर ईसा मेरे सब्से क़रीबी भाई है क्यूंकि मेरे ओर ईसा के दर्मियान कोइ नबी नही अया है"।
इस्लाम के अनुसार , ईसा का मृत्यू या धर्ती से ज़िंदा उठाऐ गऐ [संपादित करें]
इस्लाम और यहूदी मत [संपादित करें]
इस्लाम में ईसा को एक आदरणीय नबी (मसीहा) माना जाता है, जो ईश्वर ने इस्राइलियों को उनके संदेश फैलाने को भेजा था। क़ुरान में ईसा के नाम का ज़िक्र मुहम्मद से भी ज़्यादा है, और मुसुल्मान ईसा के कुंआरी द्वारा जन्म में मानते हैं।
इस्लाम में ईसा महज़ एक नश्वर इंसान माना जाता है, सब नबियों की तरह, और ईश्वर-पुत्र या त्रिमूर्ति का सदस्य नहीं , और उनकी पूजा पर मनाही है । उन्हें चमत्कार करने की क्षमता ईश्वर से मिली थी, और ख़ुद ईसा में ऐसी शक्तियां नहीं मौजूद थीं। यह भी नहीं माना जाता है कि वे क्रूस पर लटके। इस्लामी परंपरा के मुताबिक़, क्रूस पर मरने के ब-वजूद, ईश्वर ने उन्हें सीधे स्वर्ग में उठाया गया था। सब नबियों की तरह, ईसा भी क़ुरान में एक मुस्लिम कहलाता है। क़ुरान के मुताबिक़, ईसा ने अपने आप को ईशवर-पुत्र कभी नहीं माना और वे क़यामत के दिन पर इस बात का इंकार करेंगे। मुसुल्मानों की मान्यता है कि क़यामत के दिन पर, ईसा पृथ्वी पर लौटएगा और न्याय क़ैयाम करेगा।
यहूदी ईसा को न तो मसीहा मानते हैं न ईश्वर-पुत्र । वे अपने मसीहा का आज भी इंतज़ार करते हैं ।