असामान्य मनोविज्ञान

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आसामान्य मनोविज्ञान (Abnormal Psychology) मनोविज्ञान की वह शाखा है जो मनुष्यों के असाधारण व्यवहारों, विचारों, ज्ञान, भावनाओं और क्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करती है। असामान्य या असाधारण व्यवहार वह है जो सामान्य या साधारण व्यवहार से भिन्न हो। साधारण व्यवहार वह है जो बहुधा देखा जाता है और जिसको देखकर कोई आश्चर्य नहीं होता और न उसके लिए कोई चिंता ही होती है। वैसे तो सभी मनुष्यों के व्यवहार में कुछ न कुछ विशेषता और भिन्नता होती है जो एक व्यक्ति को दूसरे से भिन्न बतलाती है, फिर भी जबतक वह विशेषता अति अद्भुत न हो, कोई उससे उद्विग्न नहीं होता, उसकी ओर किसी का विशेष ध्यान नहीं जाता। पर जब किसी व्यक्ति का व्यवहार, ज्ञान, भावना, या क्रिया दूसरे व्यक्तियों से विशेष मात्रा और विशेष प्रकार से भिन्न हो और इतना भिन्न होकि दूसरे लोगों को विचित्र जान पड़े तो उस क्रिया या व्यवहार को असामान्य या असाधारण कहते हैं।

इसका विषय-वस्तु मूलतः अनाभियोजित व्यवहारों (maladaptive behaviour), व्यक्तित्व अशांति (Personality disturbances) एवं विघटित व्यक्तित्व (disorganized personality) का अध्ययन करने तथा उनके उपचार (treatment) के तरीकों पर विचार करने से संबंधित है। असामान्य मनोविज्ञान के अन्तर्गत के अन्तर्गत आने वाले कुछ महत्त्वपूर्ण विषय हैं-

  • नैदानिक वर्गीकरण एवं मूल्यांकन (clinical classification assessment),
  • असामान्य व्यवहार के सामान्य सिद्धान्त एवं मॉडल, असामान्य व्यवहार के कारण,
  • स्वप्न, चिंता विकृति (Anxiety disorder),
  • मनोविच्छेदी विकृति, मनोदैहिक विकृति, वयक्तित्व विकृति,
  • द्रव्य-संबंद्ध विकृति, मनोदशा विकृति (Mood disorder), मनोविदालिता, (Schizophrenia),
  • व्यामोही विकृति, (Delusional disorder), मानसिक मंदन, (Mental retardation), मनश्चिकित्सा (Psychotherapy) आदि।

असामान्य मनोविज्ञान के प्रकार[संपादित करें]

असामान्य मनोविज्ञान के कई प्रकार होते हैं :

(1) अभावात्मक, जिसमें किसी ऐसे व्यवहार, ज्ञान, भावना और क्रिया में से किसी का अभाव पाया जाए तो साधारण या सामान्य मनुष्यों में पाया जाता हो। जैसे किसी व्यक्ति में किसी प्रकार के इंद्रियज्ञान का अभाव, अथवा कामप्रवृत्ति अथवा क्रियाशक्ति का अभाव।

(2) किसी विशेष शक्ति, ज्ञान, भाव या क्रिया की अधिकता या मात्रा में वृद्धि।

(3) किसी विशेष शक्ति, ज्ञान, भाव या क्रिया की अधिकता या मात्रा में वृद्धि।

(4) असाधारण व्यवहार से इतना भिन्न व्यवहार कि वह अनोखा और आश्चर्यजनक जान पड़े। उदाहरणार्थ कह सकते हैं कि साधारण कामप्रवृत्ति के असामान्य रूप का भाव, कामह्रास, कामाधिक्य और विकृत काम हो सकते हैं।

किसी प्रकार की असामान्यता हो तो केवल उसी व्यक्ति को कष्ट और दु:ख नहीं होता जिसमें वह असामान्यता पाई जाती है, बल्कि समाज के लिए भी वह कष्टप्रद होकर एक समस्या बन जाती है। अतएव समाज के लिए असामान्यता एक बड़ी समस्या है। कहा जाता है कि संयुक्त राज्य, अमरीका में 10 प्रतिशत व्यक्ति असामान्य हैं, इसी कारण वहाँ का समाज समृद्ध और सब प्रकार से संपन्न होता हुआ थी सुखी नहीं कहा जा सकता।

कुछ असामान्यताएँ तो ऐसी होती हैं कि उनके कारण किसी की विशेष हानि नहीं होती, वे केवल आश्चर्य और कौतूहल का विषय होती हैं, किंतु कुछ असामान्यताएँ ऐसी होती हैं जिनके कारण व्यक्ति का अपना जीवन दु:खी, असफल और असमर्थ हो जाता है, पर उनसे दूसरों को विशेष कष्ट और हानि नहीं होती। उनको साधारण मानसिक रोग कहते हैं। जब मानसिक रोग इस प्रकार का हो जाए कि उससे दूसरे व्यक्तियों को भय, दु:ख, कष्ट और हानि होने लगे ते उसे पागलपन कहते हैं। पागलपन की मात्रा जब अधिक हो जाती है तो उस व्यक्ति को पागलखाने में रखा जाता है, ताकि वह स्वतंत्र रहकर दूसरों के लिए कष्टप्रद और हानिकारक न हो जाए।

उस समय और उन देशों में जब और जहाँ मनोविज्ञान का अधिक ज्ञान नहीं था, मनोरोगी और पागलों के संबंध में यह मिथ्या धारणा थी कि उनपर भूत, पिशाच या हैवान का प्रभाव पड़ गया है और वे उनमें से किसी के वश में होकर असामान्य व्यवहार करते हैं। उनको ठीक करने के लिए पूजा पाठ, मंत्र तंत्र और यंत्र आदि का प्रयोग होता था अथवा उनको बहुत मार पीटकर उनके शरीर से भूत पिशाच या शैतान भगाया जाता था।

आधुनिक समय में मनोविज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि अब मनोरोग, पागलपन और मनुष्य के असामान्य व्यवहार के कारण, स्वरूप और उपचार को बहुत लोग जान गए हैं।

असामान्य मनोविज्ञान की विषय-वस्तु[संपादित करें]

असामान्य मनोविज्ञान में इन विषयों की विशेष चर्चा होती है :

(1) असामान्यता का स्वरूप और उसकी पहचान।

(2) साधारण मानवीय ज्ञान, क्रियाओं, भावनाओं और व्यक्तित्व तथा सामाजिक व्यवहार के अनेक प्रकारों में अभावात्मक विकृतियों के स्वरूप, लक्षण और कारणों का अध्ययन।

(3) ऐसे मनोरोग जिनमें अनेक प्रकार की मनोविकृतियाँ उनके लक्षणों के रूप में पाई जाती है। इनके होने से व्यक्ति के आचार और व्यवहार में कुछ विचित्रता आ जाती है, पर वह सर्वथा निकम्मा और अयोग्य नहीं हो जाता। इनको साधारण मनोरोग कह सकते हैं। ऐसे किसी रोग में मन में कोई विचार बहुत दृढ़ता के साथ बैठ जाता है और हटाए नहीं हटता। यदा-कदा और अनिवार्य रूप से वह रोगी के मन में आता रहता है। किसी में किसी असामान्य विचित्र और अकारण विशेष भय यदा-कदा और अनिवार्य रूप से अनुभव होता रहता है। जिन वस्तुओं से साधारण मनुष्य नहीं डरते, मानसिक रोगी उनसे भयभीत होता है। कुछ लोग किसी विशेष प्रकार की क्रिया को करने के लिए, जिसकी उनको किसी प्रकार की आवश्यकता नहीं, अपने अंदर से इतने अधिक प्रेरित और बाध्य हो जाते हैं कि उन्हें किए बिना उनको चैन नहीं पड़ती।

(4) असामान्य व्यक्तित्व जिसकी अभिव्यक्ति नाना के उन्मादों (हिस्टीरिया) में होती है। इस रोग में व्यक्ति के स्वभाव, विचारों, भावों और क्रियाओं में स्थिरता, सामंजस्य और परिस्थितियों के प्रति अनुकूलता का अभाव, व्यक्तित्व के गठन की कमी और अपनी ही क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं पर अपने नियंत्रण का ह्रास हो जाता है। द्विव्यक्तित्व अथवा व्यक्तित्व की तब्दीली, निद्रावस्था में उठकर चलना फिरना, अपने नाम, वंश और नगर का विस्मरण होकर दूसरे नाम आदि का ग्रहण कर लेना इत्यादि बातें हो जाती हैं। इस रोग का रोगी, अकारण ही कभी रोने, हंसने, बोलने लगता है; कभी चुप्पी साध लेता है। शरीर में नाना प्रकार की पीड़ाओं और इंद्रियों में नाना प्रकार के ज्ञान का अभाव अनुभव करता है। न वह स्वयं सुखी रहता है और न कुटुब के लोगों को सुखी रहने देता है।

(5) भयंकर मानसिक रोग, जिनके हो जाने से मनुष्य का व्यक्तिगत जीवन निकम्मा, असफल और दु:खी हो जाता है और समाज के प्रति वह व्यर्थ भाररूप और भयानक हो जाता है; उसको और लोगों से अलग रखने की आवश्यकता पड़ती है। इस कोटि में ये तीन रोग आते हैं :

(अ) उत्साह-विषाद-मय पागलपन-इस रोग में व्यक्ति को एक समय विशेष शक्ति और उत्साह का अनुभव होता हे जिस कारण उसमें असामान्य स्फूर्ति, चपलता, बहुभाषिता, क्रियाशलीता की अभिव्यक्ति होती है और दूसरे समय इसके विपरीत अशक्तता, खिन्नता, ग्लानि, चुप्पी, आलस्य और नाना प्रकार की मनोवेदनाओं का अनुभव होता है। पूर्व अवस्था में व्यक्ति जितना निरर्थक अतिकार्यशील होता है उतना ही दूसरी अवस्था में उत्साहहीन और आलसी हो जाता है। इसके लिए हाथ पैर उठाना और खाना पीना कठिन हो जाता है।

(आ) स्थिर भ्रमात्मक पागलपन-इस रोगवाले व्यक्ति के मन में कोई ऐसा भ्रम स्थिरता और दृढ़ता के साथ बैठ जाता है जो सर्वथा निर्मूल होता है; ऐसा असत्य होता है; उसे वह सत्य और वास्तविक समझता है। उसके जीवन का समस्त व्यवहार इस मिथ्या भ्रम से प्रेरित होता है। अतएव दूसरे लोगों को आश्चर्यजनक जान पड़ता है। बहुधा किसी प्रकार के बड़प्पन से संबंध रखता है जो वास्तव में उस व्यक्ति में नहीं हाता। जैसे, कोई बहुत साधारण या पिछड़ा हुआ व्यक्ति अपने को बहुत बड़ा विद्वान्, आविष्कारक, सुधारक, पैगंबर, धनवान, समृद्ध, भाग्यवान, सर्वस्वी, वल्लभ, भगवान् का अवतार, चक्रवर्ती राजा समझकर लोगों से उस प्रकार के व्यक्तित्व के प्रति जो आदर और सम्मान होना चाहिए उसकी आशा करता है। संसार के लाग जब उसकी आशा पूरी करते नहीं दिखाई देते तो ऐसे व्यक्ति के मन में इस परिस्थिति का समाधान करने के लिए एक दूसरा भ्रम उत्पन्न हो जाता है। वह सोचता है कि चूँंकि वह अत्यंत महान् और उत्कृष्ट व्यक्ति है इसलिए दुनिया उससे जलती और उसका निरादर करती है तथा उसको दु:ख और यातना देने एवं उसे मारने को उद्यत रहती है। बड़प्पन का और यातना का दोनों का भ्रम एक दूसरे के पाँचषक होकर ऐस व्यक्ति के व्यवहार को दूसरे लोगों के लिए रहस्यमय और भयप्रद बना देते हैं।

(ई) मनोह्रास, व्यक्तित्वप्रणाश या आत्मनाश रोग में पागलपन की पराकाष्ठा हो जाती है। व्यक्ति सर्वथा नष्ट होकर उसके विचारों, भावनाओं और कामों में किसी प्रकार का सामंजस्य, ऐक्य, परिस्थिति अनुकूलता, औचित्य और दृढ़ता नहीं रहती। अपनी किसी क्रिया, भावना या विचार पर उसका नियंत्रण नहीं रहता। देश, काल और परिस्थिति का ज्ञान लुप्त हो जाता है। उसकी सभी बातें अनर्गल और दूसरों की समझ में न आनेवाली होती हैं। वह व्यक्ति न अपने किसी काम का रहता है, न दूसरों के कुछ काम आ सकता है। ऐसे पागल सब कुछ खा लेते हैं; जो जी में आता है, बकते रहते हैं और जो कुछ मन में आता है, कर डालते हैं। न उन्हें लज्जा रहती है और न भय। विवेक का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

(6) अति उच्च प्रतिभाशाली और जन्मजात न्यून प्रतिभावाले व्यक्तियों का अध्ययन भी असामान्य मनोविज्ञान करता है। यद्यपि यह विश्वास बहुत पुराना है कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिभा की मात्रा भिन्न होती है, तथापि कुछ दिनों से पाश्चात्य देशों में मनुष्य की प्रतिभा की मात्रा की भिन्नता (न्यूनता, सामान्यता और अधिकता) को निर्धारित करने की रीति का आविष्कार हो गया है। यदि सामान्य मनुष्य की प्रतिभा की मात्रा की कल्पना 100 की जाए तो संसार में 20 से लेकर 200 मात्रा की प्रतिभावाले व्यक्ति पाए जाते हैं। इनमें से 90 से 110 तक की मात्रावालों को साधारण, 90 से कम मात्रावालों को निम्न और 110 तक की मात्रावालों को उच्च श्रेणी की प्रतिभावाले व्यक्ति कहना होगा। अतिनिम्न, निम्न और ईषत् निम्न तथा अति उच्च, उच्च और ईषत् उच्च मात्रावाले भी बहुत व्यक्ति मिलेंगे। इन विशेष प्रकार की प्रतिभावालों के ज्ञान, भाव और क्रियाओं का अध्ययन भी असामान्य मनोविज्ञान करता है।

(7) असामान्य मनोविज्ञान जाग्रत अवस्था से स्वप्न, सुषुप्ति और समाधि, मूर्छा, सम्मोहित निद्रा, निद्राहीनता और निद्रभ्रमण आदि अवस्थाओं को भी समझने का प्रयत्न करता है और यह जानना चाता है कि जाग्रत अवस्था से इसका क्या संबंध है।

(8) मनुष्य के साधारण जाग्रत व्यवहार में भी कुछ ऐसी विचित्र और आकस्मिक घटनाएँ होती रहती हैं जिनके कारणों का ज्ञान नहीं होता और जिनपर उनके करनेवालों को स्वयं विस्मय होता है। जैसे, किसी के मुंह से कुछ अद्वितीय, अवांछित और अनुपयुक्त शब्दों का निकल पड़ना, कुछ अनुचित बातें कलम से लिख जाना; जिनके करने का इरादा न होते हुए और जिनको करके पछतावा होता है, ऐसे कामों को कर डालना। इस प्रकार की घटनाओं का भी असामान्य मनोविज्ञान अध्ययन करता है।

(9) अपराधियों और विशेषत: उन अपराधियों की मनोवृत्तियों का भी असामान्य मनोविज्ञान अध्ययन करता है जो मन की दुर्बलताओं और मानसिक रुग्णता के कारण एवं अपने अज्ञात मन की प्रेरणाओं और इच्छाओं के कारण अपराध करते हैं।

असामान्य और असाधारण व्यवहारों के कारण[संपादित करें]

उपर्युक्त विषयों का वैज्ञानिक रीति से अध्ययन करना असामान्य मनोविज्ञान का काम है, इसपर कोई मतभेद नहीं है; पर इस विज्ञान में इस विषय पर बड़ा मतभेद है कि इन असामान्य और असाधारण घटनाओं के कारण क्या हैं। यह तो सभी वैज्ञानिक मानते हैं कि मनोविकृतियों की उत्पत्ति के कारणों में भूत, पिशाच, शैतान आदि के प्रभाव का मानना अनावश्यक और अवैज्ञानिक है। उनके कारण तो शरीर, मन और सामाजिक परिस्थितियों में ही ढूंढ़ने होंगे। इस संबंध में अनेक मत प्रचलित होते हुए भी तीन मतों को प्रधानता दी जा सकती है और उनमें समन्वय भी किया जा सकता है। वे ये हैं :

(1) शारीरिक तत्वों का रासायनिक ह्रास अथवा अतिवृद्धि। विषैले रासायनिक तत्वों का प्रवेश या अंतरुत्पादन और शारीरिक अंगों तथा अवयवों की, विशेषत: मस्तिष्क और स्नायुओं की, विकृति अथवा विनाश।

(2) सामाजिक परिस्थितियों की अत्यंत प्रतिकूलता और उनसे व्यक्ति के ऊपर अनुपयुक्त दबाव तथा उनके द्वारा व्यक्ति की पराजय। बाहरी आघात और साधनहीनता।

(3) अज्ञात और गुप्त मानसिक वासनाएँ, प्रवृत्तियाँ और भावनाएँ जिनका ज्ञान मन के ऊपर अज्ञात रूप से प्रभाव डालता है। इस दिशामें खोज करने में फ्रायड, एडलर और युंग ने बहुत कार्य किया है और उनकी बहुमूल्य खोजों के आधार पर बहुत से मानसिक रोगों का उपचार भी हो जाता है।

मानसिक असामान्यताओं और रोगों का उपचार[संपादित करें]

मानसिक असामान्यताओं और रोगों का उपचार भी असामान्य मनोविज्ञान के अंतर्गत होता है।

रोगों के कारणों के अध्ययन के आधार पर ही अनेक प्रकार के उपचारों का निर्माण होता है। उनमें प्रधान ये हैं :

(1) रासायनिक कर्मी की पूर्ति।

(2) संमोहन द्वारा निर्देश देकर व्यक्ति की सुप्त शक्तियों का उद्बोधन।

(3) मनोविश्लेषण, जिसके द्वारा अज्ञात मन में निहित कारणों का ज्ञान प्राप्त करके दूर किया जाता है।

(4) मस्तिष्क की शल्यचिकित्सा।

(5) पुन:शिक्षण द्वारा बालकपन में हुए अनुपयुक्त स्वभावों को बदलकर दूसरे स्वभावों और प्रतिक्रियाओं का निर्माण इत्यादि।

अनेक प्रकार की विधियों का प्रयोग मानसिक चिकित्सा में किया जाता है।

इतिहास[संपादित करें]

आसामान्य व्यवहार का अध्ययन कोई नया कदम नहीं है बल्कि इसका एक लम्बा रोचक इतिहास है। असामान्य व्यवहार या मानसिक बीमारियों के अध्ययन की शुरुआत मानव जाति के अभिलिखित इतिहास (recorded history) से ही होती है हालाँकि मानव जाति की सृष्टि का इतिहास तो उससे काफी पहले शुरू होता है। अति प्राचीनकाल में असामान्य व्यवहार का कोई ऐतिहासिक उल्लेख मनोवैज्ञानिकों के पास नहीं है। उस समय का अध्ययन मात्र अधूरा था जो अवैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित था। उस समय से लेकर आज तक का असामान्य मनोविज्ञान के इतिहास को किश्कर (Kisker, 1985) के अनुसार निम्नांकित तीन प्रमुख भागों में बाँटा गया है-

  • पूर्ववैज्ञानिक काल : पुरातन समय से लेकर 1800 तक
  • आसामान्य मनोविज्ञान का आधुनिक उद्भव : 1801 से 1950 तक
  • आज का असामान्य मनोविज्ञान : 1951 से लेकर आज तक

असामान्य मनोविज्ञान एवं नैदानिक मनोविज्ञान की मुख्य घटनाएँ[संपादित करें]

(ईसवी सन्)

1791 : गलवानी (Galvani) इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि तंत्रिका आवेग (nerve impulse) का स्वरूप वैद्युतीय (electrical) होता है।

1794 : पिनेल ने मानसिक अस्पतालों से मानसिक रोगियों को लोहे की जंजीरों से मुक्त करने का आदेश दिया।

1807 : वेल (Bell) एवं मैगेनडाई (Megnedie) द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुँच गया कि संवेदी एवं पेशीय तंत्रिकाएँ संरचना तथा कार्य के खयाल से एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

1841 : डोरोथिया डिक्स (Dorothiya Dix) ने अमेरिका तथा यूरोप में मानसिक अस्पतालों को उन्नत बनाने के लिए कार्यक्रम तैयार किया।

1861 पॉल व्रोका (Paul Broca) ने मस्तिष्क में संभाषण (speech) विशिष्ठ क्षेत्रों का निर्धारण किया।

1870 फ्रिस्क (Fristch) हिटजीग (Hitzig) ने मस्तिष्क में विशिष्ठ संवेदी तथा पेशीय क्षेत्रों का पता लगाया।

1879 लिपजिग विश्वविद्यालय में विलहेल्म वुन्ट (Wilhelm Wundt) ने पहला मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला खोला और मनोविज्ञान को एक स्वातंत्र विज्ञान का दर्जा दिया गया। इस विश्वविद्यालय का वर्तमान नाम कालमार्क्स विश्वविद्यालय (Karl Marx University) है।

1883 जी. एस. हॉल (G. S. Hall) ने जान हापकिन्स विश्वविद्यालय (John Hopkinns University) पहले अमेरिकन मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना किया।

1885 सर फ्राँसिस गाल्टन ने लंदन में पहला मानसिक परीक्षण-कार्य (mental testing) केन्द्र की स्थापना किया।

1887 जी. एस. हाल द्वारा मनोवैज्ञानिक का प्रथम पेशेवर जनरल अमेरिका में प्रकाशित किया गया।–अमेरिकन जनरल ऑफ साइकोलोजी (American Journal of Psychology)

1890 जे. एस. कैटेल (J. S. Cattell) ने मानसिक परीक्षण (mental test) जैसे पद का सृजन किया।

1892 जी. एस. हाल (G. S. Hall) ने अमेरिकन मनोवैज्ञानिक संघ (American) Psychological Association) की स्थापना किया और इसके प्रथम अध्य्क्ष बने।

1895 ब्रियूअर (Breuer) तथा फ्रायड (Freud) ने एक साथ मिलकर अपनी पुस्तक स्टडीज इन हिस्ट्रीया (Studies in Hysteria) का प्रतिपादन किया।

1886 लाइटर विटमर (Lighter Witmer) ने पेनिस्लावैनिया विश्वविद्यालय (Pennsylavania University) में पहला मनोवैज्ञानिक उपचारगृह (clinic) खोला।

1896 काल पियरसन (Karl Pearson) ने सहसंबंध के साँख्यिकी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

1900 सिगमंड फ्रायड द्वारा अपनी बहुचर्चित पुस्तक दी इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम (The Interpretation of Dream) का प्रकाशन किया गया।

1904 : स्पीयरमैन ने बुद्धि की व्याख्या सामान्य (General or g) तथा विशिष्ठ (Specific or s) कारक के रूप में पेश किया है.

1905 : फ्रांस में बिने तथा साइमन ने बच्चों के लिए पहला माननीकृत बुद्धि परीक्षण का निर्माण किया।

1907 : पहला नैदानिक जनरल जिसका नाम साइकोलाजिकल क्लिनिक (Psychological clinic) था, विटमर द्वारा प्रकाशित किया गया।

1908 : वाइनलैंड (Vineland) प्रशिक्षण स्कूल में पहला नैदानिक इटर्नशीप (clinical iternship) था, विटमर द्वारा प्रकाशित किया गया।

1909 : विलियम हीली (William Healy) द्वारा पहला बाल निदेशक केन्द्र तथा शिकागो में जुवेनाइल साइकोपैथिक इन्स्टीट्यूट (Juvenile Psychopathic Insititute) की स्थापना की गयी।

1910 : बिने-साइमन परीक्षण का 1908 के संशोधित संस्करण का गोडार्ड (Goddard) द्वारा किया गया अंग्रेजी अनुवाद का प्रकाशन हुआ।

1911 : स्टर्न (Stern) द्वारा बुद्धिलब्ध (Intelligence Quotient or IQ) के संप्रत्यय का विकास हुआ।

1912 : जे.वी. वाटसन (J.B. Watson) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक साइकोलोजी एज ए बिहेवियरिस्ट व्यूज इट (Psychology as a Behaviourist views it) का प्रकाशन किया।

1913 : कार्ल युंग (Carl Jung ) अपने आपको फ्रायड से अलग करके वैश्लेषिक स्कूल (analytical school) की स्थापना किया।

1916 : स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में टरमैन (Terman) द्वारा बिने-साइमन परीक्षण (Binet-Simon test) का अमेरिका में उपयोग के लिये संशोधित किया गया। इस नयी परीक्षण को स्टैन-फोर्ड बिने-परीक्षण कहा गया।

1917 : अमेरिकन सैनिकों के उपयोग के लिए बुद्धि का प्रथम समूह परीक्षण का निर्माण किया गया।

1917 : नैदानिक मनोवैज्ञानिक द्वारा अमेरिकन मनोवैज्ञानिक संघ (American Psychological Association) से संबंध विच्छेद करके नया संघ अमेरिका एशोसियशन ऑफ क्लिनिकल साइकोलाजी (American Association of Clinical Psychology or AACP) की स्थापना की गयी।

1919 : AACP पुनः अमेरिकन मनोवैज्ञानिक संघ के नैदानिक विभाग (clinical section) से जुड़ गया।

1921 : जे. एम. कैटेल द्वारा ‘साइकोलोजिकल कारपोरेशन’ (Psychological Corporation) की स्थापना की गयी।

1921 हरमान रोशार्क (Harmann Rorschach) जो स्विटजरलैंड के एक मनोवैज्ञानिक थे, ने असंरचित सामाग्रियों के आधार पर व्यक्तित्व मापने का एक परीक्षण का निर्माण किया ।

1924 : डेविड लेवी (David Levy) द्वारा अमेरिका के रोशार्क परीक्षण का परिचय प्रारंभ किया गया।

1925 भारतीय मनोवैज्ञानिक संघ (Indian Psychological Association) की स्थापना की गयी।

1931 : एपीए (APA) का नैदानिक डिविजन ने शिक्षण मानक (Training standards) के लिए एक कमेटी का निर्माण किया।

1935 : मर्रे (Murray) द्वारा थीमेटिक एपरसेपसन टेस्ट (Thematic Apperception Test or TAT) का प्रकाशन हुआ।

1936 : नैदानिक मनोविज्ञान की पहली पुस्तक नैदानिक मनोविज्ञान (Clinical Psychology) का प्रकाशन लोउटिट (Louttit) द्वारा किया गया।

1939 : अमेरिकन मनोवैज्ञानिक संघ का नैदानिक विभाग का अमेरिकन एशोशियसन फॉर एपलायड साइकोलाजी (American Association for Applied Psychology or AAAP) से संबंध टूटा।

1937 : व्यक्तित्व विकास एवं कार्य में सामाजिक कारकों के महत्व को नवफ्रायडिन (Neo-Freudians) द्वारा बल डाला गया।

1938 : मेन्टल मेजरमेंट ईयरबुक (Mental Measurement Yearbook) का प्रथम प्रकाशन हुआ।

1939 वेक्सलर-वेलेव्यू बुद्धि परीक्षण (Wechler-Bellevue Intelligence test) का प्रकाशन हुआ।

1941-45 : द्वितीय विश्व-युद्ध की घटना के परिणाम स्वरूप नैदानिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में तेजी से फैलाव हुआ।

1942 : कार्ल रोजर्स (Carl Rogers) द्वारा क्लायंट-केन्द्रित चिकित्सा (Client-Centered therapy) का प्रतिपादन किया गया।

1943 : माइनेसोटा मल्टीफेजिक परसनालिटी इन्वेन्ट्री (Minnesota Multiphasic personality Inventory or MMPI) का निर्माण किया गया।

1945 : AAAP पुनः अमेरिकन मनोवैज्ञानिक संघ का सदस्य बना।

1946 नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ मेन्टल हेल्थ (National Institute of Mental Health) द्वारा नैदानिक मनोविज्ञानियों के परीक्षण का समर्थन किया गया।

1947 : पेशेवर मनोविज्ञान (Professional psychology) में परीक्षकों का अमेरिका बोर्ड (American Bord of Examiners) का संगठन किया गया।

1947 भारतीय मनोरोगविज्ञानी (Psychiatrist) संघ का गठन।

1952 : अमेरिकन मनोरोगविज्ञानी संघ (American psychiatric Association) द्वारा डायग्नोस्टिक एण्ड स्टैस्टीकल मैनुअल-1 (Diagnostic and Statistical Manual or DSM-1) का प्रकाशन किया गया।

1953 : अमेरिकन मनोवैज्ञानिक संघ (American Psychological Association) द्वारा मनोवैज्ञानिकों के लिए नैतिकता मानक (ethical standards) प्रकाशित किया गया।

1954 : अब्राहम मैसलो (Abraham maslow) द्वारा मानवतावादी अन्दोलन (Humanistic Moement) की शुरुआत किया गया। 1954 : बंगलौर में अखिल भारतीय मानसिक स्वास्थ संस्थान का गठन जिसका नाम बाद में निम्हांस (NIMHANS-National Institute of Mental Health and Neuro Science) कर दिया गया।

1962 : सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री (Central Institute of Psychiatry) कांके, राँची का स्थापना।

1965 : शिकागो ट्रेनिंग कनफ्रेंस का आयोजन किया गया।

1968 : इलिनोइस विश्वविद्यालय (Illinois University) द्वारा डॉक्टर ऑफ साइकोलोजी एण्ड स्टैटिस्टीकल मैनुअल का दूसरा संस्करण (Diagnostic and Statistical Manual or DSM-II) का प्रकाशन किया गया।

1968 भारतीय नैदानिक मनोवैज्ञानिक संघ का गठन।

1969 कैलीफोर्निया स्कूल ऑफ प्रोफेसनल साइकोलोजी (Clifornia School of Professional Psychology ) का स्थापना की गयी।

1978 : सोवियत रूस के आल्मा अटा में पूरे संसार में मानसिक स्वास्थ्य के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय घोषणा की गयी जिसे आल्मा अटा की घोषणाएँ (Declaration for Alma Ata) कहते हैं।

1980 : DSM का तीसरा संस्करण (DSM-III) का प्रकाशन किया गया।

1981 : अमेरिकन मनोवैज्ञानिक संघ द्वारा मनोवैज्ञानिकों के लिए नैतिक मानकों का संशोधित संस्करण प्रकाशित किया गया।

1987 : DSM-3 का संशोधित प्रारूप जिसे ‘DSM-3-Revision’ कहा गया, प्रकाशित किया गया।

1987 : मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम (Mental Health Act-, 1987) पारित

1988 : अमेरिकन साइकोलोजिकल सोसाइटी (American Psychological Society) की स्थापना की गयी।

1889 : MMPI का संशोधित संस्करण का प्रकाशन हुआ जिसे MMPI-2 कहा गया।

1994 : DSM-IV का प्रकाशन हुआ।

2000 : पारकिन्सन (Parkinson) रोग तथा अन्य तंत्रकीय रोगों (neurological disoders) के उपचार की खोज के लिए अर्विड कार्लसन (Arvid Carlsson) को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कार्लसन जो स्वीडन के एक वैज्ञानिक है, को यह पुरस्कार दो अमेरीकन वैज्ञानिक अर्थात् पाल ग्रीनगार्ड (Paull Greengard) एवं इरिक कैनडेल (Eric Kandel) के साथ संयुक्त रूप से दिया गया।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]